प्रभास खण्ड · अध्याय 418
कृष्णतीर्थ माहात्म्य वर्णन
श्लोक 1 (skanda.7.418.1)
॥ पुलस्त्य उवाच ॥ कृष्णतीर्थं ततो गच्छेत्कृष्णस्य दयितं सदा । यत्र सन्निहितो नित्यं स्वयं विष्णुर्महीपते
pulastya uvāca | kṛṣṇatīrthaṁ tato gacchetkṛṣṇasya dayitaṁ sadā | yatra sannihito nityaṁ svayaṁ viṣṇurmahīpate
पुलस्त्य ने कहा - तदनन्तर कृष्ण को सदा प्रिय कृष्णतीर्थ में जाना चाहिए, जहाँ हे राजन्! स्वयं विष्णु नित्य निवास करते हैं।
श्लोक 2 (skanda.7.418.2)
॥ ययातिरुवाच ॥ कृष्णतीर्थं कथं तत्र जातं ब्राह्मणसत्तम । कस्मिन्काले मुने ब्रूहि सर्वं विस्तरतो मम
yayātiruvāca | kṛṣṇatīrthaṁ kathaṁ tatra jātaṁ brāhmaṇasattama | kasminkāle mune brūhi sarvaṁ vistarato mama
ययाति ने कहा - हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! वहाँ कृष्णतीर्थ कैसे उत्पन्न हुआ? हे मुने! किस समय हुआ? मुझे सब कुछ विस्तार से बताइये।
श्लोक 3 (skanda.7.418.3)
॥ पुलस्त्य उवाच ॥ तस्मिन्नेकार्णवे घोरे नष्टे स्थावरजंगमे । चंद्रार्कपवने नष्टे ज्योतिषि प्रलयं गते
pulastya uvāca | tasminnekārṇave ghore naṣṭe sthāvarajaṅgame | candrārkapavane naṣṭe jyotiṣi pralayaṁ gate
पुलस्त्य ने कहा - जब वह भयंकर एकार्णव था, स्थावर-जंगम नष्ट हो चुके थे, चन्द्रमा-सूर्य और वायु नष्ट हो चुके थे, ज्योतिर्गण प्रलय को प्राप्त हो चुके थे -
श्लोक 4 (skanda.7.418.4)
ततो युगसहस्रांते विबुद्धः कमलासनः । एकाकी चिंतयामास कथं सृष्टिर्भवेदिति
tato yugasahasrānte vibuddhaḥ kamalāsanaḥ | ekākī cintayāmāsa kathaṁ sṛṣṭirbhavediti
- तब सहस्र युगों के अन्त में कमलासन ब्रह्मा जागे। अकेले उन्होंने विचार किया कि सृष्टि कैसे हो।
श्लोक 5 (skanda.7.418.5)
भ्रमंश्चापि चतुर्वक्त्रो यावत्पश्यति दूरतः । चतुर्भुजं विशालाक्षं पुरुषं पुरतः स्थितम्
bhramaṁścāpi caturvaktro yāvatpaśyati dūrataḥ | caturbhujaṁ viśālākṣaṁ puruṣaṁ purataḥ sthitam
विचरण करते हुए चतुर्मुख ब्रह्मा ने दूर से एक चतुर्भुज, विशाललोचन पुरुष को अपने सामने खड़ा देखा।
श्लोक 6 (skanda.7.418.6)
तं चोवाच चतुर्वक्त्रः कस्त्वं केन विनिर्मितः । किमर्थमिह संप्राप्तः सर्वं विस्तरतो वद
taṁ covāca caturvaktraḥ kastvaṁ kena vinirmitaḥ | kimarthamiha saṁprāptaḥ sarvaṁ vistarato vada
चतुर्मुख ब्रह्मा ने उससे कहा - "तुम कौन हो? तुम्हें किसने बनाया है? यहाँ किसलिए आये हो? सब कुछ विस्तार से बताओ।"
श्लोक 7 (skanda.7.418.7)
तमुवाचाथ गोविंदः प्रहसञ्छ्लक्ष्णया गिरा
tamuvācātha govindaḥ prahasañchlakṣṇayā girā
तब गोविन्द ने मुसकराते हुए मृदु वाणी में उनसे कहा -
श्लोक 8 (skanda.7.418.8)
अहमाद्यः पुमानेको मया सृष्टो भवानपि । स्रष्टुमिच्छामि भूयोऽपि भूतग्रामं चतुर्विधम्
ahamādyaḥ pumāneko mayā sṛṣṭo bhavānapi | sraṣṭumicchāmi bhūyo'pi bhūtagrāmaṁ caturvidham
