प्रभास खण्ड · अध्याय 419
मामुह्रद की उत्पत्ति का वर्णन
श्लोक 1 (skanda.7.419.1)
॥ पुलस्त्य उवाच ॥ ततो गच्छेन्नृपश्रेष्ठ तीर्थं पापप्रणाशनम् । मामुह्रदमिति ख्यातं तस्मिन्पर्वतरोधसि
pulastya uvāca | tato gacchennṛpaśreṣṭha tīrthaṁ pāpapraṇāśanam | māmuhradamiti khyātaṁ tasminparvatarodhasi
पुलस्त्य ने कहा - हे नृपश्रेष्ठ! तत्पश्चात् उस पर्वत के तट पर स्थित, पापों का नाश करने वाले मामुह्रद नामक तीर्थ में जाना चाहिए।
श्लोक 2 (skanda.7.419.2)
तत्र स्नातो नरः सम्यक्छ्रद्धावान्सुसमाहितः । मुच्यते पातकैर्घोरैः पूर्वजन्मकृतैरपि
tatra snāto naraḥ samyakchraddhāvānsusamāhitaḥ | mucyate pātakairghoraiḥ pūrvajanmakṛtairapi
वहाँ भलीभाँति स्नान करने वाला श्रद्धावान् और एकाग्रचित्त मनुष्य पूर्वजन्म में किये गये घोर पापों से भी मुक्त हो जाता है।
श्लोक 3 (skanda.7.419.3)
तस्य पश्चिमदिग्भागे लिंगमस्ति महीपते । सर्वकामप्रदं नृणां स्थापितं मुद्गलेन तु
tasya paścimadigbhāge liṅgamasti mahīpate | sarvakāmapradaṁ nṛṇāṁ sthāpitaṁ mudgalena tu
हे राजन्! उसके पश्चिम दिशा में एक लिंग है, जो मनुष्यों की सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाला है और मुद्गल मुनि द्वारा स्थापित किया गया है।
श्लोक 4 (skanda.7.419.4)
स्नात्वा मामुह्रदे पुण्ये यस्तल्लिंगं च पश्यति । शुक्लपक्षे चतुर्दश्यां फाल्गुने मासि मानवः । स प्राप्नोति परं श्रेयः सर्वतीर्थेषु दुर्लभम्
snātvā māmuhrade puṇye yastalliṅgaṁ ca paśyati | śuklapakṣe caturdaśyāṁ phālgune māsi mānavaḥ | sa prāpnoti paraṁ śreyaḥ sarvatīrtheṣu durlabham
जो मनुष्य पुण्य मामुह्रद में स्नान करके फाल्गुन मास की शुक्ल चतुर्दशी को उस लिंग का दर्शन करता है, वह सम्पूर्ण तीर्थों में भी दुर्लभ परम कल्याण को प्राप्त करता है।
श्लोक 5 (skanda.7.419.5)
यस्तत्र कुरुते श्राद्धं दक्षिणां मूर्तिमाश्रितः । पितरस्तस्य तृप्यंति यावदाभूतसंप्लवम्
yastatra kurute śrāddhaṁ dakṣiṇāṁ mūrtimāśritaḥ | pitarastasya tṛpyanti yāvadābhūtasamplavam
जो वहाँ दक्षिणामूर्ति का आश्रय लेकर श्राद्ध करता है, उसके पितर प्रलयकाल तक तृप्त रहते हैं।
श्लोक 6 (skanda.7.419.6)
तत्र दानं प्रशंसंति नीवाराणां महर्षयः । शाकमूलादिभिः श्राद्धं पितॄणां तुष्टिदं नृप
tatra dānaṁ praśaṁsanti nīvārāṇāṁ maharṣayaḥ | śākamūlādibhiḥ śrāddhaṁ pitṝṇāṁ tuṣṭidaṁ nṛpa
हे राजन्! महर्षिगण वहाँ नीवार (जंगली चावल) के दान की प्रशंसा करते हैं। शाक-मूल आदि से किया गया श्राद्ध पितरों को संतुष्ट करने वाला होता है।
श्लोक 7 (skanda.7.419.7)
