प्रभास खण्ड · अध्याय 471
चन्द्रशर्मा उपाख्यान: द्वारकागमन, कृष्ण से वरप्राप्ति तथा द्वारका नगरी की श्रेष्ठता का वर्णन
श्लोक 1 (skanda.7.471.1)
श्रीमार्कण्डेय उवाच। पितॄणां प्रेतरूपाणां कृत्वा वाक्यं महीपते। चंद्रशर्मा द्विजश्रेष्ठो द्वारकां समुपागतः
śrīmārkaṇḍeya uvāca| pitṝṇāṁ pretarūpāṇāṁ kṛtvā vākyaṁ mahīpate| caṁdraśarmā dvijaśreṣṭho dvārakāṁ samupāgataḥ
श्री मार्कण्डेय जी ने कहा — हे महीपते! प्रेतरूपी पितरों की बात मानकर द्विजश्रेष्ठ चन्द्रशर्मा द्वारका को आ पहुँचे।
श्लोक 2 (skanda.7.471.2)
रुक्मिणीसहितः कृष्णो यत्र तिष्ठति चान्वहम्। यत्र तिष्ठंति तीर्थानि तत्र यातो द्विजोत्तमः
rukmiṇīsahitaḥ kṛṣṇo yatra tiṣṭhati cānvaham| yatra tiṣṭhaṁti tīrthāni tatra yāto dvijottamaḥ
जहाँ रुक्मिणी सहित कृष्ण नित्य निवास करते हैं, तथा जहाँ तीर्थ स्थित हैं, वहाँ वह श्रेष्ठ ब्राह्मण गया।
श्लोक 3 (skanda.7.471.3)
यत्र तिष्ठंति यज्ञाश्च यत्र तिष्ठंति देवताः। यत्र तिष्ठंति ऋषयो मुनयो योगवित्तमाः
yatra tiṣṭhaṁti yajñāśca yatra tiṣṭhaṁti devatāḥ| yatra tiṣṭhaṁti ṛṣayo munayo yogavittamāḥ
जहाँ यज्ञ स्थित हैं, जहाँ देवता स्थित हैं, जहाँ योगविद्या में श्रेष्ठ ऋषि-मुनि स्थित हैं,
श्लोक 4 (skanda.7.471.4)
या पुरी सिद्धगंधर्वैः सेव्यते किंनरैर्नरेः। अप्सरोगणयक्षैश्च द्वारका सर्वकामदा
yā purī siddhagaṁdharvaiḥ sevyate kiṁnarairnaraiḥ| apsarogaṇayakṣaiśca dvārakā sarvakāmadā
जो पुरी सिद्धों, गन्धर्वों, किन्नरों, मनुष्यों, अप्सराओं तथा यक्षों द्वारा सेवित है — वह सर्वकामदायिनी द्वारका है।
श्लोक 5 (skanda.7.471.5)
स्वर्गारोहणनिश्रेणी वहते यत्र गोमती। सा पुरी मोक्षदा नृणां दृष्टा विप्रवरेण हि
svargārohaṇaniśreṇī vahate yatra gomatī| sā purī mokṣadā nṛṇāṁ dṛṣṭā vipravareṇa hi
जहाँ स्वर्ग की सीढ़ी रूपी गोमती बहती है, वह पुरी मनुष्यों को मोक्षदायिनी है — उस उत्तम ब्राह्मण ने उसका दर्शन किया।
श्लोक 6 (skanda.7.471.6)
यस्याः सीमां प्रविष्टस्य ब्रह्महत्यादिपातकम्। नश्यते दर्शनादेव तां पुरीं को न सेवते
yasyāḥ sīmāṁ praviṣṭasya brahmahatyādipātakam| naśyate darśanādeva tāṁ purīṁ ko na sevate
जिसकी सीमा में प्रवेश करते ही ब्रह्महत्या आदि पाप दर्शनमात्र से नष्ट हो जाते हैं, उस पुरी की सेवा कौन नहीं करेगा?
श्लोक 7 (skanda.7.471.7)
गत्वा कृष्णपुरीं दृष्ट्वा गोमतीं चैव सागरम्। मन्ये कृतार्थमात्मानं जीवितं यौवनं धनम्
gatvā kṛṣṇapurīṁ dṛṣṭvā gomatīṁ caiva sāgaram| manye kṛtārthamātmānaṁ jīvitaṁ yauvanaṁ dhanam
कृष्णपुरी जाकर, गोमती और सागर का दर्शन कर, मैं अपने आपको, अपने जीवन, यौवन और धन को कृतार्थ मानता हूँ।
श्लोक 8 (skanda.7.471.8)
दृष्ट्वा कृष्णपुरीं रम्यां कृष्णस्य मुखपंकजम्। धन्योऽहं कृत्यकृत्योहं सभाग्योऽहं धरातले
dṛṣṭvā kṛṣṇapurīṁ ramyāṁ kṛṣṇasya mukhapaṁkajam| dhanyo'haṁ kṛtyakṛtyohaṁ sabhāgyo'haṁ dharātale
सुन्दर कृष्णपुरी तथा कृष्ण के मुखकमल का दर्शन कर, मैं धन्य हूँ, कृतकृत्य हूँ, इस पृथ्वी पर सौभाग्यशाली हूँ।
श्लोक 9 (skanda.7.471.9)
दृष्ट्वा कृष्णमुखं रम्यं रुक्मिणीं द्वारकां पुरीम्। तीर्थकोटिसहस्रैस्तु सेवितैः किं प्रयोजनम्
dṛṣṭvā kṛṣṇamukhaṁ ramyaṁ rukmiṇīṁ dvārakāṁ purīm| tīrthakoṭisahasraistu sevitaiḥ kiṁ prayojanam
सुन्दर कृष्ण के मुख, रुक्मिणी तथा द्वारका पुरी का दर्शन करने पर, करोड़ों-सहस्रों तीर्थों के सेवन से भी क्या प्रयोजन है?
