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प्रभास खण्ड · अध्याय 420

चण्डिकाश्रमोत्पत्ति माहात्म्य वर्णन

अध्याय 419अध्याय-सूचीअध्याय 421

श्लोक 1 (skanda.7.420.1)

॥ ययातिरुवाच ॥ चंडिकाया द्विजश्रेष्ठ कथं तत्राश्रमोऽभवत् । कस्मिन्काले फलं तेन किं दृष्टेन भवेन्नृणाम्

yayātiruvāca | caṇḍikāyā dvijaśreṣṭha kathaṁ tatrāśramo'bhavat | kasminkāle phalaṁ tena kiṁ dṛṣṭena bhavennṛṇām

ययाति ने कहा - हे द्विजश्रेष्ठ! चण्डिका का वहाँ आश्रम कैसे बना? किस काल में बना? और उसके दर्शन से मनुष्यों को क्या फल प्राप्त होता है?

श्लोक 2 (skanda.7.420.2)

॥ पुलस्त्य उवाच ॥ शृणु राजन्प्रवक्ष्यामि कथां पापप्रणाशिनीम् । यां श्रुत्वा मानवः सम्यक्सर्वपापैः प्रमुच्यते

pulastya uvāca | śṛṇu rājanpravakṣyāmi kathāṁ pāpapraṇāśinīm | yāṁ śrutvā mānavaḥ samyaksarvapāpaiḥ pramucyate

पुलस्त्य ने कहा - हे राजन्! सुनो, मैं पाप का नाश करने वाली कथा कहूँगा, जिसे सुनकर मनुष्य भलीभाँति सम्पूर्ण पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 3 (skanda.7.420.3)

पुरा देवयुगे राजन्महिषोनाम दानवः । पितामहवराद्दृप्तः सर्वदेवभयंकरः

purā devayuge rājanmahiṣonāma dānavaḥ | pitāmahavarāddṛptaḥ sarvadevabhayaṁkaraḥ

हे राजन्! पूर्वकाल में देवयुग में महिष नामक एक दानव था, जो ब्रह्मा के वर से गर्वित और सभी देवों के लिए भयंकर था।

श्लोक 4 (skanda.7.420.4)

तेन शक्रादयो देवा जिताः संख्ये सहस्रशः । भयात्तस्य दिवं हित्वा गतास्ते वै यथादिशम्

tena śakrādayo devā jitāḥ saṁkhye sahasraśaḥ | bhayāttasya divaṁ hitvā gatāste vai yathādiśam

उसके द्वारा इन्द्र आदि देवता युद्ध में हजारों बार पराजित हुए। उसके भय से वे स्वर्ग को छोड़कर जिस-जिस दिशा में भाग गये।

श्लोक 5 (skanda.7.420.5)

त्रैलोक्यं स वशे कृत्वा स्वयमिन्द्रो बभूव ह

trailokyaṁ sa vaśe kṛtvā svayamindro babhūva ha

उसने तीनों लोकों को वश में करके स्वयं ही इन्द्र बन बैठा।

श्लोक 6 (skanda.7.420.6)

आदित्या वसवो रुद्रा नासत्यौ मरुतां गणाः । कृतास्तेन तथा दैत्या यथार्हं बलवत्तराः

ādityā vasavo rudrā nāsatyau marutāṁ gaṇāḥ | kṛtāstena tathā daityā yathārhaṁ balavattarāḥ

आदित्य, वसु, रुद्र, अश्विनीकुमार और मरुद्गण - इन्हें उसने अपने-अपने अधिकारानुसार अधिक बलवान् दैत्यों में परिवर्तित कर दिया।

श्लोक 7 (skanda.7.420.7)

वह्निर्भयं समापन्नस्त्यक्त्वा देवगणांस्तदा । दानवेभ्यो हविर्भागं देवेभ्यो न प्रयच्छति

vahnirbhayaṁ samāpannastyaktvā devagaṇāṁstadā | dānavebhyo havirbhāgaṁ devebhyo na prayacchati

भयभीत हुआ अग्नि उस समय देवताओं को छोड़कर हवि का भाग दानवों को देने लगा, देवताओं को नहीं।

श्लोक 8 (skanda.7.420.8)

उद्द्योतं कुरुते सूर्यो यादृक्तस्याभिसंमतः । यज्ञभागं विनाऽप्येष भयात्पार्थिवसत्तम

uddyotaṁ kurute sūryo yādṛktasyābhisaṁmataḥ | yajñabhāgaṁ vinā'pyeṣa bhayātpārthivasattama

हे नृपसत्तम! सूर्य भी उसकी इच्छा के अनुरूप ही प्रकाश देते थे, यज्ञभाग के बिना भी, भय के कारण।

श्लोक 9 (skanda.7.420.9)

लोकपालास्तथा सर्वे तस्य कर्म प्रचक्रिरे । दासवत्पार्थिवश्रेष्ठ यज्ञभागं विनाकृताः

lokapālāstathā sarve tasya karma pracakrire | dāsavatpārthivaśreṣṭha yajñabhāgaṁ vinākṛtāḥ

हे नृपश्रेष्ठ! इसी प्रकार समस्त लोकपाल भी, यज्ञभाग से वंचित होकर, दासों के समान उसके कार्य करने लगे।

श्लोक 10 (skanda.7.420.10)

कस्यचित्त्वथ कालस्य सर्वे देवाः समेत्य तु । पप्रच्छुर्विनयोपेता विप्रश्रेष्ठं बृहस्पतिम्

kasyacittvatha kālasya sarve devāḥ sametya tu | papracchurvinayopetā vipraśreṣṭhaṁ bṛhaspatim

किसी समय, सब देवता मिलकर विनयपूर्वक विप्रश्रेष्ठ बृहस्पति से पूछने लगे।

श्लोक 11 (skanda.7.420.11)

भगवान्किं वयं कुर्मः कुत्र यामो निराश्रयाः । तस्माद्ब्रूहि क्षयोपायं महिषस्य दुरात्मनः

bhagavānkiṁ vayaṁ kurmaḥ kutra yāmo nirāśrayāḥ | tasmādbrūhi kṣayopāyaṁ mahiṣasya durātmanaḥ

"हे भगवन्! हम क्या करें, आश्रयहीन होकर कहाँ जाएँ? इसलिए दुरात्मा महिष के विनाश का उपाय बताइये।"

श्लोक 12 (skanda.7.420.12)

एवमुक्तो गुरुर्देवैर्ध्यात्वा कालं चिरं नृप । ततस्तांस्त्रिदशान्प्राह जीवयन्निव भूपतेः

evamukto gururdevairdhyātvā kālaṁ ciraṁ nṛpa | tatastāṁstridaśānprāha jīvayanniva bhūpateḥ

हे राजन्! देवताओं द्वारा ऐसा कहे जाने पर गुरु बृहस्पति ने बहुत देर तक ध्यान किया, फिर उन देवताओं को मानो पुनर्जीवित करते हुए बोले।

श्लोक 13 (skanda.7.420.13)

॥ बृहस्पतिरुवाच ॥ ब्रह्मलब्धवरो दैत्यः पौरुषे च व्यवस्थितः । अवध्यः सर्वदेवानां मुक्त्वेकां योषितं सुराः । व्रजध्वं सहितास्तस्मादर्बुदं पर्वतोत्तमम्

bṛhaspatiruvāca | brahmalabdhavaro daityaḥ pauruṣe ca vyavasthitaḥ | avadhyaḥ sarvadevānāṁ muktvekāṁ yoṣitaṁ surāḥ | vrajadhvaṁ sahitāstasmādarbudaṁ parvatottamam

बृहस्पति ने कहा - "यह दैत्य ब्रह्मा से वर पाकर पौरुष में स्थित है, और एक स्त्री को छोड़कर सभी देवताओं के लिए अवध्य है। हे देवताओ! अतः तुम सब मिलकर सर्वश्रेष्ठ अर्बुद पर्वत पर जाओ।"

श्लोक 14 (skanda.7.420.14)

तपोऽर्थं तत्र संसिद्धिर्जायतामचिराद्धि वः । शक्तिरूपां परां देवीं चंडिकां कामरूपिणीम्

tapo'rthaṁ tatra saṁsiddhirjāyatāmacirāddhi vaḥ | śaktirūpāṁ parāṁ devīṁ caṇḍikāṁ kāmarūpiṇīm

"वहाँ तपस्या से तुम्हें शीघ्र ही सिद्धि प्राप्त हो। शक्तिरूपा, इच्छानुसार रूप धारण करने वाली परम देवी चण्डिका की -"

श्लोक 15 (skanda.7.420.15)

आराधयध्वमेकांते यया व्याप्तमिदं जगत् । सा तुष्टा वै वधार्थं तु महिषस्य दुरात्मनः

ārādhayadhvamekānte yayā vyāptamidaṁ jagat | sā tuṣṭā vai vadhārthaṁ tu mahiṣasya durātmanaḥ

"- उसकी एकान्त में आराधना करो, जिससे यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है। वह प्रसन्न होकर दुरात्मा महिष के वध के लिए -"

श्लोक 16 (skanda.7.420.16)

करिष्यति समुद्योगमवतारसमुद्भवम् । तस्या हस्तेन सोऽवश्यं वधं प्राप्स्यति दुर्मतिः

kariṣyati samudyogamavatārasamudbhavam | tasyā hastena so'vaśyaṁ vadhaṁ prāpsyati durmatiḥ

"- अपने अवतार के रूप में उद्योग करेगी। उस दुर्बुद्धि महिष को उसी के हाथों निश्चय ही मृत्यु प्राप्त होगी।"

श्लोक 17 (skanda.7.420.17)

अहं वः कीर्तयिष्यामि शक्तियं मंत्रमुत्तमम् । पूजाविधानसंयुक्तं भुक्तिमुक्तिप्रदं शुभम्

ahaṁ vaḥ kīrtayiṣyāmi śāktyaṁ mantramuttamam | pūjāvidhānasaṁyuktaṁ bhuktimuktipradaṁ śubham

"मैं तुम्हें उत्तम शाक्त मन्त्र बताऊँगा, जो पूजाविधि से युक्त, भोग और मोक्ष देने वाला तथा शुभ है।"

श्लोक 18 (skanda.7.420.18)

॥ पुलस्त्य उवाच ॥ एवमुक्ताः सुराः सर्वे हर्षेण महतान्विताः । तेनैव सहिता राजन्गताः पर्वतमर्बुदम्

pulastya uvāca | evamuktāḥ surāḥ sarve harṣeṇa mahatānvitāḥ | tenaiva sahitā rājangatāḥ parvatamarbudam

पुलस्त्य ने कहा - इस प्रकार कहे जाने पर सभी देवता महान् हर्ष से युक्त होकर, हे राजन्! उन्हीं के साथ अर्बुद पर्वत पर गये।

श्लोक 19 (skanda.7.420.19)

तत्र स्नाताञ्छुचीन्सर्वान्दीक्षयामास गीष्पतिः । शाक्तयैः परमैर्मंत्रैः सद्यःसिद्धिकरैर्नृप

tatra snātāñchucīnsarvāndīkṣayāmāsa gīṣpatiḥ | śāktayaiḥ paramairmantraiḥ sadyaḥsiddhikarairnṛpa

हे राजन्! वहाँ स्नान करके पवित्र हुए उन सभी देवताओं को बृहस्पति ने तत्काल सिद्धि देने वाले परम शाक्त मन्त्रों से दीक्षित किया।

श्लोक 20 (skanda.7.420.20)

सार्धयामत्रयं तत्र परिवारसमन्विताः । बलिपूजोपहारैश्च गंधं माल्यानुलेपनैः

sārdhayāmatrayaṁ tatra parivārasamanvitāḥ | balipūjopahāraiśca gandhaṁ mālyānulepanaiḥ

वहाँ परिवार सहित उन्होंने साधना का अनुष्ठान किया - बलि, पूजा, उपहार तथा गन्ध, माला और अनुलेपन से।

श्लोक 21 (skanda.7.420.21)

मंत्रेण विविधेनैव चारुस्तोत्रेण भक्तितः । प्रार्थयंतस्तथा नित्यं दीपज्योतिः समाहिताः

mantreṇa vividhenaiva cārustotreṇa bhaktitaḥ | prārthayantastathā nityaṁ dīpajyotiḥ samāhitāḥ

वे विविध मन्त्रों तथा सुन्दर स्तोत्र से भक्तिपूर्वक प्रार्थना करते हुए, नित्य दीपज्योति के समक्ष एकाग्रचित्त रहे।

श्लोक 22 (skanda.7.420.22)

निर्ममा निरहंकारा गुरुभक्तिपरायणाः । अंगन्याससमायुक्ताः समदर्शित्वमागताः

nirmamā nirahaṁkārā gurubhaktiparāyaṇāḥ | aṅganyāsasamāyuktāḥ samadarśitvamāgatāḥ

ममत्व और अहंकार से रहित, गुरुभक्ति में तत्पर, अंगन्यास से युक्त होकर वे समदर्शिता को प्राप्त हुए।

श्लोक 23 (skanda.7.420.23)

एवं संतिष्ठमानानां तेषां पार्थिवसत्तम । सप्त मासा व्यतिक्रांतास्ततस्तुष्टा सुरेश्वरी

evaṁ saṁtiṣṭhamānānāṁ teṣāṁ pārthivasattama | sapta māsā vyatikrāntāstatastuṣṭā sureśvarī

हे नृपसत्तम! इस प्रकार स्थित रहते हुए उनके सात मास बीत गये, तब देवेश्वरी प्रसन्न हुई।

श्लोक 24 (skanda.7.420.24)

दीपज्योतिःसमावेशात्तेषां गात्रेषु पार्थिव । मंत्रेण परिपूतानां परं तेजो व्यवर्धत

dīpajyotiḥsamāveśāttteṣāṁ gātreṣu pārthiva | mantreṇa paripūtānāṁ paraṁ tejo vyavardhata

हे राजन्! दीपज्योति के प्रवेश से मन्त्र द्वारा पवित्र हुए उनके शरीरों में परम तेज बढ़ने लगा।

श्लोक 25 (skanda.7.420.25)

द्वादशार्कप्रभा जाताः षण्मासाभ्यंतरेण ते । अथ तांस्तेजसा युक्ताञ्ज्ञात्वा जीवो महीपते

dvādaśārkaprabhā jātāḥ ṣaṇmāsābhyantareṇa te | atha tāṁstejasā yuktāñjñātvā jīvo mahīpate

छह मास के भीतर ही वे बारह सूर्यों के समान तेजस्वी हो गये। हे राजन्! तब उन्हें तेजयुक्त जानकर बृहस्पति ने -

श्लोक 26 (skanda.7.420.26)