॥ ययातिरुवाच ॥ मामुह्रदमिति विभो कथं नामाऽभवत्पुरा । मुद्गलस्याश्रमं ब्रूहि मम सर्वं विधानतः
yayātiruvāca | māmuhradamiti vibho kathaṁ nāmā'bhavatpurā | mudgalasyāśramaṁ brūhi mama sarvaṁ vidhānataḥ
ययाति ने कहा - हे विभो! पूर्वकाल में मामुह्रद यह नाम कैसे पड़ा? मुद्गल के आश्रम के विषय में मुझे सब कुछ विधिपूर्वक बताइये।
श्लोक 8 (skanda.7.419.8)
॥ पुलस्त्य उवाच ॥ तत्रस्थस्य पुरा राजन्मुद्गलस्य महात्मनः । विमानं वरमादाय देवदूतः समागतः
pulastya uvāca | tatrasthasya purā rājanmudgalasya mahātmanaḥ | vimānaṁ varamādāya devadūtaḥ samāgataḥ
पुलस्त्य ने कहा - हे राजन्! पूर्वकाल में वहाँ रहने वाले महात्मा मुद्गल के पास एक श्रेष्ठ विमान लेकर देवदूत आया।
श्लोक 9 (skanda.7.419.9)
सोऽब्रवीद्देवराज्ञाहं प्रेषितो मुनिसत्तम । तवार्थायाऽऽरुहैनं त्वं विमानं गम्यतां दिवि
so'bravīddevarājñāhaṁ preṣito munisattama | tavārthāyāruhainaṁ tvaṁ vimānaṁ gamyatāṁ divi
उसने कहा - "हे मुनिसत्तम! मैं देवराज इन्द्र द्वारा आपके लिए भेजा गया हूँ - इस विमान पर आरूढ़ होइये, आप स्वर्ग को पधारें।"
श्लोक 10 (skanda.7.419.10)
॥ मुद्गल उवाच ॥ स्वर्गस्य ये गुणा दूत ये च दोषाः प्रकीर्तिताः । तान्मे वद करिष्येऽहं श्रुत्वा वै यत्क्षमं भवेत्
mudgala uvāca | svargasya ye guṇā dūta ye ca doṣāḥ prakīrtitāḥ | tānme vada kariṣye'haṁ śrutvā vai yatkṣamaṁ bhavet
मुद्गल ने कहा - हे दूत! स्वर्ग के जो गुण हैं और जो दोष कहे गये हैं, वे मुझे बताओ; सुनकर मैं वही करूँगा जो उचित होगा।
श्लोक 11 (skanda.7.419.11)
ब्रूहि तान्सकलान्दूत त्वागमिष्याम्यहं ततः
brūhi tānsakalāndūta tvāgamiṣyāmyahaṁ tataḥ
हे दूत! वे सब मुझे बताओ, तत्पश्चात् मैं चलूँगा।
श्लोक 12 (skanda.7.419.12)
॥ देवदूत उवाच ॥ अलमेतेन दर्पेण क्रियतां शक्रजल्पितम् । पुण्यैः स्वकैर्द्विजश्रेष्ठ समागच्छेरिदं ततः
devadūta uvāca | alametena darpeṇa kriyatāṁ śakrajalpitam | puṇyaiḥ svakairdvijaśreṣṭha samāgaccheridaṁ tataḥ
देवदूत ने कहा - "इस हठ से क्या लाभ? इन्द्र का कहा हुआ कीजिये। हे द्विजश्रेष्ठ! अपने ही पुण्यों से आप यहाँ तक पहुँचे हैं, अतः अब चलिये।"
श्लोक 13 (skanda.7.419.13)
॥ मुद्गल उवाच ॥ अश्रुतैस्तैर्न गच्छेऽहमेतन्मे हृदि निश्चितम् । करिष्येऽहं तपो भूरि पूजयिष्ये महेश्वरम्
mudgala uvāca | aśrutaistairna gacche'hametanme hṛdi niścitam | kariṣye'haṁ tapo bhūri pūjayiṣye maheśvaram
मुद्गल ने कहा - "उन्हें सुने बिना मैं नहीं जाऊँगा, यह मेरे हृदय में निश्चित है। मैं अत्यधिक तपस्या करूँगा, महेश्वर की पूजा करूँगा।"
श्लोक 14 (skanda.7.419.14)
