प्रभास खण्ड · अध्याय 472
वंजुली, द्वारका, गंगा, गया, गोविन्द, गोमती, गोकुल, गीता तथा गोपीचन्दन माहात्म्य वर्णन
श्लोक 1 (skanda.7.472.1)
इंद्रद्युम्न उवाच। कथयस्व मुनिश्रेष्ठ किंचित्कौतूहलं मम। पुण्यं पवित्रं पापघ्नं तीर्थं तु वद विस्तरात्
iṁdradyumna uvāca| kathayasva muniśreṣṭha kiṁcitkautūhalaṁ mama| puṇyaṁ pavitraṁ pāpaghnaṁ tīrthaṁ tu vada vistarāt
इन्द्रद्युम्न ने कहा — हे मुनिश्रेष्ठ! मुझे कुछ कौतूहल है, कहिए। पुण्य, पवित्र तथा पापनाशक तीर्थ के बारे में विस्तार से बताइए।
श्लोक 2 (skanda.7.472.2)
मार्कण्डेय उवाच। मथुरा द्वारकाऽयोध्या कलिकाले पुरीत्रयम्। धर्मार्थकामदं भूप मोक्षदं हरिवल्लभम्
mārkaṇḍeya uvāca| mathurā dvārakā'yodhyā kalikāle purītrayam| dharmārthakāmadaṁ bhūpa mokṣadaṁ harivallabham
मार्कण्डेय ने कहा — हे राजन्! मथुरा, द्वारका और अयोध्या — ये तीन पुरियाँ कलिकाल में धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष देने वाली और हरि को प्रिय हैं।
श्लोक 3 (skanda.7.472.3)
मधुरायां तु कालिंदी गोमती कृष्णसन्निधौ। अयोध्यायां तु सरयूर्मुक्तिदा सेविता सदा
madhurāyāṁ tu kāliṁdī gomatī kṛṣṇasannidhau| ayodhyāyāṁ tu sarayūrmuktidā sevitā sadā
मथुरा में यमुना, कृष्ण के समीप गोमती, तथा अयोध्या में सरयू — ये सदा सेवित होकर मुक्ति देने वाली हैं।
श्लोक 4 (skanda.7.472.4)
द्रारवत्यामयोध्यायां कृष्णं रामं शुभप्रदम्। मथुरायां हरिं विष्णुं स्मृत्वा मुक्तिमवाप्नुयात्
dvāravatyāmayodhyāyāṁ kṛṣṇaṁ rāmaṁ śubhapradam| mathurāyāṁ hariṁ viṣṇuṁ smṛtvā muktimavāpnuyāt
द्वारका में कृष्ण का, अयोध्या में शुभप्रद राम का, तथा मथुरा में हरि विष्णु का स्मरण कर मनुष्य मुक्ति प्राप्त करता है।
श्लोक 5 (skanda.7.472.5)
धन्या सा मथुरा लोके यत्र जातो हरिः स्वयम्। द्वारका सफला लोके क्रीडितं यत्र विष्णुना
dhanyā sā mathurā loke yatra jāto hariḥ svayam| dvārakā saphalā loke krīḍitaṁ yatra viṣṇunā
संसार में वह मथुरा धन्य है, जहाँ स्वयं हरि ने जन्म लिया। द्वारका संसार में सफल है, जहाँ विष्णु ने क्रीड़ा की।
श्लोक 6 (skanda.7.472.6)
धन्यानामपि सा पूज्या अयोध्या सर्वकामदा। या स्वयं रामदेवेन पालिता धर्मबुद्धिना
dhanyānāmapi sā pūjyā ayodhyā sarvakāmadā| yā svayaṁ rāmadevena pālitā dharmabuddhinā
धन्यों में भी वह अयोध्या पूज्य है, जो सर्वकामदायिनी है, जिसे स्वयं धर्मबुद्धि राम देव ने पाला।
श्लोक 7 (skanda.7.472.7)
यद्ददाति फलं काशी सेविता कल्पसंख्यया। कला ददाति मथुरा वासरेणापि तत्फलम्
yaddadāti phalaṁ kāśī sevitā kalpasaṁkhyayā| kalā dadāti mathurā vāsareṇāpi tatphalam
काशी की सेवा करने से जो फल कल्पों की संख्या में मिलता है, मथुरा उसका सोलहवाँ भाग भी एक ही दिन में दे देती है।
श्लोक 8 (skanda.7.472.8)
मन्वंतरसहस्रे तु प्रयागे यत्फलं भवेत्। निमिषार्द्धेन वसतां द्वारकायां तु तत्फलम्
manvaṁtarasahasre tu prayāge yatphalaṁ bhavet| nimiṣārddhena vasatāṁ dvārakāyāṁ tu tatphalam
प्रयाग में सहस्र मन्वन्तरों में जो फल मिलता है, वही फल द्वारका में आधे निमेष तक निवास करने से मिल जाता है।
श्लोक 9 (skanda.7.472.9)
प्रभासे च कुरुक्षेत्रे यत्फलं वत्सरैः शतैः। वसतां निमिषार्द्धेन ह्ययोध्यायां च तद्भवेत्