"मैं ही आदि एवं एकमात्र पुरुष हूँ, तुम्हें भी मैंने ही उत्पन्न किया है। मैं पुनः चतुर्विध प्राणिसमूह की सृष्टि करना चाहता हूँ।"
श्लोक 9 (skanda.7.418.9)
॥ पुलस्त्य उवाच ॥ तस्य तद्वचनं श्रुत्वा क्रुद्धो देवः पितामहः । अब्रवीत्परुषं वाक्यं भर्त्सयंश्च पुनःपुनः
pulastya uvāca | tasya tadvacanaṁ śrutvā kruddho devaḥ pitāmahaḥ | abravītparuṣaṁ vākyaṁ bhartsayaṁśca punaḥpunaḥ
पुलस्त्य ने कहा - उसके यह वचन सुनकर पितामह देव ब्रह्मा क्रुद्ध हो गये और बार-बार भर्त्सना करते हुए कठोर वचन बोले।
श्लोक 10 (skanda.7.418.10)
सृष्टस्त्वं हि मया मूढ प्रथमोऽहमसंशयम् । त्वादृशानां सहस्राणि करिष्येऽहमसंशयम्
sṛṣṭastvaṁ hi mayā mūḍha prathamo'hamasaṁśayam | tvādṛśānāṁ sahasrāṇi kariṣye'hamasaṁśayam
"हे मूढ़! तुम्हें तो मैंने उत्पन्न किया है, मैं ही निस्सन्देह प्रथम हूँ। मैं तुम्हारे जैसे हजारों उत्पन्न कर सकता हूँ, इसमें सन्देह नहीं।"
श्लोक 11 (skanda.7.418.11)
एवं विवदमानौ तौ मिथो राजन्महाद्युती । स्पर्धया रोषताम्राक्षौ युयुधाते परस्परम्
evaṁ vivadamānau tau mitho rājanmahādyutī | spardhayā roṣatāmrākṣau yuyudhāte parasparam
हे राजन्! इस प्रकार परस्पर विवाद करते हुए वे दोनों महातेजस्वी स्पर्धा के कारण रोषरक्त नेत्र होकर आपस में युद्ध करने लगे।
श्लोक 12 (skanda.7.418.12)
मुष्टिभिर्बाहुभिश्चैव नखैर्दंतैर्विकर्षणैः । एवं वर्षसहस्रं तु तयोर्युद्धमवर्त्तत
muṣṭibhirbāhubhiścaiva nakhairdantairvikarṣaṇaiḥ | evaṁ varṣasahasraṁ tu tayoryuddhamavartata
मुक्कों, भुजाओं, नखों, दाँतों और खींचातानी से - इस प्रकार उन दोनों का युद्ध एक सहस्र वर्ष तक चलता रहा।
श्लोक 13 (skanda.7.418.13)
ततो वर्षसहस्रांते तयोर्मध्ये नृपोत्तम । प्रादुर्भूतं महालिंगं दिव्यं तेजोमयं शुभम्
tato varṣasahasrānte tayormadhye nṛpottama | prādurbhūtaṁ mahāliṅgaṁ divyaṁ tejomayaṁ śubham
हे नृपोत्तम! तब एक सहस्र वर्ष के अन्त में उन दोनों के मध्य एक महान्, दिव्य, तेजोमय, शुभ लिंग प्रकट हुआ।
श्लोक 14 (skanda.7.418.14)
एतस्मिन्नेव काले तु वागुवाचाशरीरिणी । युद्धाद्ब्रह्मन्निवर्तस्व त्वं च विष्णो ममाज्ञया
etasminneva kāle tu vāguvācāśarīriṇī | yuddhādbrahmannivartasva tvaṁ ca viṣṇo mamājñayā
उसी समय एक अशरीरी वाणी ने कहा - "हे ब्रह्मन्! युद्ध से निवृत्त हो जाओ, और हे विष्णो! तुम भी मेरी आज्ञा से निवृत्त हो जाओ।"
श्लोक 15 (skanda.7.418.15)
एतन्माहेश्वरं लिंगं योऽस्य चांते गमिष्यति । स ज्येष्ठः स विभुः कर्त्ता युवयोर्नात्र संशयः
etanmāheśvaraṁ liṅgaṁ yo'sya cānte gamiṣyati | sa jyeṣṭhaḥ sa vibhuḥ karttā yuvayornātra saṁśayaḥ
"यह महेश्वर का लिंग है। तुम दोनों में से जो इसके अन्त तक पहुँच जाएगा, वही ज्येष्ठ है, वही स्वामी और कर्ता है - इसमें कोई सन्देह नहीं।"
श्लोक 16 (skanda.7.418.16)