॥ दूत उवाच ॥ न शक्तः स्वर्गुणान्वक्तुमपि वर्षशतैरपि । संक्षेपात्कथयिष्यामि यदि ते निश्चयः परः
dūta uvāca | na śaktaḥ svarguṇānvaktumapi varṣaśatairapi | saṁkṣepātkathayiṣyāmi yadi te niścayaḥ paraḥ
दूत ने कहा - "स्वर्ग के गुणों को मैं सैकड़ों वर्षों में भी नहीं कह सकता। यदि आपका दृढ़ निश्चय है, तो मैं संक्षेप में कहूँगा।"
श्लोक 15 (skanda.7.419.15)
नंदनादीनि रम्याणि तत्र देववनानि च । अनन्यसदृशा भोगाः सदा तृप्तिर्द्विजोत्तम
nandanādīni ramyāṇi tatra devavanāni ca | ananyasadṛśā bhogāḥ sadā tṛptirdvijottama
"वहाँ नन्दन आदि रमणीय देववन हैं; हे द्विजोत्तम! वहाँ अनुपम भोग और सदा तृप्ति रहती है।"
श्लोक 16 (skanda.7.419.16)
बुभुक्षा नैव तृष्णा च निद्रालस्ये न च प्रभो । रंभाद्यप्सरसो मुख्या गंधर्वास्तुंबरादयः । रमयंति नरं तत्र गीतैर्नृत्यैरनेकशः
bubhukṣā naiva tṛṣṇā ca nidrālasye na ca prabho | rambhādyapsaraso mukhyā gandharvāstumburādayaḥ | ramayanti naraṁ tatra gītairnṛtyairanekaśaḥ
"हे प्रभो! वहाँ न भूख है, न प्यास, न नींद, न आलस्य। रम्भा आदि मुख्य अप्सराएँ तथा तुम्बुरु आदि गन्धर्व वहाँ गीतों और नृत्यों से मनुष्य को अनेक प्रकार से रमाते हैं।"
श्लोक 17 (skanda.7.419.17)
एवं च वसते तत्र जनः स्वर्गे तपोधन । यावत्पुण्यक्षयस्तावत्पश्चात्पातमवाप्नुयात्
evaṁ ca vasate tatra janaḥ svarge tapodhana | yāvatpuṇyakṣayastāvatpaścātpātamavāpnuyāt
"हे तपोधन! इस प्रकार मनुष्य स्वर्ग में तब तक रहता है, जब तक उसका पुण्य क्षीण नहीं हो जाता; उसके पश्चात् वह पतन को प्राप्त होता है।"
श्लोक 18 (skanda.7.419.18)
एक एव मुने दोषः स्वर्लोके प्रतिभाति मे । स एव पतनाख्यस्तु स्वर्गिणां च भयावहः
eka eva mune doṣaḥ svarloke pratibhāti me | sa eva patanākhyastu svargiṇāṁ ca bhayāvahaḥ
"हे मुने! मुझे स्वर्गलोक में एक ही दोष प्रतीत होता है, और वही 'पतन' नामक दोष स्वर्गवासियों के लिए भयावह है।"
श्लोक 19 (skanda.7.419.19)
न पुण्यं लभते तत्र कर्तुं विप्र कथंचन । कर्मभूमिरियं ब्रह्मन्भोगभूमिस्तु सा स्मृता
na puṇyaṁ labhate tatra kartuṁ vipra kathaṁcana | karmabhūmiriyaṁ brahmanbhogabhūmistu sā smṛtā
"हे विप्र! वहाँ किसी प्रकार भी पुण्य करने का अवसर नहीं मिलता। हे ब्रह्मन्! यह (पृथ्वी) कर्मभूमि है और वह (स्वर्ग) भोगभूमि कही गयी है।"
श्लोक 20 (skanda.7.419.20)
यदत्र क्रियते कर्म शुभं तत्रोप भुज्यते । तथा दृष्ट्वा विमानस्थान्भूरिधर्मादिसंयुतान्
yadatra kriyate karma śubhaṁ tatropa bhujyate | tathā dṛṣṭvā vimānasthānbhūridharmādisaṁyutān
"यहाँ जो शुभ कर्म किया जाता है, उसका भोग वहाँ होता है। तथा विपुल धर्म आदि से युक्त विमानस्थ जनों को देखकर -"
