प्रभास खण्ड · अध्याय 424
कामेश्वर माहात्म्य वर्णन
श्लोक 1 (skanda.7.424.1)
॥ पुलस्त्य उवाच ॥ ततः कामेश्वरं गच्छेत्तत्र कामप्रतिष्ठितम् । यस्मिन्दृष्टे सदा मर्त्यः सुरूपः सुप्रभो भवेत्
pulastya uvāca | tataḥ kāmeśvaraṁ gacchettatra kāmapratiṣṭhitam | yasmindṛṣṭe sadā martyaḥ surūpaḥ suprabho bhavet
पुलस्त्य ने कहा - तदनन्तर कामेश्वर के पास जाना चाहिए, जहाँ काम प्रतिष्ठित हैं; जिसके दर्शन से मनुष्य सदा सुरूप और तेजस्वी हो जाता है।
श्लोक 2 (skanda.7.424.2)
॥ ययातिरुवाच ॥ त्वया प्रोक्तं पुरा शंभुः कामबाण भयात्किल । वालखिल्याश्रमं प्राप्तो यत्र लिंगं पपात ह
yayātiruvāca | tvayā proktaṁ purā śaṁbhuḥ kāmabāṇa bhayātkila | vālakhilyāśramaṁ prāpto yatra liṅgaṁ papāta ha
ययाति ने कहा - आपने पहले कहा था कि शम्भु कामबाण के भय से वालखिल्याश्रम में पहुँचे, जहाँ लिंग गिर पड़ा था।
श्लोक 3 (skanda.7.424.3)
स कथं पूजितस्तेन शंभुर्मे कौतुकं महत् । वद सर्वं द्विजश्रेष्ठ कामेश्वरनिवेशनम्
sa kathaṁ pūjitastena śambhurme kautukaṁ mahat | vada sarvaṁ dvijaśreṣṭha kāmeśvaraniveśanam
वह किस प्रकार पूजित हुए? मुझे इसमें महान् कौतूहल है। हे द्विजश्रेष्ठ! कामेश्वर की स्थापना के विषय में मुझे सब कुछ बताइये।
श्लोक 4 (skanda.7.424.4)
॥ पुलस्त्य उवाच ॥ मुक्तलिंगेऽपि देवेशे न स्मरस्तं मुमोच ह । दर्शयन्नात्मनो बाणं तस्यासौ पृष्ठतः स्थितः
pulastya uvāca | muktaliṅge'pi deveśe na smarastaṁ mumoca ha | darśayannātmano bāṇaṁ tasyāsau pṛṣṭhataḥ sthitaḥ
पुलस्त्य ने कहा - लिंग गिर जाने पर भी देवेश को काम ने नहीं छोड़ा। अपना बाण दिखाते हुए वह उनके पीछे-पीछे रहने लगा।
श्लोक 5 (skanda.7.424.5)
ततो वाराणसीं प्राप्तस्तद्भयात्त्रिपुरांतकः । तत्राऽपि च तथा दृष्ट्वा धृतचापं मनोभवम्
tato vārāṇasīṁ prāptastadbhayāttripurāntakaḥ | tatrā'pi ca tathā dṛṣṭvā dhṛtacāpaṁ manobhavam
तब उसके भय से त्रिपुरान्तक वाराणसी पहुँचे; वहाँ भी उन्होंने उसी प्रकार धनुष धारण किये हुए मनोभव को देखा।
श्लोक 6 (skanda.7.424.6)
ततः प्रयागमापन्नः केदारं च ततः परम् । नैमिषं भद्रकर्णं च जंबूमार्गे त्रिपुष्करम्
tataḥ prayāgamāpannaḥ kedāraṁ ca tataḥ param | naimiṣaṁ bhadrakarṇaṁ ca jambūmārge tripuṣkaram
तत्पश्चात् वे प्रयाग पहुँचे, फिर केदार; नैमिष, भद्रकर्ण, और जम्बूमार्ग में त्रिपुष्कर।
श्लोक 7 (skanda.7.424.7)
