प्रभास खण्ड · अध्याय 416
विनायक माहात्म्य वर्णन
श्लोक 1 (skanda.7.416.1)
पुलस्त्य उवाच महाविनायकं गच्छेत्ततः पार्थिवसत्तम यस्मिन्दृष्टे नृणां सद्यो निर्विघ्नत्वं प्रजायते
pulastya uvāca mahāvināyakaṁ gacchettataḥ pārthivasattama yasmindṛṣṭe nṛṇāṁ sadyo nirvighnatvaṁ prajāyate
पुलस्त्य जी ने कहा — हे पार्थिवसत्तम, तदनन्तर महाविनायक के स्थान में जाना चाहिए, जिनके दर्शन से मनुष्यों को तत्क्षण निर्विघ्नता प्राप्त होती है।
श्लोक 2 (skanda.7.416.2)
ययातिरुवाच कथं महत्त्वमगमत्पूर्वं तत्र विनायकः कस्मिन्काले द्विजश्रेष्ठ सर्वं विस्तरतो वद
yayātiruvāca kathaṁ mahattvamagamatpūrvaṁ tatra vināyakaḥ kasminkāle dvijaśreṣṭha sarvaṁ vistarato vada
ययाति ने कहा — हे द्विजश्रेष्ठ, विनायक ने पूर्वकाल में वहाँ किस प्रकार महत्त्व को प्राप्त किया? किस काल में? मुझे सब कुछ विस्तारपूर्वक कहिए।
श्लोक 3 (skanda.7.416.3)
पुलस्त्य उवाच पुरोद्वर्त्तनजं लेपं गृहीत्वा नृप पार्वती विनोदार्थं चकाराथ बालकं सुकुमारकम्
pulastya uvāca purodvarttanajaṁ lepaṁ gṛhītvā nṛpa pārvatī vinodārthaṁ cakārātha bālakaṁ sukumārakam
पुलस्त्य जी ने कहा — हे राजन्, उबटन का लेप लेकर पार्वती ने विनोद के लिए एक सुकुमार बालक बनाया।
श्लोक 4 (skanda.7.416.4)
लेपाभावाच्छिरोहीनं शेषांगावयवं नृप यथोक्तं निर्मयित्वा तं स्कन्दं वाक्यमथाब्रवीत्
lepābhāvācchirohīnaṁ śeṣāṁgāvayavaṁ nṛpa yathoktaṁ nirmayitvā taṁ skandaṁ vākyamathābravīt
हे राजन्, लेप की कमी के कारण वह शिरविहीन रह गया, शेष अंग पूर्ण थे। इस प्रकार बनाकर उन्होंने स्कन्द से यह वचन कहा।
श्लोक 5 (skanda.7.416.5)
लेपमानय भद्रं ते शिरोऽर्थं स्कन्द सत्वरम् येनायं पुत्रको मे स्याद्भ्राता ते परदुर्जयः
lepamānaya bhadraṁ te śiro'rthaṁ skanda satvaram yenāyaṁ putrako me syādbhrātā te paradurjayaḥ
हे स्कन्द, शिर के लिए शीघ्र लेप लाओ, तुम्हारा कल्याण हो, जिससे मेरा यह पुत्र, तुम्हारा भाई, शत्रुओं के लिए दुर्जय हो सके।
श्लोक 6 (skanda.7.416.6)
ततो गौरीसमादेशाल्लेपालब्धौ नृपोत्तम मत्तं गजवरं दृष्ट्वा शिरस्तस्य समानयत्
tato gaurīsamādeśāllepālabdhau nṛpottama mattaṁ gajavaraṁ dṛṣṭvā śirastasya samānayat
तब गौरी की आज्ञा से, हे नृपोत्तम, लेप प्राप्त होने पर, उन्होंने एक मत्त श्रेष्ठ हाथी को देखकर उसका सिर ले आए।
श्लोक 7 (skanda.7.416.7)
तस्मिन्नियोजयामास गात्रे लेपसमुद्भवे महद्धीदं शिरो भावि पुत्र कस्मात्त्वयाऽऽहृतम्
tasminniyojayāmāsa gātre lepasamudbhave mahaddhīdaṁ śiro bhāvi putra kasmāttvayā''hṛtam
उन्होंने उसे लेप से बने उस शरीर पर लगा दिया। यह तो बहुत बड़ा सिर होगा, पुत्र! तुम इसे कहाँ से लाए?
