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प्रभास खण्ड · अध्याय 352

भल्लतीर्थमाहात्म्यवर्णनम्

अध्याय 351अध्याय-सूचीअध्याय 353

श्लोक 1 (skanda.7.352.1)

ईश्वर उवाच। ततो गच्छेन्महादेवि भल्लतीर्थमनुत्तमम्। तस्याश्च पश्चिमे भागे यत्र विष्णुश्चतुर्भुजः

īśvara uvāca| tato gacchenmahādevi bhallatīrtham anuttamam| tasyāśca paścime bhāge yatra viṣṇuścaturbhujaḥ

ईश्वर ने कहा—हे महादेवि, तदनन्तर अनुपम भल्लतीर्थ के पास जाना चाहिए, जिसके पश्चिम भाग में चतुर्भुज विष्णु विराजमान हैं।

श्लोक 2 (skanda.7.352.2)

यत्र त्यक्तं शरीरं तु विष्णुना प्रभविष्णुना। तस्मिन्मित्रवने रम्ये योजनार्द्धार्द्धविस्तृते

yatra tyaktaṁ śarīraṁ tu viṣṇunā prabhaviṣṇunā| tasminmitravane ramye yojanārdhārdhavistṛte

जहाँ शक्तिशाली विष्णु द्वारा शरीर त्याग दिया गया था, उस मनोहर मित्रवन में, जो आधे योजन में विस्तृत है।

श्लोक 3 (skanda.7.352.3)

युगेयुगे महादेवि कल्पमन्वतरादिषु। तत्रैव संस्थितिर्विष्णोर्नान्यत्र च रतिर्भवेत्

yuge yuge mahādevi kalpamanvantarādiṣu| tatraiva saṁsthitirviṣṇornānyatra ca ratirbhavet

हे महादेवि, युग-युग में, कल्प-मन्वन्तर आदि में, विष्णु की स्थिति वहीं रहती है; अन्यत्र उनकी रति नहीं होती।

श्लोक 4 (skanda.7.352.4)

क्षेत्राणामादिक्षेत्रं तु वैष्णवं तद्विदुर्बुधाः। तिस्रः कोट्यर्द्धकोटिश्च तीर्थानां प्रवराणि च

kṣetrāṇāmādikṣetraṁ tu vaiṣṇavaṁ tadvidurbudhāḥ| tisraḥ koṭyardhakoṭiśca tīrthānāṁ pravarāṇi ca

क्षेत्रों में यही वैष्णव क्षेत्र आदिक्षेत्र है—ऐसा विद्वान् जानते हैं। वहाँ तीन करोड़ और आधा करोड़ श्रेष्ठ तीर्थ हैं।

श्लोक 5 (skanda.7.352.5)

दिवि भुव्यंतरिक्षे च तानि तत्रैव भामिनि। तत्र मूर्तिमती गंगा स्वयमेव व्यवस्थिता

divi bhuvyantarikṣe ca tāni tatraiva bhāmini| tatra mūrtimatī gaṅgā svayameva vyavasthitā

हे भामिनि, जो तीर्थ स्वर्ग, पृथ्वी और अंतरिक्ष में हैं, वे सभी वहीं हैं। वहाँ गंगा स्वयं मूर्तिमती होकर स्थित हैं।

श्लोक 6 (skanda.7.352.6)

विष्णोः संप्लवनार्थाय प्राणिनां च हिताय वै। गंगा गया कुरुक्षेत्रं नैमिषं पुष्कराणि च

viṣṇoḥ saṁplavanārthāya prāṇināṁ ca hitāya vai| gaṅgā gayā kurukṣetraṁ naimiṣaṁ puṣkarāṇi ca

विष्णु के संप्लवन (स्नान-संस्कार) के लिए तथा प्राणियों के हित के लिए, गंगा, गया, कुरुक्षेत्र, नैमिष और पुष्कर—

श्लोक 7 (skanda.7.352.7)

पुरी द्वारवतीं त्यक्त्वा अत्रैव वसते हरिः। तस्यौर्ध्वदैहिकं देवि प्रकरोमि युगेयुगे

purīṁ dvāravatīṁ tyaktvā atraiva vasate hariḥ| tasyaurdhvadaihikaṁ devi prakaromi yuge yuge