मंडलं रचयामास सर्वसिद्धिप्रदायकम् । उपवेश्य ततः सर्वान्समस्तांस्त्रिदशालयान्

maṇḍalaṁ racayāmāsa sarvasiddhipradāyakam | upaveśya tataḥ sarvānsamastāṁstridaśālayān

- सभी सिद्धियों को देने वाला एक मण्डल रचा, और फिर उसमें सभी देवताओं को बिठाकर -

श्लोक 27 (skanda.7.420.27)

तेषां शरीरगं तेजः शाक्तयैर्मंत्रसत्तमैः । आकृष्य न्यसयामास मंडले तत्र पार्थिव

teṣāṁ śarīragaṁ tejaḥ śāktayairmantrasattamaiḥ | ākṛṣya nyasayāmāsa maṇḍale tatra pārthiva

हे राजन्! उसने उत्तम शाक्त मन्त्रों द्वारा उनके शरीरों में स्थित तेज को खींचकर उस मण्डल में स्थापित कर दिया।

श्लोक 28 (skanda.7.420.28)

ततस्तेजोमयी कन्या तत्र जाता स्वरूपिणी । शक्तिरूपा महाकाया दिव्यलक्षणलक्षिता

tatastejomayī kanyā tatra jātā svarūpiṇī | śaktirūpā mahākāyā divyalakṣaṇalakṣitā

तब वहाँ एक तेजोमयी कन्या स्वयं ही प्रकट हुई - शक्तिस्वरूपिणी, विशाल शरीर वाली, दिव्य लक्षणों से युक्त।

श्लोक 29 (skanda.7.420.29)

इंद्रस्तस्यै ददौ वज्रं स्वपाशं च जलेश्वरः । शक्तिं च भगवानग्निः सिंहयानं धनाधिपः

indrastasyai dadau vajraṁ svapāśaṁ ca jaleśvaraḥ | śaktiṁ ca bhagavānagniḥ siṁhayānaṁ dhanādhipaḥ

इन्द्र ने उसे वज्र दिया, जलेश्वर वरुण ने अपना पाश, भगवान् अग्नि ने शक्ति (अस्त्र), और कुबेर ने सिंह वाहन दिया।

श्लोक 30 (skanda.7.420.30)

अन्ये चैव गणाः सर्वे निजशस्त्राणि हर्षिताः । तस्यै ददुर्नृपश्रेष्ठ स्तुतिं चक्रुः समाहिताः

anye caiva gaṇāḥ sarve nijaśastrāṇi harṣitāḥ | tasyai dadurnṛpaśreṣṭha stutiṁ cakruḥ samāhitāḥ

हे नृपश्रेष्ठ! अन्य सभी गणों ने भी हर्षित होकर उसे अपने-अपने शस्त्र दिये और एकाग्रचित्त होकर उसकी स्तुति की।

श्लोक 31 (skanda.7.420.31)

॥ देवा ऊचुः ॥ नमस्ते देवदेवेशि नमस्ते कांचनप्रभे । नमस्ते पद्मपत्राक्षि नमस्ते जगदम्बिके

devā ūcuḥ | namaste devadeveśi namaste kāñcanaprabhe | namaste padmapatrākṣi namaste jagadambike

देवताओं ने कहा - हे देवदेवेशि! तुम्हें नमस्कार है। हे कांचन के समान कान्ति वाली! तुम्हें नमस्कार है। हे कमलपत्र के समान नेत्रों वाली! तुम्हें नमस्कार है। हे जगदम्बिके! तुम्हें नमस्कार है।

श्लोक 32 (skanda.7.420.32)

नमस्ते विश्वरूपे च नमस्ते विश्वसंस्तुते । त्वं मतिस्त्वं धृतिः कांतिस्त्वं सुधा त्वं विभावरी

namaste viśvarūpe ca namaste viśvasaṁstute | tvaṁ matistvaṁ dhṛtiḥ kāntistvaṁ sudhā tvaṁ vibhāvarī

हे विश्वरूपे! तुम्हें नमस्कार है, हे विश्वसंस्तुते! तुम्हें नमस्कार है। तुम बुद्धि हो, तुम धृति हो, तुम कान्ति हो, तुम अमृत हो, तुम रात्रि हो।

श्लोक 33 (skanda.7.420.33)

क्षमा ऋद्धिः प्रभा स्वाहा सावित्री कमला सती । त्वं गौरी त्वं महामाया चामुण्डा त्वं सरस्वती

kṣamā ṛddhiḥ prabhā svāhā sāvitrī kamalā satī | tvaṁ gaurī tvaṁ mahāmāyā cāmuṇḍā tvaṁ sarasvatī

तुम क्षमा हो, ऋद्धि हो, प्रभा हो, स्वाहा हो, सावित्री हो, कमला हो, सती हो। तुम गौरी हो, तुम महामाया हो, चामुण्डा हो, तुम सरस्वती हो।

श्लोक 34 (skanda.7.420.34)

भैरवी भीषणाकारा चंडमुंडासिधारिणी । भूतप्रिया महाकाया घटाली विक्रमोत्कटा

bhairavī bhīṣaṇākārā caṇḍamuṇḍāsidhāriṇī | bhūtapriyā mahākāyā ghaṭālī vikramotkaṭā

तुम भैरवी हो, भीषण रूप वाली हो, चण्ड-मुण्ड की संहारक खड्गधारिणी हो। तुम भूतों की प्रिय, विशालकाया, घटाली और उत्कट पराक्रम वाली हो।

श्लोक 35 (skanda.7.420.35)

मद्यमांसप्रिया नित्यं भक्तत्राणपरायणा । त्वया व्याप्तमिदं सर्वं त्रैलोक्यं सचराचरम्

madyamāṁsapriyā nityaṁ bhaktatrāṇaparāyaṇā | tvayā vyāptamidaṁ sarvaṁ trailokyaṁ sacarācaram

तुम मद्य-मांस को प्रिय मानने वाली हो, नित्य भक्तों की रक्षा में तत्पर हो। यह सम्पूर्ण चराचर त्रैलोक्य तुमसे ही व्याप्त है।

श्लोक 36 (skanda.7.420.36)

॥ पुलस्त्य उवाच ॥ एवं स्तुता सुरैः सर्वैस्ततो देवी प्रहर्षिता । तानब्रवीद्वरं सर्वा गृह्णंतु मम देवताः

pulastya uvāca | evaṁ stutā suraiḥ sarvaistato devī praharṣitā | tānabravīdvaraṁ sarvā gṛhṇantu mama devatāḥ

पुलस्त्य ने कहा - इस प्रकार सभी देवताओं द्वारा स्तुति की जाने पर देवी अत्यन्त प्रसन्न हुई और उनसे बोली - "हे देवताओ! तुम सब मुझसे वर ग्रहण करो।"

श्लोक 37 (skanda.7.420.37)

॥ देवा ऊचुः ॥ दानवो महिषो नाम पितामहवरान्वितः । अवध्यः सर्वभूतानां देवानां च तथा कृतः

devā ūcuḥ | dānavo mahiṣo nāma pitāmahavarānvitaḥ | avadhyaḥ sarvabhūtānāṁ devānāṁ ca tathā kṛtaḥ

देवताओं ने कहा - "महिष नामक दानव, जो ब्रह्मा के वर से युक्त है, सभी प्राणियों तथा देवताओं के लिए भी अवध्य कर दिया गया है।"

श्लोक 38 (skanda.7.420.38)

मुक्त्वैकां योषितं देवि तस्मात्त्वं विनिपातय

muktvaikāṁ yoṣitaṁ devi tasmāttvaṁ vinipātaya

"हे देवि! एक स्त्री को छोड़कर सबके लिए वह अवध्य है, अतः तुम ही उसका विनाश करो।"

श्लोक 39 (skanda.7.420.39)

॥ देव्युवाच ॥ गच्छध्वं त्रिदशाः सर्वे स्वानि स्थानानि निर्वृताः

devyuvāca | gacchadhvaṁ tridaśāḥ sarve svāni sthānāni nirvṛtāḥ

देवी ने कहा - "हे देवताओ! तुम सब निश्चिन्त होकर अपने-अपने स्थानों को जाओ।"

श्लोक 40 (skanda.7.420.40)

अहं तं सूदयिष्यामि समये पर्युपस्थिते । एवमुक्ता गताः सर्वे देवाः स्थानानि हर्षिताः

ahaṁ taṁ sūdayiṣyāmi samaye paryupasthite | evamuktā gatāḥ sarve devāḥ sthānāni harṣitāḥ

"मैं उपयुक्त समय आने पर उसका वध कर दूँगी।" ऐसा कहे जाने पर सभी देवता हर्षित होकर अपने-अपने स्थानों को चले गये।

श्लोक 41 (skanda.7.420.41)

देवी तत्रैव संहृष्टा स्थिता पर्वतरोधसि । कस्यचित्त्वथकालस्य नारदो भगवान्मुनिः

devī tatraiva saṁhṛṣṭā sthitā parvatarodhasi | kasyacittvathakālasya nārado bhagavānmuniḥ

देवी प्रसन्नचित्त होकर वहीं पर्वत के तट पर स्थित रहीं। तत्पश्चात् किसी समय भगवान् नारद मुनि -

श्लोक 42 (skanda.7.420.42)

तत्र देवीं च संदृष्ट्वा तीर्थयात्रापरायणः । त्रिविष्टपमनुप्राप्तो महिषो यत्र तिष्ठति

tatra devīṁ ca saṁdṛṣṭvā tīrthayātrāparāyaṇaḥ | triviṣṭapamanuprāpto mahiṣo yatra tiṣṭhati

- वहाँ देवी का दर्शन करके, तीर्थयात्रा में तत्पर होकर, उस स्वर्ग में पहुँचे, जहाँ महिष निवास करता था।

श्लोक 43 (skanda.7.420.43)

तत्र दृष्ट्वा मुनिं प्राप्तं प्रणम्य महिषासुरः । विनयेन समायुक्तो ह्यभ्युत्थानमथाकरोत्

tatra dṛṣṭvā muniṁ prāptaṁ praṇamya mahiṣāsuraḥ | vinayena samāyukto hyabhyutthānamathākarot

वहाँ आये हुए मुनि को देखकर महिषासुर ने प्रणाम किया और विनयपूर्वक उनके सम्मान में खड़ा हो गया।

श्लोक 44 (skanda.7.420.44)

ततस्तं पूजयामास मधुपर्कार्घविष्टरैः । सुखासीनं सुविश्रांतं ज्ञात्वा वाक्यमुवाच ह

tatastaṁ pūjayāmāsa madhuparkārghaviṣṭaraiḥ | sukhāsīnaṁ suviśrāntaṁ jñātvā vākyamuvāca ha

तब उसने मधुपर्क, अर्घ्य और आसन से उनका सत्कार किया। उन्हें सुखपूर्वक बैठे और विश्राम करते जानकर उसने कहा -

श्लोक 45 (skanda.7.420.45)

कुतो भवानितः प्राप्तः किमर्थं मुनिसत्तम । अमी पुत्रास्तथा राज्यं कलत्राणि धनानि च

kuto bhavānitaḥ prāptaḥ kimarthaṁ munisattama | amī putrāstathā rājyaṁ kalatrāṇi dhanāni ca

"हे मुनिसत्तम! आप कहाँ से यहाँ पधारे हैं, किस प्रयोजन से? ये मेरे पुत्र, राज्य, पत्नियाँ तथा धन हैं।"

श्लोक 46 (skanda.7.420.46)

अहं भृत्यसमायुक्तः किमनेन द्विजोत्तम । सर्वं तेऽहं प्रदास्यामि ब्रूहि येन प्रयोजनम्

ahaṁ bhṛtyasamāyuktaḥ kimanena dvijottama | sarvaṁ te'haṁ pradāsyāmi brūhi yena prayojanam

"हे द्विजोत्तम! मैं सेवकों से युक्त हूँ, इससे क्या? मैं आपको सब कुछ दूँगा, जिससे आपका प्रयोजन सिद्ध हो, वह बताइये।"

श्लोक 47 (skanda.7.420.47)

॥ नारद उवाच ॥ अभिनंदामि ते सर्वमेतत्त्वय्युपपद्यते । निःस्पृहा हि वयं नित्यं मुनिधर्मं समाश्रिताः

nārada uvāca | abhinandāmi te sarvametattvayyupapadyate | niḥspṛhā hi vayaṁ nityaṁ munidharmaṁ samāśritāḥ

नारद ने कहा - "यह सब तुममें उचित ही है, मैं इसकी सराहना करता हूँ। परन्तु हम तो नित्य मुनिधर्म का आश्रय लेकर निःस्पृह रहते हैं।"

श्लोक 48 (skanda.7.420.48)

कौतूहलादिह प्राप्तश्चिरात्ते दर्शनं गतः । मर्त्त्यलोकात्समायातो यास्यामि ब्रह्मणः पदम्

kautūhalādiha prāptaścirātte darśanaṁ gataḥ | marttyalokātsamāyāto yāsyāmi brahmaṇaḥ padam

"मैं कौतूहलवश यहाँ आया हूँ, चिरकाल बाद तुम्हारा दर्शन करने आया हूँ। मृत्युलोक से आया हूँ, अब ब्रह्मलोक जाऊँगा।"

श्लोक 49 (skanda.7.420.49)

॥ महिषासुर उवाच ॥ क्वचिद्दृष्टं त्वया किञ्चिदाश्चर्यं भूतले मुने । दैवं वा मानुषं वापि दानवा लंभिता विभो

mahiṣāsura uvāca | kvacid dṛṣṭaṁ tvayā kiñcidāścaryaṁ bhūtale mune | daivaṁ vā mānuṣaṁ vāpi dānavā lambhitā vibho

महिषासुर ने कहा - "हे मुने! क्या पृथ्वी पर आपने कहीं कोई आश्चर्य देखा - चाहे देवसम्बन्धी हो या मानवसम्बन्धी, अथवा हे विभो! दानवों से सम्बन्धित?"