श्लोक 8 (skanda.7.416.8)
ब्रुवंत्याश्चापि पार्वत्या मा मेति च मुहुर्मुहुः न्यस्ते शिरसि तद्गात्रे दैवयोगान्नराधिप
bruvaṁtyāścāpi pārvatyā mā meti ca muhurmuhuḥ nyaste śirasi tadgātre daivayogānnarādhipa
पार्वती द्वारा बार-बार यह नहीं, यह नहीं कहते हुए भी, हे नराधिप, दैवयोग से उस शरीर पर सिर रख दिए जाने पर,
श्लोक 9 (skanda.7.416.9)
विशेषान्नायकत्वं च गात्रेभ्यः समजायत बालकप्रतिमं कान्तं सर्वलक्षणलक्षितम्
viśeṣānnāyakatvaṁ ca gātrebhyaḥ samajāyata bālakapratimaṁ kāntaṁ sarvalakṣaṇalakṣitam
अंगों से विशेष रूप से नायकत्व (नेतृत्व-गुण) उत्पन्न हो गया — वह बालक-प्रतिमा, कमनीय, सर्वलक्षणों से युक्त हो गया,
श्लोक 10 (skanda.7.416.10)
त्रिगंभीरं चतुर्हस्तं सप्तरक्तं महीपते षडुन्नतं पञ्चदीर्घं पश्चसूक्ष्मं सुसुन्दरम्
trigaṁbhīraṁ caturhastaṁ saptaraktaṁ mahīpate ṣaḍunnataṁ pañcadīrghaṁ paścasūkṣmaṁ susuṁdaram
हे महीपते, त्रिगम्भीर, चतुर्हस्त, सप्तरक्त, षडुन्नत, पंचदीर्घ, पंचसूक्ष्म, सुसुन्दर,
श्लोक 11 (skanda.7.416.11)
त्रिविस्तीर्णं महाराज दृष्ट्वा गौरी सुविस्मिता सजीवं कारयामास स्वशक्त्या शक्तिरूपिणी
trivistīrṇaṁ mahārāja dṛṣṭvā gaurī suvismitā sajīvaṁ kārayāmāsa svaśaktyā śaktirūpiṇī
तीन भागों में विस्तीर्ण — यह देखकर, हे महाराज, गौरी अत्यन्त विस्मित हुईं, और स्वयं शक्तिरूपिणी होने के कारण अपनी शक्ति से उसे सजीव कर दिया।
श्लोक 12 (skanda.7.416.12)
स सजीवः कृतो देव्या समुत्तस्थौ च तत्क्षणात् आदेशं याचयामास विनयानतकन्धरः
sa sajīvaḥ kṛto devyā samuttasthau ca tatkṣaṇāt ādeśaṁ yācayāmāsa vinayānatakandharaḥ
देवी द्वारा सजीव किए जाने पर वह तत्क्षण उठ खड़ा हुआ, और विनयपूर्वक गर्दन झुकाए हुए आज्ञा माँगने लगा।
श्लोक 13 (skanda.7.416.13)
तं दृष्ट्वा चाद्भुताकारं प्रोक्त्वा पुत्रं मुहुर्मुहुः शंभोः सकाशमनयत्प्रहृष्टेनान्तरात्मना
taṁ dṛṣṭvā cādbhutākāraṁ proktvā putraṁ muhurmuhuḥ śaṁbhoḥ sakāśamanayatprahṛṣṭenāntarātmanā
उसके अद्भुत रूप को देखकर, बार-बार पुत्र कहते हुए, वे उसे प्रसन्न अन्तःकरण से शम्भु के समीप ले आईं।
श्लोक 14 (skanda.7.416.14)
ततोऽब्रवीत्सुतं देव ममैव गात्रलेपजम् देहि देव वरानित्थं महत्त्वं येन गच्छति
tato'bravītsutaṁ deva mamaiva gātralepajam dehi deva varānitthaṁ mahattvaṁ yena gacchati
तब उन्होंने देव (शिव) से कहा — यह मेरे ही शरीर के लेप से उत्पन्न है; हे देव, इसे ऐसे वर दीजिए, जिससे यह महत्त्व को प्राप्त हो।
श्लोक 15 (skanda.7.416.15)
