प्रभास खण्ड · अध्याय 351
सुपर्णेलामाहात्म्यवर्णनम्
श्लोक 1 (skanda.7.351.1)
ईश्वर उवाच। ततो गच्छेन्महादेवि सुपर्णेलां च भैरवीम्। दुर्गकूटाद्दक्षिणतो धनुःपंचशतांतरे
īśvara uvāca| tato gacchenmahādevi suparṇelāṁ ca bhairavīm| durgakūṭāddakṣiṇato dhanuḥpañcaśatāntare
ईश्वर ने कहा—हे महादेवि, तदनन्तर दुर्गकूट के दक्षिण में पाँच सौ धनुष की दूरी पर स्थित सुपर्णेला भैरवी के पास जाना चाहिए।
श्लोक 2 (skanda.7.351.2)
सुपर्णेन पुरा देवि पातालादमृतं हृतम्। गृहीत्वा तत्र मुक्तं तु नागानां पश्यतां किल
suparṇena purā devi pātālādamṛtaṁ hṛtam| gṛhītvā tatra muktaṁ tu nāgānāṁ paśyatāṁ kila
हे देवि, सुपर्ण (गरुड़) द्वारा पूर्वकाल में पाताल से अमृत हरण किया गया था। ग्रहण करके उसे वहाँ नागों के देखते-देखते छोड़ दिया गया।
श्लोक 3 (skanda.7.351.3)
ततो देव्या तदा दृष्ट्वा रक्षितं नागपार्श्वतः। ततः सुपर्णेलेत्येवं ख्याता सा वसुधातले
tato devyā tadā dṛṣṭvā rakṣitaṁ nāgapārśvataḥ| tataḥ suparṇeletyevaṁ khyātā sā vasudhātale
तब देवी ने उसे नागों के पार्श्व में रक्षित देखा। तभी से वह पृथ्वीतल पर सुपर्णेला नाम से विख्यात हुई।
श्लोक 4 (skanda.7.351.4)
इला तु कथ्यते भूमिः सुपर्णेन प्रतिष्ठिता। ततः सुपर्णेलेत्येव नाम्ना पातकनाशिनी
ilā tu kathyate bhūmiḥ suparṇena pratiṣṭhitā| tataḥ suparṇeletyeva nāmnā pātakanāśinī
'इला' शब्द भूमि का वाचक है; सुपर्ण द्वारा प्रतिष्ठित होने से वह इसी नाम से सुपर्णेला—पापनाशिनी—कहलायी।
श्लोक 5 (skanda.7.351.5)
सुपर्णकुण्डे तत्रैव स्नात्वा तां पूजयेन्नरः। विप्रेभ्यो भोजनं दद्यान्नापद्भिर्म्रियते नरः। जीववत्सा भवेन्नारी आत्मजैश्चाप्यलंकृता
suparṇakuṇḍe tatraiva snātvā tāṁ pūjayennaraḥ| viprebhyo bhojanaṁ dadyānnāpadbhirmriyate naraḥ| jīvavatsā bhavennārī ātmajaiścāpyalaṁkṛtā
उसी सुपर्णकुण्ड में स्नान करके मनुष्य उसका पूजन करे और ब्राह्मणों को भोजन कराए—तो वह आपदाओं से नहीं मरता; और नारी जीववत्सा (जिसकी संतान जीवित रहे) होकर सन्तान से सुशोभित होती है।