द्वारवती नगरी को त्यागकर हरि यहीं निवास करते हैं। हे देवि, उनका ऊर्ध्वदैहिक (मृत्योत्तर) संस्कार मैं प्रत्येक युग में सम्पन्न करता हूँ।

श्लोक 8 (skanda.7.352.8)

नभस्ये द्वादशीयोगे तत्र गत्वा स्वयं प्रिये। करोमि तद्विधानेन तत्र ब्राह्मणपुंगवैः

nabhasye dvādaśīyoge tatra gatvā svayaṁ priye| karomi tadvidhānena tatra brāhmaṇapuṁgavaiḥ

नभस्य (भाद्रपद) मास की द्वादशी के योग में, वहाँ स्वयं जाकर, हे प्रिये, श्रेष्ठ ब्राह्मणों के साथ मैं वह कार्य विधिपूर्वक सम्पन्न करता हूँ।

श्लोक 9 (skanda.7.352.9)

तत्र दत्त्वा तु दानानि विधिवद्वेदपारगे। तत्रैव द्वादशीयोगे स्नात्वा चैव विधानतः

tatra dattvā tu dānāni vidhivadvedapārage| tatraiva dvādaśīyoge snātvā caiva vidhānataḥ

वहाँ वेदपारंगत ब्राह्मणों को विधिपूर्वक दान देकर, तथा उसी द्वादशी के योग में विधिपूर्वक स्नान करके,

श्लोक 10 (skanda.7.352.10)

सन्तर्प्य च पितॄन्भक्त्या मुच्यते सर्वपातकैः। तत्र विष्णुं तु संपूज्य कृत्वा जागरणं निशि

santarpya ca pitṝnbhaktyā mucyate sarvapātakaiḥ| tatra viṣṇuṁ tu saṁpūjya kṛtvā jāgaraṇaṁ niśi

और भक्तिपूर्वक पितरों को तर्पण देकर मनुष्य सभी पापों से मुक्त हो जाता है। वहाँ विष्णु का सम्यक् पूजन करके तथा रात्रि में जागरण करके,

श्लोक 11 (skanda.7.352.11)

दीपादिदानं कृत्वा तु कृतकृत्योऽभिजायते

dīpādidānaṁ kṛtvā tu kṛtakṛtyo'bhijāyate

तथा दीपदान आदि करके, मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है।

श्लोक 12 (skanda.7.352.12)

अथ तस्य प्रवक्ष्यामि पुरावृत्तमहं प्रिये। संहृत्य यादवान्सर्वान्वासुदेवः प्रतापवान्

atha tasya pravakṣyāmi purāvṛttamahaṁ priye| saṁhṛtya yādavānsarvānvāsudevaḥ pratāpavān

अब मैं तुम्हें उसका पुरातन वृत्तान्त बताता हूँ, हे प्रिये: प्रतापी वासुदेव ने समस्त यादवों का संहार करके—

श्लोक 13 (skanda.7.352.13)

दुर्वाससाऽनुलिप्तेन पायसेन पदस्तले। वज्रांगभूतदेहस्तु सर्वव्यापी जनार्द्दनः

durvāsasā'nuliptena pāyasena padastale| vajrāṅgabhūtadehastu sarvavyāpī janārdanaḥ

दुर्वासा द्वारा पायस से चरण-तल पर लेप किये जाने से, वज्र के समान अंगयुक्त देहवाला, सर्वव्यापी जनार्दन—

श्लोक 14 (skanda.7.352.14)

गत्वा तीरे समुद्रस्य समाधिस्थो बभूव ह। सर्वस्रोतांसि संयम्य निवेश्यात्मानमात्मनि

gatvā tīre samudrasya samādhistho babhūva ha| sarvasrotāṁsi saṁyamya niveśyātmānamātmani

समुद्र के तट पर जाकर वे समाधिस्थ हो गये, समस्त इन्द्रियों के स्रोतों को संयत करके अपनी आत्मा को आत्मा में स्थापित करके।