श्लोक 10 (skanda.7.471.10)
पुण्यैर्लक्षसहस्रैस्तु प्राप्ता द्वारवती शुभा। शुक्ला वैशाखमासे तु संप्राप्ता मधुसूदनी
puṇyairlakṣasahasraistu prāptā dvāravatī śubhā| śuklā vaiśākhamāse tu saṁprāptā madhusūdanī
लाखों पुण्यों से यह शुभ द्वारावती प्राप्त हुई है। वैशाख मास के शुक्लपक्ष में मुझे मधुसूदनी पर्व प्राप्त हुआ।
श्लोक 11 (skanda.7.471.11)
द्वादशी त्रिस्पृशानाम पापकोटिशतापहा। धन्याः सर्वे मनुष्यास्ते वैशाखे मधुसूदनी
dvādaśī trispṛśānāma pāpakoṭiśatāpahā| dhanyāḥ sarve manuṣyāste vaiśākhe madhusūdanī
त्रिस्पृशा नामक द्वादशी करोड़ों-सैकड़ों पापों का हरण करने वाली है। वैशाख मास में जो मधुसूदनी व्रत करते हैं, वे सब मनुष्य धन्य हैं।
श्लोक 12 (skanda.7.471.12)
संप्राप्ता त्रिस्पृशा यैस्तु बुधवारेण संयुता। न यज्ञैस्तु न वेदैस्तु न तीर्थैः कोटिसेवितैः। प्राप्यते तत्फलं नैव द्वारकायां यथा नृणाम्
saṁprāptā trispṛśā yaistu budhavāreṇa saṁyutā| na yajñaistu na vedaistu na tīrthaiḥ koṭisevitaiḥ| prāpyate tatphalaṁ naiva dvārakāyāṁ yathā nṛṇām
जिन्होंने बुधवार से युक्त त्रिस्पृशा तिथि प्राप्त की, न यज्ञों से, न वेदों से, न करोड़ों तीर्थों के सेवन से — मनुष्यों को वह फल कभी नहीं मिलता, जो द्वारका में मिलता है।
श्लोक 13 (skanda.7.471.13)
एवमुक्त्वा द्विजश्रेष्ठो गोमतीतीरमाश्रितः। उपस्पृश्य यथान्यायं शास्त्रदृष्टेन कर्मणा
evamuktvā dvijaśreṣṭho gomatītīramāśritaḥ| upaspṛśya yathānyāyaṁ śāstradṛṣṭena karmaṇā
ऐसा कहकर वह श्रेष्ठ ब्राह्मण गोमती के तट पर पहुँचा, तथा शास्त्रोक्त विधि से यथान्याय आचमन कर,
श्लोक 14 (skanda.7.471.14)
कृत्वा स्नानं यथोक्तं तु संतर्प्य पितृदेवताः। चक्रतीर्थात्समादाय शिलांश्चक्रांकिताञ्छुभान्। पूजिताः पुरुषसूक्तेन यथोक्तविधिना नृप
kṛtvā snānaṁ yathoktaṁ tu saṁtarpya pitṛdevatāḥ| cakratīrthātsamādāya śilāṁścakrāṁkitāñchubhān| pūjitāḥ puruṣasūktena yathoktavidhinā nṛpa
यथाविधि स्नान कर, पितरों और देवताओं का तर्पण कर, चक्रतीर्थ से चक्र-चिह्नित शुभ शिलाएँ लेकर, हे राजन्! उन्हें विधिपूर्वक पुरुषसूक्त से पूजित किया,
श्लोक 15 (skanda.7.471.15)
शिवपूजा कृता पश्चात्संस्मृत्य पितृभाषितम्। दत्त्वा पिंडोदकं सम्यक्पितॄणां विधिपूर्वकम्
śivapūjā kṛtā paścātsaṁsmṛtya pitṛbhāṣitam| dattvā piṁḍodakaṁ samyakpitṝṇāṁ vidhipūrvakam
फिर पितरों के कथन का स्मरण कर शिव की पूजा की, और पितरों को विधिपूर्वक पिण्डोदक अर्पित किया।
श्लोक 16 (skanda.7.471.16)
विलेपनं च वस्त्राणि पुष्पाणि धूपदीपको। नैवेद्यानि मनोज्ञानि कंदमूलफलानि च
vilepanaṁ ca vastrāṇi puṣpāṇi dhūpadīpako| naivedyāni manojñāni kaṁdamūlaphalāni ca
अनुलेपन, वस्त्र, पुष्प, धूप-दीप, मनोहर नैवेद्य तथा कंद-मूल-फल,
श्लोक 17 (skanda.7.471.17)
तांबूलं च सकर्पूरं कृत्वा नीराजनादिकम्। प्रदक्षिणां नमस्कारं स्तुतिपूर्वं पुनःपुनः
tāṁbūlaṁ ca sakarpūraṁ kṛtvā nīrājanādikam| pradakṣiṇāṁ namaskāraṁ stutipūrvaṁ punaḥpunaḥ
कर्पूर सहित ताम्बूल अर्पित कर, आरती आदि करके, प्रदक्षिणा, नमस्कार तथा स्तुति बार-बार करते हुए,
श्लोक 18 (skanda.7.471.18)
क्षमापयित्वा देवेशं चक्रे जागरणं ततः। यामत्रये व्यतीते तु चंद्रशर्मा ह्युवाच ह
kṣamāpayitvā deveśaṁ cakre jāgaraṇaṁ tataḥ| yāmatraye vyatīte tu caṁdraśarmā hyuvāca ha
देवेश्वर से क्षमा माँगकर फिर उसने रात्रि-जागरण किया। जब तीन प्रहर बीत गए, तब चन्द्रशर्मा ने कहा —
श्लोक 19 (skanda.7.471.19)
आतुरस्य च दीनस्य शृणु कृष्ण वचो मम। संसारभयसंत्रस्तं मां त्वमुद्धर केशव
āturasya ca dīnasya śṛṇu kṛṣṇa vaco mama| saṁsārabhayasaṁtrastaṁ māṁ tvamuddhara keśava
हे कृष्ण! पीड़ित और दीन हुए मेरे इस वचन को सुनिए। हे केशव! संसार के भय से त्रस्त मुझे आप उद्धार कीजिए।
श्लोक 20 (skanda.7.471.20)
त्वत्पादांबुज भक्तानां न दुःखं पापिनामपि। किं पुनः पापहीनानां द्वादशीसेविनां नृणाम्
tvatpādāṁbuja bhaktānāṁ na duḥkhaṁ pāpināmapi| kiṁ punaḥ pāpahīnānāṁ dvādaśīsevināṁ nṛṇām
आपके चरणकमलों के भक्त, पापी होने पर भी, दुःखी नहीं होते; फिर पापरहित, द्वादशीव्रत का पालन करने वाले मनुष्यों की तो बात ही क्या!
