Skip to main content

प्रभास खण्ड · अध्याय 429

देवखात उत्पत्ति माहात्म्य वर्णन

अध्याय 428अध्याय-सूचीअध्याय 430

श्लोक 1 (skanda.7.429.1)

॥ पुलस्त्य उवाच ॥ देवखातं ततो गच्छेत्सुपुण्यं तीर्थमुत्तमम् । यत्ख्यातिर्विबुधैः सर्वैः स्वयमेव व्यधीयत

pulastya uvāca | devakhātaṁ tato gacchetsupuṇyaṁ tīrthamuttamam | yatkhyātirvibudhaiḥ sarvaiḥ svayameva vyadhīyata

पुलस्त्य ने कहा - तदनन्तर देवखात नामक अत्यन्त पुण्य, उत्तम तीर्थ में जाना चाहिए, जिसकी ख्याति सभी विद्वान् देवताओं ने स्वयं स्थापित की है।

श्लोक 2 (skanda.7.429.2)

तत्र यः कुरुते श्राद्धममावास्यां विशेषतः । कन्यागते रवौ राजन्स लभेत्परमं पदम् । पितॄन्स तारयत्येव प्राप्तानपि सुदुर्गतिम्

tatra yaḥ kurute śrāddhamamāvāsyāṁ viśeṣataḥ | kanyāgate ravau rājansa labhetparamaṁ padam | pitṝnsa tārayatyeva prāptānapi sudurgatim

हे राजन्! जो वहाँ अमावस्या को, विशेष रूप से सूर्य के कन्या राशि में होने पर, श्राद्ध करता है, वह परम पद को प्राप्त करता है; वह अत्यन्त दुर्गति को प्राप्त हुए अपने पितरों को भी तार देता है।

अध्याय 428अध्याय-सूचीअध्याय 430