प्रभास खण्ड · अध्याय 421
नागोद्भव तीर्थ माहात्म्य वर्णन
श्लोक 1 (skanda.7.421.1)
॥ पुलस्त्य उवाच ॥ नागह्रदं ततो गच्छेत्तीर्थं पापप्रणाशनम् । यत्र नागैस्तपस्तप्तं रम्ये पर्वतरोधसि
pulastya uvāca | nāgahradaṁ tato gacchettīrthaṁ pāpapraṇāśanam | yatra nāgaistapastaptaṁ ramye parvatarodhasi
पुलस्त्य ने कहा - तदनन्तर पापनाशक नागह्रद तीर्थ में जाना चाहिए, जहाँ उस रमणीय पर्वत के तट पर नागों ने तपस्या की थी।
श्लोक 2 (skanda.7.421.2)
कद्रूशापं पुरा श्रुत्वा नागाः सर्वे भयातुराः । पप्रच्छुर्नागराजानं शेषं प्रणतकन्धराः
kadrūśāpaṁ purā śrutvā nāgāḥ sarve bhayāturāḥ | papracchurnāgarājānaṁ śeṣaṁ praṇatakandharāḥ
पूर्वकाल में कद्रू के शाप को सुनकर सभी नाग भयभीत हो गये और नतमस्तक होकर नागराज शेष से पूछने लगे।
श्लोक 3 (skanda.7.421.3)
मातृशापेन संतप्ता वयं पन्नगसत्तम । किं कुर्मः क्व च गच्छामः शापमोक्षो भवेत्कथम्
mātṛśāpena saṁtaptā vayaṁ pannagasattama | kiṁ kurmaḥ kva ca gacchāmaḥ śāpamokṣo bhavetkatham
"हे पन्नगसत्तम! माता के शाप से संतप्त हम क्या करें, कहाँ जाएँ? शाप से मुक्ति कैसे हो?"
श्लोक 4 (skanda.7.421.4)
॥ शेष उवाच ॥ प्रसादिता मया माता शापमुक्तिकृते पुरा । तयोक्तं ये तपोयुक्ता धर्मात्मानः सुसंयताः
śeṣa uvāca | prasāditā mayā mātā śāpamuktikṛte purā | tayoktaṁ ye tapoyuktā dharmātmānaḥ susaṁyatāḥ
शेष ने कहा - "पूर्वकाल में शाप-मुक्ति के लिए मैंने माता को प्रसन्न किया था। उन्होंने कहा - 'जो तपस्या में लगे, धर्मात्मा, सुसंयमी होंगे -'"
श्लोक 5 (skanda.7.421.5)
न दहिष्यति तान्वह्निर्यज्ञे पारिक्षितस्य हि । तस्माद्गत्वार्बुदंनाम पर्वतं धरणीतले
na dahiṣyati tānvahniryajñe pārikṣitasya hi | tasmādgatvārbudaṁnāma parvataṁ dharaṇītale
"'- उन्हें परीक्षित्-पुत्र के यज्ञ में अग्नि नहीं जलाएगी। अतः पृथ्वी पर अर्बुद नामक पर्वत पर जाकर -'"
श्लोक 6 (skanda.7.421.6)
तत्र यूयं तपोयुक्ता भवध्वं सुसमाहिताः । यत्रास्ते सा स्वयं देवी चंडिका कामरूपिणी
tatra yūyaṁ tapoyuktā bhavadhvaṁ susamāhitāḥ | yatrāste sā svayaṁ devī caṇḍikā kāmarūpiṇī
"'- वहाँ तुम सब तपोयुक्त, एकाग्रचित्त होकर रहना, जहाँ वह स्वयं देवी चण्डिका, इच्छानुसार रूप धारण करने वाली, विराजमान हैं।'"
श्लोक 7 (skanda.7.421.7)
यस्याः संकीर्त्तनेनापि नश्यंति विपदो ध्रुवम् । आराधयध्वमनिशं तां देवीं मम वाक्यतः
yasyāḥ saṁkīrttanenāpi naśyanti vipado dhruvam | ārādhayadhvamaniśaṁ tāṁ devīṁ mama vākyataḥ
"'जिनके नाम के कीर्तन मात्र से भी विपत्तियाँ निश्चय ही नष्ट हो जाती हैं। मेरे कहने से तुम उस देवी की निरन्तर आराधना करो।'"
श्लोक 8 (skanda.7.421.8)