श्लोक 21 (skanda.7.419.21)
बहुतेजोन्वितान्स्वर्गे ह्यल्पपुण्यो द्विजोत्तम । पश्चात्तापजदुःखेन स्वर्गस्थो दुःखितः सदा
bahutejonvitānsvarge hyalpapuṇyo dvijottama | paścāttāpajaduḥkhena svargastho duḥkhitaḥ sadā
"- अत्यन्त तेजस्वी उन स्वर्गवासियों को देखकर, हे द्विजोत्तम! अल्प पुण्य वाला व्यक्ति स्वर्ग में रहते हुए भी पश्चात्ताप के दुःख से सदा दुःखी रहता है।"
श्लोक 22 (skanda.7.419.22)
न मया सुकृतं भूरि कृतं मर्त्त्ये कथंचन
na mayā sukṛtaṁ bhūri kṛtaṁ marttye kathaṁcana
"(वह सोचता है -) 'मृत्युलोक में मैंने किसी प्रकार भी बहुत पुण्य नहीं किया।'"
श्लोक 23 (skanda.7.419.23)
तथा च पतमानांश्च दृष्ट्वा चान्यान्सहस्रशः । आत्मनश्च महद्दुःखं जायते च तदद्भुतम्
tathā ca patamānāṁśca dṛṣṭvā cānyānsahasraśaḥ | ātmanaśca mahadduḥkhaṁ jāyate ca tadadbhutam
"और इसी प्रकार गिरते हुए हजारों अन्य लोगों को देखकर, उसके मन में भी महान् एवं विचित्र दुःख उत्पन्न होता है।"
श्लोक 24 (skanda.7.419.24)
एतत्ते सर्वमाख्यातं गुणदोषसमुद्भवम् । स्वर्गसंचेष्टितं ब्रह्मन्कुरुष्व यदभीप्सितम्
etatte sarvamākhyātaṁ guṇadoṣasamudbhavam | svargasaṁceṣṭitaṁ brahmankuruṣva yadabhīpsitam
"इस प्रकार गुण-दोषों से उत्पन्न यह सब मैंने तुम्हें बता दिया। हे ब्रह्मन्! स्वर्ग की यह चेष्टा बता दी, अब जो तुम्हें अभीष्ट हो, वह करो।"
श्लोक 25 (skanda.7.419.25)
॥ मुद्गल उवाच ॥ पतनस्य भयं यत्र पुण्यहानिर्न वर्द्धनम् । तेन स्वर्गेण मे दूत नैव कार्यं कथंचन
mudgala uvāca | patanasya bhayaṁ yatra puṇyahānirna varddhanam | tena svargeṇa me dūta naiva kāryaṁ kathaṁcana
मुद्गल ने कहा - "जहाँ पतन का भय हो, जहाँ पुण्य की हानि ही हो, वृद्धि न हो, हे दूत! ऐसे स्वर्ग से मुझे किसी प्रकार कोई प्रयोजन नहीं है।"
श्लोक 26 (skanda.7.419.26)
वाच्यस्त्वया ममादेशाद्देवराजः स्फुटं वचः । क्षम्यतामपराधो मे न स्वर्गाय स्पृहा मम
vācyastvayā mamādeśāddevarājaḥ sphuṭaṁ vacaḥ | kṣamyatāmaparādho me na svargāya spṛhā mama
"मेरे कहने से तुम देवराज इन्द्र से स्पष्ट कह देना - 'मेरा अपराध क्षमा किया जाए, मुझे स्वर्ग की कोई इच्छा नहीं है।'"
श्लोक 27 (skanda.7.419.27)
तत्कर्माऽहं करिष्यामि येन नो पतनाद्भयम् । साधयिष्यामि तान्लोकान्ये सदा पातवर्जिताः
tatkarmā'haṁ kariṣyāmi yena no patanādbhayam | sādhayiṣyāmi tānlokānye sadā pātavarjitāḥ
"मैं वह कर्म करूँगा जिससे हमें पतन का भय न रहे। मैं उन लोकों को प्राप्त करूँगा जो सदा पतन से रहित हैं।"
श्लोक 28 (skanda.7.419.28)