श्लोक 15 (skanda.7.352.15)

एतस्मिन्नंतरे प्राप्तो बाणहस्तो जराभिधः। दाशपुत्रोऽतिकृष्णांगो मत्स्यघाती च पापकृत्

etasminnantare prāpto bāṇahasto jarābhidhaḥ| dāśaputro'tikṛṣṇāṅgo matsyaghātī ca pāpakṛt

इसी बीच बाण हाथ में लिये जरा नामक व्यक्ति आया, जो धीवर-पुत्र, अत्यन्त श्याम अंगों वाला, मत्स्यघाती और पापकर्मा था।

श्लोक 16 (skanda.7.352.16)

तेन दृष्टस्ततो दूरान्निषादात्मसमुद्भवः। विष्णोः पदं मृगं मत्वा शरं तस्य मुमोच ह

tena dṛṣṭastato dūrānniṣādātmasamudbhavaḥ| viṣṇoḥ padaṁ mṛgaṁ matvā śaraṁ tasya mumoca ha

उस निषादकुलोत्पन्न पुरुष ने उन्हें दूर से देखा, और विष्णु के चरण को मृग समझकर उस पर बाण छोड़ दिया।

श्लोक 17 (skanda.7.352.17)

ततोऽसौ पश्यते यावद्गत्वा तस्य च संनिधौ। चतुर्बाहुं महाकायं शंखचक्रगदाधरम्

tato'sau paśyate yāvadgatvā tasya ca saṁnidhau| caturbāhuṁ mahākāyaṁ śaṅkhacakragadādharam

तब जैसे ही वह उनके समीप जाकर देखता है, तो उसे चतुर्भुज, महाकाय, शंख-चक्र-गदाधारी—

श्लोक 18 (skanda.7.352.18)

पुरुषं नीलमेघाभं पुडरीकनिभे क्षणम्। तं दृष्ट्वा भयभीतस्तु वेपमानः कृतांजलिः। अब्रवीन्न मया ज्ञातस्त्वं विभो दिव्यरूपधृक्

puruṣaṁ nīlameghābhaṁ puḍarīkanibhe kṣaṇam| taṁ dṛṣṭvā bhayabhītastu vepamānaḥ kṛtāñjaliḥ| abravīnna mayā jñātastvaṁ vibho divyarūpadhṛk

उस पुरुष को नीलमेघ के समान वर्ण वाला, क्षणभर के लिए पुण्डरीक के समान देखा। उसे देखकर वह भयभीत होकर, कांपते हुए, हाथ जोड़कर बोला—'हे विभो, मैंने आपको नहीं पहचाना, आप दिव्यरूपधारी हैं।'

श्लोक 19 (skanda.7.352.19)

अज्ञानात्त्वं मया विद्धस्त्वत्पदाग्रे सुरोत्तम। क्षन्तुमर्हसि मे नाथ न त्वं क्रोद्धुमिहार्हसि

ajñānāttvaṁ mayā viddhastvatpadāgre surottama| kṣantumarhasi me nātha na tvaṁ kroddhumihārhasi

'हे सुरोत्तम, अज्ञानवश आपके चरणाग्र में मैंने आपको बींध दिया है। हे नाथ, आप मुझे क्षमा करें; आपको यहाँ क्रोध करना उचित नहीं है।'

श्लोक 20 (skanda.7.352.20)

विष्णुरुवाच। शापस्यांतोद्य मे भद्र शरपातात्कृतस्त्वया। तस्मात्त्वं मत्प्रसादेन स्वर्गं गच्छ महाद्युते

viṣṇuruvāca| śāpasyāntodya me bhadra śarapātātkṛtastvayā| tasmāttvaṁ matprasādena svargaṁ gaccha mahādyute

विष्णु ने कहा—'हे भद्र, आज तुम्हारे बाण के गिरने से मेरे शाप का अन्त हुआ है। इसलिए हे महाद्युते, तुम मेरी कृपा से स्वर्ग को जाओ।'

श्लोक 21 (skanda.7.352.21)

