प्रभास खण्ड · अध्याय 423
शिवलिंग महेश्वर माहात्म्य एवं सक्तुदान माहात्म्य वर्णन
श्लोक 1 (skanda.7.423.1)
॥ ययातिरुवाच ॥ यत्त्वया कीर्तितं ब्रह्मन्पूर्वं देवैः प्रसादितः । लिंगं संस्थापयामास स्थिररूपो महेश्वरः
yayātiruvāca | yattvayā kīrtitaṁ brahmanpūrvaṁ devaiḥ prasāditaḥ | liṅgaṁ saṁsthāpayāmāsa sthirarūpo maheśvaraḥ
ययाति ने कहा - हे ब्रह्मन्! आपने पहले जो कहा था कि देवताओं द्वारा प्रसन्न किये गये महेश्वर ने स्थिर रूप से लिंग की स्थापना की -
श्लोक 2 (skanda.7.423.2)
कस्मात्तत्पातितं लिंगं वालखिल्यैर्महात्मभिः । कस्मात्तत्राचलो जातो देवदेवो महेश्वरः
kasmāttatpātitaṁ liṅgaṁ vālakhilyairmahātmabhiḥ | kasmāttatrācalo jāto devadevo maheśvaraḥ
- वह लिंग महात्मा वालखिल्यों द्वारा क्यों गिराया गया? और देवदेव महेश्वर वहाँ अचल क्यों हुए?
श्लोक 3 (skanda.7.423.3)
एतन्मे कौतुकं सर्वं यथावद्वक्तुमर्हसि । तस्मिन्दृष्टे च किं पुण्यं नराणां तत्र जायते
etanme kautukaṁ sarvaṁ yathāvadvaktumarhasi | tasmindṛṣṭe ca kiṁ puṇyaṁ narāṇāṁ tatra jāyate
यह सब मेरा कौतूहल है; आप इसे यथावत् बताने योग्य हैं। और उसके दर्शन से वहाँ मनुष्यों को क्या पुण्य प्राप्त होता है?
श्लोक 4 (skanda.7.423.4)
॥ पुलस्त्य उवाच ॥ महेश्वरस्य माहात्म्यं शृणु पार्थिवसत्तम । अत्र ते कीर्तयिष्यामि पूर्ववृत्तं कथांतरम्
pulastya uvāca | maheśvarasya māhātmyaṁ śṛṇu pārthivasattama | atra te kīrtayiṣyāmi pūrvavṛttaṁ kathāntaram
पुलस्त्य ने कहा - हे पार्थिवसत्तम! महेश्वर का माहात्म्य सुनो। यहाँ मैं तुम्हें पूर्व में घटित एक कथा सुनाऊँगा।
श्लोक 5 (skanda.7.423.5)
यदा पञ्चत्वमापन्ना सती सत्यपराक्रमा । अपमानेन दक्षस्य यज्ञे न च निमंत्रिता
yadā pañcatvamāpannā satī satyaparākramā | apamānena dakṣasya yajñe na ca nimantritā
जब सत्यपराक्रमशालिनी सती, दक्ष के अपमान से, यज्ञ में आमंत्रित न किये जाने पर, मृत्यु को प्राप्त हुईं -
श्लोक 6 (skanda.7.423.6)
तदा कामो द्रुतं गृह्य पुष्पचापं तमभ्यगात् । कन्दर्प्पं सहसा दृष्ट्वा सन्धितेषुं सुदुर्जयम्
tadā kāmo drutaṁ gṛhya puṣpacāpaṁ tamabhyagāt | kandarppaṁ sahasā dṛṣṭvā sandhiteṣuṁ sudurjayam
- तब काम शीघ्र ही पुष्पधनुष लेकर उनके पास गया। सहसा बाण चढ़ाये हुए अत्यन्त दुर्जय कन्दर्प को देखकर -
श्लोक 7 (skanda.7.423.7)
आपतन्तं भयात्तस्य प्रणष्टस्त्रिपुरांतकः । स तदा भ्रममाणश्च इतश्चेतश्च पार्थिव
āpatantaṁ bhayāttasya praṇaṣṭastripurāntakaḥ | sa tadā bhramamāṇaśca itaścetaśca pārthiva
- उसे आक्रमण करते देखकर भय से त्रिपुरान्तक भाग खड़े हुए। हे राजन्! तब वे इधर-उधर भटकते हुए -
श्लोक 8 (skanda.7.423.8)
वालखिल्याश्रमं प्राप्तः पुण्यं सद्वृक्षशोभितम् । स तत्र भगवांस्तेषां दारैर्दृष्टः सुरूपवान्
vālakhilyāśramaṁ prāptaḥ puṇyaṁ sadvṛkṣaśobhitam | sa tatra bhagavāṁsteṣāṁ dāraidṛṣṭaḥ surūpavān
- अच्छे वृक्षों से सुशोभित पुण्य वालखिल्याश्रम में पहुँचे। वहाँ उन भगवान् सुरूपवान् को उन ऋषियों की पत्नियों ने देखा।
श्लोक 9 (skanda.7.423.9)
दिग्वासाः सुप्रियालापस्ततस्ताः काममोहिताः । त्यक्त्वा पुत्रगृहाद्यं च सर्वास्तत्पृष्ठसंस्थिताः । बभूवुश्चानिशं राजन्मां भजस्वेति चाब्रुवन्
digvāsāḥ supriyālāpastatastāḥ kāmamohitāḥ | tyaktvā putragṛhādyaṁ ca sarvāstatpṛṣṭhasaṁsthitāḥ | babhūvuścāniśaṁ rājanmāṁ bhajasveti cābruvan
