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प्रभास खण्ड · अध्याय 422

शिवगंगाकुण्ड उत्पत्ति माहात्म्य वर्णन

अध्याय 421अध्याय-सूचीअध्याय 423

श्लोक 1 (skanda.7.422.1)

॥ पुलस्त्य उवाच ॥ कुंडं तु शिवलिंगाख्यं ततो गच्छेन्महीपते । यत्र सा जाह्नवी गुप्ता तिष्ठते भूपसत्तम

pulastya uvāca | kuṇḍaṁ tu śivaliṅgākhyaṁ tato gacchenmahīpate | yatra sā jāhnavī guptā tiṣṭhate bhūpasattama

पुलस्त्य ने कहा - हे राजन्! तदनन्तर शिवलिंग नामक कुण्ड में जाना चाहिए, जहाँ हे भूपसत्तम! वह गुप्त जाह्नवी (गंगा) विराजमान हैं।

श्लोक 2 (skanda.7.422.2)

तस्यां स्नातो नरः सम्यक्सर्वतीर्थफलं लभेत् । मुच्यते पातकात्कृत्स्नादाजन्ममरणांतिकात्

tasyāṁ snāto naraḥ samyaksarvatīrthaphalaṁ labhet | mucyate pātakātkṛtsnādājanmamaraṇāntikāt

उसमें भलीभाँति स्नान करने वाला मनुष्य सम्पूर्ण तीर्थों के फल को प्राप्त करता है। वह जन्म से लेकर मृत्युपर्यन्त के सम्पूर्ण पाप से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 3 (skanda.7.422.3)

॥ ययातिरुवाच ॥ किमर्थं तत्र सा गुप्ता जाह्नवी तिष्ठते विभो । कस्मिन्काले समायाता परं कौतूहलं हि मे

yayātiruvāca | kimarthaṁ tatra sā guptā jāhnavī tiṣṭhate vibho | kasminkāle samāyātā paraṁ kautūhalaṁ hi me

ययाति ने कहा - हे विभो! वह जाह्नवी वहाँ गुप्त होकर क्यों निवास करती है? वे किस समय आयीं? मुझे इसमें अत्यन्त कौतूहल है।

श्लोक 4 (skanda.7.422.4)

॥ पुलस्त्य उवाच ॥ यदा प्रसादितो देवैर्भगवान्वृषभध्वजः । अर्बुदेऽस्मिन्सदा स्थेयमचलेन त्वया विभो

pulastya uvāca | yadā prasādito devairbhagavānvṛṣabhadhvajaḥ | arbude'sminsadā stheyamacalena tvayā vibho

पुलस्त्य ने कहा - जब देवताओं द्वारा वृषभध्वज भगवान् को प्रसन्न किया गया - "हे विभो! आपको सदा इसी अर्बुद पर अचल होकर रहना है -"

श्लोक 5 (skanda.7.422.5)

तत्र संस्थापिते लिंगे स्वयं देवेन शंभुना । यत्पातितं पुरा लिंगं वालखिल्यैर्महर्षिभिः

tatra saṁsthāpite liṅge svayaṁ devena śambhunā | yatpātitaṁ purā liṅgaṁ vālakhilyairmaharṣibhiḥ

"- वहाँ स्वयं देव शम्भु द्वारा वही लिंग स्थापित किया गया, जो पूर्व में महर्षि वालखिल्यों द्वारा गिराया गया था -"

श्लोक 6 (skanda.7.422.6)

अतिकोपसमायुक्तैः कस्मिंश्चित्कारणांतरे । तदा देवेन प्रतिज्ञातं सर्वेषां त्रिदिवौकसाम्

atikopasamāyuktaiḥ kasmiṁścitkāraṇāntare | tadā devena pratijñātaṁ sarveṣāṁ tridivaukasām

"- जो किसी कारणवश अत्यन्त क्रोध से युक्त थे। उस समय सम्पूर्ण देवताओं के समक्ष देव ने प्रतिज्ञा की थी -"

श्लोक 7 (skanda.7.422.7)