श्रीभगवानुवाच शरीरस्थं शिरो मुख्यं यस्मात्पर्वतनन्दिनि महत्त्विदं शिरः प्रोक्तं त्वया स्कन्देन योजितम्
śrībhagavānuvāca śarīrasthaṁ śiro mukhyaṁ yasmātparvatanandini mahattvidaṁ śiraḥ proktaṁ tvayā skandena yojitam
श्रीभगवान् ने कहा — हे पर्वतनन्दिनि, चूँकि शरीर में शिर मुख्य होता है, इसलिए तुमने स्कन्द के साथ मिलकर जो यह शिर लगाया है, वह महान् कहा गया है।
श्लोक 16 (skanda.7.416.16)
विशेषान्नायकत्वं च गात्रे चास्य यतः स्थितम् महाविनायको ह्येष तस्मान्नाम्ना भविष्यति
viśeṣānnāyakatvaṁ ca gātre cāsya yataḥ sthitam mahāvināyako hyeṣa tasmānnāmnā bhaviṣyati
और चूँकि इसके शरीर में विशेष रूप से नायकत्व स्थित है, इसलिए यह 'महाविनायक' नाम से प्रसिद्ध होगा।
श्लोक 17 (skanda.7.416.17)
गणानां चैव सर्वेषामाधिपत्यं नगात्मजे अस्य दत्तं मया यस्माद्भविष्यति गणाधिपः
gaṇānāṁ caiva sarveṣāmādhipatyaṁ nagātmaje asya dattaṁ mayā yasmādbhaviṣyati gaṇādhipaḥ
हे नगात्मजे, मैंने इसे सभी गणों का आधिपत्य दिया है, इसलिए यह गणाधिप होगा।
श्लोक 18 (skanda.7.416.18)
सर्वकार्येषु ये मर्त्याः पूर्वमेनं गणाधिपम् स्मरिष्यंति न वै तेषां कार्यहानिर्भविष्यति
sarvakāryeṣu ye martyāḥ pūrvamenaṁ gaṇādhipam smariṣyaṁti na vai teṣāṁ kāryahānirbhaviṣyati
जो भी मनुष्य सब कार्यों में पहले इस गणाधिप का स्मरण करेंगे, उनके कार्य में कभी हानि नहीं होगी।
श्लोक 19 (skanda.7.416.19)
ततोऽस्य प्रददौ स्कन्दः प्रक्रीडार्थं कुठारकम् तदेव चायुधं तस्य सुप्रियं हि सदाऽभवत्
tato'sya pradadau skandaḥ prakrīḍārthaṁ kuṭhārakam tadeva cāyudhaṁ tasya supriyaṁ hi sadā'bhavat
तब स्कन्द ने उसे खेलने के लिए एक छोटी कुल्हाड़ी दी; वही उसका सदा प्रिय आयुध बन गया।
श्लोक 20 (skanda.7.416.20)
ततो गौरी ददौ भोज्यपात्रं मोदकपूरितम् पुत्रस्नेहात्स तत्प्राप्य लास्यमेवं तदाऽकरोत्
tato gaurī dadau bhojyapātraṁ modakapūritam putrasnehātsa tatprāpya lāsyamevaṁ tadā'karot
फिर गौरी ने उसे मोदकों से भरा भोजन-पात्र दिया; पुत्रस्नेह के कारण उसे प्राप्त कर उसने तब यह लास्य (नृत्य) किया।
श्लोक 21 (skanda.7.416.21)
तस्य भक्ष्यस्य गन्धेन निष्क्रान्तो मूषको बिलात् भक्षणाच्चामरो जातस्तस्य वाह्यो व्यजायत
tasya bhakṣyasya gandhena niṣkrānto mūṣako bilāt bhakṣaṇāccāmaro jātastasya vāhyo vyajāyata
उस भक्ष्य की सुगन्ध से एक चूहा बिल से निकला; उससे उसका सम्बन्ध होने के कारण वह उसका वाहन बन गया।
श्लोक 22 (skanda.7.416.22)
पुलस्त्य उवाच महाविनायको ह्येवं तत्र जातो मही पते तस्मिन्दृष्टे च यत्पुण्यं तत्त्वमेकमनाः शृणु