गोकर्णं च प्रभासं च पुण्यं च कृमिजांगलम् । गंगाद्वारं गयाशीर्षं कालाभीष्टं वटेश्वरम्
gokarṇaṁ ca prabhāsaṁ ca puṇyaṁ ca kṛmijāṅgalam | gaṅgādvāraṁ gayāśīrṣaṁ kālābhīṣṭaṁ vaṭeśvaram
गोकर्ण, प्रभास, तथा पुण्य कृमिजांगल; गंगाद्वार, गयाशीर्ष, कालाभीष्ट, वटेश्वर।
श्लोक 8 (skanda.7.424.8)
किं वा तेन बहूक्तेन तीर्थान्यायतनानि च । असंख्यानि गतो देवः कामं च ददृशे तथा
kiṁ vā tena bahūktena tīrthānyāyatanāni ca | asaṁkhyāni gato devaḥ kāmaṁ ca dadṛśe tathā
अधिक कहने से क्या लाभ - देव असंख्य तीर्थों और आयतनों में गये, और सर्वत्र उन्होंने उसी प्रकार काम को देखा।
श्लोक 9 (skanda.7.424.9)
यत्रयत्र महादेवस्तद्भयान्नृप गच्छति । तत्रतत्र पुनः कामं प्रपश्यति धृतायुधम्
yatrayatra mahādevastadbhayānnṛpa gacchati | tatratatra punaḥ kāmaṁ prapaśyati dhṛtāyudham
हे राजन्! महादेव जहाँ-जहाँ भी उसके भय से जाते, वहाँ-वहाँ पुनः वे शस्त्रधारी काम को देखते।
श्लोक 10 (skanda.7.424.10)
कस्यचित्त्वथकालस्य पुनः प्राप्तोऽर्बुदं प्रति । तत्रापश्यत्तथा काममाकर्णाकर्षितायुधम् । आकुंचितैकपादं च स्थिरदृष्टिं नृपोत्तम
kasyacittvathakālasya punaḥ prāpto'rbudaṁ prati | tatrāpaśyattathā kāmamākarṇākarṣitāyudham | ākuñcitaikapādaṁ ca sthiradṛṣṭiṁ nṛpottama
तत्पश्चात् किसी समय वे पुनः अर्बुद पहुँचे; वहाँ भी हे नृपोत्तम! उन्होंने काम को कान तक बाण खींचे, एक पैर मोड़े, स्थिर दृष्टि से देखा।
श्लोक 11 (skanda.7.424.11)
अथाऽसौ भगवाञ्छांतः प्रियादुःखसमन्वितः । क्रोधं चक्रे विशेषेण दृष्ट्वा तं पुरतः स्थितम्
athā'sau bhagavāñchāntaḥ priyāduḥkhasamanvitaḥ | krodhaṁ cakre viśeṣeṇa dṛṣṭvā taṁ purataḥ sthitam
तब वे भगवान् यद्यपि शान्त थे, प्रिया के दुःख से युक्त होकर, उसे अपने सामने खड़ा देखकर विशेष रूप से क्रोधित हो गये।
श्लोक 12 (skanda.7.424.12)
तस्य कोपाभिभूतस्य तृतीयान्नयनान्नृप । निश्चक्राम महाज्वाला ययाऽसौ भस्मसात्कृतः
tasya kopābhibhūtasya tṛtīyānnayanānnṛpa | niścakrāma mahājvālā yayā'sau bhasmasātkṛtaḥ
हे राजन्! उनके क्रोध से आविष्ट तृतीय नेत्र से महान् ज्वाला निकली, जिससे वह भस्म हो गया।
श्लोक 13 (skanda.7.424.13)
सचापः सशरो राजंस्तस्मिन्पर्वतरोधसि । शंकरो रोषपर्यंतं गत्वा सौख्यमवाप्तवान्
sacāpaḥ saśaro rājaṁstasminparvatarodhasi | śaṅkaro roṣaparyantaṁ gatvā saukhyamavāptavān
हे राजन्! धनुष-बाण सहित उस पर्वत के तट पर वह भस्म हो गया। शंकर अपने रोष की चरम सीमा तक जाकर शान्ति को प्राप्त हुए।
