Skip to main content

प्रभास खण्ड · अध्याय 425

मार्कण्डेयाश्रमपद उत्पत्ति वर्णन

अध्याय 424अध्याय-सूचीअध्याय 426

श्लोक 1 (skanda.7.425.1)

॥ पुलस्त्य उवाच ॥ ततो गच्छेन्नृपश्रेष्ठ मार्कंडेयस्य चाश्रमम् । यत्र पूर्वं तपस्तप्तं मार्कंडेन महात्मना

pulastya uvāca | tato gacchennṛpaśreṣṭha mārkaṇḍeyasya cāśramam | yatra pūrvaṁ tapastaptaṁ mārkaṇḍena mahātmanā

पुलस्त्य ने कहा - हे नृपश्रेष्ठ! तदनन्तर मार्कण्डेय के आश्रम में जाना चाहिए, जहाँ महात्मा मार्कण्ड ने पूर्वकाल में तपस्या की थी।

श्लोक 2 (skanda.7.425.2)

मृकण्डो ब्राह्मणोनाम पुराऽऽसीच्छंसितव्रतः । अन्ते वयसि संजातस्तस्य पुत्रोऽतिसुन्दरः

mṛkaṇḍo brāhmaṇonāma purāsīcchaṁsitavrataḥ | ante vayasi saṁjātastasya putro'tisundaraḥ

पूर्वकाल में मृकण्डु नामक एक ब्राह्मण था, जो प्रशंसनीय व्रतों वाला था। उसके वृद्धावस्था में एक अत्यन्त सुन्दर पुत्र उत्पन्न हुआ।

श्लोक 3 (skanda.7.425.3)

सर्वलक्षणसंपूर्णः शांतः सूर्यसमप्रभः । कस्यचित्त्वथ कालस्य तस्याश्रमपदे नृप

sarvalakṣaṇasaṁpūrṇaḥ śāntaḥ sūryasamaprabhaḥ | kasyacittvatha kālasya tasyāśramapade nṛpa

वह सम्पूर्ण शुभ लक्षणों से युक्त, शान्त, सूर्य के समान तेजस्वी था। हे राजन्! तत्पश्चात् किसी समय उस आश्रम में -

श्लोक 4 (skanda.7.425.4)

आगतो ब्राह्मणो ज्ञानी कश्चित्सामुद्रविच्छुभः । ततोऽसौ क्रीडमानस्तु बालकः पंचवार्षिकः

āgato brāhmaṇo jñānī kaścitsāmudravicchubhaḥ | tato'sau krīḍamānastu bālakaḥ pañcavārṣikaḥ

- एक ज्ञानी, शुभ, सामुद्रिकशास्त्र-विद् ब्राह्मण वहाँ आया। तब वह पाँच वर्ष का बालक खेलते हुए -

श्लोक 5 (skanda.7.425.5)

आनासाग्रशिखाग्राभ्यां चिरं चैवावलोकितः । ततोऽहसत्स सहसा तं मृकण्डो ह्यलक्षयत्

ānāsāgraśikhāgrābhyāṁ ciraṁ caivāvalokitaḥ | tato'hasatsa sahasā taṁ mṛkaṇḍo hyalakṣayat

- नासाग्र से लेकर शिखाग्र तक बहुत देर तक देखा गया। तब वह अचानक हँस पड़ा, और मृकण्डु ने इसे देख लिया।

श्लोक 6 (skanda.7.425.6)

अथाऽब्रवीच्चिरं दृष्टस्त्वया पुत्रो मम द्विज । ततो हसितवान्भूयः किमिदं कारणं वद

athā'bravīccciraṁ dṛṣṭastvayā putro mama dvija | tato hasitavānbhūyaḥ kimidaṁ kāraṇaṁ vada

तब उसने कहा - "हे द्विज! आपने मेरे पुत्र को बहुत देर तक देखा, फिर हँसे - बताइये, इसका क्या कारण है?"