श्लोक 21 (skanda.7.471.21)
दशमीवेधजं पापं कथितं मम पूर्वजैः। दुष्कृतं नाशमायातु त्वत्प्रसादाज्जनार्द्दन
daśamīvedhajaṁ pāpaṁ kathitaṁ mama pūrvajaiḥ| duṣkṛtaṁ nāśamāyātu tvatprasādājjanārddana
दशमी के वेध से उत्पन्न पाप मेरे पूर्वजों ने बताया है। हे जनार्दन! आपकी कृपा से वह दुष्कृत नष्ट हो जाए।
श्लोक 22 (skanda.7.471.22)
सविद्धं त्वद्दिनं कृष्ण यत्कृतं जागरं हरे। तत्पापं विलयं यातु यथालवणमंभसि
saviddhaṁ tvaddinaṁ kṛṣṇa yatkṛtaṁ jāgaraṁ hare| tatpāpaṁ vilayaṁ yātu yathālavaṇamaṁbhasi
हे कृष्ण! जो आपका दिन दोषयुक्त हुआ, जो जागरण दोषयुक्त हुआ, हे हरि! वह पाप उसी तरह विलीन हो जाए, जैसे नमक जल में घुल जाता है।
श्लोक 23 (skanda.7.471.23)
सविद्धं वासरं यस्मा त्कृतं मम पितामहैः। प्रेतत्वं तेन संप्राप्तं महादुःखप्रसाधकम्
saviddhaṁ vāsaraṁ yasmāt kṛtaṁ mama pitāmahaiḥ| pretatvaṁ tena saṁprāptaṁ mahāduḥkhaprasādhakam
जिस कारण मेरे पितामहों ने दोषयुक्त दिन मनाया, उसी से उन्हें महादुःखकारक प्रेतत्व प्राप्त हुआ।
श्लोक 24 (skanda.7.471.24)
यथा प्रेतत्वनिर्मुक्ता मम पूर्वपितामहाः। मुक्तिं प्रयांति देवेश तथा कुरु जगत्पते
yathā pretatvanirmuktā mama pūrvapitāmahāḥ| muktiṁ prayāṁti deveśa tathā kuru jagatpate
हे देवेश! जगत्पते! ऐसा कीजिए कि प्रेतत्व से मुक्त होकर मेरे पूर्वज पितर मुक्ति को प्राप्त हों।
श्लोक 25 (skanda.7.471.25)
पुनरेव यदुश्रेष्ठ प्रसादं कर्तुमर्हसि। अविद्यामोहितेनापि न कृतं तव पूजनम्
punareva yaduśreṣṭha prasādaṁ kartumarhasi| avidyāmohitenāpi na kṛtaṁ tava pūjanam
हे यदुश्रेष्ठ! फिर से कृपा कीजिए। अज्ञान से मोहित होकर भी मैंने आपकी पूजा नहीं की,
श्लोक 26 (skanda.7.471.26)
मया पापेन देवेश शिवभक्तिः समाश्रिता। तव भक्तिः कृता नैव न कृतं तव वासरम्
mayā pāpena deveśa śivabhaktiḥ samāśritā| tava bhaktiḥ kṛtā naiva na kṛtaṁ tava vāsaram
हे देवेश! मुझ पापी ने केवल शिवभक्ति का आश्रय लिया; आपकी भक्ति कभी नहीं की, आपका पावन दिन कभी नहीं मनाया।
श्लोक 27 (skanda.7.471.27)
न दृष्टा द्वारका कृष्ण न स्नातो गोमतीजले। न दृष्टं पादपद्मं च त्वदीयं मोक्षदा यकम्
na dṛṣṭā dvārakā kṛṣṇa na snāto gomatījale| na dṛṣṭaṁ pādapadmaṁ ca tvadīyaṁ mokṣadāyakam
हे कृष्ण! न मैंने द्वारका का दर्शन किया, न गोमती के जल में स्नान किया, न आपके मोक्षदायक चरणकमलों का दर्शन किया।
श्लोक 28 (skanda.7.471.28)
न कृता द्वारकायात्रा दृष्ट्वा सोमेश्वरं प्रभुम्। विफलं सुकृतं जातं यन्मया समुपार्जितम्
na kṛtā dvārakāyātrā dṛṣṭvā someśvaraṁ prabhum| viphalaṁ sukṛtaṁ jātaṁ yanmayā samupārjitam
सोमेश्वर प्रभु का दर्शन करके भी मैंने द्वारका की यात्रा नहीं की; जो सुकृत मैंने अर्जित किया, वह सब व्यर्थ हो गया।
श्लोक 29 (skanda.7.471.29)
मत्पूर्वजैस्तु कथितं सर्वमेव सुरेश्वर। तत्पुण्यं मा वृथा यातु प्रसादात्तव केशव
matpūrvajaistu kathitaṁ sarvameva sureśvara| tatpuṇyaṁ mā vṛthā yātu prasādāttava keśava
हे सुरेश्वर! मेरे पूर्वजों ने यह सब मुझे बताया। हे केशव! आपकी कृपा से वह पुण्य व्यर्थ न जाए।
श्लोक 30 (skanda.7.471.30)
दृष्टं तु तव वक्त्रं च दुर्ल्लभं भुवनत्रये। तन्नास्ति देवकीपुत्र पुराणेषु श्रुतं मया
dṛṣṭaṁ tu tava vaktraṁ ca durlabhaṁ bhuvanatraye| tannāsti devakīputra purāṇeṣu śrutaṁ mayā
आपका मुख, जो त्रिभुवन में भी दुर्लभ है, वह मैंने देखा। हे देवकीपुत्र! ऐसा जो पुराणों में मैंने सुना है, वैसा दुर्लभ कुछ और नहीं है।
श्लोक 31 (skanda.7.471.31)
सापराधास्तु ये केचिच्छिशुपालादयः स्मृताः। त्वत्करेण हताः कोपान्मुक्तिं प्राप्ता महीवराः
sāparādhāstu ye kecicchiśupālādayaḥ smṛtāḥ| tvatkareṇa hatāḥ kopānmuktiṁ prāptā mahīvarāḥ
जो अपराधी शिशुपाल आदि कहे गए हैं, वे आपके हाथों क्रोधवश मारे जाकर भी मुक्ति को प्राप्त हुए, हे पृथ्वीश्रेष्ठ!
श्लोक 32 (skanda.7.471.32)
अद्यप्रभृति कर्त्तव्यं पूजनं प्रत्यहं च तत्। पलार्धेनापि विद्धं स्याद्भोक्तव्यं वासरे तव
adyaprabhṛti karttavyaṁ pūjanaṁ pratyahaṁ ca tat| palārdhenāpi viddhaṁ syādbhoktavyaṁ vāsare tava
आज से मैं आपकी पूजा प्रतिदिन करूँगा। यदि आपका व्रत-दिन आधे पल से भी दोषयुक्त हो, तब भी मैं उस दिन भोजन करूँगा।
श्लोक 33 (skanda.7.471.33)
त्वत्प्रिया च मया कार्य्या द्वादशी व्रतसंयुता। भक्तिर्भागवतानां च कार्य्या प्राणैर्द्धनैरपि
tvatpriyā ca mayā kāryā dvādaśī vratasaṁyutā| bhaktirbhāgavatānāṁ ca kāryā prāṇairddhanairapi
मैं आपकी प्रिय द्वादशी को व्रतपूर्वक मनाऊँगा; भागवतों की भक्ति भी प्राणों और धन से करूँगा।
श्लोक 34 (skanda.7.471.34)