pulastya uvāca mahāvināyako hyevaṁ tatra jāto mahī pate tasmindṛṣṭe ca yatpuṇyaṁ tattvamekamanāḥ śṛṇu
पुलस्त्य जी ने कहा — हे भूमिपते, इस प्रकार वहाँ महाविनायक उत्पन्न हुए। उनके दर्शन से जो पुण्य होता है, वह एकाग्रचित्त होकर सुनो।
श्लोक 23 (skanda.7.416.23)
बाल्ये वयसि यत्पापं वार्द्धके यौवनेऽपि यत् करोति मानवो राजंस्तस्मात्पापात्प्रमुच्यते
bālye vayasi yatpāpaṁ vārddhake yauvane'pi yat karoti mānavo rājaṁstasmātpāpātpramucyate
हे राजन्, बाल्यावस्था में, वृद्धावस्था में, या यौवन में मनुष्य जो भी पाप करता है, उस पाप से वह मुक्त हो जाता है।
श्लोक 24 (skanda.7.416.24)
माघमासे सिते पक्षे चतुर्थ्यां समुपोषितः यस्तं पश्यति वाग्ग्मी स सर्वज्ञश्च प्रजायते तस्याग्रे सुमहत्कुण्डं स्वच्छोदकपूरितम्
māghamāse site pakṣe caturthyāṁ samupoṣitaḥ yastaṁ paśyati vāggmī sa sarvajñaśca prajāyate tasyāgre sumahatkuṇḍaṁ svacchodakapūritam
माघ मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को उपवास कर जो भी उनका दर्शन करता है, वह वाक्पटु और सर्वज्ञ हो जाता है। उनके सामने अत्यन्त विशाल, स्वच्छ जल से भरा एक कुण्ड है।
श्लोक 25 (skanda.7.416.25)
तत्र स्नात्वा नरो भक्त्या यः पश्यति विनायकम् तस्यान्वयेऽपि सर्वज्ञा जायन्ते मानवा नृप
tatra snātvā naro bhaktyā yaḥ paśyati vināyakam tasyānvaye'pi sarvajñā jāyaṁte mānavā nṛpa
वहाँ स्नान कर जो मनुष्य भक्तिपूर्वक विनायक का दर्शन करता है, हे राजन्, उसके वंश में भी मनुष्य सर्वज्ञ उत्पन्न होते हैं।
श्लोक 26 (skanda.7.416.26)
गणानां त्वेति मंत्रेण कृत्वा वै त्रिः प्रदक्षिणम् यस्तं पश्यति राजेन्द्र दुरितं न स पश्यति
gaṇānāṁ tveti maṁtreṇa kṛtvā vai triḥ pradakṣiṇam yastaṁ paśyati rājendra duritaṁ na sa paśyati
'गणानां त्वा' मन्त्र से तीन बार प्रदक्षिणा कर, हे राजेन्द्र, जो उनका दर्शन करता है, वह दुर्भाग्य को नहीं देखता।
श्लोक 27 (skanda.7.416.27)
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन तं प्रपश्येद्विनायकम् य इच्छेत्सकलान्कामानिह लोके परत्र च
tasmātsarvaprayatnena taṁ prapaśyedvināyakam ya icchetsakalānkāmāniha loke paratra ca
इसलिए जो भी इस लोक और परलोक में सभी कामनाओं की इच्छा रखता है, उसे सब प्रकार से प्रयत्नपूर्वक उस विनायक का दर्शन करना चाहिए।
श्लोक 28 (skanda.7.416.28)
गृहस्थोऽपि च यो भक्त्या स्मरेत्कार्य उपस्थिते अविघ्नं तस्य तत्सर्वं संसिद्धिमुपगच्छति
gṛhastho'pi ca yo bhaktyā smaretkārya upasthite avighnaṁ tasya tatsarvaṁ saṁsiddhimupagacchati