अधोभागं व्रजत्वेक एकश्चोर्द्ध्वं ममाज्ञया । तच्छ्रुत्वा सत्वरो ब्रह्मा व्योममार्गं समाश्रितः
adhobhāgaṁ vrajatveka ekaścordhvaṁ mamājñayā | tacchrutvā satvaro brahmā vyomamārgaṁ samāśritaḥ
"तुम दोनों में से एक नीचे की ओर जाए तथा एक ऊपर की ओर, मेरी आज्ञा से।" यह सुनकर ब्रह्मा शीघ्रता से आकाश मार्ग का आश्रय लेकर चल पड़े।
श्लोक 17 (skanda.7.418.17)
विदार्य वसुधां कृष्णोऽप्यधस्तात्सत्वरं गतः । स भित्त्वा सप्तपातालानधो यावत्प्रयाति च । तावत्कालाग्निरुद्रस्तु दृष्टस्तेन महात्मना
vidārya vasudhāṁ kṛṣṇo'pyadhastātsatvaraṁ gataḥ | sa bhittvā saptapātālānadho yāvatprayāti ca | tāvatkālāgnirudrastu dṛṣṭastena mahātmanā
कृष्ण (विष्णु) भी पृथ्वी को विदीर्ण करके शीघ्रता से नीचे की ओर गये। सातों पातालों को भेदते हुए जैसे ही वे महात्मा और नीचे बढ़े, उन्होंने कालाग्निरुद्र को देखा।
श्लोक 18 (skanda.7.418.18)
गंतुमिच्छंस्ततोऽधस्ताद्यावद्वेगं करोति सः । तावत्तस्यार्चिभिर्दग्धः कृष्णत्वं समपद्यत
gantumicchaṁstato'dhastādyāvadvegaṁ karoti saḥ | tāvattasyārcibhirdagdhaḥ kṛṣṇatvaṁ samapadyata
जैसे ही वे और नीचे जाने की इच्छा से वेग करने लगे, वे उन रुद्र की ज्वालाओं से झुलस गये और उन्हें कृष्ण-वर्ण प्राप्त हो गया।
श्लोक 19 (skanda.7.418.19)
ततो मूर्छाभिसंतप्तो दह्यमानोऽद्भुताग्निना । निवर्त्य सहसा विष्णुर्वैलक्ष्यं परमं गतः
tato mūrcchābhisaṁtapto dahyamāno'dbhutāgninā | nivartya sahasā viṣṇurvailakṣyaṁ paramaṁ gataḥ
तब उस अद्भुत अग्नि से झुलसते हुए मूर्च्छित हो, विष्णु सहसा लौट पड़े और अत्यन्त विस्मय को प्राप्त हुए।
श्लोक 20 (skanda.7.418.20)
तथा लिंगं समासाद्य भक्त्या पूजा कृता ततः । वेदोक्तैः परमैः सूक्ष्मैः स्तुतिं चक्रे महीपते
tathā liṅgaṁ samāsādya bhaktyā pūjā kṛtā tataḥ | vedoktaiḥ paramaiḥ sūkṣmaiḥ stutiṁ cakre mahīpate
तत्पश्चात् उस लिंग के पास पहुँचकर उन्होंने भक्तिपूर्वक पूजा की। हे राजन्! वेदोक्त परम सूक्ष्म मन्त्रों से उन्होंने स्तुति की।
श्लोक 21 (skanda.7.418.21)
ब्रह्माऽपि व्योममार्गेण गतो हंसविमानतः । दिव्यं वर्षसहस्रं तु तस्यांतं नाभ्यपद्यत
brahmā'pi vyomamārgeṇa gato haṁsavimānataḥ | divyaṁ varṣasahasraṁ tu tasyāntaṁ nābhyapadyata
ब्रह्मा भी हंस-विमान से आकाश मार्ग से चले, किन्तु एक दिव्य सहस्र वर्ष तक भी उसका अन्त प्राप्त नहीं कर सके।
श्लोक 22 (skanda.7.418.22)
ततो वर्षसहस्रांते केतकीं सोऽप्यपश्यत । आयांतीं व्योममार्गेण तया पृष्टश्चतुर्मुखः
tato varṣasahasrānte ketakīṁ so'pyapaśyat | āyāntīṁ vyomamārgeṇa tayā pṛṣṭaścaturmukhaḥ
तब सहस्र वर्ष के अन्त में उन्होंने आकाश मार्ग से आती हुई केतकी के फूल को देखा। उस केतकी ने चतुर्मुख ब्रह्मा से पूछा -
श्लोक 23 (skanda.7.418.23)
क्व त्वया गम्यते ब्रह्मन्निरालंबे महापथि । शून्ये तत्त्वं समाचक्ष्व परं कौतूहलं हि मे