नित्यं नामसहस्रं तु पठनीयं तव प्रियम्। पूजा तु तुलसीपत्रैर्मया कार्या सदैव हि
nityaṁ nāmasahasraṁ tu paṭhanīyaṁ tava priyam| pūjā tu tulasīpatrairmayā kāryā sadaiva hi
मैं नित्य आपका प्रिय सहस्रनाम पढ़ूँगा। तुलसीपत्रों से आपकी पूजा सदा करूँगा।
श्लोक 35 (skanda.7.471.35)
तुलसीकाष्ठसंभूता माला धार्य्या सदा मया। नृत्यं गीतं च कर्त्तव्यं संप्राप्ते जागरे तव
tulasīkāṣṭhasaṁbhūtā mālā dhāryā sadā mayā| nṛtyaṁ gītaṁ ca karttavyaṁ saṁprāpte jāgare tava
तुलसी की काष्ठ से बनी माला मैं सदा धारण करूँगा। जब आपका जागरण आएगा, तब नृत्य और गीत भी करूँगा।
श्लोक 36 (skanda.7.471.36)
द्वारकायां प्रकर्त्तव्यं प्रत्यहं गमनं मया। त्वत्कथाश्रवणार्थं च नित्यं पुस्तकवाचनम्
dvārakāyāṁ prakarttavyaṁ pratyahaṁ gamanaṁ mayā| tvatkathāśravaṇārthaṁ ca nityaṁ pustakavācanam
प्रतिदिन द्वारका में जाऊँगा; आपकी कथा सुनने के लिए नित्य ग्रन्थ-पाठ कराऊँगा।
श्लोक 37 (skanda.7.471.37)
नित्यं पादोदकं मूर्ध्ना मया धार्यं सुभक्तितः। नैवेद्यभक्षणं चैव करिष्यामि सुभक्तितः
nityaṁ pādodakaṁ mūrdhnā mayā dhāryaṁ subhaktitaḥ| naivedyabhakṣaṇaṁ caiva kariṣyāmi subhaktitaḥ
आपके चरणोदक को मैं नित्य भक्तिपूर्वक सिर पर धारण करूँगा; और आपके नैवेद्य का भक्षण भी भक्तिपूर्वक करूँगा।
श्लोक 38 (skanda.7.471.38)
निर्माल्यं शिरसा धार्य्यं त्वदीयं सादरं मया। तव दत्त्वा यदिष्टं तु भक्षणीयं सदा मया
nirmālyaṁ śirasā dhāryaṁ tvadīyaṁ sādaraṁ mayā| tava dattvā yadiṣṭaṁ tu bhakṣaṇīyaṁ sadā mayā
आपके निर्माल्य को मैं आदरपूर्वक सिर पर धारण करूँगा। आपको अर्पित कर जो कुछ भी अभीष्ट होगा, उसे मैं सदा ग्रहण करूँगा।
श्लोक 39 (skanda.7.471.39)
तथा तथा प्रकर्त्तव्यं येन तुष्टिर्भवेत्तव। तथ्यमेतन्मया कृष्ण तवाग्रे परिकीर्तितम्
tathā tathā prakarttavyaṁ yena tuṣṭirbhavettava| tathyametanmayā kṛṣṇa tavāgre parikīrtitam
जिस-जिस प्रकार से आपकी संतुष्टि हो, वैसा ही मैं करूँगा। हे कृष्ण! यह सत्य वचन मैंने आपके सामने कहा है।
श्लोक 40 (skanda.7.471.40)
श्रीकृष्ण उवाच। साधुसाधु महाभाग चन्द्रशर्मन्द्विजोत्तम। आगमिष्यंति मल्लोके त्वया सह पितामहाः
śrīkṛṣṇa uvāca| sādhusādhu mahābhāga caṁdraśarmandvijottama| āgamiṣyaṁti malloke tvayā saha pitāmahāḥ
श्री कृष्ण ने कहा — साधु, साधु! हे महाभाग द्विजोत्तम चन्द्रशर्मा! तुम्हारे साथ तुम्हारे पितामह भी मेरे लोक में आएँगे।
श्लोक 41 (skanda.7.471.41)
पश्य प्रेतत्वनिर्मुक्ता मत्प्रसादाद्द्विजोत्तम। आकाशे गरुडारूढास्तव पूर्वपितामहाः
paśya pretatvanirmuktā matprasādāddvijottama| ākāśe garuḍārūḍhāstava pūrvapitāmahāḥ
हे द्विजोत्तम! देखो, मेरी कृपा से प्रेतत्व से मुक्त होकर तुम्हारे पूर्वज पितर आकाश में गरुड़ पर आरूढ़ होकर आ रहे हैं।
श्लोक 42 (skanda.7.471.42)
पितामहा ऊचुः। त्वत्प्रसादाद्वयं पुत्र मुक्तिं प्राप्ता न संशयः। प्रेतयोनेर्विनिर्मुक्ताः कृष्णवक्त्रावलोकनात्
pitāmahā ūcuḥ| tvatprasādādvayaṁ putra muktiṁ prāptā na saṁśayaḥ| pretayonervinirmuktāḥ kṛṣṇavaktrāvalokanāt
पितामहों ने कहा — हे पुत्र! तुम्हारे प्रसाद से हमें निःसंदेह मुक्ति प्राप्त हुई है; कृष्ण के मुख के दर्शन से हम प्रेतयोनि से मुक्त हुए हैं।
श्लोक 43 (skanda.7.471.43)
धन्यास्ते मानुषे लोके पुत्रपौत्रप्रपौत्रकाः। दृष्ट्वा श्रीसोमनाथं तु कृष्णं पश्यंति द्वारकाम्
dhanyāste mānuṣe loke putrapautraprapautrakāḥ| dṛṣṭvā śrīsomanāthaṁ tu kṛṣṇaṁ paśyaṁti dvārakām
मनुष्य-लोक में वे पुत्र, पौत्र तथा प्रपौत्र धन्य हैं, जो श्री सोमनाथ का दर्शन कर द्वारका में कृष्ण का दर्शन करते हैं।
श्लोक 44 (skanda.7.471.44)
धन्या च विधवा नारी कृष्णयात्रां करोति या। उद्धरिष्यति लोकेऽस्मिन्कुलानां निरयाच्छतम्
dhanyā ca vidhavā nārī kṛṣṇayātrāṁ karoti yā| uddhariṣyati loke'sminkulānāṁ nirayācchatam
जो विधवा स्त्री कृष्ण की यात्रा करती है, वह धन्य है; वह इस लोक में अपने सौ कुलों को नरक से उद्धार करती है।
श्लोक 45 (skanda.7.471.45)
श्वपचोऽपि करोत्येवं यात्रां च हरिशांकरीम्। स याति परमां मुक्तिं पितृभिः परिवारितः
śvapaco'pi karotyevaṁ yātrāṁ ca hariśāṁkarīm| sa yāti paramāṁ muktiṁ pitṛbhiḥ parivāritaḥ
यहाँ तक कि चाण्डाल भी यदि हरि-शंकर की इस यात्रा को करता है, तो वह अपने पितरों से घिरा हुआ परम मुक्ति को प्राप्त होता है।
श्लोक 46 (skanda.7.471.46)
यः पुनस्तीर्थसंन्यासं कृत्वा तिष्ठति तत्र वै। विष्णुलोकान्निवृत्तिर्न कल्पकोटिशतैरपि
yaḥ punastīrthasaṁnyāsaṁ kṛtvā tiṣṭhati tatra vai| viṣṇulokānnivṛttirna kalpakoṭiśatairapi
