प्रभास खण्ड · अध्याय 363
हिरण्यातुण्डपुरघर्घरह्रदकन्देश्वरमाहात्म्यवर्णनम्
श्लोक 1 (skanda.7.363.1)
ईश्वर उवाच। ततो गच्छेन्महादेवि हिरण्यातटसंस्थितम्। स्थानं तुण्डपुरंनाम यत्रासौ घर्घरो ह्रदः
īśvara uvāca| tato gacchenmahādevi hiraṇyātaṭasaṁsthitam| sthānaṁ tuṇḍapuraṁnāma yatrāsau ghargharo hradaḥ
ईश्वर ने कहा—हे महादेवि, तदनन्तर हिरण्या नदी के तट पर स्थित तुण्डपुर नामक स्थान में जाना चाहिए, जहाँ वह घर्घर नामक ह्रद (सरोवर) है।
श्लोक 2 (skanda.7.363.2)
तत्र कन्देश्वरो देवो यत्र बद्धा जटा मया। तत्र स्नात्वा नरः सम्यक्त्ं देवं यः प्रपूजयेत्। स मुक्तः पातकैर्घोरैः प्राप्नुयाच्छासनं शुभम्
tatra kandeśvaro devo yatra baddhā jaṭā mayā| tatra snātvā naraḥ samyaktaṁ devaṁ yaḥ prapūjayet| sa muktaḥ pātakairghoraiḥ prāpnuyācchāsanaṁ śubham
वहाँ कन्देश्वर देव हैं, जहाँ मैंने अपनी जटा बाँधी थी। वहाँ स्नान कर जो मनुष्य उस देव की भलीभाँति पूजा करता है, वह घोर पापों से मुक्त होकर शुभ शासन (पद) को प्राप्त करता है।