kva tvayā gamyate brahmannirālambe mahāpathi | śūnye tattvaṁ samācakṣva paraṁ kautūhalaṁ hi me
"हे ब्रह्मन्! इस निराधार, शून्य महापथ पर आप कहाँ जा रहे हैं? मुझे सत्य बताइये, मुझे बड़ा कौतूहल है।"
श्लोक 24 (skanda.7.418.24)
॥ ब्रह्मोवाच ॥ मम स्पर्धा समुत्पन्ना विष्णुना सह शोभने । लिंगस्यास्य हि पर्यंतं यो लभिष्यति चावयोः
brahmovāca | mama spardhā samutpannā viṣṇunā saha śobhane | liṅgasyāsya hi paryantaṁ yo labhiṣyati cāvayoḥ
ब्रह्मा ने कहा - "हे शोभने! मेरी विष्णु के साथ यह स्पर्धा हुई है कि हम दोनों में से जो इस लिंग का अन्त प्राप्त कर लेगा -"
श्लोक 25 (skanda.7.418.25)
स ज्यायानितरो हीनो ह्येतदुक्तं पिनाकिना । प्रस्थितोऽहं ततश्चोर्द्ध्वमधोमार्गं गतो हरिः
sa jyāyānitaro hīno hyetaduktaṁ pinākinā | prasthito'haṁ tataścordhvamadhomārgaṁ gato hariḥ
"- वही ज्येष्ठ है, दूसरा हीन है - ऐसा पिनाकधारी शिव ने कहा था। मैं वहाँ से ऊपर की ओर चला और हरि नीचे के मार्ग से गये।"
श्लोक 26 (skanda.7.418.26)
लब्ध्वा लिंगस्य पर्यंतं यास्यामि क्षितिमंडले । तस्य तद्वचनं श्रुत्वा तत्पुष्पमभ्यभाषत
labdhvā liṅgasya paryantaṁ yāsyāmi kṣitimaṇḍale | tasya tadvacanaṁ śrutvā tatpuṣpamabhyabhāṣata
"लिंग का अन्त पाकर मैं पृथ्वीमण्डल पर वापस जाऊँगा।" उनका यह वचन सुनकर उस पुष्प ने उनसे कहा -
श्लोक 27 (skanda.7.418.27)
व्यर्थश्रमोऽसि लोकेश नांतो लिंगस्य विद्यते । चतुर्युगसहस्राणां कोटिरेका पितामह
vyarthaśramo'si lokeśa nānto liṅgasya vidyate | caturyugasahasrāṇāṁ koṭirekā pitāmaha
"हे लोकेश! आपका परिश्रम व्यर्थ है, इस लिंग का कोई अन्त नहीं है! हे पितामह! चार युगों के हजारों की एक करोड़ अवधि से -"
श्लोक 28 (skanda.7.418.28)
लिंगमूर्ध्नः पतंत्या मे कालो जातो महाद्युते । तथापि क्षिति पृष्ठं तु न प्राप्तास्मि कथंचन
liṅgamūrdhnaḥ patantyā me kālo jāto mahādyute | tathāpi kṣiti pṛṣṭhaṁ tu na prāptāsmi kathaṁcana
"- हे महाद्युते! मुझे इस लिंग के शिखर से गिरते हुए इतना काल बीत चुका है, फिर भी मैं किसी प्रकार पृथ्वीतल तक नहीं पहुँच सकी हूँ।"
श्लोक 29 (skanda.7.418.29)
यावत्कालेन हंसस्ते योजनं संप्रगच्छति । तावत्कालेन गच्छामि योजनानामहं शतम्
yāvatkālena haṁsaste yojanaṁ saṁpragacchati | tāvatkālena gacchāmi yojanānāmahaṁ śatam
"जितने समय में आपका हंस एक योजन चलता है, उतने ही समय में मैं सौ योजन चलती हूँ।"
श्लोक 30 (skanda.7.418.30)
तस्मान्निवर्तनं युक्तं मम वाक्येन ते विभो । दर्शयित्वा च मां विष्णोर्ज्येष्ठत्वं व्रज सांप्रतम्
tasmānnivartanaṁ yuktaṁ mama vākyena te vibho | darśayitvā ca māṁ viṣṇorjyeṣṭhatvaṁ vraja sāṁpratam
"इसलिए हे विभो! मेरे कथनानुसार लौट जाना ही उचित है। मुझे साक्षी बनाकर अब जाकर विष्णु की ज्येष्ठता स्वीकार कर लीजिये।"
