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प्रभास खण्ड · अध्याय 372

स्वर्णरेखामाहात्म्यवर्णनम्

अध्याय 371अध्याय-सूचीअध्याय 373

श्लोक 1 (skanda.7.372.1)

राजोवाच। कथं त्वं हरिणीरूपे जाता मानुषरूपिणी। केन संवर्धिता बाल्ये कथं ते रूपमीदृशम्

rājovāca| kathaṁ tvaṁ hariṇīrūpe jātā mānuṣarūpiṇī| kena saṁvardhitā bālye kathaṁ te rūpamīdṛśam

राजा ने कहा—तुम हरिणी के रूप में होते हुए मनुष्य-रूप में कैसे उत्पन्न हुईं? बाल्यकाल में किसने तुम्हारा पालन-पोषण किया, तथा तुम्हारा ऐसा रूप कैसे हुआ?

श्लोक 2 (skanda.7.372.2)

मृग्युवाच। शृणु देव प्रवक्ष्यामि यद्वृत्तं कन्यके वने। ऋषिरुद्दालकोनाम गंगाकूले महातपाः

mṛgyuvāca| śṛṇu deva pravakṣyāmi yadvṛttaṁ kanyake vane| ṛṣiruddālakonāma gaṁgākūle mahātapāḥ

मृगी ने कहा—हे देव, सुनो, मैं वह वृत्तांत कहती हूँ जो कन्या रहते हुए वन में घटित हुआ। गंगा के तट पर उद्दालक नामक एक महातपस्वी ऋषि थे।

श्लोक 3 (skanda.7.372.3)

प्रभाते मूत्रमुत्सृष्टुं गतो देव वनांतरे। मूत्रांते पतितो भूमौ वीर्यबिंदुर्द्विजन्मनः

prabhāte mūtramutsṛṣṭuṁ gato deva vanāṁtare| mūtrāṁte patito bhūmau vīryabiṁdurdvijanmanaḥ

हे देव, प्रभात में वे मूत्र-त्याग के लिए वन के भीतर गए। मूत्र-त्याग के अंत में उस द्विज के वीर्य की एक बूँद भूमि पर गिर पड़ी।

श्लोक 4 (skanda.7.372.4)

यावत्स चलितो विप्रः शौचं कृत्वा प्रयत्नतः। तावन्मृगी समायाता दृष्ट्वा पुष्पवनांतरात्

yāvatsa calito vipraḥ śaucaṁ kṛtvā prayatnataḥ| tāvanmṛgī samāyātā dṛṣṭvā puṣpavanāṁtarāt

ज्यों ही वह ब्राह्मण प्रयत्नपूर्वक शौच करके चल दिया, त्यों ही फूलों के वन के भीतर से देखकर एक मृगी वहाँ आ गई।

श्लोक 5 (skanda.7.372.5)

चापल्याद्भक्षितं वीर्यं दृष्टं ब्रह्मर्षिणा स्वयम्। यस्मादश्नाति मे वीर्यं तस्माद्गर्भो भविष्यति

cāpalyādbhakṣitaṁ vīryaṁ dṛṣṭaṁ brahmarṣiṇā svayam| yasmādaśnāti me vīryaṁ tasmādgarbho bhaviṣyati

चपलतावश उसने वह वीर्य खा लिया, जिसे उस ब्रह्मर्षि ने स्वयं देख लिया। उन्होंने कहा—चूँकि यह मेरा वीर्य खा रही है, इसलिए इससे गर्भ होगा।

श्लोक 6 (skanda.7.372.6)

ममरूपा तववक्त्रा नारी गर्भे भविष्यति। वर्द्धयिष्यति देव्यस्तां रसैर्दिव्यैः सुतां तव

mamarūpā tavavaktrā nārī garbhe bhaviṣyati| varddhayiṣyati devyastāṁ rasairdivyaiḥ sutāṁ tava

उसके गर्भ में एक ऐसी स्त्री होगी जो रूप में मेरे समान होगी, किंतु मुख तुम्हारा होगा। हे मृगी, देवियाँ उस तुम्हारी पुत्री को दिव्य रसों से पालेंगी।

श्लोक 7 (skanda.7.372.7)