श्लोक 7 (skanda.7.425.7)

असकृत्स मृकण्डेन यावत्पृष्टो द्विजोत्तमः । उपरोधवशात्तस्मै यथार्थं संन्यवेदयत्

asakṛtsa mṛkaṇḍena yāvatpṛṣṭo dvijottamaḥ | uparodhavaśāttasmai yathārthaṁ sannyavedayat

जब मृकण्डु द्वारा उस द्विजोत्तम से बार-बार पूछा गया, तो आग्रहवश उसने उसे यथार्थ बात बता दी।

श्लोक 8 (skanda.7.425.8)

अस्य बालस्य चिह्नानि यानि काये द्विजोत्तम । अजरश्चामरश्चैव तैर्भवेत्पुरुषः किल

asya bālasya cihnāni yāni kāye dvijottama | ajaraścāmaraścaiva tairbhavetpuruṣaḥ kila

"हे द्विजोत्तम! इस बालक के शरीर पर जो चिह्न हैं, उनसे मनुष्य निश्चय ही अजर-अमर हो जाता है -"

श्लोक 9 (skanda.7.425.9)

षण्मासेनास्य बालस्य नूनं मृत्युर्भविष्यति । एतस्मात्कारणाद्धास्यं मयाऽकारि द्विजोत्तम । अनृतं नोक्तपूर्वं मे वैरिष्वपि कदाचन

ṣaṇmāsenāsya bālasya nūnaṁ mṛtyurbhaviṣyati | etasmātkāraṇāddhāsyaṁ mayā'kāri dvijottama | anṛtaṁ noktapūrvaṁ me vairiṣvapi kadācana

"- फिर भी छह मास में इस बालक की निश्चय ही मृत्यु हो जाएगी। इसी कारण, हे द्विजोत्तम! मुझसे हँसी निकल गयी। मैंने कभी भी, शत्रुओं से भी, पहले असत्य नहीं कहा है।"

श्लोक 10 (skanda.7.425.10)

॥ पुलस्त्य उवाच ॥ एवमुक्त्वा तु स ज्ञानी उषित्वा तत्र शर्वरीम् । मृकंडेनाभ्यनुज्ञात इष्टं देशं जगाम ह

pulastya uvāca | evamuktvā tu sa jñānī uṣitvā tatra śarvarīm | mṛkaṇḍenābhyanujñāta iṣṭaṁ deśaṁ jagāma ha

पुलस्त्य ने कहा - ऐसा कहकर वह ज्ञानी वहाँ रात्रि बिताकर, मृकण्डु से अनुमति पाकर अपने अभीष्ट स्थान को चला गया।

श्लोक 11 (skanda.7.425.11)

मृकंडोपि सुतं ज्ञात्वा ततः क्षीणायुषं नृप । पंचवार्षिकमप्यार्त्तश्चकारोपनयान्वितम्

mṛkaṇḍopi sutaṁ jñātvā tataḥ kṣīṇāyuṣaṁ nṛpa | pañcavārṣikamapyārttaścakāropanayānvitam

हे राजन्! मृकण्डु ने भी अपने पुत्र की आयु क्षीण जानकर, दुःखी होते हुए भी, पाँच वर्ष की अवस्था में ही उसका उपनयन संस्कार कर दिया।

श्लोक 12 (skanda.7.425.12)

श्रुताध्ययनसंपन्नं यंयं पश्यसि चाग्रतः । तस्याभिवादनं कार्यं त्वया पुत्रक नित्यशः

śrutādhyayanasaṁpannaṁ yaṁyaṁ paśyasi cāgrataḥ | tasyābhivādanaṁ kāryaṁ tvayā putraka nityaśaḥ

"हे पुत्र! जिस-जिस श्रुत-अध्ययन-सम्पन्न व्यक्ति को तुम अपने सामने देखो, उसे तुम्हें सदा प्रणाम करना चाहिए।"

श्लोक 13 (skanda.7.425.13)

ततश्चक्रे ब्रह्मचारी पितुर्वाक्यं विशेषतः

tataścakre brahmacārī piturvākyaṁ viśeṣataḥ

तब उस ब्रह्मचारी ने पिता के वचन का विशेष रूप से पालन किया।

श्लोक 14 (skanda.7.425.14)

बालं वृद्धं युवानं च यंयं पश्यति चक्षुषा । नमस्करोति तं सर्वं ब्राह्मणं विनयान्वितः

bālaṁ vṛddhaṁ yuvānaṁ ca yaṁyaṁ paśyati cakṣuṣā | namaskaroti taṁ sarvaṁ brāhmaṇaṁ vinayānvitaḥ

बालक, वृद्ध अथवा युवा जिस-जिस को भी वह देखता, उस प्रत्येक ब्राह्मण को वह विनयपूर्वक नमस्कार करता था।

श्लोक 15 (skanda.7.425.15)