॥ पुलस्त्य उवाच ॥ एवमुक्त्वा नृपश्रेष्ठ मुद्गलः स्वर्गनिःस्पृहः । स्थितस्तत्रैव निरतः शिवध्यानपरायणः
pulastya uvāca | evamuktvā nṛpaśreṣṭha mudgalaḥ svarganiḥspṛhaḥ | sthitastatraiva nirataḥ śivadhyānaparāyaṇaḥ
पुलस्त्य ने कहा - हे नृपश्रेष्ठ! ऐसा कहकर स्वर्ग से निःस्पृह मुद्गल वहीं शिवध्यान में तत्पर होकर स्थित रहे।
श्लोक 29 (skanda.7.419.29)
श्रुत्वा दूतोऽपि शक्रस्य तस्य वाक्यं सविस्तरम् । कथयामास शक्रस्य तं भूयः सोऽभ्यभाषत
śrutvā dūto'pi śakrasya tasya vākyaṁ savistaram | kathayāmāsa śakrasya taṁ bhūyaḥ so'bhyabhāṣata
उसके वचन को विस्तारपूर्वक सुनकर इन्द्र के दूत ने भी जाकर इन्द्र से कहा; उसने पुनः इन्द्र से कहा -
श्लोक 30 (skanda.7.419.30)
देवदूताप्रमाणं च विमानं हि त्वया कृतम् । न कृतं केन चित्पूर्वं न करिष्यति कश्चन
devadūtāpramāṇaṁ ca vimānaṁ hi tvayā kṛtam | na kṛtaṁ kena citpūrvaṁ na kariṣyati kaścana
"हे देवेन्द्र! आपने जो अप्रमाण (अतुलनीय) विमान बनवाया था, जैसा न तो पहले किसी ने बनाया और न ही आगे कोई बनाएगा -"
श्लोक 31 (skanda.7.419.31)
तस्मात्तत्र द्रुतं गत्वा बलादानय तं मुनिम् । आनयस्वान्यथा शापं तव दास्याम्यसंशयम्
tasmāttatra drutaṁ gatvā balādānaya taṁ munim | ānayasvānyathā śāpaṁ tava dāsyāmyasaṁśayam
"- वह तिरस्कृत हुआ है, अतः वहाँ शीघ्र जाकर बलपूर्वक उस मुनि को ले आओ। ले आओ, अन्यथा मैं निश्चय ही तुम्हें शाप दूँगा।"
श्लोक 32 (skanda.7.419.32)
॥ पुलस्त्य उवाच ॥ शक्रस्य वचनं श्रुत्वा देवदूते भयान्वितः । प्रस्थितः सत्वरं तत्र मुद्गलो यत्र तिष्ठति
pulastya uvāca | śakrasya vacanaṁ śrutvā devadūte bhayānvitaḥ | prasthitaḥ satvaraṁ tatra mudgalo yatra tiṣṭhati
पुलस्त्य ने कहा - इन्द्र के वचन सुनकर वह देवदूत भयभीत होकर शीघ्र ही वहाँ चल पड़ा, जहाँ मुद्गल थे।
श्लोक 33 (skanda.7.419.33)
मुद्गलोऽपि विमानस्थं पुनर्दृष्ट्वा समागतम् । मामुह्रदे प्रविश्याथ वारयामास तं तदा
mudgalo'pi vimānasthaṁ punardṛṣṭvā samāgatam | māmuhrade praviśyātha vārayāmāsa taṁ tadā
मुद्गल ने भी उसे विमान पर पुनः आते हुए देखकर तब मामुह्रद में प्रवेश करके उसे रोक दिया।
श्लोक 34 (skanda.7.419.34)
स तस्य वचनेनैव स्तंभितो लिखितो यथा । चलितुं नैव शक्नोति प्रभावात्तस्य सन्मुनेः
sa tasya vacanenaiva staṁbhito likhito yathā | calituṁ naiva śaknoti prabhāvāttasya sanmuneḥ
उस सन्मुनि के वचन मात्र से ही वह जैसे चित्रलिखित-सा स्तम्भित हो गया। उस मुनि के प्रभाव से वह हिलने-डुलने में भी असमर्थ हो गया।
श्लोक 35 (skanda.7.419.35)
चिरकालगतं ज्ञात्वा दूतं तु त्रिदशाधिपः । स्वयं तत्राययौ कोपादारुह्यैरावणं गजम्