वे दिगम्बर, अत्यन्त प्रिय वाणी वाले थे; तब कामविमोहित होकर उन सभी स्त्रियों ने पुत्र, घर आदि सब कुछ छोड़कर उनके पीछे-पीछे चलना आरम्भ कर दिया, और हे राजन्! वे निरन्तर कहने लगीं - "मुझसे रमण करो।"
श्लोक 10 (skanda.7.423.10)
चक्रुरालिंगनं काश्चिच्चुम्बनं च तथापराः । अन्यास्तस्य हि लिंगं तत्स्पृशंति च मुहुर्मुहुः
cakrurāliṅganaṁ kāściccumbanaṁ ca tathāparāḥ | anyāstasya hi liṅgaṁ tatspṛśanti ca muhurmuhuḥ
कुछ ने उनका आलिंगन किया, कुछ ने चुम्बन किया; और अन्य उनके लिंग को बार-बार स्पर्श करने लगीं।
श्लोक 11 (skanda.7.423.11)
स चापि भगवाञ्छम्भुर्निष्कामः परमेश्वरः । जगद्व्याप्तिं समाश्रित्य सर्वप्राणिषु वर्तते
sa cāpi bhagavāñchambhurniṣkāmaḥ parameśvaraḥ | jagadvyāptiṁ samāśritya sarvaprāṇiṣu vartate
और वे भगवान् शम्भु भी, निष्काम, परमेश्वर, जगत् की व्याप्ति का आश्रय लेकर सम्पूर्ण प्राणियों में विद्यमान रहते हैं।
श्लोक 12 (skanda.7.423.12)
स चापि भगवाच्छंभुस्तासां सरति प्राङ्मुखः । भ्रांतस्तत्राश्रमे तेषां दारान्कामेन पीडयन्
sa cāpi bhagavācchambhustāsāṁ sarati prāṅmukhaḥ | bhrāntastatrāśrame teṣāṁ dārānkāmena pīḍayan
और वे भगवान् शम्भु भी उनके आगे-आगे चलने लगे; वहाँ आश्रम में भ्रमण करते हुए, वे मानो उनकी पत्नियों को काम से पीड़ित करने लगे।
श्लोक 13 (skanda.7.423.13)
अथ ते मुनयो दृष्ट्वा विकृतिं दारसंभवाम् । अजानन्तो महादेवं रुष्टास्तस्य महात्मनः
atha te munayo dṛṣṭvā vikṛtiṁ dārasaṁbhavām | ajānanto mahādevaṁ ruṣṭāstasya mahātmanaḥ
तब उन मुनियों ने अपनी पत्नियों में उत्पन्न विकार को देखकर, उस महात्मा को महादेव न पहचानते हुए, उन पर क्रुद्ध हो गये।
श्लोक 14 (skanda.7.423.14)
ददुः शापं सुसंतप्ताः कलत्रार्थे परंतप । पततां पततां लिङ्गमेतत्ते पापकृत्तम
daduḥ śāpaṁ susaṁtaptāḥ kalatrārthe parantapa | patatāṁ patatāṁ liṅgametatte pāpakṛttama
हे परन्तप! पत्नी के कारण अत्यन्त संतप्त होकर उन्होंने शाप दिया - "हे पापकृत्तम! तुम्हारा यह लिंग गिरता ही रहे, गिरता ही रहे!"
श्लोक 15 (skanda.7.423.15)
विडम्बयसि नो दारानजस्रं चास्य दर्शनात् । ततश्चैवापतल्लिंगं तत्क्षणात्तत्पुरद्विषः
viḍambayasi no dārānajasraṁ cāsya darśanāt | tataścaivāpatalliṅgaṁ tatkṣaṇāttatpuradviṣaḥ
"इसके दर्शन मात्र से तुम निरन्तर हमारी पत्नियों को विचलित करते हो।" और उसी क्षण उस त्रिपुरारि का लिंग गिर पड़ा।
श्लोक 16 (skanda.7.423.16)
ब्रह्मवाक्येन राजर्षे चकम्पे वसुधा ततः । शीर्णानि गिरिशृंगाणि चुक्षुभुर्मकरालयाः
brahmavākyena rājarṣe cakampe vasudhā tataḥ | śīrṇāni giriśṛṅgāṇi cukṣubhurmakarālayāḥ
हे राजर्षे! उस ब्राह्मण-शाप से पृथ्वी काँप उठी; पर्वत-शिखर टूट गये और समुद्र क्षुब्ध हो गये।
श्लोक 17 (skanda.7.423.17)
ततो देवगणाः सर्वे भयत्रस्ता नराधिप । अकाले प्रलयं मत्वा त्रैलोक्ये पर्यवस्थितम्
tato devagaṇāḥ sarve bhayatrastā narādhipa | akāle pralayaṁ matvā trailokye paryavasthitam
तब हे नराधिप! सभी देवगण भयभीत होकर, त्रैलोक्य में अकाल प्रलय आ गया - ऐसा मानकर -
श्लोक 18 (skanda.7.423.18)
तत पितामहं जग्मु स्तस्मै सर्वं न्यवेदयन् । प्रलयस्येव चिह्नानि दृश्यन्ते परमेश्वर
tata pitāmahaṁ jagmu stasmai sarvaṁ nyavedayan | pralayasyeva cihnāni dṛśyante parameśvara
- पितामह ब्रह्मा के पास गये और उन्हें सब कुछ बता दिया - "हे परमेश्वर! प्रलय के ही चिह्न दिखायी दे रहे हैं!"