अचले तु मयात्रैव स्थातव्यं नात्र संशयः । ततः कालेन महता वसतस्तस्य तत्र च

acale tu mayātraiva sthātavyaṁ nātra saṁśayaḥ | tataḥ kālena mahatā vasatastasya tatra ca

"'इसी अचल पर मुझे यहीं रहना है - इसमें कोई सन्देह नहीं।'" तत्पश्चात् वहाँ दीर्घकाल तक निवास करते हुए -

श्लोक 8 (skanda.7.422.8)

अचलेश्वररूपस्य गंगा चित्ते व्यजायत । कथं नित्यं तया सार्द्धं भविष्यति समागमः

acaleśvararūpasya gaṅgā citte vyajāyata | kathaṁ nityaṁ tayā sārddhaṁ bhaviṣyati samāgamaḥ

- अचलेश्वर रूप में स्थित उनके मन में गंगा का विचार उत्पन्न हुआ - "उनके साथ नित्य समागम कैसे हो?"

श्लोक 9 (skanda.7.422.9)

अथ जानाति नो गौरी मानिनी परमेश्वरी । तस्यैवं चिन्तयानस्य बहुशो नृपसत्तम

atha jānāti no gaurī māninī parameśvarī | tasyaivaṁ cintayānasya bahuśo nṛpasattama

"और मानिनी परमेश्वरी गौरी यह न जान पाएँ।" हे नृपसत्तम! इस प्रकार बारम्बार विचार करते हुए उन्होंने -

श्लोक 10 (skanda.7.422.10)

उपायं सुमहद्ध्यात्वा जाह्नवीसंगसंभवम् । तेनादिष्टा गणाः सर्वे नंदिभृङ्गिपुरःसराः

upāyaṁ sumahaddhyātvā jāhnavīsaṅgasaṁbhavam | tenādiṣṭā gaṇāḥ sarve nandibhṛṅgipuraḥsarāḥ

- जाह्नवी के साथ समागम के लिए एक महान् उपाय सोचकर, नन्दी-भृंगी आदि सभी गणों को आज्ञा दी।

श्लोक 11 (skanda.7.422.11)

अभिप्रायोऽस्ति मे कश्चिज्जलाश्रयव्रतोद्भवः । क्रियतामुत्तमं कुण्डमस्मिन्पर्वतरोधसि

abhiprāyo'sti me kaściajjalāśrayavratodbhavaḥ | kriyatāmuttamaṁ kuṇḍamasminparvatarodhasi

"मेरा जल-आश्रय व्रत से सम्बन्धित कोई अभिप्राय है; इस पर्वत के तट पर एक उत्तम कुण्ड बनाया जाए।"

श्लोक 12 (skanda.7.422.12)

तत्राहं जलमध्यस्थः स्थास्यामि जलतत्परः । तच्छ्रुत्वा त्वरितं चक्रुर्गणाः कुण्डमनेकशः

tatrāhaṁ jalamadhyasthaḥ sthāsyāmi jalatatparaḥ | tacchrutvā tvaritaṁ cakrurgaṇāḥ kuṇḍamanekaśaḥ

"वहाँ जलनिष्ठ होकर मैं जल के मध्य में स्थित रहूँगा।" यह सुनकर गणों ने शीघ्र ही अनेक प्रकार से वह कुण्ड बनाया।

श्लोक 13 (skanda.7.422.13)

स्वच्छोदकसमाकीर्णं सुतीर्थं सुसुखावहम् । ततो गौरीमनुज्ञाप्य जाह्नवीसंगलालसः

svacchodakasamākīrṇaṁ sutīrthaṁ susukhāvaham | tato gaurīmanujñāpya jāhnavīsaṅgalālasaḥ

वह स्वच्छ जल से भरा, सुखदायक उत्तम तीर्थ बन गया। तब गौरी से अनुमति लेकर, जाह्नवी के समागम की लालसा से -

श्लोक 14 (skanda.7.422.14)

व्रतव्याजेन देवेशो विवेश तदनन्तरम् । चिन्तयामास तत्रस्थो गंगां त्रैलोक्यपाविनीम्

vratavyājena deveśo viveśa tadanantaram | cintayāmāsa tatrastho gaṅgāṁ trailokyapāvinīm