श्लोक 31 (skanda.7.418.31)
ततो हृष्टमना भूत्वा गृहीत्वा तां चतुर्मुखः । पुनर्वर्षसहस्रांते भूमिपृष्ठमुपागतः । दर्शयामास तां विष्णोरेषा लिंगस्य मूर्धतः
tato hṛṣṭamanā bhūtvā gṛhītvā tāṁ caturmukhaḥ | punarvarṣasahasrānte bhūmipṛṣṭhamupāgataḥ | darśayāmāsa tāṁ viṣṇoreṣā liṅgasya mūrdhataḥ
तब चतुर्मुख ब्रह्मा प्रसन्नचित्त होकर उसे साथ ले गये और पुनः सहस्र वर्ष के अन्त में पृथ्वीतल पर पहुँचकर उसे विष्णु को दिखाया - "यह लिंग के शिखर से गिरी है।"
श्लोक 32 (skanda.7.418.32)
मयाऽऽनीता शुभा माला लब्धश्चांतं चतुर्भुज । त्वया लब्धो न चासत्यं वद मे पुरुषोत्तम
mayānītā śubhā mālā labdhaścāntaṁ caturbhuja | tvayā labdho na cāsatyaṁ vada me puruṣottama
"मैं यह शुभ माला लाया हूँ और मैंने अन्त प्राप्त कर लिया है। हे चतुर्भुज पुरुषोत्तम! सत्य-सत्य बताओ, क्या तुमने अन्त पाया या नहीं?"
श्लोक 33 (skanda.7.418.33)
॥ विष्णुरुवाच ॥ अनंतस्याप्रमेयस्य देवदेवस्य शूलिनः । नाहं शक्तः परं पारं गंतुं ब्रह्मन्कथंचन
viṣṇuruvāca | anantasyāprameyasya devadevasya śūlinaḥ | nāhaṁ śaktaḥ paraṁ pāraṁ gantuṁ brahmankathaṁcana
विष्णु ने कहा - "उस अनन्त, अप्रमेय, त्रिशूलधारी देवदेव का पार पाने में मैं किसी प्रकार समर्थ नहीं हुआ, हे ब्रह्मन्!"
श्लोक 34 (skanda.7.418.34)
यदि त्वयाऽस्य पर्यंतो लब्धो ब्रह्मन्कथंचन । तत्ते तुष्टिं गतो नूनं देवदेवो महेश्वरः
yadi tvayā'sya paryanto labdho brahmankathaṁcana | tatte tuṣṭiṁ gato nūnaṁ devadevo maheśvaraḥ
"हे ब्रह्मन्! यदि आपने किसी प्रकार इसका अन्त पा लिया है, तो निश्चय ही देवदेव महेश्वर आपसे प्रसन्न हैं।"
श्लोक 35 (skanda.7.418.35)
नान्यथा चास्य पर्यंतो दृश्यते केन चित्क्वचित् । तस्माज्ज्येष्ठो भवाञ्छ्रेष्ठः कनिष्ठोऽहमसंशयम्
nānyathā cāsya paryanto dṛśyate kena citkvacit | tasmājjyeṣṭho bhavāñchreṣṭhaḥ kaniṣṭho'hamasaṁśayam
"अन्यथा इसका अन्त तो किसी के द्वारा भी कहीं नहीं देखा जा सकता। अतः आप ही ज्येष्ठ और श्रेष्ठ हैं, मैं कनिष्ठ हूँ - इसमें सन्देह नहीं।"
श्लोक 36 (skanda.7.418.36)
॥ पुलस्त्य उवाच ॥ एतस्मिन्नेव काले तु भगवान्वृषभध्वजः । कोपं चक्रे महाराज ब्रह्माणं प्रति तत्क्षणात्
pulastya uvāca | etasminneva kāle tu bhagavānvṛṣabhadhvajaḥ | kopaṁ cakre mahārāja brahmāṇaṁ prati tatkṣaṇāt
पुलस्त्य ने कहा - हे महाराज! उसी क्षण वृषभध्वज भगवान् शिव तत्काल ब्रह्मा पर क्रुद्ध हो गये।
श्लोक 37 (skanda.7.418.37)
अथाह दर्शनं गत्वा धिग्धिग्व्यर्थप्रजल्पक । मिथ्या प्रजल्पमानेन किमिदं साहसं कृतम्
athāha darśanaṁ gatvā dhigdhigvyarthaprajalpaka | mithyā prajalpamānena kimidaṁ sāhasaṁ kṛtam
तब दर्शन देकर उन्होंने कहा - "धिक्कार है, धिक्कार है, हे व्यर्थ बकवादी! झूठ बोलकर तुमने यह कैसा दुस्साहस किया है?"