तस्याः प्रसादतः सर्वे भविष्यथ गतज्वराः । एतमेवात्र पश्यामि उपायं नागसत्तमाः । दैवो वा मानुषो वाऽपि नान्यो वो मुक्तिकारकः
tasyāḥ prasādataḥ sarve bhaviṣyatha gatajvarāḥ | etamevātra paśyāmi upāyaṁ nāgasattamāḥ | daivo vā mānuṣo vā'pi nānyo vo muktikārakaḥ
"'उनकी कृपा से तुम सब पीड़ामुक्त हो जाओगे। हे नागसत्तमो! मैं यहाँ यही उपाय देखता हूँ। इसके अतिरिक्त कोई भी देव अथवा मानव तुम्हारा मुक्तिदाता नहीं है।'"
श्लोक 9 (skanda.7.421.9)
॥ पुलस्त्य उवाच ॥ एवमुक्तास्ततो नागा नागराजेन पार्थिव । प्रणम्य तं ततो जग्मुरर्बुदं पर्वतं प्रति
pulastya uvāca | evamuktāstato nāgā nāgarājena pārthiva | praṇamya taṁ tato jagmurarbudaṁ parvataṁ prati
पुलस्त्य ने कहा - हे राजन्! नागराज द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर, उन्हें प्रणाम करके नाग अर्बुद पर्वत की ओर चले गये।
श्लोक 10 (skanda.7.421.10)
ते भित्त्वा धरणीपृष्ठं पर्वते तदनन्तरम् । निजग्मुर्बिलमार्गेण कृत्वा श्वभ्रे सुविस्तरम्
te bhittvā dharaṇīpṛṣṭhaṁ parvate tadanantaram | nijagmurbilamārgeṇa kṛtvā śvabhre suvistaram
वे पृथ्वी की सतह को भेदकर, तत्पश्चात् पर्वत में विशाल बिल बनाकर, बिल के मार्ग से भीतर प्रविष्ट हो गये।
श्लोक 11 (skanda.7.421.11)
ततो धृतव्रताः सर्वे देवी भक्तिपरायणाः । वसंति भक्तिसंयुक्ताश्चण्डिकाराधनाय ते
tato dhṛtavratāḥ sarve devī bhaktiparāyaṇāḥ | vasanti bhaktisaṁyuktāścaṇḍikārādhanāya te
तब वे सभी व्रतधारी, देवी की भक्ति में तत्पर होकर, चण्डिका की आराधना के लिए भक्तिपूर्वक वहाँ रहने लगे।
श्लोक 12 (skanda.7.421.12)
तस्थुस्तत्र सदा होमं कुर्वन्तो जाप्यमुत्तमम् । एकाहारा निराहारा वायुभक्षास्तथा परे
tasthustatra sadā homaṁ kurvanto jāpyamuttamam | ekāhārā nirāhārā vāyubhakṣāstathā pare
वे वहाँ सदा होम और उत्तम जप करते हुए रहे - कुछ एकाहारी, कुछ निराहारी, तथा अन्य वायुभक्षी थे।
श्लोक 13 (skanda.7.421.13)
दन्तोलूखलिनः केचिदश्मकुट्टास्तथा परे । पञ्चाग्निसाधकाश्चान्ये सद्यः प्रक्षालकास्तथा
dantolūkhalinaḥ kecidaśmakuṭṭāstathā pare | pañcāgnisādhakāścānye sadyaḥ prakṣālakāstathā
कुछ दाँतों को ही ऊखल के समान उपयोग करने वाले थे, कुछ पत्थर से कूटकर खाने वाले थे; अन्य पंचाग्नि-साधक थे, तथा कुछ तत्काल प्रक्षालन करने वाले थे।
श्लोक 14 (skanda.7.421.14)
गीतं वाद्यं तथा चक्रुरन्ये देवाः पुरस्तदा । अनन्यश्रद्धयोपेतांस्तान्दृष्ट्वा पन्नगोत्तमान्
gītaṁ vādyaṁ tathā cakrurainye devāḥ purastadā | ananyaśraddhayopetāṁstāndṛṣṭvā pannagottamān
अन्य देवताओं ने भी उन अनन्य श्रद्धा से युक्त श्रेष्ठ नागों को देखकर उनके समक्ष गीत-वाद्य किया।
श्लोक 15 (skanda.7.421.15)