cirakālagataṁ jñātvā dūtaṁ tu tridaśādhipaḥ | svayaṁ tatrāyayau kopādāruhyairāvaṇaṁ gajam
दूत को लम्बे समय तक न लौटता देखकर देवराज इन्द्र क्रोधपूर्वक स्वयं ऐरावत हाथी पर सवार होकर वहाँ आये।
श्लोक 36 (skanda.7.419.36)
अथ दृष्ट्वा तदा दूतं स्तंभितं मुद्गलेन तु । वधार्थं तूद्यतस्तस्य स वज्रं भ्रामयंस्तदा
atha dṛṣṭvā tadā dūtaṁ staṁbhitaṁ mudgalena tu | vadhārthaṁ tūdyatastasya sa vajraṁ bhrāmayaṁstadā
तब मुद्गल द्वारा स्तम्भित उस दूत को देखकर, उसे मारने के लिए उद्यत हो, इन्द्र उस समय वज्र को घुमाने लगे।
श्लोक 37 (skanda.7.419.37)
एतस्मिन्नेव काले तु उत्पातास्तत्र दारुणाः । अपसव्यं मृगाश्चक्रुः पशवः पक्षिणश्च ये । तान्दृष्ट्वा चिन्तयामास मुद्गलो विस्मयान्वितः
etasminneva kāle tu utpātāstatra dāruṇāḥ | apasavyaṁ mṛgāścakruḥ paśavaḥ pakṣiṇaśca ye | tāndṛṣṭvā cintayāmāsa mudgalo vismayānvitaḥ
उसी समय वहाँ भयंकर अपशकुन होने लगे - मृग, पशु और पक्षी सभी अपसव्य (उलटी दिशा में) घूमने लगे। उन्हें देखकर मुद्गल आश्चर्यचकित होकर विचार करने लगे।
श्लोक 38 (skanda.7.419.38)
अथ दृष्ट्वांबरगतं वज्रोद्यतकरं हरिम् । स्तंभयामास तं सद्यो दृष्टिपातेन मुद्गलः
atha dṛṣṭvāmbaragataṁ vajrodyatakaraṁ harim | staṁbhayāmāsa taṁ sadyo dṛṣṭipātena mudgalaḥ
तब आकाश में वज्र उठाये हुए इन्द्र को देखकर मुद्गल ने अपनी दृष्टिपात मात्र से उन्हें तत्काल स्तम्भित कर दिया।
श्लोक 39 (skanda.7.419.39)
तत्र शक्रः स्तुतिं चक्रे भग्नोत्साहो नृपोत्तम । मुञ्च मां ब्राह्मणश्रेष्ठ यास्यामि त्रिदशालयम्
tatra śakraḥ stutiṁ cakre bhagnotsāho nṛpottama | muñca māṁ brāhmaṇaśreṣṭha yāsyāmi tridaśālayam
तब हे नृपोत्तम! इन्द्र का उत्साह भंग हो गया और उन्होंने स्तुति की - "हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! मुझे छोड़ दीजिये, मैं देवलोक को चला जाऊँगा।"
श्लोक 40 (skanda.7.419.40)
स्वर्गे वा यदि वा मर्त्त्ये तिष्ठ त्वं स्वेच्छया द्विज । मया कृतः समुद्योगो हितार्थं ते मुने ह्ययम्
svarge vā yadi vā marttye tiṣṭha tvaṁ svecchayā dvija | mayā kṛtaḥ samudyogo hitārthaṁ te mune hyayam
"हे द्विज! स्वर्ग में रहो या मृत्युलोक में, अपनी इच्छा से रहो। हे मुने! मैंने जो यह प्रयास किया, वह आपके हित के लिए ही था।"
श्लोक 41 (skanda.7.419.41)
वरं वरय भद्रं ते नित्यं यो मनसि स्थितः । तं ते सर्वं प्रदास्यामि यद्यपि स्यात्सुदुर्लभम्
varaṁ varaya bhadraṁ te nityaṁ yo manasi sthitaḥ | taṁ te sarvaṁ pradāsyāmi yadyapi syātsudurlabham