श्लोक 50 (skanda.7.420.50)

॥ नारद उवाच ॥ अत्याश्चर्यं मया दृष्टं दानवेन्द्र धरातले । यत्र दृष्टं क्वचित्पूर्वं त्रैलोक्ये सचराचरे

nārada uvāca | atyāścaryaṁ mayā dṛṣṭaṁ dānavendra dharātale | yatra dṛṣṭaṁ kvacitpūrvaṁ trailokye sacarācare

नारद ने कहा - "हे दानवेन्द्र! मैंने पृथ्वी पर एक अत्यन्त आश्चर्यजनक वस्तु देखी है, जो पहले कभी भी इस चराचर त्रैलोक्य में कहीं देखी नहीं गयी।"

श्लोक 51 (skanda.7.420.51)

अस्त्यर्बुद इति ख्यातः पर्वतो धरणीतले । सर्वर्तुपुष्पितैर्वृक्षैः शोभितः स्वर्गसन्निभः

astyarbuda iti khyātaḥ parvato dharaṇītale | sarvartupuṣpitairvṛkṣaiḥ śobhitaḥ svargasannibhaḥ

"पृथ्वी पर अर्बुद नामक एक पर्वत है, जो सभी ऋतुओं में पुष्पित वृक्षों से सुशोभित तथा स्वर्ग के समान है।"

श्लोक 52 (skanda.7.420.52)

बकुलैश्चंपकैश्चाम्रैरशोकैः कर्णिकारकैः । शालैस्तालैश्च खर्जूरैर्वटैर्भल्लातकैर्धवैः

bakulaiścampakaiścāmrairaśokaiḥ karṇikārakaiḥ | śālaistālaiśca kharjūrairvaṭairbhallātakairdhavaiḥ

"बकुल, चम्पक, आम, अशोक, कर्णिकार वृक्षों से; शाल, ताल, खर्जूर, वट, भल्लातक और धव वृक्षों से -"

श्लोक 53 (skanda.7.420.53)

सरलैः पनसैर्वृक्षैस्तिंदुकैः करवीरकैः । मंदारैः पारिजातैश्च मलयैश्चंदनैस्तथा

saralaiḥ panasairvṛkṣaistindukaiḥ karavīrakaiḥ | mandāraiḥ pārijātaiśca malayaiścandanaistathā

"- सरल, कटहल, तेंदू, कनेर वृक्षों से; मन्दार और पारिजात से, तथा मलय के चन्दन वृक्षों से -"

श्लोक 54 (skanda.7.420.54)

पुष्पजातिविशेषैश्च सुगंधैरप्यनेककैः । खाद्यैः सर्वेस्तथा लेह्यैश्चोष्यैः फलवरैर्वृतः

puṣpajātiviśeṣaiśca sugandhairapyanekakaiḥ | khādyaiḥ sarvestathā lehyaiścoṣyaiḥ phalavarairvṛtaḥ

"- और अनेक प्रकार के सुगन्धित पुष्पों से युक्त है; तथा सभी खाद्य, लेह्य, चोष्य पदार्थों और उत्तम फलों से परिपूर्ण है।"

श्लोक 55 (skanda.7.420.55)

न स वृक्षो न सा वल्ली नौषधी सा धरातले । न तत्र याऽसुरज्येष्ठ पर्वते वीक्षिता मया

na sa vṛkṣo na sā vallī naauṣadhī sā dharātale | na tatra yā'surajyeṣṭha parvate vīkṣitā mayā

"हे असुरश्रेष्ठ! पृथ्वी पर कोई ऐसा वृक्ष, लता अथवा औषधि नहीं है, जिसे मैंने उस पर्वत पर न देखा हो।"

श्लोक 56 (skanda.7.420.56)

पक्षिणो मधुरारावाश्चकोरशिखिचातकाः । कोकिला धार्तराष्ट्राश्च भ्रमराः श्वेतपत्रकाः

pakṣiṇo madhurārāvāścakoraśikhicātakāḥ | kokilā dhārtarāṣṭrāśca bhramarāḥ śvetapatrakāḥ

"मधुर बोलने वाले पक्षी - चकोर, मयूर, चातक, कोयल, राजहंस, भ्रमर तथा श्वेत पंखों वाले पक्षी -"

श्लोक 57 (skanda.7.420.57)

येषां शब्दं समाकर्ण्य मुनयोऽपि समाहिताः । क्षोभं यांति त्रिकालज्ञाः कंदर्पशरपीडिताः

yeṣāṁ śabdaṁ samākarṇya munayo'pi samāhitāḥ | kṣobhaṁ yānti trikālajñāḥ kandarpaśarapīḍitāḥ

"- जिनकी वाणी सुनकर एकाग्रचित्त और त्रिकालज्ञ मुनि भी कामदेव के बाणों से पीड़ित होकर क्षुब्ध हो जाते हैं।"

श्लोक 58 (skanda.7.420.58)

निर्झराणि सुरम्याणि नद्यश्च विमलोदकाः । पद्मिनीखंडसंयुक्ता ह्रदाः शतसहस्रशः

nirjharāṇi suramyāṇi nadyaśca vimalodakāḥ | padminīkhaṇḍasaṁyuktā hradāḥ śatasahasraśaḥ

"अत्यन्त रमणीय झरने और निर्मल जल वाली नदियाँ; कमल-समूहों से युक्त लाखों-लाखों ह्रद।"

श्लोक 59 (skanda.7.420.59)

पद्मपत्रविशालाक्षा मध्यक्षामाः शुचिस्मिताः । विवेकिनो नरास्तत्र शास्त्रव्रतसमन्विताः

padmapatraviśālākṣā madhyakṣāmāḥ śucismitāḥ | vivekino narāstatra śāstravratasamanvitāḥ

"वहाँ कमलपत्र के समान विशाल नेत्रों वाली, कृशकटि, पवित्र मुसकान वाली स्त्रियाँ हैं; और पुरुष विवेकी तथा शास्त्रोक्त व्रतों से युक्त हैं।"

श्लोक 60 (skanda.7.420.60)

किं चात्र बहुनोक्तेन यत्किंचित्तत्र पर्वते । स्वेदजांडजसंज्ञेया उद्भिज्जाश्च जरायुजाः । सर्वलोकोत्तरास्तत्र दृश्यंते पर्वतोत्तमे

kiṁ cātra bahunoktena yatkiñcittatra parvate | svedajāṇḍajasaṁjñeyā udbhijjāśca jarāyujāḥ | sarvalokottarāstatra dṛśyante parvatottame

"अधिक कहने से क्या लाभ - उस पर्वत पर जो कुछ भी है, चाहे स्वेदज हो, अण्डज हो, उद्भिज्ज हो अथवा जरायुज हो, वहाँ उस सर्वश्रेष्ठ पर्वत पर सभी लोकों से उत्कृष्ट दिखायी देते हैं।"

श्लोक 61 (skanda.7.420.61)

दशयोजनविस्तारो द्वाभ्यां संहितपर्वतः । उच्चैः पंच च स श्रीमान्मर्त्ये स्वर्गो व्यजायत

daśayojanavistāro dvābhyāṁ saṁhitaparvataḥ | uccaiḥ pañca ca sa śrīmānmartye svargo vyajāyata

"दस योजन विस्तार वाला और दो पर्वतों से मिला हुआ, पाँच योजन ऊँचा वह श्रीमान् पर्वत मृत्युलोक में मानो स्वर्ग ही बनकर प्रकट हुआ है।"

श्लोक 62 (skanda.7.420.62)

तत्राऽहं कौतुकाविष्ट इतश्चेतश्च वीक्षयन् । सर्वाश्चर्यमयीं नारीमपश्यं लोकसुंदरीम्

tatrā'haṁ kautukāviṣṭa itaścetaśca vīkṣayan | sarvāścaryamayīṁ nārīmapaśyaṁ lokasundarīm

"वहाँ कौतूहलपूर्वक इधर-उधर देखते हुए मैंने सम्पूर्ण आश्चर्यों से युक्त एक स्त्री को देखा, जो लोक में सर्वसुन्दरी थी।"

श्लोक 63 (skanda.7.420.63)

न देवी नापि गंधर्वी नासुरी न च मानुषी । तादृग्रूपा मया दृष्टा न श्रुता च वरांगना

na devī nāpi gandharvī nāsurī na ca mānuṣī | tādṛgrūpā mayā dṛṣṭā na śrutā ca varāṅganā

"न वह देवी थी, न गन्धर्वी, न असुरी, न मानुषी - मैंने ऐसी सुन्दरी न कभी देखी है और न सुनी है।"

श्लोक 64 (skanda.7.420.64)

रतिः प्रीतिरुमा लक्ष्मीः सावित्री च सरस्वती । तस्या रूपस्य लेशेन नैतास्तुल्याः स्त्रियोऽखिलाः

ratiḥ prītirumā lakṣmīḥ sāvitrī ca sarasvatī | tasyā rūpasya leśena naitāstulyāḥ striyo'khilāḥ

"रति, प्रीति, उमा, लक्ष्मी, सावित्री और सरस्वती - ये सभी स्त्रियाँ उसके रूप के एक अंश के भी तुल्य नहीं हैं।"

श्लोक 65 (skanda.7.420.65)

अहं दृष्ट्वा तथा रूपां नारीं कामेन पीडितः । तदा दानवशार्दूल वैक्लव्यं परमं गतः

ahaṁ dṛṣṭvā tathā rūpāṁ nārīṁ kāmena pīḍitaḥ | tadā dānavaśārdūla vaiklavyaṁ paramaṁ gataḥ

"हे दानवशार्दूल! उस रूपवती नारी को देखकर मैं काम से पीड़ित हो गया और उस समय परम व्याकुलता को प्राप्त हो गया।"

श्लोक 66 (skanda.7.420.66)

ततो धैर्यमवष्टभ्य मया मनसि चिंतितम् । न करिष्ये समालापं तया सह च कर्हिचित्

tato dhairyamavaṣṭabhya mayā manasi cintitam | na kariṣye samālāpaṁ tayā saha ca karhicit

"तब धैर्य धारण करके मैंने मन ही मन विचार किया - 'मैं उससे कभी भी वार्तालाप नहीं करूँगा।'"

श्लोक 67 (skanda.7.420.67)

यस्या दर्शनमात्रेण कामो मे हृदि वर्द्धितः । तस्याः संभाषणेनेव किं भविष्यति मे पुनः

yasyā darśanamātreṇa kāmo me hṛdi varddhitaḥ | tasyāḥ saṁbhāṣaṇeneva kiṁ bhaviṣyati me punaḥ

"'जिसके दर्शन मात्र से मेरे हृदय में काम बढ़ गया, उसके साथ वार्तालाप करने से मेरी क्या दशा होगी?'"

श्लोक 68 (skanda.7.420.68)

चिरकालं तपस्तप्तं ब्रह्मचर्येण वै मया । नाशं यास्यति तत्सर्वं विषयैर्निर्जितस्य च । तस्माद्गच्छामि चान्यत्र यावन्न विकृतिर्भवेत्

cirakālaṁ tapastaptaṁ brahmacaryeṇa vai mayā | nāśaṁ yāsyati tatsarvaṁ viṣayairnirjitasya ca | tasmādgacchāmi cānyatra yāvanna vikṛtirbhavet

"'मैंने ब्रह्मचर्य द्वारा दीर्घकाल तक जो तपस्या की है, विषयों से पराजित होने पर वह सब नष्ट हो जाएगी। अतः मैं कहीं और चला जाऊँ, जिससे कोई विकार उत्पन्न न हो।'"

श्लोक 69 (skanda.7.420.69)

नारीनाम तपोविघ्नं पूर्वं सृष्टं स्वयंभुवा । अर्गला स्वर्गमार्गस्य सोपानं नरकस्य च

nārīnāma tapovighnaṁ pūrvaṁ sṛṣṭaṁ svayaṁbhuvā | argalā svargamārgasya sopānaṁ narakasya ca

"'स्त्री को पूर्वकाल में स्वयंभू ब्रह्मा ने तप में विघ्न रूप में रचा है - वह स्वर्गमार्ग की अर्गला और नरक की सीढ़ी है।'"

श्लोक 70 (skanda.7.420.70)

तावद्धैर्यं तपः सत्यं तावत्स्थैर्यं कुलत्रपा । यावत्पश्यति नो नारीमैकांते च विशेषतः

tāvaddhairyaṁ tapaḥ satyaṁ tāvatsthairyaṁ kulatrapā | yāvatpaśyati no nārīmaikānte ca viśeṣataḥ

"'धैर्य, तप की सत्यता, स्थैर्य और कुल की लज्जा तब तक ही रहती है, जब तक मनुष्य किसी स्त्री को, विशेष रूप से एकान्त में, नहीं देखता।'"

श्लोक 71 (skanda.7.420.71)

एतत्संचिंत्य बहुधा निमील्य नयने ततः । अप्रजल्प्य वरारोहां तामहं चात्र संस्थितः

etatsaṁcintya bahudhā nimīlya nayane tataḥ | aprajalpya varārohāṁ tāmahaṁ cātra saṁsthitaḥ

इस प्रकार बारम्बार विचार करके, नेत्र बन्द करके, उस सुन्दरी से बिना कुछ कहे, मैं वहीं खड़ा रह गया।

श्लोक 72 (skanda.7.420.72)

॥ पुलस्त्य उवाच ॥ नारदस्य वचः श्रुत्वा महिषः कामपीडितः । श्रवणादपि राजेंद्र पुनः पप्रच्छ तं मुनिम्

pulastya uvāca | nāradasya vacaḥ śrutvā mahiṣaḥ kāmapīḍitaḥ | śravaṇādapi rājendra punaḥ papraccha taṁ munim

पुलस्त्य ने कहा - हे राजेन्द्र! नारद के वचन सुनकर महिष सुनने मात्र से ही काम से पीड़ित हो गया और उसने पुनः उस मुनि से पूछा।

श्लोक 73 (skanda.7.420.73)

॥ महिषासुर उवाच ॥ काऽसौ ब्राह्मणशार्दूल तादृग्रूपा वरांगना । यस्याः संदर्शनादेव भवानेव स्मरान्वितः

mahiṣāsura uvāca | kā'sau brāhmaṇaśārdūla tādṛgrūpā varāṅganā | yasyāḥ saṁdarśanādeva bhavāneva smarānvitaḥ

महिषासुर ने कहा - "हे ब्राह्मणशार्दूल! वह सुन्दरी कौन है, जिसके दर्शन मात्र से आप जैसे भी कामाविष्ट हो गये?"