- देवेश ने व्रत के बहाने से उसमें प्रवेश किया। वहाँ स्थित होकर उन्होंने त्रैलोक्यपाविनी गंगा का ध्यान किया।

श्लोक 15 (skanda.7.422.15)

सा ध्याता तत्क्षणात्तत्र शिवेन सह संगता । एवं स भगवांस्तत्र जाह्नवीं भजते सदा

sā dhyātā tatkṣaṇāttatra śivena saha saṅgatā | evaṁ sa bhagavāṁstatra jāhnavīṁ bhajate sadā

उनका ध्यान करते ही उसी क्षण वे वहाँ शिव से मिल गयीं। इस प्रकार वे भगवान् वहाँ सदा जाह्नवी का सेवन करने लगे।

श्लोक 16 (skanda.7.422.16)

व्रतव्याजेन राजेन्द्र न तु गौरी व्यजानत । कस्यचित्त्वथ कालस्य नारदो भगवान्मुनिः । कैवल्यज्ञानसंपन्नस्तत्रायातः परिभ्रमन्

vratavyājena rājendra na tu gaurī vyajānata | kasyacittvatha kālasya nārado bhagavānmuniḥ | kaivalyajñānasaṁpannastatrāyātaḥ paribhraman

हे राजेन्द्र! व्रत के बहाने से गौरी को इसका ज्ञान नहीं हुआ। तत्पश्चात् किसी समय कैवल्यज्ञान से सम्पन्न भगवान् नारद मुनि भ्रमण करते हुए वहाँ आये।

श्लोक 17 (skanda.7.422.17)

स तु दृष्ट्वा महादेवं जलस्थं व्रतधारिणम् । कामजैरिंगितैर्युक्तं तत्राऽसौ विस्मयान्वितः

sa tu dṛṣṭvā mahādevaṁ jalasthaṁ vratadhāriṇam | kāmajairiṅgitairyuktaṁ tatrā'sau vismayānvitaḥ

व्रतधारी महादेव को जल में खड़े हुए, किन्तु काम से उत्पन्न भावों से युक्त देखकर, वे वहाँ आश्चर्यचकित हो गये।

श्लोक 18 (skanda.7.422.18)

वक्त्रनेत्रविकारोऽयं किमस्य व्रतधारिणः । ईदृक्कामसमायुक्तस्ततो ध्यानस्थितो मुनिः

vaktranetravikāro'yaṁ kimasya vratadhāriṇaḥ | īdṛkkāmasamāyuktastato dhyānasthito muniḥ

"इस व्रतधारी के मुख और नेत्रों में यह विकार क्यों है, जो इस प्रकार काम से युक्त हैं?" फिर मुनि ध्यानस्थ हो गये।

श्लोक 19 (skanda.7.422.19)

अथाऽपश्यद्ध्यानदृष्ट्या गंगासक्तं महेश्वरम् । गौर्या भयेन सव्याजं ततो विस्मयमागतः

athā'paśyaddhyānadṛṣṭyā gaṅgāsaktaṁ maheśvaram | gauryā bhayena savyājaṁ tato vismayamāgataḥ

तब ध्यान-दृष्टि से उन्होंने महेश्वर को गंगा में आसक्त, गौरी के भय से बहाना करते हुए देखा; तब वे आश्चर्य में पड़ गये।

श्लोक 20 (skanda.7.422.20)

तदा स कथयामास सर्वं हरविचेष्टितम्

tadā sa kathayāmāsa sarvaṁ haraviceṣṭitam

तब उन्होंने हर की सारी चेष्टा का वर्णन कर दिया।

श्लोक 21 (skanda.7.422.21)

ततो देवी त्वरायुक्ता ययौ यत्र महेश्वरः । आताम्रनयना रोषाद्वेपमाना मुहुर्मुहुः

tato devī tvarāyuktā yayau yatra maheśvaraḥ | ātāmranayanā roṣādvepamānā muhurmuhuḥ

तब देवी शीघ्रता से वहाँ गयीं, जहाँ महेश्वर थे, क्रोध से उनके नेत्र लाल हो गये और वे बार-बार काँपने लगीं।

