प्रभास खण्ड · अध्याय 350
कौरवेश्वरीमाहात्म्यवर्णनम्
श्लोक 1 (skanda.7.350.1)
ईश्वर उवाच। ततो गच्छेन्महादेवि तस्माद्वै कौरवेश्वरीम्। यस्य नाम्ना कुरुक्षेत्रं तेन साराधिता पुरा
īśvara uvāca| tato gacchenmahādevi tasmādvai kauraveśvarīm| yasya nāmnā kurukṣetraṁ tena sārādhitā purā
ईश्वर ने कहा—हे महादेवि, तदनन्तर वहाँ से कौरवेश्वरी के पास जाना चाहिए। जिसके नाम से कुरुक्षेत्र प्रसिद्ध हुआ, उसी के द्वारा वह पूर्वकाल में आराधित हुई थी।
श्लोक 2 (skanda.7.350.2)
आराधिताऽसौ भीमेन कृत्वा क्षेत्रस्य रक्षणम्। महानवम्यां यत्नेन यस्तां पूजयते नरः। तं पुत्रमिव कल्याणी रक्षते नात्र संशयः
ārādhitā'sau bhīmena kṛtvā kṣetrasya rakṣaṇam| mahānavamyāṁ yatnena yastāṁ pūjayate naraḥ| taṁ putramiva kalyāṇī rakṣate nātra saṁśayaḥ
उसे भीम ने आराधित किया, क्षेत्र की रक्षा करके। महानवमी को यत्नपूर्वक जो मनुष्य उसका पूजन करता है, उसे वह कल्याणी देवी पुत्र के समान रक्षा करती है, इसमें संशय नहीं।
श्लोक 3 (skanda.7.350.3)
भोजनं तत्र दातव्यं दंपतीनां न संशयः। दिव्यैर्भक्ष्यैः सुमिष्टान्नैः सा तुष्यति ततः स्तुता
bhojanaṁ tatra dātavyaṁ daṁpatīnāṁ na saṁśayaḥ| divyairbhakṣyaiḥ sumiṣṭānnaiḥ sā tuṣyati tataḥ stutā
वहाँ दम्पतियों को भोजन कराना चाहिए, इसमें संशय नहीं। दिव्य भक्ष्य पदार्थों और अतिमधुर अन्न से वह प्रसन्न होती है और स्तुति की जाती है।