ये चान्ये मामिहागत्य द्रक्ष्यंति हि नरोत्तमाः। ते यास्यंति परं स्थानं यत्राहं नित्यसंस्थितः

ye cānye māmihāgatya drakṣyanti hi narottamāḥ| te yāsyanti paraṁ sthānaṁ yatrāhaṁ nityasaṁsthitaḥ

'और जो अन्य श्रेष्ठ पुरुष यहाँ आकर मुझे देखेंगे, वे भी उस परम स्थान को प्राप्त होंगे, जहाँ मैं नित्य निवास करता हूँ।'

श्लोक 22 (skanda.7.352.22)

भल्लेनाहं यतो विद्धस्त्वया पादतले शुभे। भल्लतीर्थमिति ख्यातं ततो ह्येतद्भविष्यति

bhallenāhaṁ yato viddhastvayā pādatale śubhe| bhallatīrthamiti khyātaṁ tato hyetadbhaviṣyati

'चूँकि मैं तुम्हारे द्वारा अपने शुभ चरणतल में भल्ल (बाण) से बींधा गया हूँ, इसलिए यह स्थान भल्लतीर्थ के नाम से विख्यात होगा।'

श्लोक 23 (skanda.7.352.23)

हरिक्षेत्रमिति प्रोक्तं पूर्वं स्वायंभुवेऽन्तरे

harikṣetramiti proktaṁ pūrvaṁ svāyaṁbhuve'ntare

'पूर्वकाल में स्वायम्भुव मन्वन्तर में इसे हरिक्षेत्र कहा जाता था।'

श्लोक 24 (skanda.7.352.24)

ईश्वर उवाच। इत्युक्त्वांतर्दधे विष्णुर्लुब्धकोऽपि दिवं गतः। येऽत्र स्नानं करिष्यंति भक्त्या परमया युताः। विष्णुलोकं गमिष्यंति प्रीत्या ते मत्प्रसादतः

īśvara uvāca| ityuktvāntardadhe viṣṇurlubdhako'pi divaṁ gataḥ| ye'tra snānaṁ kariṣyanti bhaktyā paramayā yutāḥ| viṣṇulokaṁ gamiṣyanti prītyā te matprasādataḥ

ईश्वर ने कहा—यह कहकर विष्णु अन्तर्धान हो गये; व्याध भी स्वर्ग को चला गया। जो कोई यहाँ परम भक्ति से युक्त होकर स्नान करेंगे, वे मेरी कृपा से प्रेमपूर्वक विष्णुलोक को प्राप्त होंगे।

श्लोक 25 (skanda.7.352.25)

येऽत्र श्राद्धं करिष्यंति पितृभक्तिपरायणाः। तृप्तिं तेषां गमिष्यंति पितरश्चैव तर्पिताः

ye'tra śrāddhaṁ kariṣyanti pitṛbhaktiparāyaṇāḥ| tṛptiṁ teṣāṁ gamiṣyanti pitaraścaiva tarpitāḥ

जो यहाँ पितृभक्तिपरायण होकर श्राद्ध करेंगे, उनके पितर तृप्त होकर संतोष को प्राप्त होंगे।

श्लोक 26 (skanda.7.352.26)

तस्मात्सर्वप्रयत्नेन प्राप्य तत्क्षेत्रमुत्तमम्। दृश्यो देवश्चतुर्बाहुः स्नात्वा तीर्थे तु भल्लके

tasmātsarvaprayatnena prāpya tatkṣetramuttamam| dṛśyo devaścaturbāhuḥ snātvā tīrthe tu bhallake

अतः सम्पूर्ण प्रयत्न से उस उत्तम क्षेत्र को प्राप्त करके, भल्लक तीर्थ में स्नान करके चतुर्भुज देव के दर्शन करने चाहिए।

श्लोक 27 (skanda.7.352.27)

मद्भक्तिबलदर्पिष्ठा मत्प्रियं न नमंति ये। वासुदेवं न ते ज्ञेया मद्भक्ताः पापिनो हि ते

madbhaktibaladarpiṣṭhā matpriyaṁ na namanti ye| vāsudevaṁ na te jñeyā madbhaktāḥ pāpino hi te