श्लोक 38 (skanda.7.418.38)
यस्मात्त्वया मृषा प्रोक्तं मम पर्यंतदर्शनम् । तस्मात्त्वं सर्ववर्णानां पूजार्हो न भविष्यसि
yasmāttvayā mṛṣā proktaṁ mama paryantadarśanam | tasmāttvaṁ sarvavarṇānāṁ pūjārho na bhaviṣyasi
"क्योंकि तुमने झूठा दावा किया कि तुमने मेरा अन्त देख लिया है, इसलिए तुम सभी वर्णों के लिए पूजा के योग्य नहीं रहोगे।"
श्लोक 39 (skanda.7.418.39)
ये च त्वां पूजयिष्यंति मानवा मोह संयुताः । ते कृच्छ्रं परमं प्राप्य नाशं यास्यंति कृत्स्नशः
ye ca tvāṁ pūjayiṣyanti mānavā moha saṁyutāḥ | te kṛcchraṁ paramaṁ prāpya nāśaṁ yāsyanti kṛtsnaśaḥ
"और जो मोहग्रस्त मनुष्य तुम्हारी पूजा करेंगे, वे परम कष्ट को प्राप्त होकर पूर्णतः नाश को प्राप्त होंगे।"
श्लोक 40 (skanda.7.418.40)
केतक्या च तथा प्रोक्तं यस्मात्तस्मात्सुदुष्टया । अस्या हि स्पर्शनाल्लोकः श्वपाकत्वं प्रयास्यति
ketakyā ca tathā proktaṁ yasmāttasmātsuduṣṭayā | asyā hi sparśanāllokaḥ śvapākatvaṁ prayāsyati
"और क्योंकि उस अति दुष्ट केतकी ने भी उसका झूठा समर्थन किया, इसलिए इसके स्पर्श मात्र से लोग श्वपाकत्व (चाण्डालत्व) को प्राप्त होंगे।"
श्लोक 41 (skanda.7.418.41)
एवं शापो तयोर्दत्त्वा देवः प्रोवाच केशवम् । प्रसन्नवदनो भूत्वा तदा तुष्टो महेश्वरः
evaṁ śāpo tayordattvā devaḥ provāca keśavam | prasannavadano bhūtvā tadā tuṣṭo maheśvaraḥ
इस प्रकार उन दोनों को शाप देकर देव महेश्वर ने केशव से कहा। तब वे प्रसन्नमुख होकर संतुष्ट हो गये।
श्लोक 42 (skanda.7.418.42)
॥ भगवानुवाच ॥ वासुदेव महाबाहो तुष्टस्तेऽहं महामते । सत्यसंभाषणादेव वरं वरय सुव्रत
bhagavānuvāca | vāsudeva mahābāho tuṣṭaste'haṁ mahāmate | satyasaṁbhāṣaṇādeva varaṁ varaya suvrata
भगवान् ने कहा - "हे महाबाहो वासुदेव! हे महामते! तुम्हारे सत्य कथन से ही मैं तुम पर प्रसन्न हूँ। हे सुव्रत! वर माँगो।"
श्लोक 43 (skanda.7.418.43)
॥ श्रीवासुदेव उवाच ॥ एष एव वरः श्लाघ्यो यत्त्वं तुष्टो महेश्वरः । न चापुण्यवतां देव त्वं तुष्टिमधिगच्छसि । अवश्यं यदि मे देयो वरो देवेश्वर त्वया
śrīvāsudeva uvāca | eṣa eva varaḥ ślāghyo yattvaṁ tuṣṭo maheśvaraḥ | na cāpuṇyavatāṁ deva tvaṁ tuṣṭimadhigacchasi | avaśyaṁ yadi me deyo varo deveśvara tvayā
श्री वासुदेव ने कहा - "यही प्रशंसनीय वर है कि आप महेश्वर प्रसन्न हुए, क्योंकि हे देव! आप पुण्यहीनों पर प्रसन्न नहीं होते। फिर भी हे देवेश्वर! यदि आपको मुझे अवश्य ही वर देना है -"
श्लोक 44 (skanda.7.418.44)
लिंगमेतदनंताख्यं लघुतां नय मा चिरम् । येन सृष्टिर्भवेल्लोके व्याप्तं विश्वमनेन तु
liṅgametadanantākhyaṁ laghutāṁ naya mā ciram | yena sṛṣṭirbhavelloke vyāptaṁ viśvamanena tu