श्लोक 19 (skanda.7.423.19)
किं निमित्तं सुरश्रेष्ठ न जानीमो वयं प्रभो । तेषां तद्वचनं श्रुत्वा चिरं ध्यात्वा पितामहः
kiṁ nimittaṁ suraśreṣṭha na jānīmo vayaṁ prabho | teṣāṁ tadvacanaṁ śrutvā ciraṁ dhyātvā pitāmahaḥ
"हे सुरश्रेष्ठ! किस कारण से हुआ, यह हम नहीं जानते, हे प्रभो!" उनके इस वचन को सुनकर पितामह ने बहुत देर तक ध्यान किया -
श्लोक 20 (skanda.7.423.20)
अब्रवीत्पातितं लिंगं वालखिल्यैः पिनाकिनः । तेनैते दारुणोत्पाताः संजाता भयसूचकाः
abravītpātitaṁ liṅgaṁ vālakhilyaiḥ pinākinaḥ | tenaite dāruṇotpātāḥ saṁjātā bhayasūcakāḥ
- फिर कहा - "पिनाकी (शिव) का लिंग वालखिल्यों द्वारा गिरा दिया गया है; उसी के कारण ये भयंकर, भयसूचक अपशकुन उत्पन्न हुए हैं।"
श्लोक 21 (skanda.7.423.21)
तस्मान्मया समायुक्ताः सर्वे तत्र दिवौकसः । व्रजंतु येन तल्लिंगं स्थाने संस्थापयेच्छिवः
tasmānmayā samāyuktāḥ sarve tatra divaukasaḥ | vrajantu yena talliṅgaṁ sthāne saṁsthāpayecchivaḥ
"अतः मेरे साथ मिलकर तुम सब देवता वहाँ जाओ, जिससे शिव उस लिंग को पुनः उसके स्थान पर स्थापित कर सकें।"
श्लोक 22 (skanda.7.423.22)
यावन्नो जायते लोके प्रलयोऽकालसंभवः । एवं संमंत्र्य ते सर्वे ततोऽर्बुदमुपाययुः
yāvanno jāyate loke pralayo'kālasaṁbhavaḥ | evaṁ saṁmantrya te sarve tato'rbudamupāyayuḥ
"- जिससे लोक में अकाल प्रलय न हो।" इस प्रकार परामर्श करके वे सभी तब अर्बुद पर्वत को गये।
श्लोक 23 (skanda.7.423.23)
वालखिल्याश्रमे यत्र तल्लिंगं निपपात ह । तुष्टुवुर्विविधैः सूक्तैर्वेदोक्तैर्विनयान्विताः
vālakhilyāśrame yatra talliṅgaṁ nipapāta ha | tuṣṭuvurvividhaiḥ sūktairvedoktairvinayānvitāḥ
वालखिल्याश्रम में, जहाँ वह लिंग गिरा था, वहाँ उन्होंने विनयपूर्वक विविध वेदोक्त सूक्तों से स्तुति की।
श्लोक 24 (skanda.7.423.24)
॥ देवा ऊचुः ॥ नमस्ते देवदेवेश भक्तानां चाभयंकर । नमस्ते सर्ववासाय सर्वयज्ञमयाय च
devā ūcuḥ | namaste devadeveśa bhaktānāṁ cābhayaṁkara | namaste sarvavāsāya sarvayajñamayāya ca
देवताओं ने कहा - हे देवदेवेश! हे भक्तों को अभय देने वाले! तुम्हें नमस्कार है। हे सर्ववास! हे सर्वयज्ञमय! तुम्हें नमस्कार है।
श्लोक 25 (skanda.7.423.25)
सर्वेश्वराय देवाय परमज्योतिषे नमः । नमः स्फुटतरज्ञानगम्याय वेधसे
sarveśvarāya devāya paramajyotiṣe namaḥ | namaḥ sphuṭatarajñānagamyāya vedhase
सर्वेश्वर देव, परम ज्योति को नमस्कार है! अत्यन्त स्पष्ट ज्ञान से जानने योग्य विधाता को नमस्कार है!