श्लोक 22 (skanda.7.422.22)

तां दृष्ट्वा कोपसंयुक्तां समायातां महेश्वरीम् । उवाच जाह्नवी भीता ज्ञात्वा दिव्येन चक्षुषा

tāṁ dṛṣṭvā kopasaṁyuktāṁ samāyātāṁ maheśvarīm | uvāca jāhnavī bhītā jñātvā divyena cakṣuṣā

क्रोध से युक्त होकर आती हुई उस महेश्वरी को देखकर, अपनी दिव्य दृष्टि से उन्हें पहचानकर भयभीत जाह्नवी बोलीं।

श्लोक 23 (skanda.7.422.23)

आवयोः संगमे देवी नारदेन निवेदिता । सेयं रुष्टा समायाति कुरुष्व यदनन्तरम्

āvayoḥ saṅgame devī nāradena niveditā | seyaṁ ruṣṭā samāyāti kuruṣva yadanantaram

"हमारे समागम की सूचना नारद ने देवी को दे दी है। वे रुष्ट होकर यहाँ आ रही हैं। अब जो उचित हो, वह कीजिये।"

श्लोक 24 (skanda.7.422.24)

॥ श्रीमहादेव उवाच ॥ कर्त्तव्यं जाह्नवि श्रेयः पुरो गत्वा नगात्मजाम् । अत्यर्थं मानिनी ह्येषा साम्ना च वशवर्तिनी

śrīmahādeva uvāca | karttavyaṁ jāhnavi śreyaḥ puro gatvā nagātmajām | atyarthaṁ māninī hyeṣā sāmnā ca vaśavartinī

श्री महादेव ने कहा - "हे जाह्नवि! सबसे अच्छा यही है कि तुम पर्वतपुत्री के समक्ष जाओ। वे अत्यन्त मानिनी हैं, किन्तु साम (मृदु वचन) से वश में आ जाती हैं।"

श्लोक 25 (skanda.7.422.25)

तत्क्षणाज्जायते साध्वी तस्मात्सामपरा भव । नो चेच्छापं मया सार्धं तव दास्यत्यसंशयम्

tatkṣaṇājjāyate sādhvī tasmātsāmaparā bhava | no cecchāpaṁ mayā sārdhaṁ tava dāsyatyasaṁśayam

"वे तत्काल ही साध्वी बन जाती हैं, अतः तुम साम-भाव अपनाओ। अन्यथा वे निश्चय ही मुझे और तुम्हें शाप देंगी।"

श्लोक 26 (skanda.7.422.26)

एवमुक्ता च रुद्रेण जाह्नवी नृपसत्तम । कुण्डान्निर्गत्य सा गंगा सम्मुखं प्रययौ तदा

evamuktā ca rudreṇa jāhnavī nṛpasattama | kuṇḍānnirgatya sā gaṅgā sammukhaṁ prayayau tadā

हे नृपसत्तम! रुद्र द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर, वह गंगा जाह्नवी कुण्ड से निकलकर उस समय उनके सम्मुख गयी।

श्लोक 27 (skanda.7.422.27)

प्रत्युद्ययौ सलज्जा च कृतांजलिपुरःसरा । प्रणम्य शिरसा चेयं ततः प्राह स्वलंकृता

pratyudyayau salajjā ca kṛtāñjalipuraḥsarā | praṇamya śirasā ceyaṁ tataḥ prāha svalaṁkṛtā

लज्जायुक्त होकर वे अंजलिबद्ध हाथों से उनकी अगवानी में आयीं; सिर झुकाकर प्रणाम करके, सुसज्जित होकर उन्होंने कहा।

श्लोक 28 (skanda.7.422.28)

पुराऽहं तव कांतेन निपतन्ती नभस्तलात् । धृता देवि तवाप्येतद्विदितं नृपतेः कृते

purā'haṁ tava kāntena nipatantī nabhastalāt | dhṛtā devi tavāpyetadviditaṁ nṛpateḥ kṛte

"हे देवि! पूर्वकाल में जब मैं आकाश से गिर रही थी, तब आपके प्रियतम ने मुझे धारण किया था। यह बात राजा के कारण आप भी जानती हैं।"