श्लोक 74 (skanda.7.420.74)

देवी वा मानुषी वापि यक्षिणी पन्नगी मुने । कुमारी वा सकांता वा ब्रूहि सर्वं सविस्तरम्

devī vā mānuṣī vāpi yakṣiṇī pannagī mune | kumārī vā sakāntā vā brūhi sarvaṁ savistaram

"हे मुने! क्या वह देवी है या मानुषी, यक्षिणी है या नागकन्या? कुमारी है या विवाहिता? मुझे सब कुछ विस्तार से बताइये।"

श्लोक 75 (skanda.7.420.75)

॥ नारद उवाच ॥ न सा पृष्टा मया किंचिन्न जानामि तदन्वयम् । एतन्मे वर्त्तते वित्ते सा कुमारी यशस्विनी

nārada uvāca | na sā pṛṣṭā mayā kiñcinna jānāmi tadanvayam | etanme varttate vitte sā kumārī yaśasvinī

नारद ने कहा - "मैंने उससे कुछ भी नहीं पूछा, न ही मैं उसकी कुलपरम्परा जानता हूँ। मेरी जानकारी में इतना ही है कि वह एक यशस्विनी कुमारी है।"

श्लोक 76 (skanda.7.420.76)

अक्षमालाधरा बाला कमंडलुसमन्विता । तपस्तेपे गिरौ तत्र हेतुना केनचिच्छुभा

akṣamālādharā bālā kamaṇḍalusamanvitā | tapastepe girau tatra hetunā kenacicchubhā

"वह अक्षमाला और कमण्डलु धारण करने वाली एक बाला है, जो किसी कारणवश उस पर्वत पर तपस्या कर रही है।"

श्लोक 77 (skanda.7.420.77)

सोऽहं यास्यामि दैत्येश ब्रह्मलोकं सनातनम् । नोत्सहे तत्कथां कर्तुं कामबाणभयातुरः

so'haṁ yāsyāmi daityeśa brahmalokaṁ sanātanam | notsahe tatkathāṁ kartuṁ kāmabāṇabhayāturaḥ

"हे दैत्येश! मैं तो सनातन ब्रह्मलोक जाऊँगा। कामबाण के भय से पीड़ित होकर मैं उसकी और चर्चा करने में समर्थ नहीं हूँ।"

श्लोक 78 (skanda.7.420.78)

॥ पुलस्त्य उवाच ॥ एवमुक्त्वा ततो राजन्ब्रह्मलोकं गतो मुनिः । महिषोऽपि स्मराविष्टश्चरं तस्याः समादिशत्

pulastya uvāca | evamuktvā tato rājanbrahmalokaṁ gato muniḥ | mahiṣo'pi smarāviṣṭaścaraṁ tasyāḥ samādiśat

पुलस्त्य ने कहा - हे राजन्! ऐसा कहकर मुनि ब्रह्मलोक को चले गये। महिष भी काम से आविष्ट होकर उसके विषय में एक गुप्तचर भेजने लगा।

श्लोक 79 (skanda.7.420.79)

गत्वा भवान्द्रुतं तत्र दृष्ट्वा तां च वरांगनाम् । किमर्थं सा तपस्तेपे को वै तस्याः परिग्रहः

gatvā bhavāndrutaṁ tatra dṛṣṭvā tāṁ ca varāṅganām | kimarthaṁ sā tapastepe ko vai tasyāḥ parigrahaḥ

"शीघ्र वहाँ जाकर उस सुन्दरी को देखो और पता लगाओ कि वह किसलिए तपस्या कर रही है, और उसका कुल-परिग्रह क्या है।"

श्लोक 80 (skanda.7.420.80)

अथाऽसौ महिषादेशाद्दूतो गत्वार्बुदाचलम् । दृष्ट्वा तां पद्मगर्भाभां ज्ञात्वा सर्व विचेष्टितम्

athā'sau mahiṣādeśāddūto gatvārbudācalam | dṛṣṭvā tāṁ padmagarbhābhāṁ jñātvā sarva viceṣṭitam

तब महिष की आज्ञा से वह दूत अर्बुदाचल गया। वहाँ कमलगर्भ के समान कान्ति वाली उस देवी को देखकर तथा उसकी सारी चेष्टाओं को जानकर -

श्लोक 81 (skanda.7.420.81)

तस्मै निवेदयामास महिषाय सविस्मयः । दृष्टा दैत्यवर स्त्री च सर्वलक्षणलक्षिता

tasmai nivedayāmāsa mahiṣāya savismayaḥ | dṛṣṭā daityavara strī ca sarvalakṣaṇalakṣitā

- उसने आश्चर्यचकित होकर महिष से निवेदन किया - "हे दैत्यवर! मैंने सम्पूर्ण शुभ लक्षणों से युक्त एक स्त्री देखी है।"

श्लोक 82 (skanda.7.420.82)

देवतेजोभवा कन्या साऽद्यापि वरवर्णिनी । त्वद्वधार्थं तपस्तेपे कौमारव्रतमाश्रिता

devatejobhavā kanyā sā'dyāpi varavarṇinī | tvadvadhārthaṁ tapastepe kaumāravratamāśritā

"वह कन्या देवताओं के तेज से उत्पन्न है, अत्यन्त सुन्दर है, और कौमार-व्रत का आश्रय लेकर आपके वध के लिए तपस्या कर रही है।"

श्लोक 83 (skanda.7.420.83)

एवं तत्र भवंती स्म पृष्टाः सर्वे तपस्विनः । सत्यमेतन्महाभाग कुरुष्व यदनंतरम्

evaṁ tatra bhavantī sma pṛṣṭāḥ sarve tapasvinaḥ | satyametanmahābhāga kuruṣva yadanantaram

"वहाँ रहने वाले सभी तपस्वियों से पूछने पर यही सत्य ज्ञात हुआ। हे महाभाग! अब जो उचित हो, वह कीजिये।"

श्लोक 84 (skanda.7.420.84)

तस्या रूपं वयः कांतिर्वर्णितुं नैव शक्यते । नालापं कुरुते बाला सा केनापि समं विभौ

tasyā rūpaṁ vayaḥ kāntirvarṇituṁ naiva śakyate | nālāpaṁ kurute bālā sā kenāpi samaṁ vibhau

"हे विभो! उसके रूप, वय और कान्ति का वर्णन नहीं किया जा सकता। वह बाला किसी के साथ भी वार्तालाप नहीं करती।"

श्लोक 85 (skanda.7.420.85)

॥ पुलस्त्य उवाच ॥ तच्छ्रुत्वा महिषो वाक्यं भूयः कामनिपीडितः । दूतं संप्रेषयामास दानवं च विचक्षणम्

pulastya uvāca | tacchrutvā mahiṣo vākyaṁ bhūyaḥ kāmanipīḍitaḥ | dūtaṁ saṁpreṣayāmāsa dānavaṁ ca vicakṣaṇam

पुलस्त्य ने कहा - यह वचन सुनकर महिष काम से और अधिक पीड़ित होकर विचक्षण नामक दानव को दूत बनाकर भेजने लगा।

श्लोक 86 (skanda.7.420.86)

विचक्षण द्रुतं गत्वा मदर्थे तां तपस्विनीम् । सामभेदप्रदानेन दंडेनापि समानय

vicakṣaṇa drutaṁ gatvā madarthe tāṁ tapasvinīm | sāmabhedapradānena daṇḍenāpi samānaya

"हे विचक्षण! शीघ्र जाकर मेरे लिए उस तपस्विनी को साम, भेद, दान अथवा दण्ड के द्वारा भी ले आओ।"

श्लोक 87 (skanda.7.420.87)

अथाऽसौ प्रययौ शीघ्रं प्रणिपत्य विचक्षणः । अर्बुदे पर्वतश्रेष्ठे यत्र सा परमेश्वरी । प्रणम्य विनयोपेतो वाक्यमेतदुवाच ताम्

athā'sau prayayau śīghraṁ praṇipatya vicakṣaṇaḥ | arbude parvataśreṣṭhe yatra sā parameśvarī | praṇamya vinayopeto vākyametaduvāca tām

तब विचक्षण प्रणाम करके शीघ्र ही उस श्रेष्ठ अर्बुद पर्वत की ओर चल पड़ा, जहाँ वह परमेश्वरी विराजमान थी। विनयपूर्वक प्रणाम करके उसने उससे यह वचन कहा।

श्लोक 88 (skanda.7.420.88)

महिषो नाम विख्यातस्त्रैलोक्याधिपतिर्बली । दनुवंशसमुद्भूतः कामरूपसमन्वितः

mahiṣo nāma vikhyātastrailokyādhipatirbalī | danuvaṁśasamudbhūtaḥ kāmarūpasamanvitaḥ

"महिष नामक एक विख्यात, बलवान् त्रैलोक्याधिपति है, जो दनुवंश में उत्पन्न हुआ है और इच्छानुसार रूप धारण करने में समर्थ है।"

श्लोक 89 (skanda.7.420.89)

स त्वां वांछति कल्याणि धर्मपत्नीं स्वधर्मतः । तस्माद्वरय भद्रं ते सर्वकामप्रदं पतिम्

sa tvāṁ vāñchati kalyāṇi dharmapatnīṁ svadharmataḥ | tasmādvaraya bhadraṁ te sarvakāmapradaṁ patim

"हे कल्याणि! वह अपने धर्मानुसार तुम्हें धर्मपत्नी बनाना चाहता है। अतः तुम कल्याण की भागी बनकर सर्वकामप्रद पति के रूप में उसे वरण करो।"

श्लोक 90 (skanda.7.420.90)

यदि स्यात्तव कांतोऽसौ त्वं च तस्य तथा प्रिया । तत्कृतार्थं द्वयोरेव यौवनं नात्र संशयः

yadi syāttava kānto'sau tvaṁ ca tasya tathā priyā | tatkṛtārthaṁ dvayoreva yauvanaṁ nātra saṁśayaḥ

"यदि वह तुम्हारा प्रिय बने और तुम भी उसकी प्रिया बनो, तो निश्चय ही तुम दोनों की युवावस्था सार्थक हो जाएगी।"

श्लोक 91 (skanda.7.420.91)

एवमुक्ता ततस्तेन देवी वचनमब्रवीत् । किञ्चित्कोपसमायुक्ता मुहुः प्रस्फुरिताधरा

evamuktā tatastena devī vacanamabravīt | kiñcitkopasamāyuktā muhuḥ prasphuritādharā

उसके इस प्रकार कहने पर देवी ने कुछ क्रोध से युक्त होकर, बार-बार काँपते हुए अधरों से, यह वचन कहा।

श्लोक 92 (skanda.7.420.92)

॥ देव्युवाच ॥ अवध्यः सर्वथा दूतः सर्वत्र परिकीर्तितः । अवस्थासु ततो न त्वं सहसा भस्मसात्कृतः

devyuvāca | avadhyaḥ sarvathā dūtaḥ sarvatra parikīrtitaḥ | avasthāsu tato na tvaṁ sahasā bhasmasātkṛtaḥ

देवी ने कहा - "दूत सब प्रकार से, सभी अवस्थाओं में अवध्य कहा गया है; इसीलिए मैंने तुम्हें तत्काल भस्म नहीं कर दिया।"

श्लोक 93 (skanda.7.420.93)

गत्वा ब्रूहि दुराचारं महिषं दानवाधमम् । नाहं शक्या त्वया पाप लब्धुं नान्येन केनचित्

gatvā brūhi durācāraṁ mahiṣaṁ dānavādhamam | nāhaṁ śakyā tvayā pāpa labdhuṁ nānyena kenacit

"जाकर उस दुराचारी, दानवों में अधम महिष से कह दो - 'हे पापी! मैं न तुम्हारे द्वारा और न किसी अन्य के द्वारा प्राप्त की जा सकती हूँ।'"

श्लोक 94 (skanda.7.420.94)

वधार्थं ते समुद्योग एष सर्वो मया कृतः । तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा महिषं स पुनर्ययौ

vadhārthaṁ te samudyoga eṣa sarvo mayā kṛtaḥ | tasyāstadvacanaṁ śrutvā mahiṣaṁ sa punaryayau

"'मैंने यह सारा प्रयास तुम्हारे वध के लिए ही किया है।'" उसके यह वचन सुनकर वह पुनः महिष के पास गया।

श्लोक 95 (skanda.7.420.95)

भयेन महताविष्टस्तस्या रूपेण विस्मितः । सर्वं निवेदयामास महिषाय विचेष्टितम् । तस्याश्चैव तथाऽऽलापानस्पृहत्वं च कृत्स्नशः

bhayena mahatāviṣṭastasyā rūpeṇa vismitaḥ | sarvaṁ nivedayāmāsa mahiṣāya viceṣṭitam | tasyāścaiva tathā'lāpānaspṛhatvaṁ ca kṛtsnaśaḥ

अत्यन्त भयभीत तथा उसके रूप से चकित होकर, उसने महिष को उसकी सारी चेष्टाएँ, वार्तालाप और उसकी पूर्ण निःस्पृहता के विषय में बता दिया।

श्लोक 96 (skanda.7.420.96)

तच्छुत्वा महिषो राजन्कामबाणप्रपीडितः । सेनापतिं समाहूय वाक्यमेतदुवाच ह

tacchrutvā mahiṣo rājankāmabāṇaprapīḍitaḥ | senāpatiṁ samāhūya vākyametaduvāca ha

यह सुनकर हे राजन्! कामबाण से अत्यन्त पीड़ित महिष ने सेनापति को बुलाकर यह वचन कहा।

श्लोक 97 (skanda.7.420.97)

अर्बुदे पर्वते सेनां कल्पयस्व सुदुर्धराम् । हस्त्यश्वकल्पितां भीमां रथपत्तिसमाकुलाम्

arbude parvate senāṁ kalpayasva sudurdharām | hastyaśvakalpitāṁ bhīmāṁ rathapattisamākulām

"अर्बुद पर्वत पर जाने के लिए एक अत्यन्त दुर्धर्ष सेना तैयार करो, जो हाथी-घोड़ों से सुसज्जित, भयंकर तथा रथों-पैदलों से परिपूर्ण हो।"

श्लोक 98 (skanda.7.420.98)

ततोऽसौ कल्पयामास चतुरंगां वरूथिनीम् । पताकाच्छत्रशबलां वादित्रारावभूषिताम्

tato'sau kalpayāmāsa caturaṅgāṁ varūthinīm | patākācchatraśabalāṁ vāditrārāvabhūṣitām

तब उसने पताका-छत्रों से चित्रित, वाद्यों की गूँज से सुशोभित चतुरंगिणी सेना तैयार की।

श्लोक 99 (skanda.7.420.99)

ततो द्विपाश्च संनद्धा दृश्यंतेऽधिष्ठिता भटैः । इतश्चेतश्च धावन्तः सपक्षाः पर्वता इव

tato dvipāśca sannaddhā dṛśyante'dhiṣṭhitā bhaṭaiḥ | itaścetaśca dhāvantaḥ sapakṣāḥ parvatā iva

तब कवचधारी हाथी, योद्धाओं से आरूढ़, इधर-उधर दौड़ते हुए, मानो पंखयुक्त पर्वतों के समान दिखायी देने लगे।

श्लोक 100 (skanda.7.420.100)

अश्वाश्चैवाप्यकल्माषा वायुवेगाः सुवर्चसः । अंगत्राणसमायुक्ताः शतशोऽथ सहस्रशः

aśvāścaivāpyakalmāṣā vāyuvegāḥ suvarcasaḥ | aṅgatrāṇasamāyuktāḥ śataśo'tha sahasraśaḥ

तथा दोषरहित, वायु के समान वेगशाली, तेजस्वी, कवचयुक्त घोड़े सैकड़ों-हजारों की संख्या में -

श्लोक 101 (skanda.7.420.101)

विमानप्रतिमाकारा रथास्तेन प्रकल्पिताः । किंकिणीजालसद्घंटापताकाभिरलंकृताः

vimānapratimākārā rathāstena prakalpitāḥ | kiṅkiṇījālasadghaṇṭāpatākābhiralaṅkṛtāḥ