"- तो बिना विलम्ब किये इस अनन्त कहे जाने वाले लिंग को लघु रूप में ले आइये, जिससे लोक में सृष्टि हो सके, क्योंकि इस समय सम्पूर्ण विश्व इसी से व्याप्त है।"
श्लोक 45 (skanda.7.418.45)
॥ पुलस्त्य उवाच ॥ ततः संक्षिप्य तल्लिंगं लघु कृत्वा महेश्वरः । अब्रवीत्केशवं भूयः शृणु वाक्यमिदं हरे
pulastya uvāca | tataḥ saṁkṣipya talliṅgaṁ laghu kṛtvā maheśvaraḥ | abravītkeśavaṁ bhūyaḥ śṛṇu vākyamidaṁ hare
पुलस्त्य ने कहा - तब उस लिंग को संकुचित कर लघु रूप में करके महेश्वर ने पुनः केशव से कहा - "हे हरे! यह वचन सुनो।"
श्लोक 46 (skanda.7.418.46)
एतन्मेध्यतमे देशे लिंगं स्थापय मे हरे । पूजय त्वं विधानेन परं श्रेयः प्रपत्स्यसे
etanmedhyatame deśe liṅgaṁ sthāpaya me hare | pūjaya tvaṁ vidhānena paraṁ śreyaḥ prapatsyase
"हे हरे! मेरे इस लिंग को अत्यन्त पवित्र स्थान में स्थापित करो और विधिपूर्वक इसकी पूजा करो; तुम परम कल्याण को प्राप्त करोगे।"
श्लोक 47 (skanda.7.418.47)
मम तेजोविनिर्दग्धः कृष्णत्वं हि यतो गतः । कृष्ण एव ततो नाम लोके ख्यातिं गमिष्यति
mama tejovinirdagdhaḥ kṛṣṇatvaṁ hi yato gataḥ | kṛṣṇa eva tato nāma loke khyātiṁ gamiṣyati
"मेरे तेज से झुलसकर चूँकि तुम्हें कृष्णत्व (श्यामवर्ण) प्राप्त हुआ है, इसलिए 'कृष्ण' नाम से ही तुम लोक में ख्याति प्राप्त करोगे।"
श्लोक 48 (skanda.7.418.48)
कृष्णकृष्णेति ते नाम प्रातरुत्थाय मानवः । कीर्तयिष्यति यो भक्त्या स याति परमां गतिम्
kṛṣṇakṛṣṇeti te nāma prātarutthāya mānavaḥ | kīrtayiṣyati yo bhaktyā sa yāti paramāṁ gatim
"जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर भक्तिपूर्वक तुम्हारे 'कृष्ण-कृष्ण' नाम का कीर्तन करेगा, वह परम गति को प्राप्त होता है।"
श्लोक 49 (skanda.7.418.49)
॥ पुलस्त्य उवाच ॥ एवमुक्त्वा तमीशानस्तत्रैवांतरधीयत । वासुदेवोऽपि तल्लिंगं गृहीत्वाऽर्बुदपर्वते । निर्झरे स्थापयामास सुपुण्ये विमलोदके
pulastya uvāca | evamuktvā tamīśānastatraivāntaradhīyata | vāsudevo'pi talliṅgaṁ gṛhītvā'rbudaparvate | nirjhare sthāpayāmāsa supuṇye vimalodake
पुलस्त्य ने कहा - ऐसा कहकर ईशान वहीं अन्तर्धान हो गये। वासुदेव ने भी उस लिंग को लेकर अर्बुद पर्वत पर, अत्यन्त पवित्र निर्मल जल वाले झरने में स्थापित कर दिया।
श्लोक 50 (skanda.7.418.50)
कृष्णतीर्थं ततो जातं नाम्ना हि धरणीतले । शृणु पार्थिवशार्दूल तत्र स्नातस्य यत्फलम्
kṛṣṇatīrthaṁ tato jātaṁ nāmnā hi dharaṇītale | śṛṇu pārthivaśārdūla tatra snātasya yatphalam
तभी से पृथ्वी पर 'कृष्णतीर्थ' नाम से यह प्रसिद्ध हुआ। हे नृपश्रेष्ठ! वहाँ स्नान करने का जो फल है, वह सुनिये।
श्लोक 51 (skanda.7.418.51)