केनापि दैवयोगेन ज्ञानं तस्या भविष्यति। एवमुद्दालकादेव संजाताहं मृगानना। प्रविश्याग्नौ मृता पूर्वं त्वया सार्द्धं नराधिप

kenāpi daivayogena jñānaṁ tasyā bhaviṣyati| evamuddālakādeva saṁjātāhaṁ mṛgānanā| praviśyāgnau mṛtā pūrvaṁ tvayā sārddhaṁ narādhipa

किसी दैवयोग से उसे ज्ञान भी प्राप्त होगा। इस प्रकार उद्दालक से ही मैं, मृगमुखी, उत्पन्न हुई—मैं जो पहले, हे नराधिप, तुम्हारे साथ ही अग्नि में प्रविष्ट होकर मर गई थी।

श्लोक 8 (skanda.7.372.8)

तस्माज्जातं सतीत्वं मे सप्तजन्मनि वै प्रभो। यत्त्वया कुर्वता राज्यं पापं वै समुपार्जितम्

tasmājjātaṁ satītvaṁ me saptajanmani vai prabho| yattvayā kurvatā rājyaṁ pāpaṁ vai samupārjitam

हे प्रभो, इसी से सात जन्मों तक मेरा सतीत्व उत्पन्न होता रहा; क्योंकि राज्य करते हुए तुमने पाप अर्जित किया था।

श्लोक 9 (skanda.7.372.9)

क्षत्त्रधर्मं परित्यज्य पलायनपरो मृतः। तदेनो हि मया दग्धं चिताग्नौ नृपसत्तम

kṣattradharmaṁ parityajya palāyanaparo mṛtaḥ| tadeno hi mayā dagdhaṁ citāgnau nṛpasattama

क्षत्रिय-धर्म त्यागकर तुम भागते हुए मरे थे। हे नृपसत्तम, उस पाप को ही मैंने चिता की अग्नि में जला डाला।

श्लोक 10 (skanda.7.372.10)

पतिं गृहीत्वा या नारी मृतमग्नौ विशेद्यदि। सा तारयति भर्तारमात्मानं च कुलद्वयम्

patiṁ gṛhītvā yā nārī mṛtamagnau viśedyadi| sā tārayati bhartāramātmānaṁ ca kuladvayam

यदि कोई स्त्री अपने मृत पति को लेकर अग्नि में प्रवेश करे, तो वह अपने पति को, स्वयं को तथा दोनों कुलों को तार देती है।

श्लोक 11 (skanda.7.372.11)

गोग्रहे देशभंगे च संग्रामे सम्मुखे मृतः। स सूर्यमण्डलं भित्त्वा ब्रह्मलोके महीयते

gograhe deśabhaṁge ca saṁgrāme sammukhe mṛtaḥ| sa sūryamaṇḍalaṁ bhittvā brahmaloke mahīyate

जो कोई गायों की रक्षा में अथवा देश की रक्षा में, युद्ध में शत्रु के सम्मुख मरता है, वह सूर्यमंडल को भेदकर ब्रह्मलोक में महिमामंडित होता है।

श्लोक 12 (skanda.7.372.12)

अनाशकं यो विदधाति मर्त्त्यो दिनेदिने यज्ञसहस्रपुण्यम्। स याति यानेन गणान्वितेन विधूय पापानि सुरैः स पूज्यते

anāśakaṁ yo vidadhāti marttyo dinedine yajñasahasrapuṇyam| sa yāti yānena gaṇānvitena vidhūya pāpāni suraiḥ sa pūjyate

जो मर्त्य मनुष्य अनशन करता है, वह प्रतिदिन हजार यज्ञों का पुण्य पाता है; वह गणों सहित विमान पर चढ़कर, पापों को धोकर, देवताओं द्वारा पूजित होता है।

श्लोक 13 (skanda.7.372.13)

गंगाजले प्रयागे वा केदारे पुष्करे च ये। वस्त्रापथे प्रभासे च मृतास्ते स्वर्गगामिनः

gaṁgājale prayāge vā kedāre puṣkare ca ye| vastrāpathe prabhāse ca mṛtāste svargagāminaḥ

जो लोग गंगाजल में, प्रयाग में, केदार में, पुष्कर में, अथवा वस्त्रापथ और प्रभास में मरते हैं, वे स्वर्ग को जाने वाले होते हैं।

श्लोक 14 (skanda.7.372.14)