श्लोक 14 (skanda.7.424.14)
कैलासं पर्वतश्रेष्ठं जगाम सुरपूजितः । दग्धे मनोभवे भार्या रतिरस्य पतिव्रता । व्यलपत्करुणं दीना पतिशोकपरिप्लुता
kailāsaṁ parvataśreṣṭhaṁ jagāma surapūjitaḥ | dagdhe manobhave bhāryā ratirasya pativratā | vyalapatkaruṇaṁ dīnā patiśokapariplutā
देवताओं द्वारा पूजित होकर वे श्रेष्ठ कैलास पर्वत पर चले गये। मनोभव के भस्म हो जाने पर उनकी पतिव्रता पत्नी रति, दीन होकर, पति-शोक में डूबी हुई करुणापूर्वक विलाप करने लगी।
श्लोक 15 (skanda.7.424.15)
ततो दारूणि चाहृत्य चितिं कृत्वा नराधिप । आरुरोहाग्निसंदीप्तां चितिं सा पतिदुःखिता । तावदाकाशगां वाणीं शुश्राव च यशस्विनी
tato dārūṇi cāhṛtya citiṁ kṛtvā narādhipa | āruroha agnisaṁdīptāṁ citiṁ sā patiduḥkhitā | tāvadākāśagāṁ vāṇīṁ śuśrāva ca yaśasvinī
हे नराधिप! तब लकड़ियाँ इकट्ठी करके चिता बनाकर, वह पति-दुःखिनी अग्नि-प्रज्वलित चिता पर चढ़ गयी; उसी समय उस यशस्विनी ने आकाशवाणी सुनी।
श्लोक 16 (skanda.7.424.16)
॥ वागुवाच ॥ मा पुत्रि साहसं कार्षीस्तपसा तिष्ठ सुन्दरि । भूयः प्राप्स्यसि भर्त्तारं कामें तुष्टेन शंभुना
vāguvāca | mā putri sāhasaṁ kārṣīstapasā tiṣṭha sundari | bhūyaḥ prāpsyasi bharttāraṁ kāmeṁ tuṣṭena śaṁbhunā
वाणी ने कहा - "हे पुत्रि! यह दुस्साहस मत करो, हे सुन्दरि! तपस्या में स्थित रहो। शम्भु के प्रसन्न होने पर तुम पुनः अपने पति काम को प्राप्त करोगी।"
श्लोक 17 (skanda.7.424.17)
सा श्रुत्वा तां तदा वाणीं समुत्तस्थौ समुमध्यमा । देवमाराधयामास दिवानक्तमतंद्रिता । व्रतैर्दानैर्जपैर्होमैरुपवासैस्तथा परैः
sā śrutvā tāṁ tadā vāṇīṁ samuttasthau samumadhyamā | devamārādhayāmāsa divānaktamataṁdritā | vrataidānairjapairhomairupavāsaistathā paraiḥ
उस वाणी को सुनकर वह सुमध्यमा उठ खड़ी हुई; और अथक होकर दिन-रात व्रत, दान, जप, होम, उपवास तथा अन्य साधनों से देव की आराधना करने लगी।
श्लोक 18 (skanda.7.424.18)
ततो वर्ष सहस्रांते तुष्टस्तस्या महेश्वरः । अब्रवीद्वद कल्याणि वरं यन्मनसि स्थितम्
tato varṣa sahasrānte tuṣṭastasyā maheśvaraḥ | abravīdvada kalyāṇi varaṁ yanmanasi sthitam
तब एक सहस्र वर्ष के अन्त में उससे प्रसन्न होकर महेश्वर ने कहा - "हे कल्याणि! जो तुम्हारे मन में हो, वह वर बताओ।"
श्लोक 19 (skanda.7.424.19)
॥ रतिरुवाच ॥ यदि तुष्टोऽसि मे देव भगवँल्लोक भावनः । अक्षतांगः पुनः कामः कांतो मे जायतां पतिः