स्नात्वा कृष्णह्रदे पुण्ये तल्लिंगं पश्यते तु यः । सर्वतीर्थोद्भवं श्रेयः स मर्त्त्यो लभतेऽखिलम्
snātvā kṛṣṇahrade puṇye talliṅgaṁ paśyate tu yaḥ | sarvatīrthodbhavaṁ śreyaḥ sa marttyo labhate'khilam
जो मनुष्य पुण्य कृष्ण-ह्रद में स्नान करके उस लिंग का दर्शन करता है, वह सम्पूर्ण तीर्थों से उत्पन्न होने वाले सम्पूर्ण कल्याण को प्राप्त करता है।
श्लोक 52 (skanda.7.418.52)
तथा च सर्वदानानां निष्कामः प्राप्नुयात्फलम् । सकामोऽपि फलं चेष्टं यद्यपि स्यात्सुदुर्ल्लभम्
tathā ca sarvadānānāṁ niṣkāmaḥ prāpnuyātphalam | sakāmo'pi phalaṁ ceṣṭaṁ yadyapi syātsudurlabham
तथा निष्काम व्यक्ति सभी दानों का फल प्राप्त करता है, और सकाम व्यक्ति भी अपने अभीष्ट फल को प्राप्त करता है, चाहे वह कितना ही दुर्लभ क्यों न हो।
श्लोक 53 (skanda.7.418.53)
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन स्नानं तत्र समाचरेत् । य इच्छेच्छाश्वतं श्रेयो नात्र कार्या विचारणा
tasmātsarvaprayatnena snānaṁ tatra samācaret | ya icchecchāśvataṁ śreyo nātra kāryā vicāraṇā
इसलिए जो शाश्वत कल्याण की इच्छा रखता हो, उसे सम्पूर्ण प्रयत्न से वहाँ स्नान करना चाहिए; इसमें कोई विचार नहीं करना चाहिए।
श्लोक 54 (skanda.7.418.54)
एकादश्यां महाराज निराहारो जितेन्द्रियः । यस्तत्र जागरं कृत्वा लिंगस्याग्रे सुभक्तितः
ekādaśyāṁ mahārāja nirāhāro jitendriyaḥ | yastatra jāgaraṁ kṛtvā liṅgasyāgre subhaktitaḥ
हे महाराज! जो एकादशी को निराहार, जितेन्द्रिय होकर वहाँ लिंग के सम्मुख सुभक्तिपूर्वक जागरण करता है -
श्लोक 55 (skanda.7.418.55)
प्रभाते कुरुते श्राद्धं यस्तु श्रद्धासमन्वितः । पितृन्संतारयेत्सर्वान्पूर्वजैः सह धर्मवित्
prabhāte kurute śrāddhaṁ yastu śraddhāsamanvitaḥ | pitṛnsaṁtārayetsarvānpūrvajaiḥ saha dharmavit
- और प्रातःकाल श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करता है, वह धर्मज्ञ अपने सभी पितरों को पूर्वजों सहित तार देता है।
श्लोक 56 (skanda.7.418.56)
तिलान्कृष्णान्नरस्तत्र ब्राह्मणेभ्यो ददाति यः । ब्रह्महत्यादिभिः पापैः स मर्त्त्यो मुच्यते ध्रुवम्
tilānkṛṣṇānnarastatra brāhmaṇebhyo dadāti yaḥ | brahmahatyādibhiḥ pāpaiḥ sa marttyo mucyate dhruvam
जो मनुष्य वहाँ ब्राह्मणों को काले तिल देता है, वह ब्रह्महत्या आदि पापों से निश्चय ही मुक्त हो जाता है।
श्लोक 57 (skanda.7.418.57)
दर्शनादेव राजेन्द्र कृष्णतीर्थस्य मानवः । मुच्यते सर्वपापेभ्यो नात्र कार्या विचारणा
darśanādeva rājendra kṛṣṇatīrthasya mānavaḥ | mucyate sarvapāpebhyo nātra kāryā vicāraṇā
हे राजेन्द्र! कृष्णतीर्थ के दर्शन मात्र से ही मनुष्य सम्पूर्ण पापों से मुक्त हो जाता है; इसमें कोई विचार नहीं करना चाहिए।