जो तीर्थ में संन्यास लेकर वहीं रहता है, उसकी विष्णुलोक से पुनरावृत्ति सैकड़ों करोड़ों कल्पों में भी नहीं होती।
श्लोक 47 (skanda.7.471.47)
वंचितास्ते न सन्देहो दृष्ट्वा सोमेश्वरं प्रभुम्। दृष्टं कृष्णमुखं नैव न स्नाता गोमतीजले
vaṁcitāste na sandeho dṛṣṭvā someśvaraṁ prabhum| dṛṣṭaṁ kṛṣṇamukhaṁ naiva na snātā gomatījale
जिन्होंने सोमेश्वर प्रभु का दर्शन किया, परन्तु कृष्ण के मुख का दर्शन नहीं किया, गोमती के जल में स्नान नहीं किया, वे निःसंदेह वंचित रह गए।
श्लोक 48 (skanda.7.471.48)
किं जलैर्बहुभिः पुण्यैस्तीर्थकोटिसमुद्भवैः। दृष्ट्वा सोमेश्वरं यस्तु द्वारकां नैव गच्छति। धिक्कुर्वंति च तं पापं पितरो दिवि संस्थिताः
kiṁ jalairbahubhiḥ puṇyaistīrthakoṭisamudbhavaiḥ| dṛṣṭvā someśvaraṁ yastu dvārakāṁ naiva gacchati| dhikkurvaṁti ca taṁ pāpaṁ pitaro divi saṁsthitāḥ
करोड़ों तीर्थों से उत्पन्न पुण्यमय जलों से क्या लाभ? जो सोमेश्वर का दर्शन कर द्वारका नहीं जाता, स्वर्गवासी पितर उस पापी को धिक्कारते हैं।
श्लोक 49 (skanda.7.471.49)
दृष्ट्वा सोमेश्वरं देवं कृष्णं दृष्ट्वा पुनः शिवम्। सौपर्णे कथितं पुण्यं यात्राशतसमुद्भवम्
dṛṣṭvā someśvaraṁ devaṁ kṛṣṇaṁ dṛṣṭvā punaḥ śivam| sauparṇe kathitaṁ puṇyaṁ yātrāśatasamudbhavam
सोमेश्वर देव का दर्शन कर, फिर कृष्ण तथा शिव का दर्शन करने पर, गरुड़-पुराण में जो पुण्य कहा गया है, वह सौ यात्राओं के बराबर है।
श्लोक 50 (skanda.7.471.50)
दृष्ट्वा सोमेश्वरं देवं कृष्णं नैव प्रपश्यति। मोहाद्व्यर्थगतं तस्य सर्वं संसारकर्म वै
dṛṣṭvā someśvaraṁ devaṁ kṛṣṇaṁ naiva prapaśyati| mohādvyarthagataṁ tasya sarvaṁ saṁsārakarma vai
जो सोमेश्वर देव का दर्शन कर कृष्ण का दर्शन नहीं करता, मोहवश उसका समस्त सांसारिक कर्म व्यर्थ हो जाता है।
श्लोक 51 (skanda.7.471.51)
आगत्य यः प्रभासे च कृष्णं पश्यति वै नरः। प्रभासायुतसंख्यं तु फलमाप्नोति यत्नतः
āgatya yaḥ prabhāse ca kṛṣṇaṁ paśyati vai naraḥ| prabhāsāyutasaṁkhyaṁ tu phalamāpnoti yatnataḥ
जो मनुष्य प्रभास में आकर कृष्ण का दर्शन करता है, वह प्रयत्नपूर्वक दस हजार प्रभास-यात्राओं के फल को प्राप्त करता है।
श्लोक 52 (skanda.7.471.52)
यस्मात्सर्वाणि तीर्थानि सर्वे देवास्तथा मखाः। द्वारकायां समायांति त्रिकालं कृष्णसंनिधौ
yasmātsarvāṇi tīrthāni sarve devāstathā makhāḥ| dvārakāyāṁ samāyāṁti trikālaṁ kṛṣṇasannidhau
क्योंकि समस्त तीर्थ, समस्त देवता तथा समस्त यज्ञ तीनों संध्याओं में द्वारका में कृष्ण के समीप आते हैं,
श्लोक 53 (skanda.7.471.53)
तीर्थैर्नानाविधैः पुत्र तत्स्थानैः किं प्रयोजनम्। फलं समस्ततीर्थानां दृष्ट्वा द्वारवतीं लभेत्
tīrthairnānāvidhaiḥ putra tatsthānaiḥ kiṁ prayojanam| phalaṁ samastatīrthānāṁ dṛṣṭvā dvāravatīṁ labhet
हे पुत्र! विविध तीर्थों तथा उनके स्थानों से क्या प्रयोजन? द्वारावती का दर्शन कर मनुष्य समस्त तीर्थों का फल प्राप्त कर लेता है।
श्लोक 54 (skanda.7.471.54)
हते कंसे जरासन्धे नरके च निपातिते। उत्तारिते भुवो भारे कृष्णो देवकिनंदनः। चक्रे द्वारवतीं रम्यां सन्निधौ सागरस्य च
hate kaṁse jarāsandhe narake ca nipātite| uttārite bhuvo bhāre kṛṣṇo devakinaṁdanaḥ| cakre dvāravatīṁ ramyāṁ sannidhau sāgarasya ca
कंस के मारे जाने पर, जरासंध और नरकासुर के गिराए जाने पर, तथा पृथ्वी के भार के उतर जाने पर, देवकीनन्दन कृष्ण ने सागर के समीप रमणीय द्वारावती का निर्माण किया।
श्लोक 55 (skanda.7.471.55)
स्थितः प्रीतमनाः कृष्णो लप्स्यते कामिनीसुखम्
sthitaḥ prītamanāḥ kṛṣṇo lapsyate kāminīsukham
वहाँ प्रसन्नचित्त होकर स्थित कृष्ण अपनी प्रियाओं के साथ सुख का उपभोग करेंगे।
श्लोक 56 (skanda.7.471.56)
ब्रह्माग्निवायुसूर्याश्च वासवाद्या दिवौकसः। मर्त्त्या विप्राश्च राजानः पातालात्पन्नगेश्वराः
brahmāgnivāyusūryāśca vāsavādyā divaukasaḥ| marttyā viprāśca rājānaḥ pātālātpannageśvarāḥ
ब्रह्मा, अग्नि, वायु, सूर्य तथा इन्द्र आदि स्वर्गवासी देवता, मनुष्य, ब्राह्मण, राजा, तथा पाताल से नागराज —
श्लोक 57 (skanda.7.471.57)
नद्यो नदाश्च शैलाश्च वनान्युपवनानि च। पुरग्रामा ह्यरण्यानि सागराश्च सरांसि च
nadyo nadāśca śailāśca vanānyupavanāni ca| puragrāmā hyaraṇyāni sāgarāśca sarāṁsi ca
नदियाँ, नद, पर्वत, वन, उपवन, नगर, गाँव, अरण्य, सागर तथा सरोवर —
श्लोक 58 (skanda.7.471.58)
यक्षाश्चासुरगंधर्वाः सिद्धा विद्याधरास्तथा। रम्भाद्यप्सरसश्चैव प्रह्लादाद्या दितेः सुताः। रक्षा विभीषणाद्याश्च धनदो रक्ष नायकः
yakṣāścāsuragaṁdharvāḥ siddhā vidyādharāstathā| raṁbhādyapsarasaścaiva prahlādādyā diteḥ sutāḥ| rakṣā vibhīṣaṇādyāśca dhanado rakṣa nāyakaḥ