श्लोक 29 (skanda.7.422.29)

भगीरथाभिधानस्य ततः स्नेहो व्यवर्धत । आवयोस्तव भीत्या च नाभूत्क्वापि समागमः

bhagīrathābhidhānasya tataḥ sneho vyavardhata | āvayostava bhītyā ca nābhūtkvāpi samāgamaḥ

"भगीरथ नामक राजा के लिए - तब से स्नेह बढ़ता गया। किन्तु आपके भय से हम दोनों का कहीं भी समागम नहीं हुआ।"

श्लोक 30 (skanda.7.422.30)

अधुना तव वाक्येन जानेऽहं न सुरेश्वरि । समाहूताऽस्मि रुद्रेण किं वा स्वच्छन्दतः शुभे

adhunā tava vākyena jāne'haṁ na sureśvari | samāhūtā'smi rudreṇa kiṁ vā svacchandataḥ śubhe

"हे सुरेश्वरि! अब आपके ही वचन से मैं नहीं जानती - क्या मुझे रुद्र ने बुलाया, या हे शुभे! मैं स्वयं ही स्वेच्छा से आयी?"

श्लोक 31 (skanda.7.422.31)

त्रैलोक्यस्य प्रभुरयं तन्निष्क्रम्य कथञ्चन । तस्मादत्रैव संप्राप्ता सत्यमेतन्मयोदितम्

trailokyasya prabhurayaṁ tanniṣkramya kathañcana | tasmādatraiva saṁprāptā satyametanmayoditam

"वे तीनों लोकों के स्वामी हैं, वे कहीं से भी किसी प्रकार निकलकर आ सकते हैं - इसीलिए मैं यहाँ आ पहुँची। यह मैंने सत्य कहा है।"

श्लोक 32 (skanda.7.422.32)

॥ पुलस्त्य उवाच ॥ तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा ततो देवी प्रहर्षिता । प्रोवाच मधुरं वाक्यं सत्यमेतत्त्वयोदितम्

pulastya uvāca | tasyāstadvacanaṁ śrutvā tato devī praharṣitā | provāca madhuraṁ vākyaṁ satyametattvayoditam

पुलस्त्य ने कहा - उसके यह वचन सुनकर देवी प्रसन्न हो गयीं और मधुर वचन बोलीं - "तुमने जो कहा, यह सत्य है।"

श्लोक 33 (skanda.7.422.33)

तस्माद्वरय भद्रं ते वरं मत्तो यथेप्सितम् । मुक्त्वैकं पतिधर्म्मत्वे मम कांतं महेश्वरम्

tasmādvaraya bhadraṁ te varaṁ matto yathepsitam | muktvaikaṁ patidharmmatve mama kāntaṁ maheśvaram

"अतः तुम जैसा चाहो, मुझसे वैसा वर माँगो - केवल पतिधर्म में मेरे प्रियतम महेश्वर को छोड़कर।"

श्लोक 34 (skanda.7.422.34)

॥ गंगोवाच ॥ अपि दौर्भाग्ययुक्ताऽहं भार्या जाताऽस्मि शूलिनः । तस्मादेकं दिनं देहि क्रीडनार्थमनेन तु

gaṅgovāca | api daurbhāgyayuktā'haṁ bhāryā jātā'smi śūlinaḥ | tasmādekaṁ dinaṁ dehi krīḍanārthamanena tu

गंगा ने कहा - "यद्यपि मैं दुर्भाग्यशालिनी हूँ, फिर भी मैं शूलधारी की भार्या बन चुकी हूँ। अतः उनके साथ क्रीड़ा के लिए मुझे एक दिन प्रदान कीजिये।"

श्लोक 35 (skanda.7.422.35)

चैत्रशुक्लत्रयोदश्यामहोरात्रं सुरेश्वरि । शिवकुंडं तथास्त्वेतन्मया यस्मात्समावृतम्

caitraśukalatrayodaśyāmahorātraṁ sureśvari | śivakuṇḍaṁ tathāstvetanmayā yasmātsamāvṛtam