उसने विमानों के समान आकार वाले रथ तैयार कराये, जो छोटी-छोटी घंटियों के जाल, बड़ी घंटियों और पताकाओं से अलंकृत थे।

श्लोक 102 (skanda.7.420.102)

पत्तयश्च महाकाया महेष्वासा महाबलाः । असिचर्मधराश्चान्ये प्रासपट्टिशपाणयः

pattayaśca mahākāyā maheṣvāsā mahābalāḥ | asicarmadharāścānye prāsapaṭṭiśapāṇayaḥ

विशालकाय, महाधनुर्धर, महाबली पैदल सैनिक; तथा असि-चर्म धारण करने वाले, प्रास और पट्टिश हाथों में लिये हुए अन्य सैनिक -

श्लोक 103 (skanda.7.420.103)

लक्षमेकं मतंगानां रथानां त्रिगुणं ततः । अश्वा दशगुणा राजन्नसंख्याताः पदातयः

lakṣamekaṁ mataṅgānāṁ rathānāṁ triguṇaṁ tataḥ | aśvā daśaguṇā rājannasaṁkhyātāḥ padātayaḥ

एक लाख हाथी, उससे तीन गुने रथ; हे राजन्! दस गुने घोड़े और असंख्य पैदल सैनिक थे।

श्लोक 104 (skanda.7.420.104)

ततश्चार्बुदमासाद्य वेष्टयित्वा स दूरतः । संमितैः सचिवैः सार्धं तदंतिकमुपाद्रवत्

tataścārbudamāsādya veṣṭayitvā sa dūrataḥ | saṁmitaiḥ sacivaiḥ sārdhaṁ tadantikamupādravat

तब अर्बुद पर्वत पर पहुँचकर और उसे दूर से घेरकर, वह अपने विश्वस्त मन्त्रियों के साथ उसके निकट पहुँचा।

श्लोक 105 (skanda.7.420.105)

ध्यानस्थां वीक्ष्य तां देवीं कन्दर्पशरपीडितः । ततोऽब्रवीत्स तां वाक्यं विनयेन समन्वितः

dhyānasthāṁ vīkṣya tāṁ devīṁ kandarpaśarapīḍitaḥ | tato'bravītsa tāṁ vākyaṁ vinayena samanvitaḥ

ध्यानमग्न उस देवी को देखकर, कामबाण से पीड़ित होकर, उसने विनयपूर्वक उससे यह वचन कहा।

श्लोक 106 (skanda.7.420.106)

श्रुत्वा तवेदृशं रूपमहं प्राप्तो वरानने । गांधर्वेण विवाहेन तस्माद्वरय मां द्रुतम्

śrutvā tavedṛśaṁ rūpamahaṁ prāpto varānane | gāndharveṇa vivāhena tasmādvaraya māṁ drutam

"हे वरानने! तुम्हारे ऐसे रूप को सुनकर मैं यहाँ आया हूँ। अतः गान्धर्व विवाह से शीघ्र मुझे वरण करो।"

श्लोक 107 (skanda.7.420.107)

षष्टिभार्यासहस्राणि मम संति शुचिस्मिते । कृत्वा मां दर्पितं कांतं तासां त्वं स्वामिनी भव

ṣaṣṭibhāryāsahasrāṇi mama santi śucismite | kṛtvā māṁ darpitaṁ kāntaṁ tāsāṁ tvaṁ svāminī bhava

"हे शुचिस्मिते! मेरी साठ हजार पत्नियाँ हैं। मुझ गर्वित प्रियतम को पाकर तुम उनकी स्वामिनी बन जाओ।"

श्लोक 108 (skanda.7.420.108)

अनर्हं ते तपो बाले भुंक्ष्व भोगान्यथेप्सितान् । त्रैलोक्यस्वामिनी भूत्वा मया सार्धमहर्निशम्

anarhaṁ te tapo bāle bhuṅkṣva bhogānyathepsitān | trailokyasvāminī bhūtvā mayā sārdhamaharniśam

"हे बाले! तप तुम्हारे योग्य नहीं है, जैसी इच्छा हो वैसे भोगों का उपभोग करो। त्रैलोक्य की स्वामिनी बनकर मेरे साथ रात-दिन रहो।"

श्लोक 109 (skanda.7.420.109)

एवमुक्ताऽपि सा तेन नोत्तरं प्रत्यभाषत । ततः कामसमाविष्टस्तदंतिकमुपाययौ

evamuktā'pi sā tena nottaraṁ pratyabhāṣata | tataḥ kāmasamāviṣṭastadantikamupāyayau

उसके ऐसा कहने पर भी उसने कोई उत्तर नहीं दिया। तब काम से आविष्ट होकर वह उसके निकट आ गया।

श्लोक 110 (skanda.7.420.110)

ततस्तं लोलुपं दृष्ट्वा सा देवी कोपसंयुता । अस्मरद्वाहनं सिंहं समायातः स साऽऽरुहत्

tatastaṁ lolupaṁ dṛṣṭvā sā devī kopasaṁyutā | asmaradvāhanaṁ siṁhaṁ samāyātaḥ sa sārūhat

तब उस लोलुप को देखकर वह देवी क्रोध से भर गयी और उसने अपने सिंह वाहन का स्मरण किया; वह आ गया और वह उस पर आरूढ़ हो गयी।

श्लोक 111 (skanda.7.420.111)

अब्रवीत्परुषं वाक्यं गच्छगच्छेति चासकृत् । नो चेत्त्वां च वधिष्यामि स्थानेऽस्मिन्दानवाधम

abravītparuṣaṁ vākyaṁ gacchagaccheti cāsakṛt | no cettvāṁ ca vadhiṣyāmi sthāne'smindānavādhama

उसने कठोर वचन कहे, बार-बार "जाओ, जाओ" कहा - "अन्यथा हे दानवाधम! मैं तुम्हें इसी स्थान पर मार डालूँगी।"

श्लोक 112 (skanda.7.420.112)

अथाऽसौ सचिवैः सार्द्धं समंतात्पर्यवेष्टयत् । प्रग्रहार्थं तु तां देवीं कामबाणप्रपीडितः

athā'sau sacivaiḥ sārddhaṁ samantātparyaveṣṭayat | pragrahārthaṁ tu tāṁ devīṁ kāmabāṇaprapīḍitaḥ

तब कामबाण से अत्यन्त पीड़ित होकर उसने अपने मन्त्रियों सहित उस देवी को पकड़ने के लिए चारों ओर से घेर लिया।

श्लोक 113 (skanda.7.420.113)

ततो जहास सा देवी सशब्दं परमेश्वरी । तस्मादहर्निशं सार्द्धं निष्क्रांता पुरुषा घनाः

tato jahāsa sā devī saśabdaṁ parameśvarī | tasmādaharniśaṁ sārddhaṁ niṣkrāntā puruṣā ghanāḥ

तब वह परमेश्वरी देवी जोर से हँस पड़ी; उस हँसी से रात-दिन उसके साथ रहने वाले घने पुरुष-समूह प्रकट हो गये।

श्लोक 114 (skanda.7.420.114)

सुसन्नद्धाः सशस्त्राश्च रोषेण महताऽन्विताः । ततस्तानब्रवीद्देवी पापोऽयं वध्यतामिति

susannaddhāḥ saśastrāśca roṣeṇa mahatā'nvitāḥ | tatastānabravīddevī pāpo'yaṁ vadhyatāmiti

वे पूर्ण रूप से कवचधारी, शस्त्रधारी और महान् क्रोध से युक्त थे। तब देवी ने उनसे कहा - "यह पापी वध्य है।"

श्लोक 115 (skanda.7.420.115)

ततस्ते सहिताः सर्वे महिषं समुपाद्रवन् । तिष्ठतिष्ठेति जल्पन्तो मुंचन्तोऽस्त्रणि भूरिशः

tataste sahitāḥ sarve mahiṣaṁ samupādravan | tiṣṭhatiṣṭheti jalpanto muñcanto'strāṇi bhūriśaḥ

तब वे सभी मिलकर महिष पर टूट पड़े, "ठहरो, ठहरो" कहते हुए और बहुत से अस्त्र चलाते हुए।

श्लोक 116 (skanda.7.420.116)

ततः समभवद्युद्धं गणानां दानवैः सह । ततस्ते सचिवाः सर्वे वैवस्वतगृहं गताः

tataḥ samabhavadyuddhaṁ gaṇānāṁ dānavaiḥ saha | tataste sacivāḥ sarve vaivasvatagṛhaṁ gatāḥ

तब गणों और दानवों के बीच युद्ध हुआ। तब वे सभी दानव मन्त्री यमलोक को चले गये।

श्लोक 117 (skanda.7.420.117)

अथाऽसौ महिषो रुष्टः सचिवैर्विंनिपातितैः । स्वसैन्यमानयामास तस्मिन्पर्वतरोधसि

athā'sau mahiṣo ruṣṭaḥ sacivairviṁnipātitaiḥ | svasainyamānayāmāsa tasminparvatarodhasi

तब अपने मन्त्रियों के मारे जाने से क्रुद्ध हुए महिष ने अपनी सम्पूर्ण सेना उस पर्वत के तट पर ले आयी।

श्लोक 118 (skanda.7.420.118)

रथप्रवरमारुह्य सारथिं समभाषत । नय मां सारथे तूर्णं यत्र साऽऽस्ते व्यवस्थिता

rathapravaramāruhya sārathiṁ samabhāṣata | naya māṁ sārathe tūrṇaṁ yatra sā'ste vyavasthitā

श्रेष्ठ रथ पर आरूढ़ होकर उसने सारथी से कहा - "हे सारथे! मुझे शीघ्र वहाँ ले चलो, जहाँ वह स्थित है।"

श्लोक 119 (skanda.7.420.119)

हत्वैनामद्य यास्यामि पारं रोषस्य दुस्तरम् । एवमुक्तस्ततो राजन्प्रेरयामास सारथिः

hatvaināmadya yāsyāmi pāraṁ roṣasya dustaram | evamuktastato rājanprerayāmāsa sārathiḥ

"आज इसका वध करके मैं अपने दुस्तर रोष के पार पहुँच जाऊँगा।" हे राजन्! ऐसा कहे जाने पर सारथी ने रथ को आगे बढ़ाया।

श्लोक 120 (skanda.7.420.120)

रथं तेनैव मार्गेण यत्र सा तिष्ठते ध्रुवम् । एतस्मिन्नेव काले तु तत्रोत्पाताः सुदारुणाः

rathaṁ tenaiva mārgeṇa yatra sā tiṣṭhate dhruvam | etasminneva kāle tu tatrotpātāḥ sudāruṇāḥ

उसी मार्ग से रथ को, जहाँ वह निश्चित रूप से स्थित थी, ले चला। उसी समय वहाँ अत्यन्त भयंकर अपशकुन होने लगे।

श्लोक 121 (skanda.7.420.121)

बहवस्तेन मार्गेण येनासौ प्रस्थितो नृप । सम्मुखः प्रववौ वातो रूक्षः कर्करसंयुतः

bahavastena mārgeṇa yenāsau prasthito nṛpa | sammukhaḥ pravavau vāto rūkṣaḥ karkarasaṁyutaḥ

हे राजन्! जिस मार्ग से वह चला था, उस मार्ग पर अनेक अपशकुन हुए - उसके सम्मुख कंकड़ मिश्रित रूखी वायु बहने लगी।

श्लोक 122 (skanda.7.420.122)

पपात महती चोल्का निहत्य रविमंडलम् । अपसव्यं मृगाश्चक्रुस्तस्य मार्गे नृपोत्तम

papāta mahatī colkā nihatya ravimaṇḍalam | apasavyaṁ mṛgāścakrustasya mārge nṛpottama

सूर्यमण्डल का स्पर्श करके एक बड़ी उल्का गिरी। हे नृपोत्तम! उसके मार्ग में मृग अपसव्य दिशा में घूमने लगे।

श्लोक 123 (skanda.7.420.123)

उपविष्टास्तथा वांता बहुमूत्रं प्रसुस्रुवुः । रथध्वजे समाविष्टो गृध्रः शब्दमथाकरोत्

upaviṣṭāstathā vāntā bahumūtraṁ prasusruvuḥ | rathadhvaje samāviṣṭo gṛdhraḥ śabdamathākarot

बैठे हुए पशु वमन करने लगे और बहुत मूत्र त्यागने लगे। रथ की ध्वजा पर बैठा एक गिद्ध बोलने लगा।

श्लोक 124 (skanda.7.420.124)

स तान्सर्वाननादृत्य महोत्पातान्सुदारुणान् । प्रययौ सम्मुखस्तस्या देव्याः कोपपरायणः

sa tānsarvānanādṛtya mahotpātānsudāruṇān | prayayau sammukhastasyā devyāḥ kopaparāyaṇaḥ

उन समस्त भयंकर महान् अपशकुनों की उपेक्षा करके वह क्रोध से युक्त होकर देवी के सम्मुख आगे बढ़ गया।

श्लोक 125 (skanda.7.420.125)

विमुंचंश्च शरान्नादांस्तिष्ठतिष्ठेति च ब्रुवन् । न कश्चिद्दृश्यते तत्र तेषां मध्ये नृपोत्तम

vimuñcaṁśca śarānnādāṁstiṣṭhatiṣṭheti ca bruvan | na kaścid dṛśyate tatra teṣāṁ madhye nṛpottama

बाण और ललकार छोड़ता हुआ, "ठहरो, ठहरो" कहता हुआ - हे नृपोत्तम! उनके बीच कोई भी स्पष्ट दिखायी नहीं दे रहा था।

श्लोक 126 (skanda.7.420.126)

महिषं रोषसंयुक्तं यो वारयति संगरे । तेन हत्वा गणगणान्कृतं रुधिरकर्दमम्

mahiṣaṁ roṣasaṁyuktaṁ yo vārayati saṁgare | tena hatvā gaṇagaṇānkṛtaṁ rudhirakardamam

संग्राम में जो भी क्रोधयुक्त महिष को रोकने का प्रयास करता, उसे वह मार डालता; उसने गणों के समूह को मारकर रक्त का कीचड़ बना दिया।

श्लोक 127 (skanda.7.420.127)

ततो देवी समासाद्य प्रोक्ता गर्वेण पार्थिव । न त्वया संगरो भीरु नूनं कर्तुं ममोचितः

tato devī samāsādya proktā garveṇa pārthiva | na tvayā saṁgaro bhīru nūnaṁ kartuṁ mamocitaḥ

तब हे राजन्! देवी के पास पहुँचकर उसने गर्वपूर्वक कहा - "हे डरपोक! निश्चय ही मेरे लिए तुमसे युद्ध करना उचित नहीं है।"

