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प्रभास खण्ड · अध्याय 349

दुर्गकूटगणपतिमाहात्म्यवर्णनम्

अध्याय 348अध्याय-सूचीअध्याय 350

श्लोक 1 (skanda.7.349.1)

ईश्वर उवाच। ततो गच्छेन्महादेवि विश्वेशं दुर्गकूटकम्। भल्लतीर्थस्य पूर्वेण योगिनीचक्रदक्षिणे

īśvara uvāca| tato gacchenmahādevi viśveśaṁ durgakūṭakam| bhallatīrthasya pūrveṇa yoginīcakradakṣiṇe

ईश्वर ने कहा—हे महादेवि, तदनन्तर भल्लतीर्थ के पूर्व में, योगिनीचक्र के दक्षिण में स्थित विश्वेश दुर्गकूटक के पास जाना चाहिए।

श्लोक 2 (skanda.7.349.2)

आराधितोऽसौ भीमेन सर्वकामप्रदोऽभवत्। फाल्गुनस्य चतुर्थ्यां तु शुक्लपक्षे विधानतः

ārādhito'sau bhīmena sarvakāmaprado'bhavat| phālgunasya caturthyāṁ tu śuklapakṣe vidhānataḥ

भीम द्वारा आराधित वह सर्वकामप्रद बन गया, फाल्गुन के शुक्लपक्ष की चतुर्थी को विधिपूर्वक।

श्लोक 3 (skanda.7.349.3)

यस्तं पूजयते देवं गन्धपुष्पैः समोदकैः। निर्विघ्नं जायते तस्य वर्षमेकं न संशयः

yastaṁ pūjayate devaṁ gandhapuṣpaiḥ samodakaiḥ| nirvighnaṁ jāyate tasya varṣamekaṁ na saṁśayaḥ

जो उस देव का गन्ध, पुष्प और मोदकों से पूजन करता है, उसका एक वर्ष निर्विघ्न व्यतीत होता है, इसमें कोई संशय नहीं।

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