द्वारावत्यां कुरुक्षेत्रे योगाभ्यासेन ये मृताः। हरिरित्यक्षरं मृत्यौ येषां ते स्वर्गगामिनः

dvārāvatyāṁ kurukṣetre yogābhyāsena ye mṛtāḥ| haririti akṣaraṁ mṛtyau yeṣāṁ te svargagāminaḥ

जो लोग द्वारावती में अथवा कुरुक्षेत्र में योगाभ्यास द्वारा मरते हैं, तथा जिनके मुख में मृत्यु के समय 'हरि' अक्षर होता है, वे स्वर्ग को जाने वाले होते हैं।

श्लोक 15 (skanda.7.372.15)

पूजयित्वा हरिं ये तु भूमौ दर्भतिलैः सह। तिलांश्च पञ्चलोहं च दत्त्वा ये तु पयस्विनीम्

pūjayitvā hariṁ ye tu bhūmau darbhatilaiḥ saha| tilāṁśca paṁcalohaṁ ca dattvā ye tu payasvinīm

जो हरि की पूजा भूमि पर कुश तथा तिलों के साथ करते हैं, तथा जो तिल, पंचधातु, और दुधारू गाय का दान करते हैं—

श्लोक 16 (skanda.7.372.16)

ये मृता राजशार्दूल ते नराः स्वर्ग गामिनः। उत्पाद्य पुत्रान्संस्थाप्य पितृपैतामहे पदे

ye mṛtā rājaśārdūla te narāḥ svarga gāminaḥ| utpādya putrānsaṁsthāpya pitṛpaitāmahe pade

हे राजशार्दूल, वे मनुष्य मरकर स्वर्ग को जाते हैं; तथा जो पुत्रों को उत्पन्न करके उन्हें पिता और पितामह के पद पर स्थापित करते हैं,

श्लोक 17 (skanda.7.372.17)

निर्मला निष्कलंका ये ते मृताः स्वर्गगामिनः। व्रतोपवासनिरताः सत्याचारपरायणाः। अहिंसानिरताः शांतास्ते नराः स्वर्गगामिनः

nirmalā niṣkalaṁkā ye te mṛtāḥ svargagāminaḥ| vratopavāsaniratāḥ satyācāraparāyaṇāḥ| ahiṁsāniratāḥ śāṁtāste narāḥ svargagāminaḥ

जो निर्मल तथा निष्कलंक हैं, वे मरकर स्वर्ग को जाते हैं; जो व्रत-उपवास में तत्पर, सत्याचार में परायण, अहिंसा में तत्पर तथा शांत हैं, वे मनुष्य स्वर्ग को जाने वाले होते हैं।

श्लोक 18 (skanda.7.372.18)

सापवादो रणं त्यक्त्वा मृतो यस्मान्नराधिप। सप्तयोनिषु ते जन्म तस्माज्जातं मया सह

sāpavādo raṇaṁ tyaktvā mṛto yasmānnarādhipa| saptayoniṣu te janma tasmājjātaṁ mayā saha

किंतु हे नराधिप, चूँकि तुम कलंकित होकर युद्ध त्यागकर मरे थे, इसलिए सात योनियों में तुम्हारा जन्म हुआ, और उसी के साथ मेरा भी जन्म हुआ।

श्लोक 19 (skanda.7.372.19)

त्वां विना मे पतिर्मा भून्मरणे याचितं मया। तदांतरिक्षे राजेन्द्र वागुवाचाशरीरिणी। आदौ पापफलं भुक्त्वा पश्चात्स्वर्गं गमिष्यसि

tvāṁ vinā me patirmā bhūnmaraṇe yācitaṁ mayā| tadāṁtarikṣe rājeṁdra vāguvācāśarīriṇī| ādau pāpaphalaṁ bhuktvā paścātsvargaṁ gamiṣyasi

'तुम्हारे अतिरिक्त मेरा कोई पति न हो'—यह मैंने मृत्यु के समय माँगा था। तब हे राजेंद्र, आकाश में एक अशरीरी वाणी बोली—पहले पाप का फल भोगकर तत्पश्चात् तुम स्वर्ग को जाओगे।

श्लोक 20 (skanda.7.372.20)

यदि वस्त्रापथे गत्वा शिरः कश्चिद्विमुंचति। स्वर्णरेखाजले राजन्मानुषं स्यान्मुखं मम

yadi vastrāpathe gatvā śiraḥ kaścidvimuṁcati| svarṇarekhājale rājanmānuṣaṁ syānmukhaṁ mama