श्लोक 128 (skanda.7.420.128)

न च बालिशि मे वीर्यं न सौभाग्यं न वा धनम् । न करोषि हि तेन त्वं मम वाक्यं कथञ्चन

na ca bāliśi me vīryaṁ na saubhāgyaṁ na vā dhanam | na karoṣi hi tena tvaṁ mama vākyaṁ kathañcana

"हे बालिशे! तुम मेरे पराक्रम को, मेरे सौभाग्य को, अथवा मेरे धन को नहीं जानतीं; इसीलिए तुम मेरी बात किसी प्रकार भी नहीं मानतीं।"

श्लोक 129 (skanda.7.420.129)

नूनं तत्त्वेन जानामि अवलिप्तासि भामिनि । कुरुष्वाद्यापि मे वाक्यं भार्या भव मम प्रिया

nūnaṁ tattvena jānāmi avaliptāsi bhāmini | kuruṣvādyāpi me vākyaṁ bhāryā bhava mama priyā

"हे भामिनि! मैं यथार्थ जानता हूँ कि तुम अभिमानी हो। अब भी मेरी बात मानो, मेरी प्रिय भार्या बनो।"

श्लोक 130 (skanda.7.420.130)

स्त्रियं त्वां नोत्सहे हंतुं पौरुषे च व्यवस्थितः । असकृन्निर्जितः संख्ये मया शक्रः सुरैः सह

striyaṁ tvāṁ notsahe hantuṁ pauruṣe ca vyavasthitaḥ | asakṛnnirjitaḥ saṁkhye mayā śakraḥ suraiḥ saha

"पौरुष में स्थित होते हुए भी मैं तुम स्त्री को मारने में उत्सुक नहीं हूँ। मैंने कई बार युद्ध में इन्द्र को देवताओं सहित पराजित किया है।"

श्लोक 131 (skanda.7.420.131)

त्रैलोक्ये नास्ति मत्तुल्यः पुमान्कश्चिच्च बालिशि । एवमुक्ता ततो देवी कोपेन महताऽन्विता

trailokye nāsti mattulyaḥ pumānkaścicca bāliśi | evamuktā tato devī kopena mahatā'nvitā

"हे बालिशे! तीनों लोकों में मेरे समान कोई पुरुष नहीं है।" ऐसा कहे जाने पर देवी महान् क्रोध से भर गयी।

श्लोक 132 (skanda.7.420.132)

प्रगृह्य सशरं चापं वाक्यमेतदुवाच ह । नालापो युज्यते पाप कर्तुं सह मम त्वया

pragṛhya saśaraṁ cāpaṁ vākyametaduvāca ha | nālāpo yujyate pāpa kartuṁ saha mama tvayā

बाण सहित धनुष उठाकर उसने यह वचन कहा - "हे पापी! तुम्हारे साथ मेरे लिए वार्तालाप करना उचित नहीं है।"

श्लोक 133 (skanda.7.420.133)

कुमार्याः कामयुक्तेन तथापि शृणु मे वचः । न त्वया निर्जितः शक्रः स्ववीर्येण रणाजिरे

kumāryāḥ kāmayuktena tathāpi śṛṇu me vacaḥ | na tvayā nirjitaḥ śakraḥ svavīryeṇa raṇājire

"फिर भी, हे कुमारी के प्रति काम से युक्त! मेरा वचन सुनो - रणभूमि में इन्द्र तुमसे तुम्हारे अपने पराक्रम से पराजित नहीं हुए थे।"

श्लोक 134 (skanda.7.420.134)

पितामह वरं देवा मन्यंते दानवाधम । गौरवात्तस्य तेन त्वमात्मानं मन्यसेऽधिकम्

pitāmaha varaṁ devā manyante dānavādhama | gauravāttasya tena tvamātmānaṁ manyase'dhikam

"हे दानवाधम! देवता ब्रह्मा के वर का आदर करते हैं; उसी के गौरव से तुम अपने को श्रेष्ठ मानते हो।"

श्लोक 135 (skanda.7.420.135)

मुक्त्वैकां कामिनीं पाप त्वं कृतः पद्मयोनिना । अवध्यः सर्वसत्त्वानां पुंसः जातौ धरातले

muktvaikāṁ kāminīṁ pāpa tvaṁ kṛtaḥ padmayoninā | avadhyaḥ sarvasattvānāṁ puṁsaḥ jātau dharātale

"हे पापी! एक स्त्री को छोड़कर, कमलयोनि ब्रह्मा ने तुम्हें पृथ्वी पर पुरुष-जाति के सम्पूर्ण प्राणियों के लिए अवध्य बना दिया है।"

श्लोक 136 (skanda.7.420.136)

पितामहवरः सोऽत्र जयशीलोऽसि दानव । यदि ते पौरुषं चास्ति तच्छीघ्रं संप्रदर्शय

pitāmahavaraḥ so'tra jayaśīlo'si dānava | yadi te pauruṣaṁ cāsti tacchīghraṁ saṁpradarśaya

"हे दानव! ब्रह्मा का वही वरदान तुम्हें यहाँ विजयी बनाता है। यदि तुम्हारे पास वास्तविक पौरुष है, तो उसे शीघ्र दिखाओ।"

श्लोक 137 (skanda.7.420.137)

एषा त्वामिषुभिस्तीक्ष्णैर्नयामि यमसादनम् । एवमुक्त्वा ततो देवी शरानष्टौ मुमोच ह

eṣā tvāmiṣubhistīkṣṇairnayāmi yamasādanam | evamuktvā tato devī śarānaṣṭau mumoca ha

"इन तीक्ष्ण बाणों से मैं तुम्हें यमलोक भेजती हूँ।" ऐसा कहकर देवी ने आठ बाण छोड़े।

श्लोक 138 (skanda.7.420.138)

चतुर्भिश्चतुरो वाहाननयद्यमसादनम् । सारथेश्च शिरः कायाच्छरेणैकेन चाक्षिपत्

caturbhiścaturo vāhānanayadyamasādanam | sāratheśca śiraḥ kāyācchareṇaikena cākṣipat

चार बाणों से उसने चारों घोड़ों को यमलोक भेज दिया, और एक बाण से सारथी के सिर को धड़ से अलग कर दिया।

श्लोक 139 (skanda.7.420.139)

ध्वजं चिच्छेद चैकेन ततोऽन्येन हृदि क्षतः । स गात्रविद्धो व्यथितो ध्वजयष्टिं समाश्रितः

dhvajaṁ cicceda caikena tato'nyena hṛdi kṣataḥ | sa gātraviddho vyathito dhvajayaṣṭiṁ samāśritaḥ

एक बाण से ध्वजा काट दी, और दूसरे से उसे हृदय में घायल कर दिया। शरीर में बिंधकर व्यथित होकर वह ध्वजदण्ड का सहारा लेने लगा।

श्लोक 140 (skanda.7.420.140)

मूर्छया सहितो राजन्किंचित्कालमधोमुखः । ततः स चेतनो भूत्वा मुमोच निशिताञ्छरान्

mūrcchayā sahito rājankiñcitkālamadhomukhaḥ | tataḥ sa cetano bhūtvā mumoca niśitāñcharān

हे राजन्! मूर्च्छा से युक्त होकर वह कुछ समय तक अधोमुख रहा; तत्पश्चात् होश में आकर उसने तीक्ष्ण बाण छोड़े।

श्लोक 141 (skanda.7.420.141)

देवी सखीसमायुक्ता सर्वदेशेष्वताडयत् । ततः क्षुरप्रबाणेन धनुस्तस्य द्विधाऽकरोत्

devī sakhīsamāyuktā sarvadeśeṣvatāḍayat | tataḥ kṣurapravāṇena dhanustasya dvidhā'karot

सखियों सहित देवी ने उसे सब ओर से आघात पहुँचाया; फिर क्षुरप्र बाण से उसके धनुष के दो टुकड़े कर दिये।

श्लोक 142 (skanda.7.420.142)

छिन्नधन्वा ततो दैत्यश्चर्मखङ्गसमन्वितः । विद्राव्य सहसा देवीं तिष्ठतिष्ठेति चाब्रवीत्

chinnadhanvā tato daityaścarmakhaṅgasamanvitaḥ | vidrāvya sahasā devīṁ tiṣṭhatiṣṭheti cābravīt

धनुष कट जाने पर दैत्य ढाल-तलवार लेकर सहसा देवी की ओर दौड़ा और "ठहरो, ठहरो" कहने लगा।

श्लोक 143 (skanda.7.420.143)

तस्य चापततस्तूर्णं खड्गं द्वाभ्यां ह्यकृन्तयत् । शराभ्यामर्धबाणेन प्रहस्य प्रासमेव च

tasya cāpatatastūrṇaṁ khaḍgaṁ dvābhyāṁ hyakṛntayat | śarābhyāmardhabāṇena prahasya prāsameva ca

उसके शीघ्रतापूर्वक आक्रमण करने पर देवी ने दो बाणों से उसकी तलवार काट दी, और हँसते हुए अर्धबाण से उसके भाले को भी काट दिया।

श्लोक 144 (skanda.7.420.144)

विशस्त्रो विरथो राजन्स तदा दानवाधमः । ततोऽस्मरच्छरान्भूप शस्त्राणि विविधानि च

viśastro viratho rājansa tadā dānavādhamaḥ | tato'smaracchrānbhūpa śastrāṇi vividhāni ca

हे राजन्! उस समय वह दानवाधम शस्त्रहीन और रथहीन हो गया। तब हे भूप! उसने बाणों और विविध शस्त्रों का स्मरण किया।

श्लोक 145 (skanda.7.420.145)

ब्रह्मास्त्रं मनसि ध्यायंस्तृणं तस्यै मुमोच सः । मुक्तेनास्त्रेण तस्मिंस्तु धूमवर्तिर्व्यजायत

brahmāstraṁ manasi dhyāyaṁstṛṇaṁ tasyai mumoca saḥ | muktenāstreṇa tasmiṁstu dhūmavartirvyajāyata

मन में ब्रह्मास्त्र का ध्यान करते हुए उसने उसकी ओर एक तिनका छोड़ा। उस छोड़े हुए अस्त्र से धूम्र का बवण्डर उत्पन्न हो गया।

श्लोक 146 (skanda.7.420.146)

एतस्मिन्नेव काले तु स ब्रह्मास्ते दिवौकसः । परं भयमनुप्राप्ता दृष्ट्वा तस्य पराक्रमम्

etasminneva kāle tu sa brahmāste divaukasaḥ | paraṁ bhayamanuprāptā dṛṣṭvā tasya parākramam

उसी समय उस ब्रह्मास्त्र को तथा उसके पराक्रम को देखकर स्वर्गवासी देवता अत्यन्त भयभीत हो गये।

श्लोक 147 (skanda.7.420.147)

ततो देवी क्षणं ध्यात्वा तदस्त्रं पार्थिवोत्तम । ब्रह्मास्त्रेणाहनत्तूर्णं ततो व्यर्थं व्यजायत

tato devī kṣaṇaṁ dhyātvā tadastraṁ pārthivottama | brahmāstreṇāhanattūrṇaṁ tato vyarthaṁ vyajāyata

हे नृपोत्तम! तब देवी ने क्षणभर ध्यान करके उस अस्त्र को अपने ब्रह्मास्त्र से शीघ्र ही निष्फल कर दिया।

श्लोक 148 (skanda.7.420.148)

ब्रह्मास्त्रे विफले जाते ह्याग्नेयं दानवोत्तमः । प्रेषयामास तां क्रुद्धो ह्यहनद्वारुणेन सा

brahmāstre viphale jāte hyāgneyaṁ dānavottamaḥ | preṣayāmāsa tāṁ kruddho hyahanadvāruṇena sā

ब्रह्मास्त्र के निष्फल हो जाने पर उस दानवश्रेष्ठ ने क्रुद्ध होकर उस पर आग्नेयास्त्र चलाया; उसने वारुणास्त्र से उसे निष्फल कर दिया।

श्लोक 149 (skanda.7.420.149)

एवं नानाप्रकाराणि तेन मुक्तानि सा तदा । अस्त्राणि विफलान्येव चक्रे देवी सहस्रशः

evaṁ nānāprakārāṇi tena muktāni sā tadā | astrāṇi viphalānyeva cakre devī sahasraśaḥ

इस प्रकार उसके द्वारा छोड़े गये अनेक प्रकार के हजारों अस्त्रों को देवी ने उसी समय निष्फल कर दिया।

श्लोक 150 (skanda.7.420.150)

एवं निःशेषितास्त्रोऽसौ दानवो बलवत्तरः । चकार परमां मायां दिव्यैरस्त्रैः सुरेश्वरी

evaṁ niḥśeṣitāstro'sau dānavo balavattaraḥ | cakāra paramāṁ māyāṁ divyairastraiḥ sureśvarī

इस प्रकार समस्त अस्त्रों से रहित हो जाने पर वह अत्यन्त बलवान् दानव परम माया करने लगा; देवेश्वरी ने दिव्य अस्त्रों से उसका सामना किया।

श्लोक 151 (skanda.7.420.151)

व्यक्षिपच्च महाकायं महिषं पर्वताकृतिम् । दीर्घतीक्ष्णविषाणाभ्यां युक्तमंजनसंनिभम्

vyakṣipacca mahākāyaṁ mahiṣaṁ parvatākṛtim | dīrghatīkṣṇaviṣāṇābhyāṁ yuktamañjanasaṁnibham

उसने मायावश एक विशालकाय, पर्वताकार, काजल के समान श्याम तथा दीर्घ-तीक्ष्ण सींगों से युक्त महिष (भैंसा) उत्पन्न किया।

श्लोक 152 (skanda.7.420.152)

सिंहस्कंधं च सा देवी ततस्तमध्यरोहत । खड्गेन तीक्ष्णेन शिरो देवी तस्य न्यकृंतत

siṁhaskandhaṁ ca sā devī tatastamadhyarohata | khaḍgena tīkṣṇena śiro devī tasya nyakṛntata

तब वह देवी उसके स्कन्ध पर सिंह सहित चढ़ गयी, और देवी ने तीक्ष्ण खड्ग से उसके सिर को काट डाला।

श्लोक 153 (skanda.7.420.153)

शूलेन भेदयामास पृष्ठदेशे सुरेश्वरी । ततः कलेवरात्तस्मान्निश्चक्राम महान्पुमान्

śūlena bhedayāmāsa pṛṣṭhadeśe sureśvarī | tataḥ kalevarāttasmānniścakrāma mahānpumān

देवेश्वरी ने त्रिशूल से उसकी पीठ को बींध दिया। तब उस शरीर से एक महान् पुरुष निकल आया।

श्लोक 154 (skanda.7.420.154)