यक्ष, असुर, गन्धर्व, सिद्ध, विद्याधर, रम्भा आदि अप्सराएँ, प्रह्लाद आदि दिति के पुत्र, विभीषण आदि राक्षस, तथा राक्षसनायक कुबेर —
श्लोक 59 (skanda.7.471.59)
ऋषयो मुनयः सिद्धाः सनकाद्याश्च योगिनः। ग्रहा ऋक्षाणि योगाश्च ध्रुवः परमवैष्णवः
ṛṣayo munayaḥ siddhāḥ sanakādyāśca yoginaḥ| grahā ṛkṣāṇi yogāśca dhruvaḥ paramavaiṣṇavaḥ
ऋषि, मुनि, सिद्ध, सनक आदि योगीजन, ग्रह, नक्षत्र, योग, तथा परम वैष्णव ध्रुव —
श्लोक 60 (skanda.7.471.60)
यत्किंचित्त्रिषु लोकेषु तिष्ठते स्थाणुजंगमम्। श्रीकृष्णसन्निधौ नित्यं प्रत्यहं तिष्ठते सदा
yatkiṁcittriṣu lokeṣu tiṣṭhate sthāṇujaṁgamam| śrīkṛṣṇasannidhau nityaṁ pratyahaṁ tiṣṭhate sadā
तीनों लोकों में जो कुछ भी स्थावर-जंगम है, वह सब नित्य, प्रतिदिन, सदा श्रीकृष्ण के समीप विद्यमान रहता है।
श्लोक 61 (skanda.7.471.61)
न त्यजंति पुरीं पुण्यां द्वारकां कृष्णसेविताम्। सा त्वया सेविता पुत्र सांप्रतं कृष्णदर्शनात्। पिशाचयोनिनिर्मुक्ता यास्यामः परमां गतिम्
na tyajaṁti purīṁ puṇyāṁ dvārakāṁ kṛṣṇasevitām| sā tvayā sevitā putra sāṁprataṁ kṛṣṇadarśanāt| piśācayoninirmuktā yāsyāmaḥ paramāṁ gatim
वे उस पुण्यपुरी द्वारका को, जो कृष्ण द्वारा सेवित है, कभी नहीं छोड़ते। हे पुत्र! उसी पुरी की तुमने अभी कृष्ण के दर्शन से सेवा की; हम पिशाचयोनि से मुक्त होकर परम गति को प्राप्त होंगे।
श्लोक 62 (skanda.7.471.62)
द्वादशीवेधजंपापं द्वारकायाः प्रभावतः। नष्टं पुत्र न सन्देहः संप्राप्ताः परमं पदम्
dvādaśīvedhajaṁpāpaṁ dvārakāyāḥ prabhāvataḥ| naṣṭaṁ putra na sandehaḥ saṁprāptāḥ paramaṁ padam
द्वादशी के वेध से उत्पन्न पाप द्वारका के प्रभाव से नष्ट हो गया, हे पुत्र! इसमें संशय नहीं; हमें परम पद प्राप्त हो गया है।
श्लोक 63 (skanda.7.471.63)
द्वादशीवेधसम्भूतं यत्त्वया पापमर्जितम्। कृष्णस्य दर्शनात्क्षीणं न जह्यं द्वादशीव्रतम्
dvādaśīvedhasambhūtaṁ yattvayā pāpamarjitam| kṛṣṇasya darśanātkṣīṇaṁ na jahyaṁ dvādaśīvratam
जो पाप तुमने द्वादशी के वेध से अर्जित किया था, वह कृष्ण के दर्शन से क्षीण हो गया; परन्तु द्वादशी व्रत को कभी मत त्यागना।
श्लोक 64 (skanda.7.471.64)
रक्षणीयं प्रयत्नेन वेधो दशमिसम्भवः। नो चेत्पुत्र न संदेहः प्रेतयोनिमवाप्स्यसि
rakṣaṇīyaṁ prayatnena vedho daśamisambhavaḥ| no cetputra na saṁdehaḥ pretayonimavāpsyasi
दशमी के वेध से रक्षा प्रयत्नपूर्वक करनी चाहिए। हे पुत्र! यदि ऐसा नहीं किया, तो निःसंदेह तुम भी प्रेतयोनि को प्राप्त होगे।
श्लोक 65 (skanda.7.471.65)
त्रैलोक्य संभवं पापं तेषां भवति भूतले। सशल्यं ये प्रकुर्वंति वासरं कृष्णसंज्ञकम्
trailokya saṁbhavaṁ pāpaṁ teṣāṁ bhavati bhūtale| saśalyaṁ ye prakurvaṁti vāsaraṁ kṛṣṇasaṁjñakam
जो लोग कृष्ण के दिन को सदोष रूप से मनाते हैं, उनके लिए इस भूतल पर त्रैलोक्य में उत्पन्न होने वाला पाप लगता है।
श्लोक 66 (skanda.7.471.66)
प्रायश्चित्तं न तस्यास्ति सशल्यं वासरं हरेः। ये कुर्वंति न ते यांति मन्वतरशतैर्दिवम्
prāyaścittaṁ na tasyāsti saśalyaṁ vāsaraṁ hareḥ| ye kurvaṁti na te yāṁti manvatataraśatairdivam
उसके लिए कोई प्रायश्चित्त नहीं है। जो हरि के दिन को सदोष रूप से मनाते हैं, वे सैकड़ों मन्वन्तरों में भी स्वर्ग को नहीं जाते।
श्लोक 67 (skanda.7.471.67)
प्रेतत्वं दुःसहं पुत्र दुःसहा यमयातना। तस्मात्पुत्र न कर्त्तव्यं सशल्यं द्वादशीव्रतम्
pretatvaṁ duḥsahaṁ putra duḥsahā yamayātanā| tasmātputra na karttavyaṁ saśalyaṁ dvādaśīvratam
हे पुत्र! प्रेतत्व असहनीय है, यम की यातना असहनीय है। अतः, हे पुत्र, सदोष द्वादशी व्रत कभी नहीं करना चाहिए।
श्लोक 68 (skanda.7.471.68)
कारयंति हि ये त्वज्ञाः कूटयुक्ताश्च हेतुकाः। प्रेतयोनिं प्रयास्यंति पितृभिः सह सर्वतः
kārayaṁti hi ye tvajñāḥ kūṭayuktāśca hetukāḥ| pretayoniṁ prayāsyaṁti pitṛbhiḥ saha sarvataḥ
जो अज्ञानी, कपटी तथा कुतर्की इसे कराते हैं, वे अपने पितरों सहित पूर्णतः प्रेतयोनि को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 69 (skanda.7.471.69)
द्वादशी दशमीविद्धा संतानप्रविनाशिनी। ध्वंसिनी पूर्वपुण्यानां कृष्णभक्तिविनाशिनी
dvādaśī daśamīviddhā saṁtānapravināśinī| dhvaṁsinī pūrvapuṇyānāṁ kṛṣṇabhaktivināśinī
दशमी से विद्ध द्वादशी संतान का नाश करने वाली, पूर्व पुण्यों का विनाश करने वाली, तथा कृष्णभक्ति का विनाश करने वाली है।
श्लोक 70 (skanda.7.471.70)
स्वस्ति तेऽस्तु गमिष्यामः प्रसादाद्रुक्मिणीपतेः। प्राप्तं विष्णुपदं पुत्र अपुनर्भवसंज्ञकम्
svasti te'stu gamiṣyāmaḥ prasādādrukmiṇīpateḥ| prāptaṁ viṣṇupadaṁ putra apunarbhavasaṁjñakam
