प्रभास खण्ड · अध्याय 417
पार्थेश्वर माहात्म्य वर्णन
श्लोक 1 (skanda.7.417.1)
॥ पुलस्त्य उवाच ॥ ततः पार्थेश्वरं गच्छेदेवं पातकनाशनम् । यं दृष्ट्वा मानवः सम्यङ्मुच्यते सर्वपातकैः
pulastya uvāca | tataḥ pārtheśvaraṁ gacchedevaṁ pātakanāśanam | yaṁ dṛṣṭvā mānavaḥ samyaṅmucyate sarvapātakaiḥ
पुलस्त्य ने कहा - तदनन्तर पापों का नाश करने वाले इस पार्थेश्वर लिंग के पास जाना चाहिए, जिसे देखकर मनुष्य भलीभाँति सम्पूर्ण पापों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 2 (skanda.7.417.2)
पार्था नाम्न्यभवत्साध्वी देवलस्य प्रिया सती । तया पूर्वं तपस्तप्तं तत्र स्थाने महीपते
pārthā nāmnyabhavatsādhvī devalasya priyā satī | tayā pūrvaṁ tapastaptaṁ tatra sthāne mahīpate
हे राजन्! पार्था नामक एक साध्वी सती थी, जो देवल मुनि की प्रिय पत्नी थी। उसी ने पहले उस स्थान पर तपस्या की थी।
श्लोक 3 (skanda.7.417.3)
सा पूर्वमभवद्वन्ध्या ऋषिपत्नी यशस्विनी । वैराग्यं परमं गत्वा ततश्चैवार्बुदं गता
sā pūrvamabhavadvandhyā ṛṣipatnī yaśasvinī | vairāgyaṁ paramaṁ gatvā tataścaivārbudaṁ gatā
वह यशस्विनी ऋषिपत्नी पहले बाँझ थी। परम वैराग्य को प्राप्त होकर वह अर्बुद पर्वत पर चली गयी।
श्लोक 4 (skanda.7.417.4)
वायुभक्षा निराहारा समचित्ताऽऽसने स्थिता । ततो वर्षसहस्रान्ते भक्त्या तस्या महीपते
vāyubhakṣā nirāhārā samacittāsane sthitā | tato varṣasahasrānte bhaktyā tasyā mahīpate
वह वायु का ही भक्षण करती हुई, निराहार, समचित्त होकर आसन पर स्थित रही। हे राजन्! तत्पश्चात् एक सहस्र वर्ष के अन्त में उसकी भक्ति से -
श्लोक 5 (skanda.7.417.5)
उद्भिद्य धरणीपृष्ठं सहसा लिङ्गमुत्थितम् । एतस्मिन्नेव काले तु वागुवाचाशरीरिणी
udbhidya dharaṇīpṛṣṭhaṁ sahasā liṅgamutthitam | etasminneva kāle tu vāguvācāśarīriṇī
सहसा पृथ्वी की सतह को भेदकर एक लिंग प्रकट हो उठा। उसी समय एक अशरीरी वाणी ने कहा -
श्लोक 6 (skanda.7.417.6)
पूजयैतन्महाभागे शिवलिङ्गं सुपावनम् । त्वद्भक्त्या धरणीपृष्ठान्निःसृतं कामदं महत्
pūjayaitanmahābhāge śivaliṅgaṁ supāvanam | tvadbhaktyā dharaṇīpṛṣṭhānniḥsṛtaṁ kāmadaṁ mahat
हे महाभागे! इस परम पवित्र शिवलिंग की पूजा करो। तुम्हारी भक्ति से ही यह पृथ्वी की सतह से प्रकट हुआ महान् एवं कामनापूर्ण करने वाला लिंग है।
श्लोक 7 (skanda.7.417.7)
यो यं काममभिध्यायन्पूजयिष्यति मानवः । अन्योऽपि तदभिप्रेतं प्राप्स्यते नात्र संशयः
yo yaṁ kāmamabhidhyāyanpūjayiṣyati mānavaḥ | anyopi tadabhipretaṁ prāpsyate nātra saṁśayaḥ
जो मनुष्य जिस कामना का ध्यान करते हुए इसकी पूजा करेगा, दूसरा भी अपनी अभीष्ट वस्तु को प्राप्त करेगा - इसमें कोई सन्देह नहीं है।
श्लोक 8 (skanda.7.417.8)
पार्थेश्वराख्यमेतद्धि लोके ख्यातिं गमिष्यति । एवमुक्त्वा ततो वाणी विरराम महीपते
pārtheśvarākhyametaddhi loke khyātiṁ gamiṣyati | evamuktvā tato vāṇī virarāma mahīpate
यह पार्थेश्वर नामक लिंग लोक में प्रसिद्धि को प्राप्त होगा। हे राजन्! ऐसा कहकर वह वाणी मौन हो गयी।
श्लोक 9 (skanda.7.417.9)
ततः सा विस्मयाविष्टा पूजयामास तत्तदा । ततः पुत्रशतं प्राप्तं दिव्यं वंशधरं तथा
tataḥ sā vismayāviṣṭā pūjayāmāsa tattadā | tataḥ putraśataṁ prāptaṁ divyaṁ vaṁśadharaṁ tathā
तब आश्चर्यचकित होकर उसने उसी समय उसकी पूजा की। तत्पश्चात् उसे सौ दिव्य, वंश बढ़ाने वाले पुत्र प्राप्त हुए।
श्लोक 10 (skanda.7.417.10)
ततः प्रभृति तल्लिङ्गं विख्यातं धरणीतले । तत्रास्ति निर्मलं तोयं गिरिगह्वरनिःसृतम्
tataḥ prabhṛti talliṅgaṁ vikhyātaṁ dharaṇītale | tatrāsti nirmalaṁ toyaṁ girigahvaraniḥsṛtam
तभी से वह लिंग पृथ्वीतल पर विख्यात हो गया। वहाँ पर्वत की गुफा से निकला हुआ निर्मल जल है।
श्लोक 11 (skanda.7.417.11)
तत्र स्नात्वा नरः सम्यग्यस्तं पश्यति भावतः । न स पश्यति संसारे दुःखं सन्तानसम्भवम्
tatra snātvā naraḥ samyagyastaṁ paśyati bhāvataḥ | na sa paśyati saṁsāre duḥkhaṁ santānasambhavam
वहाँ भलीभाँति स्नान करके जो मनुष्य भाव से उसका दर्शन करता है, वह संसार में सन्तान से उत्पन्न होने वाले दुःख को नहीं देखता।
श्लोक 12 (skanda.7.417.12)
शुक्लपक्षे चतुर्दश्यां जागरं तस्य चाग्रतः । यः करोति निराहारः स पुत्रं लभते ध्रुवम्
śuklapakṣe caturdaśyāṁ jāgaraṁ tasya cāgrataḥ | yaḥ karoti nirāhāraḥ sa putraṁ labhate dhruvam
जो निराहार रहकर शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को उसके सामने जागरण करता है, वह निश्चय ही पुत्र प्राप्त करता है।
श्लोक 13 (skanda.7.417.13)
पिण्डनिर्वापणं तत्र यः करोति समाहितः । तस्य पुत्रत्वमायाति पितरस्तत्प्रसादतः
piṇḍanirvāpaṇaṁ tatra yaḥ karoti samāhitaḥ | tasya putratvamāyāti pitarastatprasādataḥ
जो एकाग्रचित्त होकर वहाँ पिण्डदान करता है, उसके पितर उस लिंग के प्रसाद से पुत्रत्व को प्राप्त होते हैं, अर्थात् तृप्त होकर सद्गति पाते हैं।