चर्मखड्गधरो रौद्रस्तिष्ठतिष्ठेति चाब्रवीत् । तमप्येवं गृहीत्वा तत्केशपाशे सुरेश्वरी

carmakhaḍgadharo raudrastiṣṭhatiṣṭheti cābravīt | tamapyevaṁ gṛhītvā tatkeśapāśe sureśvarī

वह ढाल-तलवार धारण किये हुए रौद्र रूप में "ठहरो, ठहरो" कहने लगा। देवेश्वरी ने भी उसे उसी प्रकार केशपाश से पकड़ लिया।

श्लोक 155 (skanda.7.420.155)

निस्त्रिंशेनाहनत्प्रोच्चैः स च प्राणैर्व्ययुज्यत । दानवः पार्थिवश्रेष्ठ पार्श्वे सिंहविदारिते

nistriṁśenāhanatproccaiḥ sa ca prāṇairvyayujyata | dānavaḥ pārthivaśreṣṭha pārśve siṁhavidārite

उसने तलवार से उसे जोर से प्रहार किया, और हे नृपश्रेष्ठ! सिंह द्वारा पार्श्व फाड़े जाने पर वह दानव प्राणों से वियुक्त हो गया।

श्लोक 156 (skanda.7.420.156)

ततो जघान भूयोऽपि दानवान्सा रुषान्विता । हतशेषाश्च ये दैत्या निर्भिद्य धरणीतलम्

tato jaghāna bhūyo'pi dānavānsā ruṣānvitā | hataśeṣāśca ye daityā nirbhidya dharaṇītalam

तब क्रोध से युक्त होकर उसने अन्य दानवों को भी मार डाला। और जो दैत्य वध से बचे रह गये, वे पृथ्वी को भेदकर -

श्लोक 157 (skanda.7.420.157)

प्रविष्टा भयसंत्रस्ताः पातालं जीवितैषिणः । ततो देव गणाः सर्वे वसवो मरुतोऽश्विनौ

praviṣṭā bhayasaṁtrastāḥ pātālaṁ jīvitaiṣiṇaḥ | tato deva gaṇāḥ sarve vasavo maruto'śvinau

- भयभीत होकर जीवन की इच्छा से पाताल में प्रविष्ट हो गये। तब देवगण, वसु, मरुद्गण, अश्विनीकुमार -

श्लोक 158 (skanda.7.420.158)

विश्वेदेवास्तथा साध्या रुद्रा गुह्यककिन्नराः । आदित्याः शक्रसंयुक्ताः समेत्य परमेश्वरीम्

viśvedevāstathā sādhyā rudrā guhyakakinnarāḥ | ādityāḥ śakrasaṁyuktāḥ sametya parameśvarīm

- विश्वेदेव, साध्य, रुद्र, गुह्यक-किन्नर तथा आदित्यगण, इन्द्र सहित, सब मिलकर परमेश्वरी के पास आये।

श्लोक 159 (skanda.7.420.159)

समंताद्दिव्यपुष्पैश्च तां देवीं समवाकिरन् । स्तुवंतो विविधैः स्तोत्रैर्नमंतो भक्तितत्पराः

samantāddivyapuṣpaiśca tāṁ devīṁ samavākiran | stuvanto vividhaiḥ stotrairnamanto bhaktitatparāḥ

उन्होंने चारों ओर से उस देवी पर दिव्य पुष्पों की वर्षा की, विविध स्तोत्रों से स्तुति करते हुए, भक्तिपूर्वक नमन करते हुए।

श्लोक 160 (skanda.7.420.160)

युक्तं कृतं महेशानि यद्धतः पापकृत्तमः । त्रैलोक्यं सकलं ध्वस्तं पापेनानेन सुंदरि

yuktaṁ kṛtaṁ maheśāni yaddhataḥ pāpakṛttamaḥ | trailokyaṁ sakalaṁ dhvastaṁ pāpenānena sundari

"हे महेशानि! आपने जो किया, वह उचित ही है कि आपने उस महापापी का वध किया। हे सुन्दरि! इस पापी के द्वारा सम्पूर्ण त्रैलोक्य नष्ट हो गया था।"

श्लोक 161 (skanda.7.420.161)

त्वया दत्तं पुना राज्यं वासवस्य त्रिविष्टपे । तस्माद्वरय भद्रं ते वरं यन्मनसीप्सितम् । सर्वे देवाः प्रसन्नास्ते प्रदास्यंति न संशयः

tvayā dattaṁ punā rājyaṁ vāsavasya triviṣṭape | tasmādvaraya bhadraṁ te varaṁ yanmanasīpsitam | sarve devāḥ prasannāste pradāsyanti na saṁśayaḥ

"आपने वासव (इन्द्र) को स्वर्ग का राज्य पुनः दिला दिया है। अतः जो भी वर आपके मन में हो, वह माँगिये - इसमें कोई सन्देह नहीं कि प्रसन्न हुए सभी देवता उसे प्रदान करेंगे।"

श्लोक 162 (skanda.7.420.162)

॥ देव्युवाच ॥ यदि देवाः प्रसन्ना मे यदि देयो वरो मम । आश्रमोऽत्रैव मे पुण्यो जायतां ख्यातिसंयुतः

devyuvāca | yadi devāḥ prasannā me yadi deyo varo mama | āśramo'traiva me puṇyo jāyatāṁ khyātisaṁyutaḥ

देवी ने कहा - "यदि देवता मुझसे प्रसन्न हैं, यदि मुझे वर देना हो, तो यहीं मेरा एक पुण्य आश्रम बने, जो ख्याति से युक्त हो।"

श्लोक 163 (skanda.7.420.163)

अस्मिंश्चाहं सदा देवाः स्थास्यामि वरपर्वते

asmiṁścāhaṁ sadā devāḥ sthāsyāmi varaparvate

"और हे देवताओ! मैं सदा इसी श्रेष्ठ पर्वत पर निवास करूँगी।"

श्लोक 164 (skanda.7.420.164)

रूपेणानेन देवेशि ये त्वां द्रक्ष्यंति मानवाः । आश्रमेऽत्र महापुण्ये ते यास्यंति परां गतिम्

rūpeṇānena deveśi ye tvāṁ drakṣyanti mānavāḥ | āśrame'tra mahāpuṇye te yāsyanti parāṁ gatim

"हे देवेशि! इस रूप में जो मनुष्य इस महापुण्य आश्रम में आपका दर्शन करेंगे, वे परम गति को प्राप्त होंगे।"

श्लोक 165 (skanda.7.420.165)

ब्रह्मज्ञानसमायुक्तास्ते भविष्यंति मानवाः

brahmajñānasamāyuktāste bhaviṣyanti mānavāḥ

"वे मनुष्य ब्रह्मज्ञान से युक्त हो जाएँगे।"

श्लोक 166 (skanda.7.420.166)

यस्माच्चंडं कृतं कर्म त्वया दानवसूदनात् । तस्मात्त्वं चंडिकानाम लोके ख्यातिं गमिष्यसि

yasmāccaṇḍaṁ kṛtaṁ karma tvayā dānavasūdanāt | tasmāttvaṁ caṇḍikānāma loke khyātiṁ gamiṣyasi

"चूँकि आपने दानव का वध करके यह उग्र (चण्ड) कर्म किया है, इसलिए आप लोक में 'चण्डिका' नाम से विख्यात होंगी।"

श्लोक 167 (skanda.7.420.167)

तव नाम्ना तथा ख्यात आश्रमोऽयं भविष्यति

tava nāmnā tathā khyāta āśramo'yaṁ bhaviṣyati

"और आपके नाम से ही यह आश्रम प्रसिद्ध होगा।"

श्लोक 168 (skanda.7.420.168)

येऽत्र कृष्ण चतुर्द्दश्यामाश्विने मासि शोभने । पिंडदानं करिष्यंति स्नानं कृत्वा समाहिताः

ye'tra kṛṣṇa caturddaśyāmāśvine māsi śobhane | piṇḍadānaṁ kariṣyanti snānaṁ kṛtvā samāhitāḥ

"जो लोग शुभ आश्विन मास की कृष्ण चतुर्दशी को यहाँ स्नान करके एकाग्रचित्त होकर पिण्डदान करेंगे -"

श्लोक 169 (skanda.7.420.169)

गयाश्राद्धफलं कृत्यं तेषां देवि भविष्यति । त्वद्दर्शनात्तथा मुक्तिः पातकस्य भविष्यति

gayāśrāddhaphalaṁ kṛtyaṁ teṣāṁ devi bhaviṣyati | tvaddarśanāttathā muktiḥ pātakasya bhaviṣyati

"- हे देवि! उनके लिए गया-श्राद्ध का फल प्राप्त होगा। तथा आपके दर्शन से पाप से मुक्ति भी होगी।"

श्लोक 170 (skanda.7.420.170)

॥ कृष्ण उवाच ॥ एकरात्रिं भविष्यंति येऽत्र श्रद्धासमन्विताः । उपवासपरास्तेषां पापं यास्यति संक्षयम्

kṛṣṇa uvāca | ekarātriṁ bhaviṣyanti ye'tra śraddhāsamanvitāḥ | upavāsaparāsteṣāṁ pāpaṁ yāsyati saṁkṣayam

कृष्ण ने कहा - "जो श्रद्धायुक्त होकर एक रात्रि यहाँ उपवासपूर्वक रहेंगे, उनके पाप का सर्वथा नाश हो जाएगा।"

श्लोक 171 (skanda.7.420.171)

पुत्रहीनश्च यो मर्त्यो नारी वापि समाहिता । तन्मनाः पिंडदानं वै तथा स्नानं करिष्यति । अपुत्रो लभते शीघ्रं सुपुत्रं नात्र संशयः

putrahīnaśca yo martyo nārī vāpi samāhitā | tanmanāḥ piṇḍadānaṁ vai tathā snānaṁ kariṣyati | aputro labhate śīghraṁ suputraṁ nātra saṁśayaḥ

"जो पुत्रहीन पुरुष अथवा स्त्री एकाग्रचित्त होकर यहाँ पिण्डदान और स्नान करेगा, वह निःसन्तान निश्चय ही शीघ्र सुपुत्र प्राप्त करेगा।"

श्लोक 172 (skanda.7.420.172)

॥ इन्द्र उवाच ॥ भ्रष्टराज्यो नृपो योऽत्र स्नानं दानं करिष्यति । सर्वशत्रुक्षयस्तस्य राज्यावाप्तिर्भविष्यति

indra uvāca | bhraṣṭarājyo nṛpo yo'tra snānaṁ dānaṁ kariṣyati | sarvaśatrukṣayastasya rājyāvāptirbhaviṣyati

इन्द्र ने कहा - "जो राज्यभ्रष्ट राजा यहाँ स्नान और दान करेगा, उसके सभी शत्रुओं का नाश होगा और उसे राज्य की पुनः प्राप्ति होगी।"

श्लोक 173 (skanda.7.420.173)

॥ अग्निरुवाच ॥ अत्रागत्य शुचिः श्राद्धं यः करिष्यति मानवः । आत्मवित्तानुसारेण तस्य यज्ञफलं भवेत्

agniruvāca | atrāgatya śuciḥ śrāddhaṁ yaḥ kariṣyati mānavaḥ | ātmavittānusāreṇa tasya yajñaphalaṁ bhavet

अग्नि ने कहा - "जो मनुष्य यहाँ आकर पवित्र होकर अपनी सामर्थ्य के अनुसार श्राद्ध करेगा, उसे यज्ञ का फल प्राप्त होगा।"

श्लोक 174 (skanda.7.420.174)

॥ यम उवाच ॥ अत्र स्नात्वा तिलान्यस्तु ब्राह्मणेभ्यः प्रदास्यति । अल्पमृत्युभयं तस्य न कदाचिद्भविष्यति

yama uvāca | atra snātvā tilānyastu brāhmaṇebhyaḥ pradāsyati | alpamṛtyubhayaṁ tasya na kadācidbhaviṣyati

यम ने कहा - "जो यहाँ स्नान करके ब्राह्मणों को तिल दान करेगा, उसे अकाल मृत्यु का भय कभी नहीं होगा।"

श्लोक 175 (skanda.7.420.175)

॥ राक्षसा ऊचुः ॥ पिंडदानं नरा येऽत्र करिष्यंति तवाऽऽश्रमे । प्रेतोत्थं न भयं तस्य देवि क्वापि भविष्यति

rākṣasā ūcuḥ | piṇḍadānaṁ narā ye'tra kariṣyanti tavāśrame | pretotthaṁ na bhayaṁ tasya devi kvāpi bhaviṣyati

राक्षसों ने कहा - "हे देवि! जो मनुष्य आपके इस आश्रम में पिण्डदान करेंगे, उन्हें प्रेतजनित भय कहीं भी नहीं होगा।"

श्लोक 176 (skanda.7.420.176)

॥ वरुण उवाच ॥ स्नानार्थं ब्राह्मणेंद्राणां योऽत्र तोयं प्रदास्यति । विमलस्तु सदा भावि इह लोके परत्र च

varuṇa uvāca | snānārthaṁ brāhmaṇendrāṇāṁ yo'tra toyaṁ pradāsyati | vimalastu sadā bhāvi iha loke paratra ca

वरुण ने कहा - "जो यहाँ श्रेष्ठ ब्राह्मणों के स्नान के लिए जल देगा, वह इस लोक में और परलोक में सदा निर्मल रहेगा।"

श्लोक 177 (skanda.7.420.177)

॥ वायुरुवाच ॥ विलेपनानि शुभ्राणि सुगंधानि विशेषतः । योत्र दास्यति विप्रेभ्यो नीरोगः स भविष्यति

vāyuruvāca | vilepanāni śubhrāṇi sugandhāni viśeṣataḥ | yotra dāsyati viprebhyo nīrogaḥ sa bhaviṣyati

वायु ने कहा - "जो यहाँ ब्राह्मणों को शुभ्र, विशेष रूप से सुगन्धित उबटन देगा, वह नीरोग हो जाएगा।"

श्लोक 178 (skanda.7.420.178)

॥ धनद उवाच ॥ योऽत्र वित्तं यथाशक्त्या ब्राह्मणेभ्यः प्रदास्यति । न भविष्यति लोके स वित्तहीनः कथंचन

dhanada uvāca | yo'tra vittaṁ yathāśaktyā brāhmaṇebhyaḥ pradāsyati | na bhaviṣyati loke sa vittahīnaḥ kathaṁcana

धनद (कुबेर) ने कहा - "जो यहाँ यथाशक्ति ब्राह्मणों को धन देगा, वह लोक में किसी प्रकार भी धनहीन नहीं होगा।"

श्लोक 179 (skanda.7.420.179)

॥ ईश्वर उवाच ॥ योऽत्र व्रतपरो भूत्वा चातुर्मास्यं वसिष्यति । इह लोके परे चैव तस्य भावि सदा सुखम्