तुम्हारा कल्याण हो, हम रुक्मिणीपति की कृपा से जा रहे हैं। हे पुत्र! हमें विष्णुपद प्राप्त हो गया, जिसे अपुनर्भव कहते हैं।
श्लोक 71 (skanda.7.471.71)
श्रीकृष्ण उवाच। चंद्रशर्मन्प्रसन्नोऽहं तव भक्त्या द्विजोत्तम। शैवभावप्रपन्नोऽपि यस्त्वं जातोऽसि वैष्णवः
śrīkṛṣṇa uvāca| caṁdraśarmanprasanno'haṁ tava bhaktyā dvijottama| śaivabhāvaprapanno'pi yastvaṁ jāto'si vaiṣṇavaḥ
श्री कृष्ण ने कहा — हे द्विजोत्तम चन्द्रशर्मा! तुम्हारी भक्ति से मैं प्रसन्न हूँ; शैवभाव में समर्पित होकर भी तुम वैष्णव बन गए हो।
श्लोक 72 (skanda.7.471.72)
नवसप्ततिवर्षाणि न कृतं वासरे मम। संपूर्णं मत्प्रसादेन तव जातं न संशयः
navasaptativarṣāṇi na kṛtaṁ vāsare mama| saṁpūrṇaṁ matprasādena tava jātaṁ na saṁśayaḥ
उनहत्तर वर्षों तक मेरे दिन को नहीं मनाया, तथापि मेरी कृपा से तुम्हारा सब पूर्ण हो गया, इसमें संशय नहीं।
श्लोक 73 (skanda.7.471.73)
एकेनैवोपवासेन त्रिस्पृशासंभवेन हि। द्वारकायाः प्रसादेन मद्दृष्ट्यालोकनेन हि
ekenaivopavāsena trispṛśāsaṁbhavena hi| dvārakāyāḥ prasādena maddṛṣṭyālokanena hi
त्रिस्पृशा तिथि पर किए गए एक ही उपवास से, द्वारका की कृपा से, तथा मुझे नेत्रों से देखने से ही यह सब हुआ।
श्लोक 74 (skanda.7.471.74)
अविद्यामोहितेनैव शिवभक्त्या ममार्चनम्। न कृतं मत्प्रसादेन कृतं चैव भविष्यति
avidyāmohitenaiva śivabhaktyā mamārcanam| na kṛtaṁ matprasādena kṛtaṁ caiva bhaviṣyati
अज्ञान से मोहित होकर तुमने शिवभक्ति में रहते हुए मेरा पूजन नहीं किया; परन्तु अब मेरी कृपा से वह पूजन हो गया, ऐसा ही मानो।
श्लोक 75 (skanda.7.471.75)
वैशाखे यैरहं दृष्टो द्वारकायां द्विजोत्तम। त्रिस्पृशावासरे चैव वंजुलीवासरे तथा
vaiśākhe yairahaṁ dṛṣṭo dvārakāyāṁ dvijottama| trispṛśāvāsare caiva vaṁjulīvāsare tathā
हे द्विजोत्तम! जिन्होंने वैशाख मास में, त्रिस्पृशा दिन को, तथा वंजुली दिन को द्वारका में मेरा दर्शन किया,
श्लोक 76 (skanda.7.471.76)
उन्मीलिनीदिने प्राप्ते प्राप्ते वा पक्षवर्द्धिनी। नैतेषां चापराधोऽस्ति यद्यपि ब्रह्मघातकाः
unmīlinīdine prāpte prāpte vā pakṣavarddhinī| naiteṣāṁ cāparādho'sti yadyapi brahmaghātakāḥ
अथवा उन्मीलिनी दिवस पर, या पक्षवर्धिनी के दिन — उनके लिए कोई अपराध नहीं रहता, भले ही वे ब्रह्महत्यारे ही क्यों न हों।
श्लोक 77 (skanda.7.471.77)
जन्मप्रभृति पुण्यस्य प्रकृतस्यापि भूसुर। मत्पुरीदर्शनेनापि फलभागी भवेन्नरः
janmaprabhṛti puṇyasya prakṛtasyāpi bhūsura| matpurīdarśanenāpi phalabhāgī bhavennaraḥ
हे भूसुर! जन्म से किए गए पुण्य का फल भी, मेरी पुरी के दर्शन मात्र से, मनुष्य भागी बन जाता है।
श्लोक 78 (skanda.7.471.78)
दृष्ट्वा समस्ततीर्थानि प्रभासादीनि भूतले। मत्पुरीदर्शनेनैव पृष्ट्वाऽपीह भवेत्फलम्
dṛṣṭvā samastatīrthāni prabhāsādīni bhūtale| matpurīdarśanenaiva pṛṣṭvā'pīha bhavetphalam
इस पृथ्वी पर प्रभास आदि समस्त तीर्थों का दर्शन करने से जो फल मिलता है, वह मेरी पुरी का दर्शन करने से ही यहाँ प्राप्त हो जाता है।
श्लोक 79 (skanda.7.471.79)
माहात्म्यं द्वारकायास्तु मद्दिने यत्र तत्र वा। पठेन्मम पुरीं पुण्यां लभते मत्प्रसादतः
māhātmyaṁ dvārakāyāstu maddine yatra tatra vā| paṭhenmama purīṁ puṇyāṁ labhate matprasādataḥ
जो कहीं भी, विशेषतः मेरे दिन, द्वारका के माहात्म्य का पाठ करता है, वह मेरी कृपा से मेरी पुण्यपुरी को प्राप्त करता है।
श्लोक 80 (skanda.7.471.80)
मत्पुरीं वसतां पुण्यं त्रिकालं मम दर्शनात्। तत्फलं समवाप्नोति यस्त्विदं पठते कलौ
matpurīṁ vasatāṁ puṇyaṁ trikālaṁ mama darśanāt| tatphalaṁ samavāpnoti yastvidaṁ paṭhate kalau
मेरी पुरी में निवास करने वालों को तीनों संध्याओं में मेरे दर्शन से जो पुण्य मिलता है, कलियुग में जो इस माहात्म्य का पाठ करता है, वह भी वही फल प्राप्त करता है।
श्लोक 81 (skanda.7.471.81)
कलौ काशी च मथुरा ह्यवंती च द्विजोत्तम। अयोध्या च तथा माया कांची चैव च मत्पुरी
kalau kāśī ca mathurā hyavaṁtī ca dvijottama| ayodhyā ca tathā māyā kāṁcī caiva ca matpurī
हे द्विजोत्तम! कलियुग में काशी, मथुरा, अवन्ती, अयोध्या, माया, काञ्ची तथा मेरी पुरी द्वारका —
श्लोक 82 (skanda.7.471.82)
शालिग्रामभवं चैव बदरी च तथोत्तमा। कुरुक्षेत्रं भृगुक्षेत्रं पुष्करं शुभसंज्ञकम्
śāligrāmabhavaṁ caiva badarī ca tathottamā| kurukṣetraṁ bhṛgukṣetraṁ puṣkaraṁ śubhasaṁjñakam
शालिग्राम-क्षेत्र, उत्तम बदरी, कुरुक्षेत्र, भृगुक्षेत्र, तथा शुभनामक पुष्कर —
श्लोक 83 (skanda.7.471.83)
प्रयागं च प्रभासं च क्षेत्रं वै हाटकेश्वरम्। गंगाद्वारं शौकरं च गंगासागरसंगमम्
prayāgaṁ ca prabhāsaṁ ca kṣetraṁ vai hāṭakeśvaram| gaṁgādvāraṁ śaukaraṁ ca gaṁgāsāgarasaṁgamam
