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प्रभास खण्ड · अध्याय 364

संवर्तेश्वरमाहात्म्यवर्णनम्

अध्याय 363अध्याय-सूचीअध्याय 365

श्लोक 1 (skanda.7.364.1)

ईश्वर उवाच। ततो गच्छेन्महादेवि संवर्तेश्वरमुत्तमम्। इन्द्रेश्वरात्पश्चिमतः पूर्वतश्चार्कभास्करात्

īśvara uvāca| tato gacchenmahādevi saṁvarteśvaramuttamam| indreśvarātpaścimataḥ pūrvataścārkabhāskarāt

ईश्वर ने कहा—हे महादेवि, तदनन्तर उत्तम संवर्तेश्वर में जाना चाहिए, जो इन्द्रेश्वर से पश्चिम में और अर्कभास्कर (सूर्य-तीर्थ) से पूर्व में स्थित है।

श्लोक 2 (skanda.7.364.2)

तं दृष्ट्वा तु महादेवं स्नात्वा पुष्करिणीजले। दशानामश्वमेधानां फलमाप्नोति मानवः

taṁ dṛṣṭvā tu mahādevaṁ snātvā puṣkariṇījale| daśānāmaśvamedhānāṁ phalamāpnoti mānavaḥ

उस महादेव के दर्शन कर तथा पुष्करिणी के जल में स्नान कर मनुष्य दस अश्वमेध यज्ञों का फल प्राप्त करता है।

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