यदि कोई वस्त्रापथ जाकर सिर को स्वर्णरेखा के जल में छोड़ दे, तो हे राजन्, मेरा मुख मनुष्य का हो जाएगा।

श्लोक 21 (skanda.7.372.21)

अहं मानुषवक्त्राऽस्मि पापच्छायाऽऽवृतं मुखम्। दृश्यते मृगवक्त्राभं तस्माच्छीघ्रं विमुंचय

ahaṁ mānuṣavaktrā'smi pāpacchāyā''vṛtaṁ mukham| dṛśyate mṛgavaktrābhaṁ tasmācchīghraṁ vimuṁcaya

मैं वास्तव में मानव-मुख वाली हूँ, किंतु पाप की छाया से आच्छादित होकर मेरा मुख मृगी के मुख के समान दिखाई देता है—इसलिए शीघ्र ही उसे मुक्त करवाओ।

श्लोक 22 (skanda.7.372.22)

इति श्रुत्वा वचो राजा सारस्वतमुदैक्षत। जनो विहस्य सानन्दं सर्वं सत्यं मृगीवचः

iti śrutvā vaco rājā sārasvatamudaikṣata| jano vihasya sānandaṁ sarvaṁ satyaṁ mṛgīvacaḥ

यह वचन सुनकर राजा ने सारस्वत की ओर देखा। लोग आनंदपूर्वक मुस्कुराते हुए बोले—मृगी की सारी बातें सत्य हैं।

श्लोक 23 (skanda.7.372.23)

इत्युक्त्वाऽऽह द्विजेन्द्रः स एवं कुरु नृपोत्तम। एवं राज्ञा समादिष्टः प्रतीहारो ययौ वनम्

ityuktvā''ha dvijendraḥ sa evaṁ kuru nṛpottama| evaṁ rājñā samādiṣṭaḥ pratīhāro yayau vanam

यह कहकर उस श्रेष्ठ ब्राह्मण ने कहा—हे नृपोत्तम, ऐसा ही करो। इस प्रकार राजा द्वारा आदेशित द्वारपाल वन की ओर चला।

श्लोक 24 (skanda.7.372.24)

वस्त्रापथे महातीर्थे भवं द्रष्टुं त्वरान्वितः। त्वक्सारजालिर्महती स्वर्णरेखाजलोपरि

vastrāpathe mahātīrthe bhavaṁ draṣṭuṁ tvarānvitaḥ| tvaksārajālirmahatī svarṇarekhājalopari

वह उतावला होकर वस्त्रापथ के महातीर्थ में भव का दर्शन करने चला। स्वर्णरेखा के जल के ऊपर बाँस की छाल का एक बड़ा जाल था,

श्लोक 25 (skanda.7.372.25)

वर्त्तते तच्छिरो यत्र वंशप्रोतं महावने। सारस्वतस्य शिष्येण कुशलेन निवेदितम्

varttate tacchiro yatra vaṁśaprotaṁ mahāvane| sārasvatasya śiṣyeṇa kuśalena niveditam

जिसमें वह सिर बाँस से बिंधा हुआ, उस महावन में स्थित था—जैसा कि सारस्वत के कुशल शिष्य ने बताया था।

श्लोक 26 (skanda.7.372.26)

तीर्थं वस्त्रापथं गत्वा भवस्याग्रे महानदी। जाले तत्र शिरो दृष्टं तच्च तोये विमोचितम्

tīrthaṁ vastrāpathaṁ gatvā bhavasyāgre mahānadī| jāle tatra śiro dṛṣṭaṁ tacca toye vimocitam

वस्त्रापथ तीर्थ में जाकर, भव के सम्मुख बहती उस महानदी के जाल में सिर देखा गया, और उसे उसी जल में मुक्त कर दिया गया।

श्लोक 27 (skanda.7.372.27)

स्नात्वा संपूज्य तीर्थेशं प्रतीहारः समभ्यगात्। शिष्येण सहितो वेगाद्रथेनादित्यवर्चसा

snātvā saṁpūjya tīrtheśaṁ pratīhāraḥ samabhyagāt| śiṣyeṇa sahito vegādrathenādityavarcasā