श्लोक 26 (skanda.7.423.26)
त्र्यंबकाय च भीमाय पिनाकवरपाणये । त्वयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव
tryambakāya ca bhīmāya pinākavarapāṇaye | tvayi sarvamidaṁ protaṁ sūtre maṇigaṇā iva
त्रिनेत्रधारी, भीमकाय, श्रेष्ठ पिनाकधारी को नमस्कार है। तुम में ही यह सम्पूर्ण जगत् इस प्रकार पिरोया हुआ है, जैसे सूत्र में मणियों की माला।
श्लोक 27 (skanda.7.423.27)
संसारे विबुधश्रेष्ठ जगत्स्थावरजंगमम् । न तदस्ति त्रिलोकेऽस्मिन्सुसूक्ष्ममपि शंकर । यत्त्वया न प्रभो व्याप्तं सृष्टिसंहारकारणात्
saṁsāre vibudhaśreṣṭha jagatsthāvarajaṅgamam | na tadasti triloke'sminsusūkṣmamapi śaṅkara | yattvayā na prabho vyāptaṁ sṛṣṭisaṁhārakāraṇāt
हे विबुधश्रेष्ठ! इस स्थावर-जंगम संसार में, हे शंकर! हे प्रभो! इन तीनों लोकों में ऐसी कोई अत्यन्त सूक्ष्म वस्तु भी नहीं है, जो सृष्टि-संहार के कारणभूत तुमसे व्याप्त न हो।
श्लोक 28 (skanda.7.423.28)
पृथिव्यादीनि भूतानि त्वया सृष्टानि कामतः । यास्यंति तानि भूयोऽपि तव काये जगत्पते
pṛthivyādīni bhūtāni tvayā sṛṣṭāni kāmataḥ | yāsyanti tāni bhūyo'pi tava kāye jagatpate
हे जगत्पते! पृथ्वी आदि जो भूत तुमने इच्छानुसार उत्पन्न किये हैं, वे पुनः तुम्हारे ही शरीर में लीन हो जाएँगे।
श्लोक 29 (skanda.7.423.29)
प्रसीद भगवंस्तस्माल्लिंगमेतत्सुरेश्वर । स्थाने स्थापय भद्रं ते यावन्न स्यात्प्रजाक्षयः
prasīda bhagavaṁstasmālliṅgametatsureśvara | sthāne sthāpaya bhadraṁ te yāvanna syātprajākṣayaḥ
अतः हे भगवन्! प्रसन्न होइये। हे सुरेश्वर! इस लिंग को उसके स्थान पर स्थापित कीजिये, आपका कल्याण हो, जिससे प्रजाओं का विनाश न हो।
श्लोक 30 (skanda.7.423.30)
॥ श्रीभगवानुवाच ॥ निर्विकारस्य मल्लिंगं वालखिल्यैः प्रपातितम् । कथं भूयः प्रगृह्णामि यावच्छुद्धिर्न जायते
śrībhagavānuvāca | nirvikārasya malliṅgaṁ vālakhilyaiḥ prapātitam | kathaṁ bhūyaḥ pragṛhṇāmi yāvacchuddhirna jāyate
श्री भगवान् ने कहा - "यद्यपि मैं निर्विकार हूँ, तथापि मेरा लिंग वालखिल्यों द्वारा गिरा दिया गया। जब तक शुद्धि नहीं होगी, तब तक मैं उसे पुनः कैसे ग्रहण करूँ?"
श्लोक 31 (skanda.7.423.31)
शक्तोऽहं वालखिल्यानां निग्रहं कर्त्तुमञ्जसा । किन्तु मे ब्राह्मणा मान्याः पूज्याश्च सुरसत्तमाः
śakto'haṁ vālakhilyānāṁ nigrahaṁ karttumañjasā | kintu me brāhmaṇā mānyāḥ pūjyāśca surasattamāḥ
"मैं वालखिल्यों का सहज ही निग्रह करने में समर्थ हूँ, परन्तु हे सुरसत्तमो! ब्राह्मण मेरे लिए माननीय और पूज्य हैं।"
श्लोक 32 (skanda.7.423.32)
अचलं लिंगमेतद्धि नोद्धर्त्तुं शक्यते विभो । एक एवात्र निर्दिष्ट उपायो नापरः स्मृतः
acalaṁ liṅgametaddhi noddharttuṁ śakyate vibho | eka evātra nirdiṣṭa upāyo nāparaḥ smṛtaḥ
"हे विभो! यह लिंग अब अचल हो गया है, इसे उठाया नहीं जा सकता। यहाँ एक ही उपाय बताया गया है, दूसरा कोई स्मृत नहीं है।"
श्लोक 33 (skanda.7.423.33)
यदि मे त्वं पुरा लिंगं पूजयेथाः पितामह । ततो देवगणाः सर्वे ततो विप्रास्ततोऽपरे
yadi me tvaṁ purā liṅgaṁ pūjayethāḥ pitāmaha | tato devagaṇāḥ sarve tato viprāstato'pare
"हे पितामह! यदि तुम पहले मेरे लिंग की पूजा करो, फिर सभी देवगण, फिर ब्राह्मण, फिर अन्य लोग -"
श्लोक 34 (skanda.7.423.34)