"वर माँगिये, आपका कल्याण हो! जो भी आपके मन में सदा से स्थित है, वह सब मैं आपको दूँगा, चाहे वह कितना ही दुर्लभ क्यों न हो।"
श्लोक 42 (skanda.7.419.42)
॥ मुद्गल उवाच ॥ एष एव वरः श्लाघ्यो यत्त्वं दृष्टः सुरेश्वर । दर्शनं ते सहस्राक्ष स्वप्नेष्वपि सुदुर्लभम्
mudgala uvāca | eṣa eva varaḥ ślāghyo yattvaṁ dṛṣṭaḥ sureśvara | darśanaṁ te sahasrākṣa svapneṣvapi sudurlabham
मुद्गल ने कहा - "यही प्रशंसनीय वर है कि हे सुरेश्वर! मैंने आपका दर्शन किया। हे सहस्राक्ष! आपका दर्शन तो स्वप्न में भी अत्यन्त दुर्लभ है।"
श्लोक 43 (skanda.7.419.43)
अवश्यं यदि मे देयो वरो वृत्रनिषूदन । त्वत्प्रसादेन मे मोक्षो जायतां शीघ्रमेव हि
avaśyaṁ yadi me deyo varo vṛtraniṣūdana | tvatprasādena me mokṣo jāyatāṁ śīghrameva hi
"फिर भी हे वृत्रनिषूदन! यदि आपको मुझे अवश्य ही वर देना है, तो आपकी कृपा से मुझे शीघ्र ही मोक्ष प्राप्त हो।"
श्लोक 44 (skanda.7.419.44)
मा मु ह्रदं समागत्य दूतः प्रोक्तो मया यतः । ततो मामुह्रदमिति ख्यातिं यातु धरातले
mā mu hradaṁ samāgatya dūtaḥ prokto mayā yataḥ | tato māmuhradamiti khyātiṁ yātu dharātale
"और चूँकि इस ह्रद में आये हुए दूत से मैंने 'मा' और 'मु' कहा था, इसलिए यह पृथ्वी पर 'मामुह्रद' नाम से प्रसिद्ध हो।"
श्लोक 45 (skanda.7.419.45)
तीर्थमेतत्सहस्राक्ष सर्व पापप्रणाशनम् । अत्र स्नात्वा दिवं यांतु त्वत्प्रसादात्सुरेश्वर
tīrthametatsahasrākṣa sarva pāpapraṇāśanam | atra snātvā divaṁ yāntu tvatprasādātsureśvara
"हे सहस्राक्ष! यह तीर्थ सम्पूर्ण पापों का नाश करने वाला हो। हे सुरेश्वर! यहाँ स्नान करके आपकी कृपा से लोग स्वर्ग को जाएँ।"
श्लोक 46 (skanda.7.419.46)
पिंडदानात्परां प्रीतिं लभंतां पितरोऽत्र हि
piṇḍadānātparāṁ prītiṁ labhantāṁ pitaro'tra hi
"और यहाँ पिण्डदान से पितरों को परम प्रसन्नता प्राप्त हो।"
श्लोक 47 (skanda.7.419.47)
॥ इन्द्र उवाच ॥ मामुह्रदमिति ख्यातं तीर्थमेतद्भविष्यति । वरिष्ठं नात्र सन्देहो मत्प्रसादाद्विजोत्तम
indra uvāca | māmuhradamiti khyātaṁ tīrthametadbhaviṣyati | variṣṭhaṁ nātra sandeho matprasādādvijottama
इन्द्र ने कहा - "हे द्विजोत्तम! यह तीर्थ 'मामुह्रद' नाम से विख्यात होगा और मेरी कृपा से यह सर्वश्रेष्ठ होगा - इसमें कोई सन्देह नहीं।"
श्लोक 48 (skanda.7.419.48)
अत्र ये फाल्गुने मासि पौर्णमास्यां समाहिताः । करिष्यंति पुनः स्नानं ते यास्यंति परां गतिम्
atra ye phālgune māsi paurṇamāsyāṁ samāhitāḥ | kariṣyanti punaḥ snānaṁ te yāsyanti parāṁ gatim
"जो लोग फाल्गुन मास की पूर्णिमा को एकाग्रचित्त होकर पुनः यहाँ स्नान करेंगे, वे परम गति को प्राप्त होंगे।"