स्नान करके तथा तीर्थ के स्वामी की पूजा करके, द्वारपाल शिष्य के साथ सूर्य के समान तेजस्वी रथ पर वेगपूर्वक लौट आया।

श्लोक 28 (skanda.7.372.28)

यदागतः प्रतीहारस्तदा सारस्वतेन सा। वृता चान्द्रायणेनैव मासमेकं निरन्तरम्

yadāgataḥ pratīhārastadā sārasvatena sā| vṛtā cāndrāyaṇenaiva māsamekaṁ nirantaram

जब द्वारपाल लौट आया, तब सारस्वत ने उससे एक पूरे मास तक निरंतर चांद्रायण व्रत करवाया।

श्लोक 29 (skanda.7.372.29)

संपूर्णे तु व्रते तस्या दिव्यं वक्त्रं सुलोचनम्। सुशोभनं दीर्घकेशं दीर्घकर्णं शुभद्विजम्

saṁpūrṇe tu vrate tasyā divyaṁ vaktraṁ sulocanam| suśobhanaṁ dīrghakeśaṁ dīrghakarṇaṁ śubhadvijam

व्रत पूर्ण होने पर उसका मुख दिव्य, सुंदर नेत्रों वाला, अत्यंत शोभायमान, लंबे केशों वाला, लंबे कानों वाला तथा सुंदर दाँतों वाला हो गया,

श्लोक 30 (skanda.7.372.30)

कम्बुग्रीवं पद्मगंधं सर्वलक्षणसंयुतम्। व्रतांते मूर्च्छिता बाला गतज्ञाना वभूव सा

kambugrīvaṁ padmagaṁdhaṁ sarvalakṣaṇasaṁyutam| vratāṁte mūrcchitā bālā gatajñānā vabhūva sā

शंख के समान ग्रीवा वाला, कमल की सुगंध वाला, तथा सब शुभ लक्षणों से संपन्न। व्रत के अंत में वह बाला मूर्च्छित होकर चेतनाशून्य हो गई।

श्लोक 31 (skanda.7.372.31)

न देवी न च गंधर्वी नासुरी न च किंनरी। यादृशी सा तदा जाता तीर्थभावेन सुन्दरी

na devī na ca gaṁdharvī nāsurī na ca kiṁnarī| yādṛśī sā tadā jātā tīrthabhāvena sundarī

न देवी, न गंधर्वी, न असुर-कन्या, न किन्नरी—ऐसी सुंदरता वह तीर्थ के प्रभाव से तब प्राप्त हुई।

श्लोक 32 (skanda.7.372.32)

परिणीता तु सा तेन भोजराजेन सुन्दरी। मृगीमुखीति विख्याता देवी सा भुवनेश्वरी

pariṇītā tu sā tena bhojarājena sundarī| mṛgīmukhīti vikhyātā devī sā bhuvaneśvarī

उस सुंदरी का विवाह भोजराज से हुआ। मृगीमुखी नाम से विख्यात वह वस्तुतः लोकेश्वरी देवी ही थीं।

श्लोक 33 (skanda.7.372.33)

न जानाति पुनः किंचिद्यद्वृत्तं राजमन्दिरे। कृता सा पट्टमहिषी भोजराजेन धीमता

na jānāti punaḥ kiṁciyadvṛttaṁ rājamandire| kṛtā sā paṭṭamahiṣī bhojarājena dhīmatā

राजमंदिर में जो कुछ घटित हुआ था, उसे अब वह कुछ भी नहीं जानती थी। बुद्धिमान् भोजराज ने उसे पटरानी बना दिया।

श्लोक 34 (skanda.7.372.34)

ईश्वर उवाच। देशानां प्रवरो देशो गिरीणां प्रवरो गिरिः। क्षेत्राणामुत्तमं क्षेत्रं वनानामुत्तमं वनम्

īśvara uvāca| deśānāṁ pravaro deśo girīṇāṁ pravaro giriḥ| kṣetrāṇāmuttamaṁ kṣetraṁ vanānāmuttamaṁ vanam

ईश्वर ने कहा—यह देशों में सर्वश्रेष्ठ देश है, पर्वतों में सर्वश्रेष्ठ पर्वत है, क्षेत्रों में उत्तम क्षेत्र है, तथा वनों में उत्तम वन है।

श्लोक 35 (skanda.7.372.35)