prabhāse ca kurukṣetre yatphalaṁ vatsaraiḥ śataiḥ| vasatāṁ nimiṣārddhena hyayodhyāyāṁ ca tadbhavet
प्रभास और कुरुक्षेत्र में सौ वर्षों में जो फल मिलता है, वही फल अयोध्या में आधे निमेष तक निवास करने से मिल जाता है।
श्लोक 10 (skanda.7.472.10)
अयोध्याधिपतिं रामं मथुरायां तु केशवम्। द्वारकावासिनं कृष्णं कीर्तनं चापि दुर्ल्लभम्
ayodhyādhipatiṁ rāmaṁ mathurāyāṁ tu keśavam| dvārakāvāsinaṁ kṛṣṇaṁ kīrtanaṁ cāpi durlabham
अयोध्या के अधिपति राम का, मथुरा में केशव का, तथा द्वारकावासी कृष्ण का — इनका कीर्तन भी दुर्लभ है।
श्लोक 11 (skanda.7.472.11)
मथुराकीर्तनेनापि श्रवणाद्द्वारकापुरः। अयोध्यादर्शनेनापि त्रिशुद्धं च पदं व्रजेत्
mathurākīrtanenāpi śravaṇāddvārakāpuraḥ| ayodhyādarśanenāpi triśuddhaṁ ca padaṁ vrajet
मथुरा का कीर्तन करने से, द्वारकापुरी के बारे में सुनने से, तथा अयोध्या का दर्शन करने से — मनुष्य तीन प्रकार से शुद्ध पद को प्राप्त होता है।
श्लोक 12 (skanda.7.472.12)
कृष्णं स्वयंभुवं देवं द्वारका त्रिदिवोपमा। श्रुता चाप्यथवा दृष्टा कुरुते जन्मसंक्षयम्
kṛṣṇaṁ svayaṁbhuvaṁ devaṁ dvārakā tridivopamā| śrutā cāpyathavā dṛṣṭā kurute janmasaṁkṣayam
स्वयंभू देव कृष्ण तथा त्रिदिव के समान द्वारका — सुनने अथवा देखने मात्र से जन्म का संक्षय कर देती है।
श्लोक 13 (skanda.7.472.13)
श्रुताभिलिखिता दृष्टा ह्ययोध्या मथुरापुरी। पापं हरति कल्पोत्थं द्वारका च तृतीयका
śrutābhilikhitā dṛṣṭā hyayodhyā mathurāpurī| pāpaṁ harati kalpotthaṁ dvārakā ca tṛtīyakā
अयोध्या और मथुरापुरी — सुनने, लिखने अथवा देखने से — कल्प भर में अर्जित पाप को हर लेती हैं; और तीसरी द्वारका भी यही करती है।
श्लोक 14 (skanda.7.472.14)
कृष्णं विष्णुं हरिं देवं विश्रांतं च कलौ स्मृतम्। द्वादश्यां जागरे रात्रावश्वमेधायुतं फलम्
kṛṣṇaṁ viṣṇuṁ hariṁ devaṁ viśrāṁtaṁ ca kalau smṛtam| dvādaśyāṁ jāgare rātrāvaśvamedhāyutaṁ phalam
कृष्ण, विष्णु, हरि देव — जो कलियुग में विश्रान्त होकर स्मृत हैं — उनके द्वादशी की रात्रि में जागरण करने से दस हजार अश्वमेध यज्ञों का फल मिलता है।
श्लोक 15 (skanda.7.472.15)
बालक्रीडनकं स्थानं ये स्मरंति दिनेदिने। स्वर्णशैलपदं नृणां जायते राजसत्तम
bālakrīḍanakaṁ sthānaṁ ye smaraṁti dinedine| svarṇaśailapadaṁ nṛṇāṁ jāyate rājasattama
हे राजसत्तम! जो उनके बाल-क्रीड़ा-स्थान का प्रतिदिन स्मरण करते हैं, उन मनुष्यों को स्वर्णशैल-तुल्य पद प्राप्त होता है।
श्लोक 16 (skanda.7.472.16)
धन्यास्ते मानवा लोके कलिकाले नरोत्तम। प्लवनं सिंधुतोयेन गोमत्यां यैर्नरैः कृतम्
dhanyāste mānavā loke kalikāle narottama| plavanaṁ siṁdhutoyena gomatyāṁ yairnaraiḥ kṛtam
हे नरोत्तम! संसार में कलिकाल में वे मनुष्य धन्य हैं, जिन्होंने गोमती में समुद्र के जल से स्नान किया है।
श्लोक 17 (skanda.7.472.17)
पश्चिमाशां नरः स्नात्वा कृत्वा वै करसंपुटम्। द्वारकां ये स्मरिष्यंति तेषां कोटिगुणं फलम्
paścimāśāṁ naraḥ snātvā kṛtvā vai karasaṁpuṭam| dvārakāṁ ye smariṣyaṁti teṣāṁ koṭiguṇaṁ phalam
जो मनुष्य पश्चिम दिशा में स्नान कर, दोनों हाथ जोड़कर द्वारका का स्मरण करते हैं, उनको करोड़ों गुना फल मिलता है।
श्लोक 18 (skanda.7.472.18)
