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प्रभास खण्ड · अध्याय 426

उद्दालकेश्वर माहात्म्य वर्णन

अध्याय 425अध्याय-सूचीअध्याय 427

श्लोक 1 (skanda.7.426.1)

॥ पुलस्त्य उवाच ॥ ततो गच्छेन्नृपश्रेष्ठ लिंगं पापहरं परम् । उद्दालकेन मुनिना स्थापितं लोकविश्रुतम्

pulastya uvāca | tato gacchennṛpaśreṣṭha liṅgaṁ pāpaharaṁ param | uddālakena muninā sthāpitaṁ lokaviśrutam

पुलस्त्य ने कहा - हे नृपश्रेष्ठ! तदनन्तर पापों का हरण करने वाले, उद्दालक मुनि द्वारा स्थापित, लोकविख्यात परम लिंग के पास जाना चाहिए।

श्लोक 2 (skanda.7.426.2)

तस्मिन्स्पृष्टेऽथ वा दृष्टे पूजिते च विशेषतः । सर्वरोग विनिर्मुक्तो गार्हस्थ्यं प्राप्नुयान्नरः

tasminspṛṣṭe'tha vā dṛṣṭe pūjite ca viśeṣataḥ | sarvaroga vinirmukto gārhasthyaṁ prāpnuyānnaraḥ

उसका स्पर्श करने, अथवा दर्शन करने, और विशेष रूप से पूजा करने से, मनुष्य सभी रोगों से मुक्त होकर गार्हस्थ्य जीवन को प्राप्त करता है।

श्लोक 3 (skanda.7.426.3)

सर्वपापविनिर्मुक्तः शिवलोके महीयते

sarvapāpavinirmuktaḥ śivaloke mahīyate

सम्पूर्ण पापों से मुक्त होकर वह शिवलोक में प्रतिष्ठित होता है।

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