īśvara uvāca | yo'tra vrataparo bhūtvā cāturmāsyaṁ vasiṣyati | iha loke pare caiva tasya bhāvi sadā sukham

ईश्वर (शिव) ने कहा - "जो व्रतपरायण होकर यहाँ चातुर्मास्य में निवास करेगा, उसे इस लोक में और परलोक में सदा सुख प्राप्त होगा।"

श्लोक 180 (skanda.7.420.180)

॥ वसव ऊचुः ॥ त्रिरात्रं यो नरः सम्यगुपवासं करिष्यति । आजन्ममरणात्पापान्मुक्तः स च भविष्यति

vasava ūcuḥ | trirātraṁ yo naraḥ samyagupavāsaṁ kariṣyati | ājanmamaraṇātpāpānmuktaḥ sa ca bhaviṣyati

वसुओं ने कहा - "जो मनुष्य भलीभाँति तीन रात्रि उपवास करेगा, वह जन्म से लेकर मृत्युपर्यन्त किये गये पापों से मुक्त हो जाएगा।"

श्लोक 181 (skanda.7.420.181)

॥ आदित्य उवाच ॥ अत्राश्रमपदे पुण्ये ये नरा भक्तिसंयुताः । छत्रोपानत्प्रदातारस्तेषां लोकाः सनातनाः

āditya uvāca | atrāśramapade puṇye ye narā bhaktisaṁyutāḥ | chatropānatpradātārasteṣāṁ lokāḥ sanātanāḥ

आदित्य (सूर्य) ने कहा - "इस पुण्य आश्रम में जो भक्तिसंयुक्त मनुष्य छाता और जूता दान करते हैं, उनके लिए सनातन लोक हैं।"

श्लोक 182 (skanda.7.420.182)

॥ अश्विनावूचतुः ॥ मिष्टान्नं श्रद्धयोपेतो ब्राह्मणाय प्रदास्यति । योऽत्र तस्य परा प्रीतिर्भविष्यत्यविनाशिनी

aśvināvūcatuḥ | miṣṭānnaṁ śraddhayopeto brāhmaṇāya pradāsyati | yo'tra tasya parā prītirbhaviṣyatyavināśinī

अश्विनीकुमारों ने कहा - "जो श्रद्धापूर्वक यहाँ ब्राह्मण को मिष्टान्न देगा, उसे परम अविनाशी प्रीति प्राप्त होगी।"

श्लोक 183 (skanda.7.420.183)

॥ तीर्थान्यूचुः ॥ अद्यप्रभृति सर्वेषां तीर्थानामिह संस्थितिः । भविष्यति विशेषेण ह्याश्रमे लोकविश्रुते

tīrthānyūcuḥ | adyaprabhṛti sarveṣāṁ tīrthānāmiha saṁsthitiḥ | bhaviṣyati viśeṣeṇa hyāśrame lokaviśrute

तीर्थों ने कहा - "आज से सम्पूर्ण तीर्थों की स्थिति इस लोकविख्यात आश्रम में विशेष रूप से रहेगी।"

श्लोक 184 (skanda.7.420.184)

कृष्णपक्षे चतुर्द्दश्यामाश्विने मासि भक्तितः । उपवासपरो भूत्वा योऽत्र स्नानं करिष्यति । सर्वेषामेव तीर्थानां स फलं हि लभिष्यति

kṛṣṇapakṣe caturddaśyāmāśvine māsi bhaktitaḥ | upavāsaparo bhūtvā yo'tra snānaṁ kariṣyati | sarveṣāmeva tīrthānāṁ sa phalaṁ hi labhiṣyati

"जो आश्विन मास की कृष्ण चतुर्दशी को भक्तिपूर्वक उपवास करके यहाँ स्नान करेगा, वह सभी तीर्थों का फल प्राप्त करेगा।"

श्लोक 185 (skanda.7.420.185)

॥ गंधर्वा ऊचुः ॥ गीतवाद्यानि यश्चात्र प्रकरिष्यति मानवः । सप्तजन्मांतराण्येव रूपवान्स भविष्यति

gandharvā ūcuḥ | gītavādyāni yaścātra prakariṣyati mānavaḥ | saptajanmāntarāṇyeva rūpavānsa bhaviṣyati

गन्धर्वों ने कहा - "जो मनुष्य यहाँ गीत-वाद्य करेगा, वह सात जन्मों तक रूपवान् होगा।"

श्लोक 186 (skanda.7.420.186)

॥ ऋषय ऊचुः ॥ आश्रमेऽस्मिंस्त्रिरात्रं य उपवासं करिष्यति । चांद्रायणसहस्रस्य फलं तस्य भविष्यति

ṛṣaya ūcuḥ | āśrame'sminstrirātraṁ ya upavāsaṁ kariṣyati | cāndrāyaṇasahasrasya phalaṁ tasya bhaviṣyati

ऋषियों ने कहा - "जो इस आश्रम में तीन रात्रि उपवास करेगा, उसे एक सहस्र चान्द्रायण व्रतों का फल प्राप्त होगा।"

श्लोक 187 (skanda.7.420.187)

॥ पुलस्त्य उवाच ॥ एवं सर्वे वरान्दत्त्वा देव्यै देवा नृपोत्तम । तदाज्ञया दिवं जग्मुर्देवी तत्रैव संस्थिता

pulastya uvāca | evaṁ sarve varāndattvā devyai devā nṛpottama | tadājñayā divaṁ jagmurdevī tatraiva saṁsthitā

पुलस्त्य ने कहा - हे नृपोत्तम! इस प्रकार सभी देवता देवी को वरदान देकर, उनकी आज्ञा से स्वर्ग को चले गये। देवी वहीं रहीं।

श्लोक 188 (skanda.7.420.188)

अथ मर्त्त्या दिवं जग्मुर्दृष्ट्वा देवीं तदाश्रमे । अनायासेन संपूर्णास्ततो मर्त्यैस्त्रिविष्टपः

atha marttyā divaṁ jagmurdṛṣṭvā devīṁ tadāśrame | anāyāsena saṁpūrṇāstato martyaistriviṣṭapaḥ

तब मर्त्य मनुष्य उस आश्रम में देवी का दर्शन करके बिना किसी परिश्रम के स्वर्ग जाने लगे; इस प्रकार स्वर्ग मर्त्य मनुष्यों से परिपूर्ण हो गया।

श्लोक 189 (skanda.7.420.189)

अग्निष्टोमादिकाः सर्वाः क्रिया नष्टा धरातले । धर्मक्रियास्तथा चान्या मुक्त्वा देव्याः प्रपूजनम्

agniṣṭomādikāḥ sarvāḥ kriyā naṣṭā dharātale | dharmakriyāstathā cānyā muktvā devyāḥ prapūjanam

पृथ्वी पर अग्निष्टोम आदि सभी क्रियाएँ नष्ट हो गयीं, तथा देवी की पूजा को छोड़कर अन्य धर्मक्रियाएँ भी लुप्त हो गयीं।

श्लोक 190 (skanda.7.420.190)

ततो भीतः सहस्राक्षः संमंत्र्य गुरुणा सह । आह्वयामास वेगेन कामं क्रोधं भयं मदम्

tato bhītaḥ sahasrākṣaḥ saṁmantrya guruṇā saha | āhvayāmāsa vegena kāmaṁ krodhaṁ bhayaṁ madam

तब भयभीत होकर सहस्राक्ष इन्द्र ने गुरु के साथ मन्त्रणा करके शीघ्रता से काम, क्रोध, भय और मद को बुलाया।

श्लोक 191 (skanda.7.420.191)

व्यामोहं गृहपुत्रोत्थं तृष्णामायासमन्वितम् । गत्वा यूयं द्रुतं मर्त्ये स्थातुकामान्नरान्स्त्रियः

vyāmohaṁ gṛhaputrotthaṁ tṛṣṇāmāyāsamanvitam | gatvā yūyaṁ drutaṁ martye sthātukāmānnarānstriyaḥ

- तथा घर-पुत्र से उत्पन्न मोह, कष्टयुक्त तृष्णा को भी बुलाया - "तुम सब शीघ्र मृत्युलोक में जाकर, वहाँ स्थित रहने की इच्छा वाले नर-नारियों को -"

श्लोक 192 (skanda.7.420.192)

चंडिकायतने पुण्ये सेवध्वं हि ममाज्ञया । विशेषेणाश्विने मासि कृष्णपक्षेंऽत्यवासरे

caṇḍikāyatane puṇye sevadhvaṁ hi mamājñayā | viśeṣeṇāśvine māsi kṛṣṇapakṣe'ntyavāsare

"- मेरी आज्ञा से चण्डिका के पुण्य आयतन में जाकर, विशेष रूप से आश्विन मास की कृष्ण पक्ष की अन्तिम तिथि को, अपना कार्य करो।"

श्लोक 193 (skanda.7.420.193)

एवमुक्तास्ततः सर्वे कामाद्यास्ते द्रुतं ययुः । मर्त्यलोके महाराज रक्षां चक्रुश्च सर्वशः

evamuktāstataḥ sarve kāmādyāste drutaṁ yayuḥ | martyaloke mahārāja rakṣāṁ cakruśca sarvaśaḥ

ऐसा कहे जाने पर वे सभी काम आदि शीघ्र चले गये। हे महाराज! मृत्युलोक में उन्होंने सभी प्रकार से अपना प्रभाव उत्पन्न किया।

श्लोक 194 (skanda.7.420.194)

एवं ज्ञात्वा द्रुतं गच्छ तत्र पार्थिवसत्तम । यदीच्छसि परं श्रेय इह लोके परत्र च

evaṁ jñātvā drutaṁ gaccha tatra pārthivasattama | yadīcchasi paraṁ śreya iha loke paratra ca

हे नृपसत्तम! यह जानकर, यदि तुम इस लोक और परलोक में परम कल्याण चाहते हो, तो शीघ्र वहाँ जाओ।

श्लोक 195 (skanda.7.420.195)

यो याति चंडिकां द्रष्टुमबुर्दं प्रति पार्थिव । नृत्यंति पितरस्तस्य गर्जंति च पितामहाः

yo yāti caṇḍikāṁ draṣṭumaburdaṁ prati pārthiva | nṛtyanti pitarastasya garjanti ca pitāmahāḥ

हे राजन्! जो चण्डिका के दर्शन हेतु अर्बुद की ओर जाता है, उसके पितर नृत्य करते हैं और पितामह हर्ष से गर्जना करते हैं।

श्लोक 196 (skanda.7.420.196)

तारयिष्यति नः सर्वान्स पुत्रो य इहाश्रमे । चंडिकायाः प्रगत्वाऽथ कुर्याच्छ्राद्धं समाहितः

tārayiṣyati naḥ sarvānsa putro ya ihāśrame | caṇḍikāyāḥ pragatvā'tha kuryācchrāddhaṁ samāhitaḥ

(वे कहते हैं -) "वह पुत्र हम सबका उद्धार करेगा, जो यहाँ चण्डिका के आश्रम में जाकर एकाग्रचित्त होकर श्राद्ध करेगा।"

श्लोक 197 (skanda.7.420.197)

एकया लभ्यते राज्यं स्वर्गश्चैव द्वितीयया । तृतीयया भवेन्मोक्षो यात्रया तत्र पार्थिव

ekayā labhyate rājyaṁ svargaścaiva dvitīyayā | tṛtīyayā bhavenmokṣo yātrayā tatra pārthiva

हे राजन्! वहाँ की एक यात्रा से राज्य प्राप्त होता है, दूसरी से स्वर्ग, और तीसरी यात्रा से मोक्ष प्राप्त होता है।

श्लोक 198 (skanda.7.420.198)

तस्मात्सर्वप्रयत्नेन यात्रां तत्र समाचरेत् । अर्बुदे पर्वतश्रेष्ठे सर्वतीर्थमये शुभे

tasmātsarvaprayatnena yātrāṁ tatra samācaret | arbude parvataśreṣṭhe sarvatīrthamaye śubhe

इसलिए सम्पूर्ण प्रयत्न से, सभी तीर्थों से युक्त शुभ अर्बुद पर्वत की यात्रा करनी चाहिए।

श्लोक 199 (skanda.7.420.199)

तत्र श्लोकः पुरा गीतो नारदेन महर्षिणा । स्नात्वा तत्राश्रमे पुण्ये बहुविप्र समागमे

tatra ślokaḥ purā gīto nāradena maharṣiṇā | snātvā tatrāśrame puṇye bahuvipra samāgame

इस विषय में पूर्वकाल में महर्षि नारद द्वारा एक श्लोक गाया गया था - "उस पुण्य आश्रम में, अनेक ब्राह्मणों के समागम में स्नान करके -"

श्लोक 200 (skanda.7.420.200)

पुनंत्येवान्यतीर्थानि स्नानदानैरसंशयम् । अर्बुदालोकनादेव विपाप्मा तत्र जायते

punantyevānyatīrthāni snānadānairasaṁśayam | arbudālokanādeva vipāpmā tatra jāyate

"- यहाँ स्नान और दान से मनुष्य निस्सन्देह अन्य तीर्थों को भी पवित्र कर देता है। अर्बुद के दर्शन मात्र से ही मनुष्य पापरहित हो जाता है।"

श्लोक 201 (skanda.7.420.201)

यः शृणोति सदाख्यानमेतच्छ्रद्धासमन्वितः । स प्राप्नोति नरश्रेष्ठ कामान्मनसि वांछितान्

yaḥ śṛṇoti sadākhyānametacchraddhāsamanvitaḥ | sa prāpnoti naraśreṣṭha kāmānmanasi vāñchitān

हे नरश्रेष्ठ! जो श्रद्धायुक्त होकर सदा इस आख्यान को सुनता है, वह मन में इच्छित कामनाओं को प्राप्त करता है।

श्लोक 202 (skanda.7.420.202)

यस्यैतत्तिष्ठते गेहे लिखितं पुस्तकं नृप । तस्यापि वांछिताः कामाः संपद्यते दिनेदिने

yasyaitattiṣṭhate gehe likhitaṁ pustakaṁ nṛpa | tasyāpi vāñchitāḥ kāmāḥ saṁpadyate dinedine

हे राजन्! जिसके घर में यह लिखित पुस्तक रहती है, उसकी भी इच्छित कामनाएँ दिन-प्रतिदिन पूर्ण होती हैं।

श्लोक 203 (skanda.7.420.203)

पठति श्रद्धयोपेतो यो वा भूमिपते नरः । सोऽपि यात्राफलं राजँल्लभते पुरुषोत्तमः

paṭhati śraddhayopeto yo vā bhūmipate naraḥ | so'pi yātrāphalaṁ rājalllabhate puruṣottamaḥ

हे भूमिपते! जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक इसे पढ़ता है, वह पुरुषोत्तम भी, हे राजन्! यात्रा के फल को प्राप्त करता है।

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