मनसा चिन्तयेद्यो वै कलौ द्वारवतीं पुरीम्। कपिलाऽयुतपुण्यं च लभते हेलया नरः
manasā ciṁtayedyo vai kalau dvāravatīṁ purīm| kapilā'yutapuṇyaṁ ca labhate helayā naraḥ
जो कलियुग में मन से द्वारावती पुरी का चिन्तन करता है, वह सहज ही दस हजार कपिला गौओं के दान का पुण्य प्राप्त करता है।
श्लोक 19 (skanda.7.472.19)
गंगासागरजं पुण्यं गंगाद्वारभवं तथा। कलौ द्वारवतीं गत्वा प्राप्नोति मनुजाधिप
gaṁgāsāgarajaṁ puṇyaṁ gaṁgādvārabhavaṁ tathā| kalau dvāravatīṁ gatvā prāpnoti manujādhipa
हे मनुजाधिप! गंगासागर से उत्पन्न पुण्य तथा गंगाद्वार से उत्पन्न पुण्य — कलियुग में द्वारावती जाकर मनुष्य इन दोनों को प्राप्त कर लेता है।
श्लोक 20 (skanda.7.472.20)
सप्तकल्पस्मरो भूप मार्कण्डेयः स्मराम्यहम्। समाना वाऽधिका वापि द्वारवत्या न कापि पूः
saptakalpasmaro bhūpa mārkaṇḍeyaḥ smarāmyaham| samānā vā'dhikā vāpi dvāravatyā na kāpi pūḥ
हे राजन्! सात कल्पों को स्मरण करने वाला मार्कण्डेय मैं स्मरण करता हूँ — द्वारावती के समान अथवा उससे अधिक कोई भी नगरी नहीं है।
श्लोक 21 (skanda.7.472.21)
दुर्वाससा समो धन्यो नास्ति नाप्यधिको नृप। भाषाबंधं येन कृत्वा द्वारकायां धृतो हरिः
durvāsasā samo dhanyo nāsti nāpyadhiko nṛpa| bhāṣābaṁdhaṁ yena kṛtvā dvārakāyāṁ dhṛto hariḥ
हे राजन्! दुर्वासा के समान अथवा उनसे अधिक धन्य कोई नहीं है, जिन्होंने वाक्-बन्धन कर द्वारका में हरि को स्थापित किया।
श्लोक 22 (skanda.7.472.22)
मा काशीं मा कुरुक्षेत्रं प्रभासं मा च पुष्करम्। द्वारकां गच्छ राजर्षे पश्य कृष्णमुखं शुभम्
mā kāśīṁ mā kurukṣetraṁ prabhāsaṁ mā ca puṣkaram| dvārakāṁ gaccha rājarṣe paśya kṛṣṇamukhaṁ śubham
काशी नहीं, कुरुक्षेत्र नहीं, प्रभास नहीं, पुष्कर भी नहीं — हे राजर्षे! द्वारका जाओ और कृष्ण के शुभ मुख का दर्शन करो।
श्लोक 23 (skanda.7.472.23)
अश्वमेधसहस्रं तु राजसूयशतं कलौ। पदेपदे च लभते द्वारकां याति यो नरः
aśvamedhasahasraṁ tu rājasūyaśataṁ kalau| padepade ca labhate dvārakāṁ yāti yo naraḥ
जो मनुष्य द्वारका की ओर जाता है, वह कलियुग में प्रत्येक पग पर सहस्र अश्वमेध और सौ राजसूय यज्ञों का फल प्राप्त करता है।
श्लोक 24 (skanda.7.472.24)
सफलं जीवितं तेषां कलौ नृपवरोत्तम। येषां न स्खलितं चित्तं द्वारकां प्रति गच्छताम्
saphalaṁ jīvitaṁ teṣāṁ kalau nṛpavarottama| yeṣāṁ na skhalitaṁ cittaṁ dvārakāṁ prati gacchatām
हे नृपवरोत्तम! कलियुग में उनका जीवन सफल है, जिनका मन द्वारका की ओर जाते समय विचलित नहीं होता।
श्लोक 25 (skanda.7.472.25)
माता च पुत्रिणी तेन पिता चैव पितामहाः। पिंडदानं कृतं येन गोमत्यां कृष्णसन्निधौ
mātā ca putriṇī tena pitā caiva pitāmahāḥ| piṁḍadānaṁ kṛtaṁ yena gomatyāṁ kṛṣṇasannidhau
जिसने गोमती में कृष्ण के समीप पिण्डदान किया, उसके द्वारा माता पुत्रवती हुई, तथा पिता और पितर भी धन्य हुए।
श्लोक 26 (skanda.7.472.26)
गोपीचन्दनमुद्रां तु कृत्वा भ्रमति भूतले। सोऽपि देशो भवेत्पूतः कि पुनर्यत्र संस्थितम्
gopīcandanamudrāṁ tu kṛtvā bhramati bhūtale| so'pi deśo bhavetpūtaḥ ki punaryatra saṁsthitam
गोपीचन्दन का तिलक धारण कर जो पृथ्वी पर विचरण करता है, वह देश भी पवित्र हो जाता है — फिर जहाँ वह स्वयं स्थित हो, उसकी तो बात ही क्या!