श्लोक 49 (skanda.7.419.49)
पिंडदानाद्गयातुल्यं लप्स्यंते फलमुत्तमम् । पुण्यदानफलं चात्र संख्याहीनं द्विजोत्तम
piṇḍadānādgayātulyaṁ lapsyante phalamuttamam | puṇyadānaphalaṁ cātra saṁkhyāhīnaṁ dvijottama
"पिण्डदान से वे गया के समान उत्तम फल प्राप्त करेंगे; और हे द्विजोत्तम! यहाँ पुण्य-दान का फल असंख्य है।"
श्लोक 50 (skanda.7.419.50)
॥ पुलस्त्य उवाच ॥ एवमुक्त्वा ययौ स्वर्गं दूतमादाय वज्रभृत् । मुद्गलोऽपि परं ब्रह्म चिंतयन्ह्यनिशं ततः
pulastya uvāca | evamuktvā yayau svargaṁ dūtamādāya vajrabhṛt | mudgalo'pi paraṁ brahma cintayanhyaniśaṁ tataḥ
पुलस्त्य ने कहा - ऐसा कहकर वज्रधारी इन्द्र अपने दूत को लेकर स्वर्ग चले गये। मुद्गल भी तब से निरन्तर परब्रह्म का चिन्तन करने लगे।
श्लोक 51 (skanda.7.419.51)
शुक्लध्यानपरो भूत्वा मोक्षं प्राप्तस्ततोऽक्षयम्
śukladhyānaparo bhūtvā mokṣaṁ prāptastato'kṣayam
शुक्ल ध्यान में तत्पर होकर वे तत्पश्चात् अक्षय मोक्ष को प्राप्त हुए।
श्लोक 52 (skanda.7.419.52)
अत्र गाथा पुरा गीता नारदेन महात्मना । बहुविप्रसमवाये पर्वतेऽस्मिन्महीपते
atra gāthā purā gītā nāradena mahātmanā | bahuviprasamavāye parvate'sminmahīpate
हे राजन्! इस विषय में पूर्वकाल में इसी पर्वत पर अनेक ब्राह्मणों के समागम में महात्मा नारद द्वारा एक गाथा गायी गयी थी।
श्लोक 53 (skanda.7.419.53)
मामु ह्रदे नरः स्नात्वा दृष्ट्वा तं मुद्गलेश्वरम् । इह भुक्त्वाऽखिलान्कामानन्ते मुक्तिमवाप्स्यति । एतस्मात्कारणाद्राजन्मामुह्रदमिति स्मृतम्
māmu hrade naraḥ snātvā dṛṣṭvā taṁ mudgaleśvaram | iha bhuktvā'khilānkāmānante muktimavāpsyati | etasmātkāraṇādrājanmāmuhradamiti smṛtam
"मामुह्रद में स्नान करके तथा मुद्गलेश्वर का दर्शन करके मनुष्य यहाँ सभी कामनाओं का भोग करके अन्त में मुक्ति प्राप्त करता है।" हे राजन्! इसी कारण से इसे मामुह्रद कहा गया है।
श्लोक 54 (skanda.7.419.54)
तत्तीर्थं सर्वतीर्थानां प्रवरं लोकविश्रुतम् । तस्मात्सर्वप्रयत्नेन स्नानं तत्र समाचरेत्
tattīrthaṁ sarvatīrthānāṁ pravaraṁ lokaviśrutam | tasmātsarvaprayatnena snānaṁ tatra samācaret
वह तीर्थ समस्त तीर्थों में श्रेष्ठ और लोकविख्यात है; इसलिए वहाँ सम्पूर्ण प्रयत्न से स्नान करना चाहिए।
श्लोक 55 (skanda.7.419.55)
मोक्षकामो विशेषेण य इच्छेत्परमं पदम् । चण्डिकाश्रममासाद्य किं पुनः परितप्यते
mokṣakāmo viśeṣeṇa ya icchetparamaṁ padam | caṇḍikāśramamāsādya kiṁ punaḥ paritapyate
जो विशेष रूप से मोक्ष का इच्छुक होकर परम पद चाहता है, वह चण्डिका के आश्रम तक पहुँचकर फिर किस बात से संतप्त होगा?