ततो देवी सुसन्तुष्टा वाक्यमेतदुवाच ह
tato devī susantuṣṭā vākyametaduvāca ha
तब देवी अत्यन्त संतुष्ट होकर यह वचन बोलीं।
श्लोक 16 (skanda.7.421.16)
॥ देव्युवाच ॥ परितुष्टास्मि वो वत्साः किमर्थं तप्यते तपः । वरयध्वं वरं मत्तो यः स्थितो भवतां हृदि
devyuvāca | parituṣṭāsmi vo vatsāḥ kimarthaṁ tapyate tapaḥ | varayadhvaṁ varaṁ matto yaḥ sthito bhavatāṁ hṛdi
देवी ने कहा - "हे वत्सो! मैं तुम पर प्रसन्न हूँ। किस प्रयोजन से यह तप किया जा रहा है? तुम्हारे हृदय में जो भी हो, मुझसे वह वर माँग लो।"
श्लोक 17 (skanda.7.421.17)
॥ नागा ऊचुः ॥ मातृशापेन संतप्ता वयं देवि निराश्रयाः । नागराजसमादेशाच्छरणं त्वां समागताः
nāgā ūcuḥ | mātṛśāpena saṁtaptā vayaṁ devi nirāśrayāḥ | nāgarājasamādeśāccharaṇaṁ tvāṁ samāgatāḥ
नागों ने कहा - "हे देवि! माता के शाप से संतप्त, आश्रयहीन हम, नागराज की आज्ञा से आपकी शरण में आये हैं।"
श्लोक 18 (skanda.7.421.18)
सा त्वं रक्ष भयात्तस्माच्छापवह्निसमुद्भवात् । वयं मात्रा पुरा शप्ताः कस्मिंश्चित्कारणान्तरे । पारिक्षितस्य यज्ञे वः पावको भक्षयिष्यति
sā tvaṁ rakṣa bhayāttasmācchāpavahnisamudbhavāt | vayaṁ mātrā purā śaptāḥ kasmiṁścitkāraṇāntare | pārikṣitasya yajñe vaḥ pāvako bhakṣayiṣyati
"हमें उस शाप की अग्नि से उत्पन्न भय से बचाइये। पहले किसी कारणवश हमारी माता ने हमें शाप दिया था - 'परीक्षित्-पुत्र के यज्ञ में अग्नि तुम्हें भक्षण कर लेगी।'"
श्लोक 19 (skanda.7.421.19)
॥ देव्युवाच ॥ यावत्तस्य भवेद्यज्ञ स्तावद्यूयं ममान्तिके । संतिष्ठत विना भीत्या भोगान्भुङ्ध्वं सुपुष्कलान्
devyuvāca | yāvattasya bhavedyajña stāvadyūyaṁ mamāntike | saṁtiṣṭhata vinā bhītyā bhogānbhuṅdhvaṁ supuṣkalān
देवी ने कहा - "जब तक उसका यज्ञ नहीं होता, तब तक तुम निर्भय होकर मेरे पास रहो, और भरपूर भोगों का आनन्द लो।"
श्लोक 20 (skanda.7.421.20)
समाप्ते च क्रतौ भूयो गंतारः स्वं निकेतनम् । युष्माभिर्भेदितं यस्मादेतत्पर्वतकन्दरम्
samāpte ca kratau bhūyo gantāraḥ svaṁ niketanam | yuṣmābhirbheditaṁ yasmādetatparvatakandaram
"और यज्ञ समाप्त होने पर तुम पुनः अपने निवास स्थान को चले जाना। चूँकि यह पर्वत-गुफा तुम्हारे द्वारा भेदी गयी है -"
श्लोक 21 (skanda.7.421.21)
नागह्रदं तु तत्तीर्थमेतद्भावि धरातले । अत्र यः श्रावणे मासि पञ्चम्यां भक्तितत्परः
nāgahradaṁ tu tattīrthametadbhāvi dharātale | atra yaḥ śrāvaṇe māsi pañcamyāṁ bhaktitatparaḥ
"- इसलिए यह तीर्थ पृथ्वी पर 'नागह्रद' नाम से प्रसिद्ध होगा। जो यहाँ श्रावण मास की पंचमी को भक्तिपूर्वक -"
श्लोक 22 (skanda.7.421.22)
करिष्यति नरः स्नानं तस्य नाहिकृतं भयम् । भविष्यति पुनः श्राद्धात्पितॄन्संतारयिष्यति