श्लोक 27 (skanda.7.472.27)
द्वारकायां समुद्भूतां तुलसीं कृष्णसेविताम्। नित्यं बिभर्ति शिरसा स भवेत्त्रिदशाधिपः
dvārakāyāṁ samudbhūtāṁ tulasīṁ kṛṣṇasevitām| nityaṁ bibharti śirasā sa bhavettridaśādhipaḥ
जो द्वारका में उत्पन्न, कृष्ण द्वारा सेवित तुलसी को नित्य सिर पर धारण करता है, वह त्रिदशों का अधिपति बनता है।
श्लोक 28 (skanda.7.472.28)
दैत्यारेर्भगवत्तिथिश्च विजया नीरं च गंगोद्भवं नित्यं काशिपुरी तथैव तुलसी धात्रीफलं वल्लभम्
daityārerbhagavattithiśca vijayā nīraṁ ca gaṁgodbhavaṁ nityaṁ kāśipurī tathaiva tulasī dhātrīphalaṁ vallabham
दैत्यारि (विष्णु) की प्रिय विजया तिथि, गंगा से उत्पन्न जल, सदा काशीपुरी, इसी प्रकार तुलसी तथा आँवले का फल — ये सब उन्हें प्रिय हैं।
श्लोक 29 (skanda.7.472.29)
शास्त्रं भागवतं तथा च दयितं रामायणं द्वारका पुण्यं मालतिसम्भवं सुदयितं गीतं कृतं जागरम्
śāstraṁ bhāgavataṁ tathā ca dayitaṁ rāmāyaṇaṁ dvārakā puṇyaṁ mālatisambhavaṁ sudayitaṁ gītaṁ kṛtaṁ jāgaram
भागवत शास्त्र, तथा प्रिय रामायण, पुण्यमयी द्वारका, मालती-पुष्प, अत्यंत प्रिय गीता, तथा किया गया जागरण — ये सब भी उन्हें प्रिय हैं।
श्लोक 30 (skanda.7.472.30)
गृहे यस्य सदा तिष्ठेद्गोपीचन्दनमृत्तिका। द्वारका तिष्ठते तत्र कृष्णेन सहिता कलौ
gṛhe yasya sadā tiṣṭhedgopīcandanamṛttikā| dvārakā tiṣṭhate tatra kṛṣṇena sahitā kalau
जिसके घर में सदा गोपीचन्दन की मिट्टी रहती है, वहाँ कलियुग में कृष्ण सहित द्वारका ही निवास करती है।
श्लोक 31 (skanda.7.472.31)
कृतघ्नो वाऽथ गोघ्नोऽपि हैतुकः कृत्स्नपापकृत्। गोपीचन्दनसंपर्कात्पूतो भवति तत्क्षणात्
kṛtaghno vā'tha goghno'pi haitukaḥ kṛtsnapāpakṛt| gopīcandanasaṁparkātpūto bhavati tatkṣaṇāt
कृतघ्न, गोहत्यारा, कुतर्की, सम्पूर्ण पापकर्मी भी गोपीचन्दन के संपर्क मात्र से तत्काल पवित्र हो जाता है।
श्लोक 32 (skanda.7.472.32)
गोपीचन्दनखंडं तु यो ददातीह वैष्णवे। कुलमेकोत्तरं तेन शतं तारितमेव वा
gopīcandanakhaṁḍaṁ tu yo dadātīha vaiṣṇave| kulamekottaraṁ tena śataṁ tāritameva vā
जो यहाँ किसी वैष्णव को गोपीचन्दन का खण्ड देता है, उसके द्वारा एक सौ एक कुलजन तार दिए जाते हैं।
श्लोक 33 (skanda.7.472.33)
द्वारकासम्भवा भूप तुलसी यस्य मंदिरे। तस्य वैवस्वतो नित्यं बिभेति सह किंकरैः
dvārakāsambhavā bhūpa tulasī yasya maṁdire| tasya vaivasvato nityaṁ bibheti saha kiṁkaraiḥ
हे राजन्! जिसके मंदिर में द्वारका में उत्पन्न तुलसी है, यम अपने दूतों सहित उससे नित्य भयभीत रहते हैं।
श्लोक 34 (skanda.7.472.34)
द्वारकासंभवा मृत्स्ना तुलसीकृष्णकीर्तनम्। क्रतुकोटिशतं पुण्यं कथितं व्याससूनुना
dvārakāsaṁbhavā mṛtsnā tulasīkṛṣṇakīrtanam| kratukoṭiśataṁ puṇyaṁ kathitaṁ vyāsasūnunā
द्वारका में उत्पन्न मिट्टी, तुलसी, तथा कृष्ण-कीर्तन — इनका पुण्य व्यास-पुत्र (शुकदेव) ने सौ करोड़ यज्ञों के बराबर कहा है।
श्लोक 35 (skanda.7.472.35)