ततो नौ शांतिमागच्छेज्जगत्स्थावरजंगमम्
tato nau śāntimāgacchejjagatsthāvarajaṅgamam
"- तो हम दोनों के लिए तथा स्थावर-जंगम जगत् के लिए शान्ति आ जाएगी।"
श्लोक 35 (skanda.7.423.35)
॥ पुलस्त्य उवाच ॥ एवमुक्तः स भगवाञ्छंकरेण नृपोत्तम । ततस्तं पूजयामास ब्रह्मा पूर्वं सुभक्तितः
pulastya uvāca | evamuktaḥ sa bhagavāñchaṅkareṇa nṛpottama | tatastaṁ pūjayāmāsa brahmā pūrvaṁ subhaktitaḥ
पुलस्त्य ने कहा - हे नृपोत्तम! शंकर द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर, ब्रह्मा ने पहले उसकी अत्यन्त भक्तिपूर्वक पूजा की।
श्लोक 36 (skanda.7.423.36)
ब्रह्मणोऽनन्तरं विष्णुस्ततः शक्र स्ततोऽपरे । वालखिल्यादयो विप्रा मन्त्रैश्च शतरुद्रियैः
brahmaṇo'nantaraṁ viṣṇustataḥ śakra stato'pare | vālakhilyādayo viprā mantraiśca śatarudriyaiḥ
ब्रह्मा के बाद विष्णु, फिर इन्द्र, फिर अन्य देवता; तथा वालखिल्य आदि ब्राह्मणों ने शतरुद्रिय मन्त्रों से पूजा की।
श्लोक 37 (skanda.7.423.37)
ततस्ते दारुणोत्पाता उपशांताश्च तत्क्षणात् । अभवत्सुमुखो लोको वृत्तो गन्धवहो मृदुः
tataste dāruṇotpātā upaśāntāśca tatkṣaṇāt | abhavatsumukho loko vṛtto gandhavaho mṛduḥ
तब वे भयंकर अपशकुन तत्काल शान्त हो गये; लोक प्रसन्नमुख हो गया, तथा वायु मन्द-मन्द बहने लगी।
श्लोक 38 (skanda.7.423.38)
अथोवाच महादेवः सर्वांस्तांस्त्रिदशालयान् । वृणुध्वं सुवरं सर्वे मत्तो यन्मनसीप्सितम्
athovāca mahādevaḥ sarvāṁstāṁstridaśālayān | vṛṇudhvaṁ suvaraṁ sarve matto yanmanasīpsitam
तब महादेव ने उन सभी देवताओं से कहा - "तुम सब मुझसे उत्तम वर माँगो, जो भी तुम्हारे मन में अभीष्ट हो।"
श्लोक 39 (skanda.7.423.39)
॥ देवा ऊचुः ॥ तव लिंगस्य संस्पर्शादपि पापकृतो नराः । स्वर्गं यास्यंति देवेश नाशं यास्यति किल्बिषम् । व्रतदानानि सर्वाणि तीर्थयात्रायुतानि च
devā ūcuḥ | tava liṅgasya saṁsparśādapi pāpakṛto narāḥ | svargaṁ yāsyanti deveśa nāśaṁ yāsyati kilbiṣam | vratadānāni sarvāṇi tīrthayātrāyutāni ca
देवताओं ने कहा - "हे देवेश! आपके लिंग के स्पर्श मात्र से ही पापी मनुष्य भी स्वर्ग जाएँगे, उनका पाप नष्ट हो जाएगा - यह सभी व्रत-दानों और सहस्रों तीर्थयात्राओं के तुल्य फल देने वाला होगा।"
श्लोक 40 (skanda.7.423.40)
तस्माद्वज्रेण देवेन्द्रस्तवैतल्लिंगमुत्तमम् । छादयिष्यति सर्वत्र यदि त्वं मन्यसे प्रभो
tasmādvajreṇa devendrastavaitalliṅgamuttamam | chādayiṣyati sarvatra yadi tvaṁ manyase prabho
"अतः हे प्रभो! यदि आप स्वीकृति दें, तो देवराज इन्द्र वज्र से आपके इस उत्तम लिंग को सर्वत्र से आच्छादित कर देंगे।"
श्लोक 41 (skanda.7.423.41)
॥ श्रीभगवानुवाच ॥ अभिप्रायो ममाप्येष वर्तते हृदि पद्मज । एवं करोतु देवेन्द्रः सर्वधर्मविवृद्धये
śrībhagavānuvāca | abhiprāyo mamāpyeṣa vartate hṛdi padmaja | evaṁ karotu devendraḥ sarvadharmavivṛddhaye
श्री भगवान् ने कहा - "हे पद्मज! यही अभिप्राय मेरे हृदय में भी है। सम्पूर्ण धर्म की वृद्धि के लिए देवेन्द्र ऐसा ही करें।"
श्लोक 42 (skanda.7.423.42)
॥ पुलस्त्य उवाच ॥ ततः संछादयामास वज्रेण त्रिदशाधिपः । तल्लिंगं सर्वमर्त्यानां यथाऽदृश्यं व्यजायत
pulastya uvāca | tataḥ saṁchādayāmāsa vajreṇa tridaśādhipaḥ | talliṅgaṁ sarvamartyānāṁ yathā'dṛśyaṁ vyajāyata