और गृहस्थ भी जो भक्तिपूर्वक कार्य उपस्थित होने पर उनका स्मरण करता है, उसका वह सब कार्य निर्विघ्न होकर सफलता को प्राप्त होता है।
श्लोक 29 (skanda.7.416.29)
प्रातरुत्थाय यो मर्त्यः स्मरेद्देवं विनायकम् तस्य तद्दिनजातानि सिद्धिं कृत्यानि यांति हि
prātarutthāya yo martyaḥ smareddevaṁ vināyakam tasya taddinajātāni siddhiṁ kṛtyāni yāṁti hi
जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर विनायक देव का स्मरण करता है, उस दिन आरम्भ किए गए उसके कार्य सिद्धि को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 30 (skanda.7.416.30)
विवाहे कलहे युद्धे प्रस्थाने कृषिकर्मणि प्रवेशे च स्मरेद्यस्तु भक्तिपूर्वं विनायकम् तस्य तद्वांछितं सर्वं प्रसादात्तस्य सिद्ध्यति
vivāhe kalahe yuddhe prasthāne kṛṣikarmaṇi praveśe ca smaredyastu bhaktipūrvaṁ vināyakam tasya tadvāṁchitaṁ sarvaṁ prasādāttasya siddhyati
विवाह में, कलह में, युद्ध में, प्रस्थान में, कृषिकर्म में, और प्रवेश में जो भक्तिपूर्वक विनायक का स्मरण करता है, उसका वह सब इच्छित कार्य उनकी कृपा से सिद्ध होता है।
श्लोक 31 (skanda.7.416.31)
महाविनायकीं शांतिं यः करोति समाहितः न तं प्रेता ग्रहा रोगाः पीडयंति विनायकाः
mahāvināyakīṁ śāṁtiṁ yaḥ karoti samāhitaḥ na taṁ pretā grahā rogāḥ pīḍayaṁti vināyakāḥ
जो एकाग्रचित्त होकर महाविनायकी शान्ति करता है, उसे प्रेत, ग्रह, रोग और विघ्नकारी शक्तियाँ पीड़ा नहीं देतीं।
श्लोक 32 (skanda.7.416.32)
ययातिरुवाच महावैनायिकीं शांतिं वद मे मुनिसत्तम के मंत्राः किं विधानं च परं कौतूहलं हि मे
yayātiruvāca mahāvaināyikīṁ śāṁtiṁ vada me munisattama ke maṁtrāḥ kiṁ vidhānaṁ ca paraṁ kautūhalaṁ hi me
ययाति ने कहा — हे मुनिसत्तम, मुझे महावैनायिकी शान्ति के विषय में बताइए — कौन-से मन्त्र हैं, क्या विधि है? मुझे परम कौतूहल है।
श्लोक 33 (skanda.7.416.33)
पुलस्त्य उवाच शुक्लपक्षे शुभे वारे नक्षत्रे दोषवर्जिते श्रेष्ठचंद्रबले शांतिं गणेशस्य समाचरेत्
pulastya uvāca śuklapakṣe śubhe vāre nakṣatre doṣavarjite śreṣṭhacaṁdrabale śāṁtiṁ gaṇeśasya samācaret
पुलस्त्य जी ने कहा — शुक्ल पक्ष में, शुभ वार को, दोषरहित नक्षत्र में, श्रेष्ठ चन्द्रबल में गणेश की शान्ति करनी चाहिए।
श्लोक 34 (skanda.7.416.34)
पूर्वोत्तरे समे देशे कृत्वा वेदिं च मंडपम् मध्ये चाष्टदलं पद्मं गृह्यसूत्रं प्रयोजयेत्
pūrvottare same deśe kṛtvā vediṁ ca maṁḍapam madhye cāṣṭadalaṁ padmaṁ gṛhyasūtraṁ prayojayet
पूर्वोत्तर दिशा में समतल भूमि में वेदी और मण्डप बनाकर, मध्य में अष्टदल कमल बनाकर, गृह्यसूत्र-विधि का प्रयोग करना चाहिए।