कस्यचित्त्वथ कालस्य तस्याश्रमसमीपतः । सप्तर्षयः समायातास्तीर्थयात्रापरायणाः

kasyacittvatha kālasya tasyāśramasamīpataḥ | saptarṣayaḥ samāyātāstīrthayātrāparāyaṇāḥ

तत्पश्चात् किसी समय उसके आश्रम के निकट, तीर्थयात्रा में तत्पर सप्तर्षि आये।

श्लोक 16 (skanda.7.425.16)

अथ तान्सत्वरं गत्वा वंदयामास पार्थिव । बालः सविनयोपेतः सर्वांश्चैव यथाक्रमम्

atha tānsatvaraṁ gatvā vandayāmāsa pārthiva | bālaḥ savinayopetaḥ sarvāṁścaiva yathākramam

हे राजन्! तब वह बालक शीघ्रता से उनके पास जाकर विनयपूर्वक सभी को क्रमशः प्रणाम करने लगा।

श्लोक 17 (skanda.7.425.17)

दीर्घायुर्भव तैरुक्तः स बालस्तुष्टितत्परैः । आस्थिताश्च यथाभीष्टं देशं बालं विसर्ज्य तम्

dīrghāyurbhava tairuktaḥ sa bālastuṣṭitatparaiḥ | āsthitāśca yathābhīṣṭaṁ deśaṁ bālaṁ visarjya tam

उन्होंने प्रसन्न होकर उस बालक से कहा - "दीर्घायु होओ।" फिर उस बालक से विदा लेकर वे अपने अभीष्ट स्थान की ओर चल दिये।

श्लोक 18 (skanda.7.425.18)

तेषां मध्येंऽगिरानाम दिव्यज्ञानसमन्वितः । तेनावलोकितो बालः सूक्ष्मदृष्ट्या परंतप

teṣāṁ madhye'ṅgirānāma divyajñānasamanvitaḥ | tenāvalokito bālaḥ sūkṣmadṛṣṭyā parantapa

हे परंतप! उनमें से अंगिरा नामक, दिव्य ज्ञान से युक्त ऋषि ने उस बालक को सूक्ष्म दृष्टि से देखा।

श्लोक 19 (skanda.7.425.19)

अथ तानब्रवीत्सर्वान्मुनीन्किंचित्सविस्मयः । दीर्घायुर्न च बालोऽयं युष्माभिः संप्रकीर्तितः

atha tānabravītsarvānmunīnkiñcitsavismayaḥ | dīrghāyurna ca bālo'yaṁ yuṣmābhiḥ saṁprakīrtitaḥ

तब कुछ आश्चर्यचकित होकर उसने उन सभी मुनियों से कहा - "आपने जिसे दीर्घायु कहा, यह बालक दीर्घायु नहीं है।"

श्लोक 20 (skanda.7.425.20)

गमिष्यति कुमारोऽयं निधनं पंचमे दिने । तन्न युक्तं हि नो वाक्यमसत्यं द्विजसत्तमाः

gamiṣyati kumāro'yaṁ nidhanaṁ pañcame dine | tanna yuktaṁ hi no vākyamasatyaṁ dvijasattamāḥ

"यह बालक पाँचवें दिन मृत्यु को प्राप्त होगा। यह उचित नहीं है, हे द्विजसत्तमो! हमारा वचन असत्य नहीं होना चाहिए।"

श्लोक 21 (skanda.7.425.21)

यथाऽयं चिरजीवी स्यात्तथा नीतिर्विधीयताम् । अथ ते मुनयो भीता मिथ्या वाक्यस्य पार्थिव

yathā'yaṁ cirajīvī syāttathā nītirvidhīyatām | atha te munayo bhītā mithyā vākyasya pārthiva

"जिस प्रकार यह चिरंजीवी हो सके, वैसा उपाय किया जाए।" तब हे राजन्! वे मुनि अपने वचन के मिथ्या होने से भयभीत होकर -

श्लोक 22 (skanda.7.425.22)

बालकं तं समादाय ब्रह्मलोकं गतास्तदा । तत्र दृष्ट्वा चतुर्वक्त्रं नमश्चक्रुर्मुनीश्वराः

bālakaṁ taṁ samādāya brahmalokaṁ gatāstadā | tatra dṛṣṭvā caturvaktraṁ namaścakrurmunīśvarāḥ

