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प्रभास खण्ड · अध्याय 427

सिद्धेश्वर महिमा वर्णन

अध्याय 426अध्याय-सूचीअध्याय 428

श्लोक 1 (skanda.7.427.1)

॥ पुलस्त्य उवाच ॥ ततो गच्छेन्नृपश्रेष्ठ सिद्धलिंगं सुसिद्धिदम् । सिद्धैस्तु स्थापितं लिंगं सर्वपातकनाशनम्

pulastya uvāca | tato gacchennṛpaśreṣṭha siddhaliṅgaṁ susiddhidam | siddhaistu sthāpitaṁ liṅgaṁ sarvapātakanāśanam

पुलस्त्य ने कहा - हे नृपश्रेष्ठ! तदनन्तर सिद्धों द्वारा स्थापित, सम्पूर्ण पापों का नाश करने वाले, उत्तम सिद्धि देने वाले सिद्धलिंग के पास जाना चाहिए।

श्लोक 2 (skanda.7.427.2)

तत्रास्ति शोभनं कुण्डं सुनिर्मलजलान्वितम् । तत्र स्नातो नरः सम्यङ्मुच्यते ब्रह्महत्यया

tatrāsti śobhanaṁ kuṇḍaṁ sunirmalajalānvitam | tatra snāto naraḥ samyaṅmucyate brahmahatyayā

वहाँ अत्यन्त निर्मल जल से युक्त एक सुन्दर कुण्ड है। वहाँ भलीभाँति स्नान करने वाला मनुष्य ब्रह्महत्या से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 3 (skanda.7.427.3)

यंयं काममभिध्यायंस्तत्र स्नाति नरो नृप । अवश्यं तमवाप्नोति निष्ठांते च परां गतिम्

yaṁyaṁ kāmamabhidhyāyaṁstatra snāti naro nṛpa | avaśyaṁ tamavāpnoti niṣṭhānte ca parāṁ gatim

हे राजन्! जिस-जिस कामना का ध्यान करते हुए मनुष्य वहाँ स्नान करता है, वह उसे अवश्य प्राप्त करता है, तथा जीवन के अन्त में परम गति को भी।

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