ratiruvāca | yadi tuṣṭo'si me deva bhagavallloka bhāvanaḥ | akṣatāṅgaḥ punaḥ kāmaḥ kānto me jāyatāṁ patiḥ
रति ने कहा - "हे देव! हे भगवन्! हे लोकभावन! यदि आप मुझसे प्रसन्न हैं, तो मेरे प्रिय पति काम पुनः अक्षतांग होकर मुझे प्राप्त हों।"
श्लोक 20 (skanda.7.424.20)
एवमुक्ते तया वाक्ये तत्क्षणात्समुपस्थितः । यथा सुप्तो महाराज तद्वद्रूपः स हर्षितः
evamukte tayā vākye tatkṣaṇātsamupasthitaḥ | yathā supto mahārāja tadvadrūpaḥ sa harṣitaḥ
उसके ऐसा कहते ही उसी क्षण वे प्रकट हो गये। हे महाराज! मानो सोकर उठे हों, उसी रूप में, हर्षित होकर।
श्लोक 21 (skanda.7.424.21)
इक्षुयष्टिमयं चापं पुष्पबाणसमन्वितम् । भृंगश्रेणिमय्या मौर्व्या शोभितं सुमनोहरम्
ikṣuyaṣṭimayaṁ cāpaṁ puṣpabāṇasamanvitam | bhṛṅgaśreṇimayyā maurvyā śobhitaṁ sumanoharam
गन्ने के धनुष सहित, पुष्पबाणों से युक्त, भ्रमर-पंक्ति की प्रत्यंचा से सुशोभित, अत्यन्त मनोहर रूप में।
श्लोक 22 (skanda.7.424.22)
ततो रतिसमायुक्तः प्रणिपत्य महेश्वरम् । अनुज्ञातस्तु तेनैव स्वव्यापारेऽभ्यवर्त्तत
tato ratisamāyuktaḥ praṇipatya maheśvaram | anujñātastu tenaiva svavyāpāre'bhyavarttata
तब रति से युक्त होकर, महेश्वर को प्रणाम करके, उनसे अनुमति पाकर वे अपने कार्य में पुनः प्रवृत्त हो गये।
श्लोक 23 (skanda.7.424.23)
स दृष्ट्वा शिवमाहात्म्यं श्रद्धां कृत्वा नृपोत्तम । शिवं संस्थापयामास पर्वतेऽर्बुदसंज्ञिते
sa dṛṣṭvā śivamāhātmyaṁ śraddhāṁ kṛtvā nṛpottama | śivaṁ saṁsthāpayāmāsa parvate'rbudasaṁjñite
हे नृपोत्तम! शिव के माहात्म्य को देखकर तथा श्रद्धा उत्पन्न करके, उन्होंने अर्बुद नामक पर्वत पर शिव की स्थापना की।
श्लोक 24 (skanda.7.424.24)
यस्मिन्दृष्टे महाराज नारी वा यदि वा नरः । सप्तजन्मांतराण्येव न दौर्भाग्यमवाप्नुयात्
yasmindṛṣṭe mahārāja nārī vā yadi vā naraḥ | saptajanmāntarāṇyeva na daurbhāgyamavāpnuyāt
हे महाराज! जिसके दर्शन से स्त्री हो या पुरुष, वह सात जन्मों तक दुर्भाग्य को प्राप्त नहीं होता।
श्लोक 25 (skanda.7.424.25)
एवमेतन्मया ख्यातं यन्मां त्वं परिपृच्छसि । कामेश्वरस्य माहात्म्यं कामदाह सविस्तरम्
evametanmayā khyātaṁ yanmāṁ tvaṁ paripṛcchasi | kāmeśvarasya māhātmyaṁ kāmadāha savistaram
इस प्रकार तुमने जो मुझसे पूछा था, वह मैंने बता दिया - कामेश्वर का माहात्म्य तथा काम-दहन विस्तारपूर्वक।