पुलस्त्य ने कहा - तब त्रिदशाधिपति इन्द्र ने वज्र से उस लिंग को आच्छादित कर दिया, जिससे वह सभी मनुष्यों के लिए अदृश्य हो गया।
श्लोक 43 (skanda.7.423.43)
अद्यापि वज्रसंस्पर्शात्तत्सान्निध्यं गतो नरः । आजन्ममरणात्पापान्मुच्यते नात्र संशयः
adyāpi vajrasaṁsparśāttatsānnidhyaṁ gato naraḥ | ājanmamaraṇātpāpānmucyate nātra saṁśayaḥ
आज भी उस वज्र के स्पर्श से, उसकी सन्निधि में पहुँचा हुआ मनुष्य जन्म से लेकर मृत्युपर्यन्त के पापों से मुक्त हो जाता है - इसमें कोई सन्देह नहीं।
श्लोक 44 (skanda.7.423.44)
माहात्म्यं कीर्तितं यस्मात्तल्लिंगे शंकरेण तु । वस्त्रेणाच्छादितं चैव शक्रेणैव धरातले
māhātmyaṁ kīrtitaṁ yasmāttalliṅge śaṅkareṇa tu | vastreṇācchāditaṁ caiva śakreṇaiva dharātale
चूँकि उस लिंग के विषय में शंकर द्वारा यह माहात्म्य कहा गया, और स्वयं इन्द्र द्वारा पृथ्वी पर उसे वस्त्र के समान आच्छादित कर दिया गया -
श्लोक 45 (skanda.7.423.45)
ततःप्रभृति लिंगस्य मर्त्त्ये पूजा व्यजायत । पुरासीच्छंकरः पूज्यो यथान्ये त्रिदशालयाः
tataḥprabhṛti liṅgasya marttye pūjā vyajāyata | purāsīcchaṅkaraḥ pūjyo yathānye tridaśālayāḥ
- तभी से मर्त्यलोक में लिंग की पूजा प्रचलित हुई। पहले शंकर भी अन्य देवताओं के समान ही पूजित थे।
श्लोक 46 (skanda.7.423.46)
एवमेतत्पुरावृत्तमर्बुदे पर्वतोत्तमे । लिंगस्य पतनात्पूजां यन्मां त्वं परि पृच्छसि
evametatpurāvṛttamarbude parvatottame | liṅgasya patanātpūjāṁ yanmāṁ tvaṁ pari pṛcchasi
इस प्रकार यह घटना पूर्वकाल में उस श्रेष्ठ पर्वत अर्बुद पर घटित हुई, जिसके विषय में तुम मुझसे लिंग-पतन से उत्पन्न पूजा के बारे में पूछ रहे थे।
श्लोक 47 (skanda.7.423.47)
फाल्गुनान्तचतुर्द्दश्यां नैवेद्यं नूतनैर्यवैः । यो ददात्यचलेशाय स भूयो नेह जायते
phālgunāntacaturddaśyāṁ naivedyaṁ nūtanairyavaiḥ | yo dadātyacaleśāya sa bhūyo neha jāyate
जो व्यक्ति फाल्गुन मास की अन्तिम चतुर्दशी को अचलेश्वर को नये जौ का नैवेद्य अर्पित करता है, वह पुनः इस लोक में जन्म नहीं लेता।
श्लोक 48 (skanda.7.423.48)
ब्राह्मणान्भोजयेद्यस्तु भक्त्या तस्मिन्नवैर्यवैः । यवसंख्याप्रमाणानि युगानि दिवि मोदते
brāhmaṇānbhojayedyastu bhaktyā tasminnavairyavaiḥ | yavasaṁkhyāpramāṇāni yugāni divi modate
जो वहाँ नये जौ से भक्तिपूर्वक ब्राह्मणों को भोजन कराता है, वह जौ के दानों की संख्या के बराबर युगों तक स्वर्ग में आनन्दित रहता है।
श्लोक 49 (skanda.7.423.49)
तत्र दानं प्रशंसन्ति सक्तूनां मुनिसत्तमाः । नूतनानां महाराज यतः प्रोक्तं पुरारिणा
tatra dānaṁ praśaṁsanti saktūnāṁ munisattamāḥ | nūtanānāṁ mahārāja yataḥ proktaṁ purāriṇā
हे महाराज! वहाँ मुनिश्रेष्ठ नये सत्तू के दान की प्रशंसा करते हैं, क्योंकि यह त्रिपुरारि द्वारा कहा गया है।
श्लोक 50 (skanda.7.423.50)
किं दानैर्विविधैर्दत्तैः किं यज्ञैश्च सुविस्तरैः । किं तीर्थैर्विविधैहोमैस्तपोभिः किं च कष्टदैः
kiṁ dānairvividhairdattaiḥ kiṁ yajñaiśca suvistaraiḥ | kiṁ tīrthairvividhairhomaistapobhiḥ kiṁ ca kaṣṭadaiḥ
विविध प्रकार के दिये गये दानों से क्या लाभ? विस्तृत यज्ञों से क्या लाभ? विविध तीर्थों, होमों तथा कष्टदायक तपस्याओं से क्या लाभ?