आलोड्य सर्वशास्त्राणि पुराणानि पुनःपुनः। मया दृष्टा महीपाल न द्वारकासमा पुरी
āloḍya sarvaśāstrāṇi purāṇāni punaḥpunaḥ| mayā dṛṣṭā mahīpāla na dvārakāsamā purī
हे राजन्! समस्त शास्त्रों और पुराणों को बार-बार मंथन करने पर भी, मैंने द्वारका के समान कोई नगरी नहीं देखी।
श्लोक 36 (skanda.7.472.36)
द्वारकागमनं येन कृतं कृष्णस्य कीर्तनम्। स्नातं तीर्थसहस्रैस्तु तेनेष्टं क्रतुकोटिभिः
dvārakāgamanaṁ yena kṛtaṁ kṛṣṇasya kīrtanam| snātaṁ tīrthasahasraistu teneṣṭaṁ kratukoṭibhiḥ
जिसने द्वारका-गमन किया, कृष्ण का कीर्तन किया, उसने मानो सहस्र तीर्थों में स्नान कर लिया तथा करोड़ों यज्ञ कर लिए।
श्लोक 37 (skanda.7.472.37)
इद्रियाणां तु दमनं किं करिष्यति देहिनाम्। सांख्यमध्ययनं चापि द्वारकां गच्छते न चेत्
indriyāṇāṁ tu damanaṁ kiṁ kariṣyati dehinām| sāṁkhyamadhyayanaṁ cāpi dvārakāṁ gacchate na cet
यदि द्वारका नहीं गया, तो प्राणियों की इन्द्रिय-दमन तथा सांख्य के अध्ययन से क्या लाभ?
श्लोक 38 (skanda.7.472.38)
पशवस्ते न सन्देहो गर्दभेन समा जनाः। दृष्टं कृष्णमुखं यैर्न गत्वा द्वारवतीं पुरीम्
paśavaste na sandeho gardabhena samā janāḥ| dṛṣṭaṁ kṛṣṇamukhaṁ yairna gatvā dvāravatīṁ purīm
जिन्होंने द्वारावती पुरी जाकर कृष्ण के मुख का दर्शन नहीं किया, वे पशु हैं, निःसंदेह गधे के समान हैं।
श्लोक 39 (skanda.7.472.39)
कृतकृत्यास्तु ते धन्या द्वादश्यां जागरे हरेः। कृत्वा जागरणं भक्त्या नृत्यमाना मुहुर्मुहुः
kṛtakṛtyāstu te dhanyā dvādaśyāṁ jāgare hareḥ| kṛtvā jāgaraṇaṁ bhaktyā nṛtyamānā muhurmuhuḥ
वे कृतकृत्य और धन्य हैं, जो हरि की द्वादशी के जागरण में भक्तिपूर्वक जागरण कर, बार-बार नृत्य करते हैं।
श्लोक 40 (skanda.7.472.40)
कृष्णालयं तु यो गत्वा गोमत्यां पिंडपातनम्। करोति शक्त्या दानं च मुक्तास्तस्य पितामहाः
kṛṣṇālayaṁ tu yo gatvā gomatyāṁ piṁḍapātanam| karoti śaktyā dānaṁ ca muktāstasya pitāmahāḥ
जो कृष्ण के मंदिर में जाकर गोमती में पिण्डदान करता है तथा यथाशक्ति दान करता है, उसके पितर मुक्त हो जाते हैं।
श्लोक 41 (skanda.7.472.41)
प्रेतत्वं च पिशाचत्वं न भवेत्तस्य देहिनः। जन्मजन्मनि राजेंद्र यो गतो द्वारकां पुरीम्
pretatvaṁ ca piśācatvaṁ na bhavettasya dehinaḥ| janmajanmani rājeṁdra yo gato dvārakāṁ purīm
हे राजेन्द्र! जो द्वारका पुरी में गया है, उस प्राणी को जन्म-जन्मान्तर में प्रेतत्व अथवा पिशाचत्व प्राप्त नहीं होता।
श्लोक 42 (skanda.7.472.42)
अनशनेन यत्पुण्यं प्रयागे त्यजतस्तनुम्। द्वादश्यां निमिषार्द्धेन तत्फलं कृष्णसन्निधौ
anaśanena yatpuṇyaṁ prayāge tyajatastanum| dvādaśyāṁ nimiṣārddhena tatphalaṁ kṛṣṇasannidhau
प्रयाग में उपवास कर शरीर त्यागने से जो पुण्य मिलता है, वही फल कृष्ण के समीप द्वादशी को आधे निमेष में प्राप्त हो जाता है।
श्लोक 43 (skanda.7.472.43)
सूर्यग्रहे गवां कोटिं दत्त्वा यत्फलमाप्नुयात्। तत्फलं कलिकाले तु द्वारवत्यां दिनेदिने
