प्रभास खण्ड · अध्याय 360
मार्कंडेश्वरमाहात्म्यवर्णनम्
श्लोक 1 (skanda.7.360.1)
ईश्वर उवाच। ततो गच्छेन्महादेवि हिरण्यातटसंस्थितम्। घटिकास्थानमिति च यत्र सिद्धः पुरा ऋषिः
īśvara uvāca| tato gacchenmahādevi hiraṇyātaṭasaṁsthitam| ghaṭikāsthānamiti ca yatra siddhaḥ purā ṛṣiḥ
ईश्वर ने कहा—हे महादेवि, तदनन्तर हिरण्या नदी के तट पर स्थित घटिकास्थान नामक स्थान में जाना चाहिए, जहाँ प्राचीन काल में एक ऋषि सिद्ध हुए थे।
श्लोक 2 (skanda.7.360.2)
नाड्यैकया मृकण्डस्तु ध्यानयोगाद्वरानने। तत्रैव स्थापितं लिंगं मार्कंडेश्वरनामतः। सर्वपापोपशमनं दर्शनात्पूजनादपि
nāḍyaikayā mṛkaṇḍastu dhyānayogādvarānane| tatraiva sthāpitaṁ liṁgaṁ mārkaṁḍeśvaranāmataḥ| sarvapāpopaśamanaṁ darśanātpūjanādapi
हे वरानने, मृकण्ड मुनि ने एक ही नाड़ी (श्वास-मार्ग) से ध्यानयोग द्वारा वहीं मार्कण्डेश्वर नाम से लिंग की स्थापना की, जिसका दर्शन और पूजन मात्र से ही समस्त पापों का उपशमन हो जाता है।