"हे सुरेश्वरि! चैत्र शुक्ल त्रयोदशी को एक अहोरात्र के लिए। और चूँकि यह कुण्ड मुझसे भर गया है, अतः यह इस प्रकार हो -"

श्लोक 36 (skanda.7.422.36)

शिवगंगाभिधानं च तस्मात्कुण्डं धरातले । ख्यातिं यातु प्रसादेन तव पर्वतनंदिनि

śivagaṅgābhidhānaṁ ca tasmātkuṇḍaṁ dharātale | khyātiṁ yātu prasādena tava parvatanandini

"- हे पर्वतनन्दिनि! तुम्हारी कृपा से यह कुण्ड पृथ्वी पर 'शिवगंगा' नाम से प्रसिद्धि को प्राप्त हो।"

श्लोक 37 (skanda.7.422.37)

॥ पुलस्त्य उवाच ॥ एवमस्त्विति सा देवी प्रोच्य गंगां महानदीम् । ततो विसर्जयामास तामालिंग्य मुहुर्मुहुः

pulastya uvāca | evamastviti sā devī procya gaṅgāṁ mahānadīm | tato visarjayāmāsa tāmāliṅgya muhurmuhuḥ

पुलस्त्य ने कहा - "ऐसा ही हो" कहकर देवी ने महानदी गंगा से यह कहा; तत्पश्चात् बार-बार आलिंगन करके उन्हें विदा किया।

श्लोक 38 (skanda.7.422.38)

गतायामथ गंगायामधोवक्त्रं सुलज्जितम् । पाणौ गृह्य ययौ रुद्रं भ्रममाणा गृहं प्रति

gatāyāmatha gaṅgāyāmadhovaktraṁ sulajjitam | pāṇau gṛhya yayau rudraṁ bhramamāṇā gṛhaṁ prati

गंगा के चले जाने पर, अत्यन्त लज्जित होकर, नीचा मुख किये हुए, वे रुद्र का हाथ पकड़कर भ्रमण करती हुई घर की ओर चल पड़ीं।

श्लोक 39 (skanda.7.422.39)

एवमेतत्पुरावृत्तं तस्मिन्कुण्डे नराधिप । तस्मात्सर्वप्रयत्नेन चतुर्द्दश्यां समाहितः

evametatpurāvṛttaṁ tasminkuṇḍe narādhipa | tasmātsarvaprayatnena caturddaśyāṁ samāhitaḥ

हे नराधिप! इस प्रकार यह घटना उस कुण्ड में पूर्वकाल में घटित हुई थी। इसलिए सम्पूर्ण प्रयत्न से एकाग्रचित्त होकर चतुर्दशी को -

श्लोक 40 (skanda.7.422.40)

शुक्लायां चैत्रमासे तु स्नानं तत्र समाचरेत् । सांनिध्याद्देवदेवस्य गंगायाश्च नृपोत्तम

śuklāyāṁ caitramāse tu snānaṁ tatra samācaret | sānnidhyāddevadevasya gaṅgāyāśca nṛpottama

- चैत्र मास के शुक्ल पक्ष में वहाँ स्नान करना चाहिए। हे नृपोत्तम! वहाँ देवदेव और गंगा की सन्निधि है।

श्लोक 41 (skanda.7.422.41)

यत्र संक्षयमायाति सर्वं तत्राशुभं कृतम् । तत्र यो वृषभं दद्याद्ब्राह्मणाय नृपोत्तम । तद्रोमसंख्ययास्वर्गे स पुमान्वसति ध्रुवम्

yatra saṁkṣayamāyāti sarvaṁ tatrāśubhaṁ kṛtam | tatra yo vṛṣabhaṁ dadyādbrāhmaṇāya nṛpottama | tadromasaṁkhyayāsvarge sa pumānvasati dhruvam

वहाँ जो भी अशुभ कर्म किया गया हो, वह पूर्णतः नष्ट हो जाता है। हे नृपोत्तम! जो वहाँ ब्राह्मण को वृषभ (बैल) दान करता है, वह निश्चय ही उस बैल के रोमों की संख्या के बराबर वर्षों तक स्वर्ग में निवास करता है।

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