kariṣyati naraḥ snānaṁ tasya nāhikṛtaṁ bhayam | bhaviṣyati punaḥ śrāddhātpitṝnsaṁtārayiṣyati
"- स्नान करेगा, उसे सर्पकृत भय नहीं होगा। तथा श्राद्ध करने से वह अपने पितरों को तार देगा।"
श्लोक 23 (skanda.7.421.23)
ये भोगा भूतले ख्याता ये दिव्या ये च मानुषाः । नरो नित्यं लभिष्यति न संशयः
ye bhogā bhūtale khyātā ye divyā ye ca mānuṣāḥ | naro nityaṁ labhiṣyati na saṁśayaḥ
"पृथ्वी पर जो भी भोग प्रसिद्ध हैं, चाहे दिव्य हों या मानवीय... (यहाँ स्रोत में पाठ का एक अंश अनुपलब्ध/त्रुटित है) ...मनुष्य उन्हें सदा प्राप्त करेगा, इसमें सन्देह नहीं।" नोट: इस श्लोक के दूसरे चरण में मूल पाठ में एक वास्तविक त्रुटि/लोप है; उपलब्ध अंश का ही अनुवाद किया गया है, कोई शब्द जोड़ा नहीं गया है।
श्लोक 24 (skanda.7.421.24)
॥ पुलस्त्य उवाच ॥ ततो हृष्टा बभूवुस्ते मुक्त्वा तद्दारुणं भयम् । देव्याः शरणमापन्नास्तस्थुस्तत्र नगोत्तमे
pulastya uvāca | tato hṛṣṭā babhūvuste muktvā taddāruṇaṁ bhayam | devyāḥ śaraṇamāpannāstasthustatra nagottame
पुलस्त्य ने कहा - तब वे उस भयंकर भय से मुक्त होकर हर्षित हो गये। देवी की शरण पाकर वे उस श्रेष्ठ पर्वत पर ही रहने लगे।
श्लोक 25 (skanda.7.421.25)
ततः कालेन महता सत्रे पारिक्षितस्य च । निर्वृत्ते ते तदा जग्मुः सुनिर्वृत्ता रसातलम्
tataḥ kālena mahatā satre pārikṣitasya ca | nirvṛtte te tadā jagmuḥ sunirvṛttā rasātalam
तत्पश्चात् दीर्घकाल बाद जब परीक्षित्-पुत्र का सत्र समाप्त हुआ, तब वे भलीभाँति संतुष्ट होकर रसातल को चले गये।
श्लोक 26 (skanda.7.421.26)
देव्या चैवाभ्यनुज्ञाताः प्रणिपत्य मुहुर्मुहुः । कृच्छ्रात्पार्थिवशार्दूल तद्भक्त्या निश्चलीकृताः
devyā caivābhyanujñātāḥ praṇipatya muhurmuhuḥ | kṛcchrātpārthivaśārdūla tadbhaktyā niścalīkṛtāḥ
देवी से अनुमति पाकर बार-बार प्रणाम करके - हे नृपशार्दूल! उसकी भक्ति से कठिनतापूर्वक अपने को स्थिर करके -
श्लोक 27 (skanda.7.421.27)
अद्यापि कृष्णपंचम्यां श्रावणे मासि पार्थिव । सान्निध्यं तत्र कुर्वंति देवीदर्शनलालसाः
adyāpi kṛṣṇapañcamyāṁ śrāvaṇe māsi pārthiva | sānnidhyaṁ tatra kurvanti devīdarśanalālasāḥ
- हे राजन्! आज भी श्रावण मास की कृष्ण पंचमी को वे देवी के दर्शन की लालसा से वहाँ उपस्थित होते हैं।
श्लोक 28 (skanda.7.421.28)
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन श्राद्धं तत्र समाचरेत् । स्नानं च पार्थिवश्रेष्ठ य इच्छेच्छ्रेय आत्मनः
tasmātsarvaprayatnena śrāddhaṁ tatra samācaret | snānaṁ ca pārthivaśreṣṭha ya icchecchreya ātmanaḥ
इसलिए हे नृपश्रेष्ठ! जो अपना कल्याण चाहता हो, उसे सम्पूर्ण प्रयत्न से वहाँ श्राद्ध और स्नान करना चाहिए।