श्लोक 51 (skanda.7.423.51)
फाल्गुनान्तचतुर्द्दश्यां सुमहेश्वरसन्निधौ । धर्माण्येतानि सर्वाणि कलां नार्हंति षोडशीम्
phālgunāntacaturddaśyāṁ sumaheśvarasannidhau | dharmāṇyetāni sarvāṇi kalāṁ nārhanti ṣoḍaśīm
फाल्गुन की अन्तिम चतुर्दशी को, महेश्वर की सन्निधि में किये गये सत्तू-दान की तुलना में ये सभी धर्म-कार्य उसकी सोलहवीं कला के भी बराबर नहीं होते।
श्लोक 52 (skanda.7.423.52)
शृणु राजन्पुरा वृत्तं तत्राश्चर्यं यदुत्तमम् । कश्चित्पापसमाचारः कुष्ठी क्षामतनुर्नरः
śṛṇu rājanpurā vṛttaṁ tatrāścaryaṁ yaduttamam | kaścitpāpasamācāraḥ kuṣṭhī kṣāmatanurnaraḥ
हे राजन्! सुनो, वहाँ पूर्वकाल में जो उत्तम आश्चर्य हुआ था। एक पापाचारी, कोढ़ी, कृशकाय मनुष्य था -
श्लोक 53 (skanda.7.423.53)
भिक्षार्थमागतस्तत्र लोकैरन्यैः समन्वितः । तेन भिक्षार्जितं तत्र सक्तूनां कुडवं नृप
bhikṣārthamāgatastatra lokairanyaiḥ samanvitaḥ | tena bhikṣārjitaṁ tatra saktūnāṁ kuḍavaṁ nṛpa
- वह अन्य लोगों के साथ वहाँ भिक्षा माँगने आया था। हे राजन्! उसने भिक्षा में एक कुडव (मापविशेष) सत्तू प्राप्त किया।
श्लोक 54 (skanda.7.423.54)
ततो रोग परिक्लेशाद्भोजनं न चकार सः । दाघार्दितो जले तस्मिन्स्नातो भक्तिविवर्जितः । सक्तून्कृत्वोपधाने तान्स च सुप्तो निशागमे
tato roga parikleśādbhojanaṁ na cakāra saḥ | dāghārdito jale tasminsnāto bhaktivivarjitaḥ | saktūnkṛtvopadhāne tānsa ca supto niśāgame
तब रोग की पीड़ा के कारण उसने भोजन नहीं किया। ज्वर से पीड़ित होकर उसने उस जल में स्नान किया, वह भक्तिरहित था; उस सत्तू को ही सिरहाना बनाकर रात होने पर वह सो गया।
श्लोक 55 (skanda.7.423.55)
ततो निद्राभिभूतस्य सारमेयो जहार च । भक्षयामास युक्तोऽन्यैः सारमेयैर्बुभुक्षितः
tato nidrābhibhūtasya sārameyo jahāra ca | bhakṣayāmāsa yukto'nyaiḥ sārameyairbubhukṣitaḥ
तब निद्रा में मग्न उसके सिरहाने से एक कुत्ता उसे चुरा ले गया, और अन्य भूखे कुत्तों के साथ मिलकर उसे खा गया।
श्लोक 56 (skanda.7.423.56)
अथासौ विस्मयाद्राजन्पंचत्वं समुपस्थितः । ततो जातिस्मरो जातो विदर्भाधिपतेर्गृहे
athāsau vismayādrājanpañcatvaṁ samupasthitaḥ | tato jātismaro jāto vidarbhādhipatergṛhe
तब हे राजन्! आश्चर्य के आघात से उसकी मृत्यु हो गयी। तत्पश्चात् वह जातिस्मर होकर विदर्भाधिपति के घर में उत्पन्न हुआ।
श्लोक 57 (skanda.7.423.57)
भीमोनाम नृपश्रेष्ठ दमयन्तीपिता हि यः । तं प्रभावं हि विज्ञाय सक्तूनां तत्र पर्वते
bhīmonāma nṛpaśreṣṭha damayantīpitā hi yaḥ | taṁ prabhāvaṁ hi vijñāya saktūnāṁ tatra parvate
हे नृपश्रेष्ठ! वह भीम नामक राजा हुआ, जो दमयन्ती का पिता था। उस पर्वत पर सत्तू के प्रभाव को जानकर -
श्लोक 58 (skanda.7.423.58)
फाल्गुनांतचतुर्दश्यां वर्षे वर्षे जगाम सः । कृत्वा चैवोपवासं तु रात्रौ जागरणं तथा
phālgunāntacaturdaśyāṁ varṣe varṣe jagāma saḥ | kṛtvā caivopavāsaṁ tu rātrau jāgaraṇaṁ tathā
- वह प्रतिवर्ष फाल्गुन की अन्तिम चतुर्दशी को वहाँ जाता, उपवास करता और रात्रि में जागरण भी करता था।
श्लोक 59 (skanda.7.423.59)
अचलेश्वरसान्निध्ये ददौ सक्तूंस्ततो बहून् । सहिरण्यान्द्विजेन्द्राणां पशुपक्षिमृगेषु च
acaleśvarasānnidhye dadau saktūṁstato bahūn | sahiraṇyāndvijendrāṇāṁ paśupakṣimṛgeṣu ca
अचलेश्वर की सन्निधि में उसने तब हिरण्य सहित बहुत सा सत्तू श्रेष्ठ ब्राह्मणों को तथा पशु-पक्षी-मृगों को भी दिया।
श्लोक 60 (skanda.7.423.60)
अथ ते मुनयः सर्वे गालवप्रमुखा नृप । पप्रच्छुः कौतुकाविष्टाः सक्तुदानकृते नृपम्
atha te munayaḥ sarve gālavapramukhā nṛpa | papracchuḥ kautukāviṣṭāḥ saktudānakṛte nṛpam
हे राजन्! तब गालव आदि सभी मुनियों ने कौतूहलवश उस राजा से सत्तू-दान के विषय में पूछा।
श्लोक 61 (skanda.7.423.61)
॥ ऋषय ऊचुः ॥ हस्त्वश्वरथदानानां शक्तिरस्ति तवाद्भुता । कस्मात्सक्तून्प्रमुक्त्वा त्वं नान्यद्दातुमिहेच्छसि
ṛṣaya ūcuḥ | hastvaśvarathadānānāṁ śaktirasti tavādbhutā | kasmātsaktūnpramuktvā tvaṁ nānyaddātumihecchasi
ऋषियों ने कहा - "आपमें हाथी, घोड़े और रथ दान करने की अद्भुत शक्ति है। फिर आप यहाँ सत्तू के अतिरिक्त और कुछ देने की इच्छा क्यों नहीं करते?"