sūryagrahe gavāṁ koṭiṁ dattvā yatphalamāpnuyāt| tatphalaṁ kalikāle tu dvāravatyāṁ dinedine
सूर्यग्रहण में करोड़ों गौओं का दान देने से जो फल मिलता है, वही फल कलिकाल में द्वारावती में प्रतिदिन प्राप्त होता है।
श्लोक 44 (skanda.7.472.44)
कोटिभारं सुवर्णस्य ग्रहणे चंद्रसूर्ययोः। दत्त्वा यत्फलमाप्नोति तत्फलं कृष्णदर्शने
koṭibhāraṁ suvarṇasya grahaṇe caṁdrasūryayoḥ| dattvā yatphalamāpnoti tatphalaṁ kṛṣṇadarśane
चन्द्र और सूर्य के ग्रहण में करोड़ों भार सुवर्ण का दान देने से जो फल मिलता है, वही फल कृष्ण के दर्शन से प्राप्त होता है।
श्लोक 45 (skanda.7.472.45)
दोलासंस्थं च ये कृष्णं पश्यंति मधुमाधवे। तेषां पुत्राश्च पौत्राश्च मातामहपितामहाः
dolāsaṁsthaṁ ca ye kṛṣṇaṁ paśyaṁti madhumādhave| teṣāṁ putrāśca pautrāśca mātāmahapitāmahāḥ
जो मधुमाधव में झूले पर विराजमान कृष्ण का दर्शन करते हैं, उनके पुत्र, पौत्र, नाना तथा पितामह —
श्लोक 46 (skanda.7.472.46)
श्वशुराद्याः सभृत्याश्च पशवश्च नरोत्तम। क्रीडंति विष्णुना सार्द्धं यावदाभूतसंप्लवम्
śvaśurādyāḥ sabhṛtyāśca paśavaśca narottama| krīḍaṁti viṣṇunā sārddhaṁ yāvadābhūtasaṁplavam
हे नरोत्तम! श्वसुर आदि, सेवक तथा पशु भी विष्णु के साथ प्रलयकाल तक क्रीड़ा करते हैं।
श्लोक 47 (skanda.7.472.47)
या काचिद्द्वादशी भूप जायते कृष्णसन्निधौ। पश्यामि नांतरं किञ्चित्कलिकाले विशेषतः
yā kācidvādaśī bhūpa jāyate kṛṣṇasannidhau| paśyāmi nāṁtaraṁ kiñcitkalikāle viśeṣataḥ
हे राजन्! कृष्ण के समीप जो भी द्वादशी होती है, उसमें मुझे विशेष रूप से कलिकाल में कोई अंतर दिखाई नहीं देता।
श्लोक 48 (skanda.7.472.48)
कृष्णस्य सन्निधौ नित्यं वासरा द्वादशीसमाः। युगादिभिः समाः सर्वे नित्यं कृष्णस्य सन्निधौ
kṛṣṇasya sannidhau nityaṁ vāsarā dvādaśīsamāḥ| yugādibhiḥ samāḥ sarve nityaṁ kṛṣṇasya sannidhau
कृष्ण के समीप नित्य ही सभी दिन द्वादशी के समान हैं; कृष्ण के समीप नित्य ही सभी दिन युगादि-तिथियों के समान हैं।
श्लोक 49 (skanda.7.472.49)
कलौ द्वारवती सेव्या ज्ञात्वा पुण्यं विशेषतः। षटपुर्यश्चैव सुलभा दुर्ल्लभा द्वारका कलौ
kalau dvāravatī sevyā jñātvā puṇyaṁ viśeṣataḥ| ṣaṭpuryaścaiva sulabhā durlabhā dvārakā kalau
इस विशेष पुण्य को जानकर कलियुग में द्वारावती की सेवा करनी चाहिए। छहों अन्य पुरियाँ सुलभ हैं, किन्तु कलियुग में द्वारका दुर्लभ है।
श्लोक 50 (skanda.7.472.50)
स्मरणात्कीर्तनाद्यस्माद्भुक्तिमुक्ती सदा नृणाम्। दुर्वाससा तु ऋषिणा रक्षिता तिष्ठते पुरी
smaraṇātkīrtanādyasmādbhuktimuktī sadā nṛṇām| durvāsasā tu ṛṣiṇā rakṣitā tiṣṭhate purī
जिसके स्मरण और कीर्तन से मनुष्यों को सदा भोग और मोक्ष प्राप्त होते हैं, वह पुरी ऋषि दुर्वासा द्वारा सुरक्षित है।
श्लोक 51 (skanda.7.472.51)
कलौ न शक्यते गंतुं विना कृष्णप्रसादतः। कृष्णस्य दर्शनं कर्तुं यान्ति रुद्रादयः सुराः
kalau na śakyate gaṁtuṁ vinā kṛṣṇaprasādataḥ| kṛṣṇasya darśanaṁ kartuṁ yāṁti rudrādayaḥ surāḥ