श्लोक 35 (skanda.7.416.35)
इन्द्रादिलोकपालांश्च दिक्षु सर्वासु भूपते गणेशपूर्विकाश्चापि मातरश्च विशेषतः
iṁdrādilokapālāṁśca dikṣu sarvāsu bhūpate gaṇeśapūrvikāścāpi mātaraśca viśeṣataḥ
हे भूपते, सभी दिशाओं में इन्द्र आदि लोकपालों को, तथा विशेषतः गणेश-प्रमुख मातृकाओं को,
श्लोक 36 (skanda.7.416.36)
गंधपुष्पोपहारैश्च यथोक्तैर्बलिविस्तरैः श्वेतवस्त्रयुगच्छन्नं कलशं जलपूरितम्
gaṁdhapuṣpopahāraiśca yathoktairbalivistaraiḥ śvetavastrayugacchannaṁ kalaśaṁ jalapūritam
गन्ध, पुष्प, उपहारों और यथोक्त विस्तृत बलियों से पूजकर, श्वेत वस्त्रयुगल से ढका हुआ, जल से भरा कलश स्थापित करे;
श्लोक 37 (skanda.7.416.37)
तस्यैव पूर्वदिग्भागे सहिरण्यं फलान्वितम्
tasyaiva pūrvadigbhāge sahiraṇyaṁ phalānvitam
उसी के पूर्व दिशा भाग में सोने और फलों सहित सामग्री रखे।
श्लोक 38 (skanda.7.416.38)
गणानां त्वेति मंत्रेण सहस्रं चाष्टसंयुतम् जपेत्तत्र तथा चारून्पंचांगान्नृपसत्तम
gaṇānāṁ tveti maṁtreṇa sahasraṁ cāṣṭasaṁyutam japettatra tathā cārūnpaṁcāṁgānnṛpasattama
'गणानां त्वा' मन्त्र से एक सहस्र आठ बार, तथा हे नृपसत्तम, सुन्दर पंचांग-मन्त्रों का भी वहाँ जप करना चाहिए,
श्लोक 39 (skanda.7.416.39)
विनायकं समुद्दिश्य पुरः कुण्डे करात्मके चतुरस्रे योनियुते मेखलाभिर्विभूषिते
vināyakaṁ samuddiśya puraḥ kuṇḍe karātmake caturasre yoniyute mekhalābhirvibhūṣite
विनायक का उद्देश्य कर, आगे, हस्ताकार कुण्ड में, चतुष्कोण, योनियुक्त, मेखलाओं से विभूषित कुण्ड में।
श्लोक 40 (skanda.7.416.40)
मधुदूर्वाक्षतैहोमैर्ग्रहहोमादनंतरम् गणानां त्वेति मंत्रेण दशसाहस्रिकस्तथा
madhudūrvākṣataihomairgrahahomādanaṁtaram gaṇānāṁ tveti maṁtreṇa daśasāhasrikastathā
मधु, दूर्वा, अक्षत की आहुतियों से, ग्रहहोम के पश्चात्, 'गणानां त्वा' मन्त्र से दस सहस्र आहुतियाँ भी वैसे ही
श्लोक 41 (skanda.7.416.41)
कार्यो वै पार्थिवश्रेष्ठ कार्यश्चोदङ्मुखैर्द्विजैः चतुर्भिश्चतुरै राजन्पीतवस्त्रानुलेपनैः
kāryo vai pārthivaśreṣṭha kāryaścodaṅmukhairdvijaiḥ caturbhiścaturai rājanpītavastrānulepanaiḥ
करनी चाहिए, हे पार्थिवश्रेष्ठ, और उत्तरमुखी, चतुर, पीतवस्त्र-अनुलेपन से युक्त चार द्विजों द्वारा करानी चाहिए,
श्लोक 42 (skanda.7.416.42)
पीतांबरधरैश्चैव धृतहेमांगुलीयकैः ततो होमावसाने तु यजमानं नृपोत्तम
pītāṁbaradharaiścaiva dhṛtahemāṁgulīyakaiḥ tato homāvasāne tu yajamānaṁ nṛpottama
जो पीताम्बरधारी हों और स्वर्ण-अंगूठियाँ धारण किए हों। फिर होम की समाप्ति पर, हे नृपोत्तम, यजमान को,