- उस बालक को साथ लेकर तब ब्रह्मलोक चले गये। वहाँ चतुर्मुख ब्रह्मा को देखकर उन मुनीश्वरों ने नमस्कार किया।

श्लोक 23 (skanda.7.425.23)

तेषामनंतरं तेन बालके नाभिवादितः । दीर्घायुर्भव तेनाऽपि ब्रह्मणोक्तः स बालकः

teṣāmanantaraṁ tena bālake nābhivāditaḥ | dīrghāyurbhava tenā'pi brahmaṇoktaḥ sa bālakaḥ

उनके पश्चात् उस बालक ने भी उन्हें प्रणाम किया। ब्रह्मा ने भी उस बालक से कहा - "दीर्घायु होओ।"

श्लोक 24 (skanda.7.425.24)

ततः सप्तर्षयो हृष्टाः स्वचित्ते नृपसत्तम । सुखासीनान्सविश्रांतानब्रवीन्मुनिपुंगवान्

tataḥ saptarṣayo hṛṣṭāḥ svacitte nṛpasattama | sukhāsīnānsaviśrāntānabravīnmunipuṅgavān

हे नृपसत्तम! तब सप्तर्षि अपने हृदय में प्रसन्न हो गये। सुखपूर्वक बैठे और विश्राम करते हुए उन मुनिश्रेष्ठों से ब्रह्मा ने कहा।

श्लोक 25 (skanda.7.425.25)

॥ ब्रह्मोवाच ॥ परिपृच्छत किं कार्यं कुतो यूयमिहागताः

brahmovāca | paripṛcchata kiṁ kāryaṁ kuto yūyamihāgatāḥ

ब्रह्मा ने कहा - "पूछो, क्या कार्य है? तुम यहाँ कहाँ से आये हो?"

श्लोक 26 (skanda.7.425.26)

॥ ऋषय ऊचुः ॥ तीर्थयात्राप्रसंगेन भ्रममाणा महीतलम् । अर्बुदं पर्वतं नाम तस्य तीर्थेषु वै गताः

ṛṣaya ūcuḥ | tīrthayātrāprasaṅgena bhramamāṇā mahītalam | arbudaṁ parvataṁ nāma tasya tīrtheṣu vai gatāḥ

ऋषियों ने कहा - "तीर्थयात्रा के प्रसंग में पृथ्वीतल पर भ्रमण करते हुए, हम अर्बुद नामक पर्वत के तीर्थों में गये।"

श्लोक 27 (skanda.7.425.27)

अथागत्य द्रुतं दूराद्बालेनानेन वंदिताः । दीर्घायुर्भव संदिष्टस्ततश्चायमनेकधा । पंचमे दिवसेऽस्यापि मृत्युर्देव भविष्यति

athāgatya drutaṁ dūrādbālenānena vanditāḥ | dīrghāyurbhava saṁdiṣṭastataścāyamanekadhā | pañcame divase'syāpi mṛtyurdeva bhaviṣyati

"वहाँ दूर से शीघ्र आकर इस बालक ने हमें प्रणाम किया। हमने उससे कहा - 'दीर्घायु होओ।' किन्तु हे देव! अनेक प्रकार से यह बताया गया कि इसकी मृत्यु पाँचवें दिन हो जाएगी।"

श्लोक 28 (skanda.7.425.28)

यथा वयं त्वया सार्द्धमसत्या न चतुर्मुख । भवामोऽस्य कृते देव तथा किंचिद्विधीयताम्

yathā vayaṁ tvayā sārddhamasatyā na caturmukha | bhavāmo'sya kṛte deva tathā kiñcidvidhīyatām

"हे चतुर्मुख! जिससे हम आपके साथ असत्यवादी न बनें - हे देव! इसके लिए कुछ उपाय कीजिये।"

श्लोक 29 (skanda.7.425.29)

अथ ब्रह्मा प्रहृष्टात्मा दृष्ट्वा तं मुनिदारकम् । मत्प्रसादादयं बालो भावी कल्पायुरब्रवीत्

atha brahmā prahṛṣṭātmā dṛṣṭvā taṁ munidārakam | matprasādādayaṁ bālo bhāvī kalpāyurabravīt

तब ब्रह्मा, उस मुनि-बालक को देखकर हृदय से प्रसन्न होकर बोले - "मेरे प्रसाद से यह बालक एक कल्प तक जीवित रहेगा।"