कलियुग में कृष्ण की कृपा के बिना वहाँ जाना संभव नहीं है। कृष्ण का दर्शन करने के लिए रुद्र आदि देवता भी जाते हैं।
श्लोक 52 (skanda.7.472.52)
त्रिकालं जगतीनाथ रुक्मिणीदर्शनाय च। सफला भारती तस्य कृष्णकृष्णेति या वदेत्
trikālaṁ jagatīnātha rukmiṇīdarśanāya ca| saphalā bhāratī tasya kṛṣṇakṛṣṇeti yā vadet
हे जगत्नाथ! तीनों संध्याओं में रुक्मिणी के दर्शन के लिए भी वे जाते हैं। जो वाणी 'कृष्ण-कृष्ण' कहती है, वही सफल वाणी है।
श्लोक 53 (skanda.7.472.53)
द्वारका यायिनं दृष्ट्वा गायंति दिविसंस्थिताः। नरकात्पितरो मुक्ताः प्रचलंति हसंति च
dvārakā yāyinaṁ dṛṣṭvā gāyaṁti divisaṁsthitāḥ| narakātpitaro muktāḥ pracalaṁti hasaṁti ca
द्वारका की ओर जाते हुए मनुष्य को देखकर स्वर्गवासी गाते हैं; नरक से मुक्त हुए पितर चलते हैं और हँसते हैं।
श्लोक 54 (skanda.7.472.54)
गोप्यं यत्पातकं पुंसां गोमती तद्व्यपोहति। स्मरणात्कीर्त्तनाद्वापि किं पुनः प्लवने कृते
gopyaṁ yatpātakaṁ puṁsāṁ gomatī tadvyapohati| smaraṇātkīrttanādvāpi kiṁ punaḥ plavane kṛte
मनुष्यों के जो छिपे हुए पाप हैं, गोमती उन्हें स्मरण अथवा कीर्तन मात्र से दूर कर देती है — फिर स्नान करने पर तो कहना ही क्या!
श्लोक 55 (skanda.7.472.55)
रुक्मिणीसहितं देवं शंखोद्धारे च शंखिनम्। पिंडारके चतुर्बाहुं दृष्ट्वाऽन्यैः किं करिष्यति
rukmiṇīsahitaṁ devaṁ śaṅkhoddhāre ca śaṅkhinam| piṁḍārake caturbāhuṁ dṛṣṭvā'nyaiḥ kiṁ kariṣyati
रुक्मिणी सहित देव को, शंखोद्धार में शंखधारी को, तथा पिण्डारक में चतुर्भुज रूप को देखकर, मनुष्य अन्य कर्मों से क्या करेगा?
श्लोक 56 (skanda.7.472.56)
रुक्मिणी देवकीपुत्रश्चक्रतीर्थं च गोमती। गोपीनां चंदनं लोके तुलसी दुर्लभा कलौ
rukmiṇī devakīputraścakratīrthaṁ ca gomatī| gopīnāṁ caṁdanaṁ loke tulasī durlabhā kalau
रुक्मिणी, देवकी के पुत्र, चक्रतीर्थ, गोमती, गोपियों का चन्दन — ये सब संसार में कलियुग में तुलसी की भाँति दुर्लभ हैं।
श्लोक 57 (skanda.7.472.57)
दुर्लभास्ते सुता ज्ञेया धरणीपापनाशकाः। गयां गत्वा तु ये पिंडं द्वारकां कृष्णदर्शनम्। करिष्यंति कलौ प्राप्ते वंजुलीसमुपोषणम्
durlabhāste sutā jñeyā dharaṇīpāpanāśakāḥ| gayāṁ gatvā tu ye piṁḍaṁ dvārakāṁ kṛṣṇadarśanam| kariṣyaṁti kalau prāpte vaṁjulīsamupoṣaṇam
वे पुत्र दुर्लभ जानने चाहिए, जो पृथ्वी के पापों का नाश करने वाले हैं — जो गया जाकर पिण्डदान करेंगे, द्वारका जाकर कृष्ण का दर्शन करेंगे, तथा कलियुग में वंजुली का उपवास करेंगे।
श्लोक 58 (skanda.7.472.58)
समं पुण्यफलं तेषां वंजुली द्वारका समा। येन न्यूना नाधिकाऽपि कथितं विष्णुना स्वयम्
samaṁ puṇyaphalaṁ teṣāṁ vaṁjulī dvārakā samā| yena nyūnā nādhikā'pi kathitaṁ viṣṇunā svayam
उनका पुण्यफल समान है; वंजुली द्वारका के समान है — न कम, न अधिक — ऐसा स्वयं विष्णु ने कहा है।
श्लोक 59 (skanda.7.472.59)