गंगा सरस्वती तापी स्वर्णरेखाजले स्थिता। ब्रह्मा विष्णुश्च सूर्यश्च सर्व इन्द्रादयः सुराः

gaṁgā sarasvatī tāpī svarṇarekhājale sthitā| brahmā viṣṇuśca sūryaśca sarva indrādayaḥ surāḥ

गंगा, सरस्वती तथा तापी स्वर्णरेखा के जल में स्थित हैं; ब्रह्मा, विष्णु, सूर्य तथा इंद्र आदि सभी देवता—

श्लोक 36 (skanda.7.372.36)

नागा यक्षाश्च गन्धर्वा अस्मिन्क्षेत्रे व्यवस्थिताः। ब्रह्मांडं निर्मितं येन त्रैलोक्यं सचराचरम्

nāgā yakṣāśca gaṁdharvā asminkṣetre vyavasthitāḥ| brahmāṇḍaṁ nirmitaṁ yena trailokyaṁ sacarācaram

नाग, यक्ष तथा गंधर्व—सभी इस क्षेत्र में स्थित हैं। यही वह है जिससे यह ब्रह्मांड बना है, तथा चराचर सहित तीनों लोक बने हैं।

श्लोक 37 (skanda.7.372.37)

देवा ब्रह्मादयो जाताः स भवोऽत्र व्यवस्थितः। शिवो भवेति विख्यातः स्वयं देवस्त्रिलोचनः

devā brahmādayo jātāḥ sa bhavo'tra vyavasthitaḥ| śivo bhaveti vikhyātaḥ svayaṁ devastrilocanaḥ

जिससे ब्रह्मा आदि देवता उत्पन्न हुए, वह भव यहीं स्थित है—स्वयं वह त्रिनेत्र देव 'शिव भव' के नाम से विख्यात है।

श्लोक 38 (skanda.7.372.38)

वेवेति स्कन्दरचनाद्भवानी चात्र संस्थिता। अतो यन्नाधिकं प्रोक्तं तीर्थं देवि मया तव

veveti skaṁdaracanādbhavānī cātra saṁsthitā| ato yannādhikaṁ proktaṁ tīrthaṁ devi mayā tava

स्कंद की इस रचना में 'देवी' के नाम से कही गई भवानी भी यहीं संस्थित हैं। इसीलिए, हे देवि, मैंने तुम्हें इससे बढ़कर कोई तीर्थ नहीं बताया है।

श्लोक 39 (skanda.7.372.39)

तस्मिञ्जले स्नानपरो नरो यदि संध्यां विधायानु करोति तर्पणम्। श्राद्धं पितॄणां च ददाति दक्षिणां भवोद्भवं पश्यति मुच्यते भवात्

tasmiñjale snānaparo naro yadi saṁdhyāṁ vidhāyānu karoti tarpaṇam| śrāddhaṁ pitṝṇāṁ ca dadāti dakṣiṇāṁ bhavodbhavaṁ paśyati mucyate bhavāt

यदि कोई मनुष्य उस जल में स्नान करके, संध्या-वंदन करके, तत्पश्चात् तर्पण करता है, पितरों का श्राद्ध करता है तथा दक्षिणा देता है, और भव के इस उद्भव-स्थान का दर्शन करता है, तो वह संसार-बंधन से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 40 (skanda.7.372.40)

अथ यदि भवपूजां दिव्यपुष्पैः करोति तदनु शिवशिवेति स्तोत्रपाठं च गीतम्। सुरवर गणवृन्दैः स्तूयमानो विमानैः सुरवरशिवरूपो मानवो याति नाकम्

atha yadi bhavapūjāṁ divyapuṣpaiḥ karoti tadanu śivaśiveti stotrapāṭhaṁ ca gītam| suravara gaṇavṛndaiḥ stūyamāno vimānaiḥ suravaraśivarūpo mānavo yāti nākam

और यदि वह दिव्य पुष्पों से भव की पूजा करके, तत्पश्चात् 'शिव शिव' का स्तोत्र-पाठ तथा गान करता है, तो वह मनुष्य देवश्रेष्ठों के समूहों द्वारा स्तुति किया जाता हुआ, विमानों पर आरूढ़ होकर, देवश्रेष्ठ शिव के समान रूप धारण करके स्वर्ग को जाता है।

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