श्लोक 62 (skanda.7.423.62)
॥ पुलस्त्य उवाच ॥ अथाऽसौ कथयामास पूर्वमेतत्समुद्भवम् । सक्तुदानस्य माहात्म्यं मुनीनां भावितात्मनाम्
pulastya uvāca | athā'sau kathayāmāsa pūrvametatsamudbhavam | saktudānasya māhātmyaṁ munīnāṁ bhāvitātmanām
पुलस्त्य ने कहा - तब उसने उन भावितात्मा मुनियों को इसका पूर्ववृत्तान्त तथा सत्तू-दान का माहात्म्य सुनाया।
श्लोक 63 (skanda.7.423.63)
पूर्वं भक्त्या विहीनस्य शुना वै सक्तवो हृताः । तत्प्रभावादियं प्राप्तिर्मम जाता द्विजोत्तमाः
pūrvaṁ bhaktyā vihīnasya śunā vai saktavo hṛtāḥ | tatprabhāvādiyaṁ prāptirmama jātā dvijottamāḥ
"हे द्विजोत्तमो! पहले, जब मैं भक्तिरहित था, तब कुत्ते ने मेरा सत्तू चुरा लिया था; उसी के प्रभाव से मुझे यह प्राप्ति हुई है।"
श्लोक 64 (skanda.7.423.64)
सांप्रतं भक्तिदत्तानां किं स्याज्जानामि नो फलम् । एतस्मात्कारणाद्दानं सक्तूनां प्रकरोम्यहम् । तीर्थेऽस्मिन्भक्तिसंयुक्तः सत्येनात्मानमालभे
sāṁprataṁ bhaktidattānāṁ kiṁ syājjānāmi no phalam | etasmātkāraṇāddānaṁ saktūnāṁ prakaromyaham | tīrthe'sminbhaktisaṁyuktaḥ satyenātmānamālabhe
"अब भक्तिपूर्वक दिये गये सत्तू का क्या फल होगा, यह मैं नहीं जानता। इसी कारण मैं सत्तू का दान करता हूँ; इस तीर्थ में भक्तियुक्त होकर मैं सत्य से अपने आपको प्रतिष्ठित करता हूँ।"
श्लोक 65 (skanda.7.423.65)
॥ पुलस्त्य उवाच ॥ ततस्ते मुनयो हृष्टाः साधुसाध्विति चाब्रुवन् । चक्रुश्चैवात्मशक्त्या ते सक्तूनां दानमुत्तमम्
pulastya uvāca | tataste munayo hṛṣṭāḥ sādhusādhviti cābruvan | cakruścaivātmaśaktyā te saktūnāṁ dānamuttamam
पुलस्त्य ने कहा - तब वे मुनि प्रसन्न होकर "साधु-साधु" कहने लगे। उन्होंने भी अपनी सामर्थ्य के अनुसार सत्तू का उत्तम दान किया।
श्लोक 66 (skanda.7.423.66)
एष प्रभावो राजर्षे सक्तुदानस्य कीर्त्तितः । महेश्वरस्य माहात्म्यं सत्यं चापि प्रकीर्त्तितम्
eṣa prabhāvo rājarṣe saktudānasya kīrttitaḥ | maheśvarasya māhātmyaṁ satyaṁ cāpi prakīrttitam
हे राजर्षे! सत्तू-दान का यह प्रभाव कीर्तित किया गया। और महेश्वर का माहात्म्य भी इस प्रकार सत्य रूप में प्रकीर्तित हुआ।
श्लोक 67 (skanda.7.423.67)
यश्चैतच्छृणुयाद्भक्त्या कथ्यमानं द्विजाननात् । अहोरात्र कृतात्पापान्मुच्यते नात्र संशयः
yaścaitacchṛṇuyādbhaktyā kathyamānaṁ dvijānanāt | ahorātra kṛtātpāpānmucyate nātra saṁśayaḥ
जो कोई भक्तिपूर्वक इसे ब्राह्मण के मुख से कहे जाते हुए सुनता है, वह दिन-रात में किये गये पापों से मुक्त हो जाता है - इसमें कोई सन्देह नहीं।