श्लोक 30 (skanda.7.425.30)

ततस्ते मुनयो हृष्टास्तमादाय गृहं प्रति । प्रस्थिता ब्रह्मलोकात्तु नमस्कृत्वा चतुर्मुखम्

tataste munayo hṛṣṭāstamādāya gṛhaṁ prati | prasthitā brahmalokāttu namaskṛtvā caturmukham

तब वे मुनि प्रसन्न होकर उसे लेकर, चतुर्मुख को नमस्कार करके, ब्रह्मलोक से घर की ओर चल पड़े।

श्लोक 31 (skanda.7.425.31)

अथ तस्य पिता तत्र मृकंडो मुनिसत्तमः । ततो भार्यासमायुक्तो विललाप सुदुःखितः

atha tasya pitā tatra mṛkaṇḍo munisattamaḥ | tato bhāryāsamāyukto vilalāpa suduḥkhitaḥ

वहाँ उसके पिता मुनिश्रेष्ठ मृकण्डु, अपनी पत्नी सहित, अत्यन्त दुःखी होकर विलाप करने लगे।

श्लोक 32 (skanda.7.425.32)

हा पुत्रपुत्र करुणं रुदित्वा धर्मवत्सलः । अनामंत्र्य च मां कस्माद्दीर्घं पंथानमाश्रितः

hā putraputra karuṇaṁ ruditvā dharmavatsalaḥ | anāmantrya ca māṁ kasmāddīrghaṁ panthānamāśritaḥ

"हे पुत्र! हे पुत्र!" करुणापूर्वक रोते हुए उस धर्मवत्सल पिता ने कहा - "मुझसे बिना पूछे तुमने यह दीर्घ मार्ग क्यों अपनाया?"

श्लोक 33 (skanda.7.425.33)

अकृत्वापि क्रियाः कार्याः कथं मृत्युवशं गतः । सोऽहं त्वया विना पुत्र न जीवामि कथंचन

akṛtvāpi kriyāḥ kāryāḥ kathaṁ mṛtyuvaśaṁ gataḥ | so'haṁ tvayā vinā putra na jīvāmi kathaṁcana

"आवश्यक क्रियाएँ किये बिना ही तुम मृत्यु के वश में कैसे चले गये? हे पुत्र! मैं तुम्हारे बिना किसी प्रकार भी जीवित नहीं रह सकता।"

श्लोक 34 (skanda.7.425.34)

एवं विलपतस्तस्य बहुधा नृपसत्तम । बालश्चाभ्यागतस्तत्र यत्र देशे पुरा स्थितः

evaṁ vilapatastasya bahudhā nṛpasattama | bālaścābhyāgatastatra yatra deśe purā sthitaḥ

हे नृपसत्तम! इस प्रकार उसके बहुत विलाप करते समय, वह बालक उसी स्थान पर आ पहुँचा, जहाँ वह पहले रहता था।

श्लोक 35 (skanda.7.425.35)

अथासौ प्रययौ बालः प्रहृष्टेनांतरात्मना । तं दृष्ट्वा पथि तातश्च संप्रहृष्टो बभूव ह

athāsau prayayau bālaḥ prahṛṣṭenāntarātmanā | taṁ dṛṣṭvā pathi tātaśca saṁprahṛṣṭo babhūva ha

तब वह बालक प्रसन्न हृदय से आगे बढ़ा; और मार्ग में उसे देखकर पिता भी अत्यन्त हर्षित हो उठे।

श्लोक 36 (skanda.7.425.36)

पप्रच्छांकं समारोप्य चिरागमन कारणम् । ततः स कथयामास सर्वं मुनिविचेष्टितम् । दर्शनं ब्रह्मलोकस्य पद्मयोनेर्वरं तथा

papracchāṅkaṁ samāropya cirāgamana kāraṇam | tataḥ sa kathayāmāsa sarvaṁ munivicheṣṭitam | darśanaṁ brahmalokasya padmayonervaraṁ tathā

उसे गोद में बिठाकर पिता ने चिरकाल तक न लौटने का कारण पूछा। तब उसने सारी बात बतायी - मुनियों की चेष्टा, ब्रह्मलोक का दर्शन, तथा पद्मयोनि का वरदान।

श्लोक 37 (skanda.7.425.37)