प्रयाग, प्रभास, हाटकेश्वर क्षेत्र, गंगाद्वार, शौकर क्षेत्र, तथा गंगा-सागर संगम —
श्लोक 84 (skanda.7.471.84)
नैमिषं दण्डकारण्यं तथा वृन्दावनं द्विज। सैंधवं चार्बुदाख्यं च सर्वाण्यायतनानि च
naimiṣaṁ daṇḍakāraṇyaṁ tathā vṛndāvanaṁ dvija| saiṁdhavaṁ cārbudākhyaṁ ca sarvāṇyāyatanāni ca
हे द्विज! नैमिष, दण्डकारण्य, वृन्दावन, सैन्धव, अर्बुद नामक स्थान तथा समस्त तीर्थस्थल —
श्लोक 85 (skanda.7.471.85)
वनानि मागधादीनि पुष्कराणि द्विजोत्तम। शैलराजादयः शैला हिमाद्रिप्रमुखा हि ये
vanāni māgadhādīni puṣkarāṇi dvijottama| śailarājādayaḥ śailā himādripramukhā hi ye
हे द्विजोत्तम! मगध आदि के वन, पुष्कर तीर्थ, तथा शैलराज हिमालय आदि प्रमुख पर्वत —
श्लोक 86 (skanda.7.471.86)
गंगादयश्च सरितो भूतले संति यानि वै। तीर्थानि त्रिषु कालेषु समानि द्वारकापुरः
gaṁgādayaśca sarito bhūtale saṁti yāni vai| tīrthāni triṣu kāleṣu samāni dvārakāpuraḥ
गंगा आदि जो भी नदियाँ इस पृथ्वी पर हैं — तीनों कालों में ये सभी तीर्थ द्वारकापुरी के समान हैं।
श्लोक 87 (skanda.7.471.87)
कलिना कलितं सर्वं वर्जयित्वा तु मत्पुरीम्। विप्र वर्षशते प्राप्ते मत्पुर्यां मम दर्शने
kalinā kalitaṁ sarvaṁ varjayitvā tu matpurīm| vipra varṣaśate prāpte matpuryāṁ mama darśane
मेरी पुरी को छोड़कर बाकी सब कलियुग से आक्रान्त हो गए हैं। हे विप्र! सौ वर्ष बीतने पर, मेरी पुरी में मेरे दर्शन होने पर,
श्लोक 88 (skanda.7.471.88)
तव मृत्युर्महीदेव मत्प्रसादाद्भविष्यति। त्रिस्पृशावासरे प्राप्ते वैशाखे शुक्लपक्षतः
tava mṛtyurmahīdeva matprasādādbhaviṣyati| trispṛśāvāsare prāpte vaiśākhe śuklapakṣataḥ
हे महीदेव! मेरी कृपा से वैशाख के शुक्लपक्ष में त्रिस्पृशा दिन आने पर तुम्हारी मृत्यु होगी।
श्लोक 89 (skanda.7.471.89)
संगमे बुधवारस्य दिवा भूमौ ममाग्रतः। दशमं द्वारमासाद्य तव प्राणस्य निर्गमम्। भविष्यति न संदेहो मत्प्रसादेन भूसुर
saṁgame budhavārasya divā bhūmau mamāgrataḥ| daśamaṁ dvāramāsādya tava prāṇasya nirgamam| bhaviṣyati na saṁdeho matprasādena bhūsura
बुधवार के संगम पर, दिन में, मेरे सामने, इस पृथ्वी पर ही, दसवें द्वार से तुम्हारे प्राणों का निर्गमन होगा — हे भूसुर! मेरी कृपा से इसमें कोई संदेह नहीं।
श्लोक 90 (skanda.7.471.90)
स्वस्थानं गच्छ विप्रेंद्र सर्वान्कामानवाप्स्यसि। मद्भक्तानां युगांतेऽपि विनाशो नोपपद्यते
svasthānaṁ gaccha viprendra sarvānkāmānavāpsyasi| madbhaktānāṁ yugāṁte'pi vināśo nopapadyate
हे विप्रेन्द्र! अपने स्थान को जाओ, तुम्हें समस्त कामनाओं की प्राप्ति होगी। मेरे भक्तों का युगान्त में भी विनाश नहीं होता।
श्लोक 91 (skanda.7.471.91)
मद्भक्तिं वहतां पुंसामिह लोके परेऽपि वा। नाशुभं विद्यते किंचित्कुलकोटिं नयेद्दिवम्
madbhaktiṁ vahatāṁ puṁsāmiha loke pare'pi vā| nāśubhaṁ vidyate kiṁcitkulakoṭiṁ nayeddivam
जो पुरुष मेरी भक्ति धारण करते हैं, उनके लिए इस लोक और परलोक में कोई भी अशुभ नहीं होता; वे अपने करोड़ों कुलजनों को स्वर्ग तक पहुँचा देते हैं।
श्लोक 92 (skanda.7.471.92)
मार्कण्डेय उवाच। ततो वर्षशते प्राप्ते गत्वा द्वारवतीं पुरीम्। प्राणान्कृष्णोपदेशेन त्यक्त्वा मोक्षं जगाम ह
mārkaṇḍeya uvāca| tato varṣaśate prāpte gatvā dvāravatīṁ purīm| prāṇānkṛṣṇopadeśena tyaktvā mokṣaṁ jagāma ha
मार्कण्डेय जी ने कहा — तत्पश्चात् सौ वर्ष बीतने पर, द्वारावती पुरी जाकर, कृष्ण के उपदेशानुसार अपने प्राण त्यागकर वह मोक्ष को प्राप्त हुआ।
श्लोक 93 (skanda.7.471.93)
इन्द्रद्युम्न तदाख्यातं माहात्म्यं द्वारकाभवम्। पुनरेव प्रवक्ष्यामि यत्ते मनसि वर्त्तते
indradyumna tadākhyātaṁ māhātmyaṁ dvārakābhavam| punareva pravakṣyāmi yatte manasi varttate
हे इन्द्रद्युम्न! इस प्रकार द्वारका का माहात्म्य कहा गया। अब मैं पुनः वह कहूँगा, जो तुम्हारे मन में है।
श्लोक 94 (skanda.7.471.94)
शृण्वतां पठतां चैव माहात्म्यं द्वारकाभवम्। सर्वं फलमवाप्नोति कृष्णेन कथितं च यत्
śṛṇvatāṁ paṭhatāṁ caiva māhātmyaṁ dvārakābhavam| sarvaṁ phalamavāpnoti kṛṣṇena kathitaṁ ca yat
इस द्वारका-माहात्म्य को सुनने और पढ़ने वालों को, कृष्ण द्वारा कहा गया सम्पूर्ण फल प्राप्त होता है।
श्लोक 95 (skanda.7.471.95)
विस्तारयंति लोकेऽस्मिँल्लिखितं यस्य वेश्मनि। प्रत्यक्षं द्वारकापुण्यं प्राप्यते कृष्णसंभवम्
vistārayaṁti loke'sminllikhitaṁ yasya veśmani| pratyakṣaṁ dvārakāpuṇyaṁ prāpyate kṛṣṇasaṁbhavam
इस लोक में जिनके घर में यह लिखित रूप में विस्तार पाता है, उन्हें प्रत्यक्ष रूप से कृष्ण से उत्पन्न द्वारका का पुण्य प्राप्त होता है।