प्रभास खण्ड · अध्याय 428
गजतीर्थ प्रभाव वर्णन
श्लोक 1 (skanda.7.428.1)
॥ पुलस्त्य उवाच ॥ ततो गच्छेन्नृपश्रेष्ठ गजतीर्थमनुत्तमम् । यत्र पूर्वं तपस्तप्तं दिग्गजैर्भावितात्मभिः
pulastya uvāca | tato gacchennṛpaśreṣṭha gajatīrthamanuttamam | yatra pūrvaṁ tapastaptaṁ diggajairbhāvitātmabhiḥ
पुलस्त्य ने कहा - हे नृपश्रेष्ठ! तदनन्तर अनुपम गजतीर्थ के पास जाना चाहिए, जहाँ पवित्र आत्मा वाले दिग्गजों ने पूर्वकाल में तपस्या की थी।
श्लोक 2 (skanda.7.428.2)
भूभारधरणैश्चान्यैरैरावणमुखैर्नृप । तत्र स्नातो नरः सम्यग्गजदानफलं लभेत्
bhūbhāradharaṇaiścānyairairāvaṇamukhairnṛpa | tatra snāto naraḥ samyaggajadānaphalaṁ labhet
- तथा हे राजन्! ऐरावत आदि पृथ्वी का भार धारण करने वाले अन्य गजों ने भी। वहाँ भलीभाँति स्नान करने वाला मनुष्य गजदान के फल को प्राप्त करता है।