॥ बालक उवाच ॥ अजरश्चामरश्चाहं कृतस्तात स्वयंभुवा । तस्मात्सत्यं मदर्थे ते व्येत्वसौ मानसो ज्वरः

bālaka uvāca | ajaraścāmaraścāhaṁ kṛtastāta svayaṁbhuvā | tasmātsatyaṁ madarthe te vyetvasau mānaso jvaraḥ

बालक ने कहा - "हे तात! स्वयंभू ब्रह्मा ने मुझे अजर-अमर बना दिया है। यह सत्य है - अतः मेरे लिए आपका यह मानसिक ज्वर दूर हो जाए।"

श्लोक 38 (skanda.7.425.38)

सोऽहमाराधयिष्यामि तथैव चतुराननम् । कृत्वाऽऽश्रमपदं रम्यमर्बुदे पर्वतोत्तमे

so'hamārādhayiṣyāmi tathaiva caturānanam | kṛtvāśramapadaṁ ramyamarbude parvatottame

"अतः मैं अर्बुद नामक श्रेष्ठ पर्वत पर एक रमणीय आश्रम बनाकर चतुरानन ब्रह्मा की आराधना करूँगा।"

श्लोक 39 (skanda.7.425.39)

अमृतस्रावि तद्वाक्यं श्रुत्वा पुत्रस्य स द्विजः । मृकंडो हर्षसंयुक्तो वाचमित्यब्रवीच्च तम्

amṛtasrāvi tadvākyaṁ śrutvā putrasya sa dvijaḥ | mṛkaṇḍo harṣasaṁyukto vācamityabravīcca tam

पुत्र के उस अमृतवर्षी वचन को सुनकर, वह ब्राह्मण मृकण्डु हर्षयुक्त होकर उससे इस प्रकार बोला।

श्लोक 40 (skanda.7.425.40)

मार्क्कंडोऽपि द्रुतं गत्वा रम्यमर्बुदपर्वतम् । तपस्तेपे सुविस्तीर्णं ध्यायन्देवं पितामहम्

mārkkaṇḍo'pi drutaṁ gatvā ramyamarbudaparvatam | tapastepe suvistīrṇaṁ dhyāyandevaṁ pitāmaham

मार्कण्ड ने भी शीघ्र ही रमणीय अर्बुद पर्वत पर जाकर, पितामह देव का ध्यान करते हुए विस्तृत तपस्या की।

श्लोक 41 (skanda.7.425.41)

तस्याश्रमपदे पुण्ये श्रावणे मासि पार्थिव । पौर्णमास्यां विशेषेण यः कुर्यात्पितृतर्पणम् । पितृमेधफलं तस्य सकलं स्यादसंशयम्

tasyāśramapade puṇye śrāvaṇe māsi pārthiva | paurṇamāsyāṁ viśeṣeṇa yaḥ kuryātpitṛtarpaṇam | pitṛmedhaphalaṁ tasya sakalaṁ syādasaṁśayam

हे राजन्! उसके पुण्य आश्रम में श्रावण मास में, विशेष रूप से पूर्णिमा को, जो पितृतर्पण करता है, उसे निस्सन्देह सम्पूर्ण पितृमेध-यज्ञ का फल प्राप्त होता है।

श्लोक 42 (skanda.7.425.42)

ऋषियोगेन यस्तत्र तर्पयेद्ब्राह्मणोत्तमान् । ब्रह्मलोके चिरं वासस्तस्य संजायते नृप

ṛṣiyogena yastatra tarpayedbrāhmaṇottamān | brahmaloke ciraṁ vāsastasya saṁjāyate nṛpa

हे राजन्! जो ऋषियों के साथ मिलकर वहाँ श्रेष्ठ ब्राह्मणों को तृप्त करता है, उसे ब्रह्मलोक में दीर्घकाल तक निवास प्राप्त होता है।

श्लोक 43 (skanda.7.425.43)

यः स्नानं कुरुते तत्र सम्यक्छ्रद्धासमन्वितः । नाल्पमृत्युभयं तस्य कुले क्वापि प्रजायते

yaḥ snānaṁ kurute tatra samyakchraddhāsamanvitaḥ | nālpamṛtyubhayaṁ tasya kule kvāpi prajāyate

जो वहाँ भलीभाँति श्रद्धापूर्वक स्नान करता है, उसके कुल में कहीं भी अकाल मृत्यु का भय उत्पन्न नहीं होता।

अध्याय 424अध्याय-सूचीअध्याय 426