जो लोग मेरी भक्ति के बल से गर्वित होकर मुझे जो प्रिय है उसे नमन नहीं करते, उन्हें वासुदेव-भक्त नहीं जानना चाहिए; वे मेरे भक्त होते हुए भी पापी हैं।

श्लोक 28 (skanda.7.352.28)

मद्भक्तोऽपि हि यो भूत्वा भुंक्त एकादशीदिने। मल्लिंगस्यार्चनं कार्यं न तेन पापबुद्धिना

madbhakto'pi hi yo bhūtvā bhuṅkta ekādaśīdine| malliṅgasyārcanaṁ kāryaṁ na tena pāpabuddhinā

जो मेरा भक्त होकर भी एकादशी के दिन भोजन करता है, उस पापबुद्धि वाले को मेरे लिंग की पूजा नहीं करनी चाहिए।

श्लोक 29 (skanda.7.352.29)

या तिथिर्दयिता विष्णोः सा तिथिर्मम वल्लभा। न तां चोपोषयेद्यस्तु स पापिष्ठतराधिकः

yā tithirdayitā viṣṇoḥ sā tithirmama vallabhā| na tāṁ copoṣayedyastu sa pāpiṣṭharādhikaḥ

जो तिथि विष्णु को प्रिय है, वही तिथि मुझे भी प्रिय है। जो उस तिथि का उपवास नहीं करता, वह अत्यन्त पापी है।

श्लोक 30 (skanda.7.352.30)

तद्वत्स द्वादशीयोगे भल्लतीर्थस्य संनिधौ। यस्तु मां पूजयेद्भक्त्या नारी वाऽपि नरोऽपि वा। तस्य जन्मसहस्राणि गृहभंगो न जायते

tadvatsa dvādaśīyoge bhallatīrthasya saṁnidhau| yastu māṁ pūjayedbhaktyā nārī vā'pi naro'pi vā| tasya janmasahasrāṇi gṛhabhaṅgo na jāyate

इसी प्रकार द्वादशी के योग में, भल्लतीर्थ के समीप, जो मेरा भक्तिपूर्वक पूजन करता है—चाहे वह नारी हो या पुरुष—उसके लिए सहस्र जन्मों तक गृहभंग नहीं होता।

श्लोक 31 (skanda.7.352.31)

इत्येतत्कथितं देवि माहात्म्यं पापनाशनम्। भल्लतीर्थस्य विष्णोस्तु सर्वपातकनाशनम्

ityetatkathitaṁ devi māhātmyaṁ pāpanāśanam| bhallatīrthasya viṣṇostu sarvapātakanāśanam

इस प्रकार, हे देवि, यह पापनाशक माहात्म्य तुम्हें बताया गया—विष्णु के भल्लतीर्थ का, जो सम्पूर्ण पातकों का नाशक है।

श्लोक 32 (skanda.7.352.32)

तत्र विष्णोस्तु सांनिध्ये वायव्ये कुम्भमुत्तमम्। भल्लतीर्थं तु विख्यातं यत्र भल्लहतो हरिः

tatra viṣṇostu sānnidhye vāyavye kumbhamuttamam| bhallatīrthaṁ tu vikhyātaṁ yatra bhallahato hariḥ

वहाँ विष्णु के समीप, वायव्य कोण में, एक उत्तम कुण्ड है। भल्लतीर्थ उसी स्थान के नाम से विख्यात है, जहाँ हरि भल्ल से आहत हुए थे।

श्लोक 33 (skanda.7.352.33)

तत्र देयानि वासांसि पदं गावो विधानतः। देयानि विप्रमुख्येभ्यः सम्यग्यात्राफलेप्सुभिः

tatra deyāni vāsāṁsi padaṁ gāvo vidhānataḥ| deyāni vipramukhyebhyaḥ samyagyātrāphalepsubhiḥ

वहाँ यात्रा के सम्पूर्ण फल की कामना करने वालों को विधिपूर्वक वस्त्र, पादुकाएँ और गौएँ श्रेष्ठ ब्राह्मणों को देनी चाहिए।

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