वंजुली चाधिकां राजञ्छृणु वक्ष्यामि कारणम्। द्वादश्यामुपवासेन द्वादश्यां पारणेन तु। प्राप्यते हेलया चैव तद्विष्णोः परमं पदम्
vaṁjulī cādhikāṁ rājañchṛṇu vakṣyāmi kāraṇam| dvādaśyāmupavāsena dvādaśyāṁ pāraṇena tu| prāpyate helayā caiva tadviṣṇoḥ paramaṁ padam
हे राजन्! वंजुली तो अधिक भी है, सुनिए, मैं इसका कारण बताता हूँ। द्वादशी को उपवास करने से तथा द्वादशी को ही पारण करने से, सहज ही विष्णु का वह परम पद प्राप्त हो जाता है।
श्लोक 60 (skanda.7.472.60)
गृहेषु वसतां तीर्थं गृहेषु वसतां तपः। गृहेषु वसतां मोक्षो वंजुलीसमुपोषणात्
gṛheṣu vasatāṁ tīrthaṁ gṛheṣu vasatāṁ tapaḥ| gṛheṣu vasatāṁ mokṣo vaṁjulīsamupoṣaṇāt
वंजुली का उपवास करने से घर में रहते हुए ही तीर्थ, घर में रहते हुए ही तप, तथा घर में रहते हुए ही मोक्ष प्राप्त हो जाता है।
श्लोक 61 (skanda.7.472.61)
वंजुली द्वारका गंगा गया गोविंदकीर्त्तनम्। गोमती गोकुलं गीता दुर्ल्लभं गोपिचन्दनम्
vaṁjulī dvārakā gaṁgā gayā goviṁdakīrttanam| gomatī gokulaṁ gītā durlabhaṁ gopicandanam
वंजुली, द्वारका, गंगा, गया, गोविन्द-कीर्तन, गोमती, गोकुल, गीता तथा गोपीचन्दन — ये सब दुर्लभ हैं।
श्लोक 62 (skanda.7.472.62)
एतच्छृणोति यो भक्त्या कृत्वा मनसि केशवम्। अश्वमेधसहस्रस्य फलमाप्नोति मानवः
etacchṛṇoti yo bhaktyā kṛtvā manasi keśavam| aśvamedhasahasrasya phalamāpnoti mānavaḥ
जो मनुष्य केशव को मन में रखते हुए भक्तिपूर्वक इसे सुनता है, वह सहस्र अश्वमेध यज्ञों का फल प्राप्त करता है।
श्लोक 63 (skanda.7.472.63)
श्रोष्यंति जागरे ये वै माहात्म्यं केशवस्य च। सर्वपापविनिर्मुक्ताः पदं यास्यंति वैष्णवम्
śroṣyaṁti jāgare ye vai māhātmyaṁ keśavasya ca| sarvapāpavinirmuktāḥ padaṁ yāsyaṁti vaiṣṇavam
जो जागरण में केशव के इस माहात्म्य को सुनेंगे, वे समस्त पापों से मुक्त होकर वैष्णव पद को प्राप्त होंगे।
श्लोक 64 (skanda.7.472.64)
पठिष्यंति नरा नित्यं ये वै श्रोप्यंति भक्तितः। तुलापुरुषदानस्य फलं ते प्राप्नुवंति हि
paṭhiṣyaṁti narā nityaṁ ye vai śropyaṁti bhaktitaḥ| tulāpuruṣadānasya phalaṁ te prāpnuvaṁti hi
जो मनुष्य नित्य इसका पाठ करेंगे तथा भक्तिपूर्वक सुनेंगे, वे तुलापुरुष-दान के फल को अवश्य प्राप्त करेंगे।
श्लोक 65 (skanda.7.472.65)
कृष्णजागरणे दानं यच्चाल्पमपि दीयते। सर्वं कोटिगुणं ज्ञेयमित्याहुः कवयो नृप
kṛṣṇajāgaraṇe dānaṁ yaccālpamapi dīyate| sarvaṁ koṭiguṇaṁ jñeyamityāhuḥ kavayo nṛpa
हे राजन्! कृष्ण के जागरण में जो दान भी अल्प मात्रा में दिया जाता है, वह सब करोड़ों गुना जानना चाहिए — ऐसा कवियों ने कहा है।
श्लोक 66 (skanda.7.472.66)
मानकूटं तुलाकूटं कन्याहयगवां क्रयात्। तत्सर्वं विलयं याति द्वादश्यां जागरे कृते
mānakūṭaṁ tulākūṭaṁ kanyāhayagavāṁ krayāt| tatsarvaṁ vilayaṁ yāti dvādaśyāṁ jāgare kṛte
माप में की गई धोखाधड़ी, तराजू में की गई धोखाधड़ी, तथा कन्या, घोड़े और गौ के क्रय-विक्रय से उत्पन्न पाप — यह सब द्वादशी को जागरण करने से नष्ट हो जाता है।