श्लोक 43 (skanda.7.416.43)
मृगचर्मोपरिस्थं च मंत्रैरेभिर्विधानतः स्नापयेत्प्राङ्मुखं शांतं शुक्लवस्त्रावगुंठितम्
mṛgacarmoparisthaṁ ca mantrairebhirvidhānataḥ snāpayetprāṅmukhaṁ śāṁtaṁ śuklavastrāvaguṁṭhitam
मृगचर्म पर बैठाकर, इन मन्त्रों से विधिपूर्वक पूर्वाभिमुख, शान्त, श्वेत वस्त्र से आवृत होकर स्नान कराए —
श्लोक 44 (skanda.7.416.44)
इमं मे गंगे यमुने पंचनद्यः सुपुष्करे श्रीसूक्तसहितं विष्णोः पावमानं वृषाकपिम्
imaṁ me gaṁge yamune paṁcanadyaḥ supuṣkare śrīsūktasahitaṁ viṣṇoḥ pāvamānaṁ vṛṣākapim
हे गंगे, यमुने, पंचनद्यों, हे सुपुष्करे — श्रीसूक्त सहित, विष्णु के पावमान और वृषाकपि सूक्तों को —
श्लोक 45 (skanda.7.416.45)
सम्यगुच्चार्य विघ्नानां ततो नाशं प्रपद्यते ग्रहाः सौम्यत्वमायांति भूता नश्यंति तत्क्षणात्
samyaguccārya vighnānāṁ tato nāśaṁ prapadyate grahāḥ saumyatvamāyāṁti bhūtā naśyaṁti tatkṣaṇāt
भलीभाँति उच्चारण कर, तब विघ्नों का नाश प्राप्त होता है; ग्रह सौम्यता को प्राप्त होते हैं, भूत तत्क्षण नष्ट हो जाते हैं।
श्लोक 46 (skanda.7.416.46)
आधयो व्याधयो रौद्रा दुष्टरोगा ज्वरादयः प्रणश्यंति द्रुतं सर्वे तथोत्पाताः सुदारुणाः
ādhayo vyādhayo raudrā duṣṭarogā jvarādayaḥ praṇaśyaṁti drutaṁ sarve tathotpātāḥ sudāruṇāḥ
आधि, व्याधि, भयंकर, दुष्ट रोग, ज्वर आदि सभी शीघ्र नष्ट हो जाते हैं, तथा अत्यन्त भयंकर उत्पात भी।
श्लोक 47 (skanda.7.416.47)
एतत्ते सर्वमाख्यातं यन्मां त्वं परिपृच्छसि विनायकस्य माहात्म्यं महत्त्वं शांतिकं तथा
etatte sarvamākhyātaṁ yanmāṁ tvaṁ paripṛcchasi vināyakasya māhātmyaṁ mahattvaṁ śāṁtikaṁ tathā
यह सब मैंने आपको बताया, जो आपने मुझसे पूछा था — विनायक का माहात्म्य, उनकी महत्ता, तथा शान्तिक विधि।
श्लोक 48 (skanda.7.416.48)
यश्च कीर्त्तयते सम्यक्चतुर्थ्यां सुसमाहितः शृणोति वा नृपश्रेष्ठ तस्याऽविघ्नं सदा भवेत्
yaśca kīrttayate samyakcaturthyāṁ susamāhitaḥ śṛṇoti vā nṛpaśreṣṭha tasyā'vighnaṁ sadā bhavet
और हे नृपश्रेष्ठ, जो भी सुसमाहित होकर चतुर्थी को इसे भलीभाँति कीर्तन करता है, या सुनता है, उसे सदा निर्विघ्नता प्राप्त होती है।
श्लोक 49 (skanda.7.416.49)
यंयं काममभिध्यायन्यजेच्चेदं समाहितः तत्तदाप्नोति नूनं च गणनाथप्रसादतः
yaṁyaṁ kāmamabhidhyāyanyajeccedaṁ samāhitaḥ tattadāpnoti nūnaṁ ca gaṇanāthaprasādataḥ
जो-जो कामना का ध्यान कर, एकाग्रचित्त होकर इस प्रकार पूजा करता है, वह गणनाथ की कृपा से निश्चय ही उसे प्राप्त करता है।