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प्रभास खण्ड · अध्याय 491

समस्त स्कन्द महापुराण ग्रंथ की समाप्ति एवं सूत के सत्कार का वर्णन

अध्याय 490अध्याय-सूची

श्लोक 1 (skanda.7.491.1)

सूत उवाच । एतत्पुराणमखिलं पुरा स्कन्देन भाषितम् । भृगवे ब्रह्मपुत्राय तस्माल्लेभे तथांऽगिराः ॥ १ ॥

sūta uvāca | etatpurāṇamakhilaṁ purā skandena bhāṣitam | bhṛgave brahmaputrāya tasmāllebhe tathāṁgiraḥ || 1 ||

सूत ने कहा - यह सम्पूर्ण पुराण पूर्वकाल में स्कंद द्वारा ब्रह्मपुत्र भृगु से कहा गया था, और उनसे अंगिरा को प्राप्त हुआ।

श्लोक 2 (skanda.7.491.2)

ततश्च च्यवनः प्राप ऋचीकश्च ततो मुनिः । एवं परंपरा प्राप्तं सर्वेषु भुवनेष्वपि ॥ २ ॥

tataśca cyavanaḥ prāpa ṛcīkaśca tato muniḥ | evaṁ paraṁparā prāptaṁ sarveṣu bhuvaneṣvapi || 2 ||

फिर च्यवन ने इसे प्राप्त किया, और उनसे मुनि ऋचीक ने। इस प्रकार यह परंपरा से समस्त लोकों में प्राप्त हुआ।

श्लोक 3 (skanda.7.491.3)

स्कान्दं पुराणमेतच्च कुमारेण पुरोद्धृतम् । यः शृणोति सतां मध्ये नरः पापाद्विमुच्यते ॥ ३ ॥

skāndaṁ purāṇametacca kumāreṇa puroddhṛtam | yaḥ śṛṇoti satāṁ madhye naraḥ pāpādvimucyate || 3 ||

यह स्कंद पुराण कुमार (स्कंद) द्वारा पूर्वकाल में प्रकट किया गया। जो मनुष्य इसे सत्पुरुषों के मध्य सुनता है, वह पाप से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 4 (skanda.7.491.4)

इदं पुराणमायुष्यं चतुर्वर्णसुखप्रदम् । निर्मितं षण्मुखेनेह नियतं सुमहात्मना ॥ ४ ॥

idaṁ purāṇamāyuṣyaṁ caturvarṇasukhapradam | nirmitaṁ ṣaṇmukheneha niyataṁ sumahātmanā || 4 ||

यह आयुष्यवर्धक पुराण चारों वर्णों को सुख देने वाला है, इसे यहाँ महान् आत्मा षण्मुख (स्कंद) द्वारा निश्चित रूप से रचा गया है।

श्लोक 5 (skanda.7.491.5)

एवमेतत्समाख्यातमाख्यानं भद्रमस्तु वः ॥ ५ ॥

evametatsamākhyātamākhyānaṁ bhadramastu vaḥ || 5 ||

इस प्रकार यह आख्यान कहा गया, तुम्हारा कल्याण हो।

श्लोक 6 (skanda.7.491.6)

मण्डितं सप्तभिः खण्डैः स्कान्दं यः शृणुयान्नरः । न तस्य पुण्यसंख्यानं कर्तुं शक्येत केनचित् ॥ ६ ॥

maṇḍitaṁ saptabhiḥ khaṇḍaiḥ skāndaṁ yaḥ śṛṇuyānnaraḥ | na tasya puṇyasaṁkhyānaṁ kartuṁ śakyeta kenacit || 6 ||

सात खंडों से सुसज्जित इस स्कंद पुराण को जो मनुष्य सुनता है, उसके पुण्य की गणना करना किसी के लिए भी संभव नहीं है।

श्लोक 7 (skanda.7.491.7)

य इदं धर्ममाहात्म्यं ब्राह्मणाय प्रयच्छति । स्वर्गलोके वसेत्तावद्यावदक्षरसंख्यया ॥ ७ ॥

ya idaṁ dharmamāhātmyaṁ brāhmaṇāya prayacchati | svargaloke vasettāvadyāvadakṣarasaṁkhyayā || 7 ||

जो इस धर्म-माहात्म्य को किसी ब्राह्मण को अर्पित करता है, वह उतने काल तक स्वर्गलोक में निवास करता है, जितने इसमें अक्षर हैं।

श्लोक 8 (skanda.7.491.8)

यथा हि वर्षतो धारा यथा वा दिवि तारकाः । गंगायां सिकता यद्वत्तद्वत्संख्या न विद्यते ॥ ८ ॥

yathā hi varṣato dhārā yathā vā divi tārakāḥ | gaṁgāyāṁ sikatā yadvattadvatsaṁkhyā na vidyate || 8 ||

जैसे वर्षा की धाराओं की, जैसे आकाश के तारों की, जैसे गंगा की बालू की गणना नहीं की जा सकती, वैसे ही इसके फल की गणना नहीं हो सकती।

श्लोक 9 (skanda.7.491.9)

यो नरः शृणुयाद्भक्त्या दिनानि च कियन्ति वै । सर्वार्थसिद्धो भवति य एतत्पठते नरः ॥ ९ ॥

yo naraḥ śṛṇuyādbhaktyā dināni ca kiyanti vai | sarvārthasiddho bhavati ya etatpaṭhate naraḥ || 9 ||

जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इसे चाहे कितने ही दिनों तक सुनता है, तथा जो मनुष्य इसे पढ़ता है, वह सर्वार्थसिद्ध हो जाता है।

श्लोक 10 (skanda.7.491.10)

पुत्रार्थी लभते पुत्रान्धनार्थी लभते धनम् । लभते पतिकामा या पतिं कन्या मनोरमम् ॥ १० ॥

putrārthī labhate putrāndhanārthī labhate dhanam | labhate patikāmā yā patiṁ kanyā manoramam || 10 ||

पुत्रार्थी को पुत्र मिलता है, धनार्थी को धन मिलता है, तथा पति की कामना करने वाली कन्या को मनोरम पति मिलता है।

श्लोक 11 (skanda.7.491.11)

समागमं लभन्ते च बान्धवाश्च प्रवासिभिः । स्कान्दं पुराणं श्रुत्वा तु पुमानाप्नोति वाञ्छितम् ॥ ११ ॥

samāgamaṁ labhante ca bāndhavāśca pravāsibhiḥ | skāndaṁ purāṇaṁ śrutvā tu pumānāpnoti vāñchitam || 11 ||

प्रवासी संबंधियों से भी समागम प्राप्त होता है। स्कंद पुराण को सुनकर पुरुष अपनी अभीष्ट वस्तु को प्राप्त करता है।

श्लोक 12 (skanda.7.491.12)

शृण्वतः पठतश्चैव सर्वकामप्रदं नृणाम् ॥ १२ ॥

śṛṇvataḥ paṭhataścaiva sarvakāmapradaṁ nṛṇām || 12 ||

यह सुनने वालों और पढ़ने वालों, दोनों के लिए मनुष्यों की समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाला है।

श्लोक 13 (skanda.7.491.13)

पुण्यं श्रुत्वा पुराणं वै दीर्घमायुश्च विन्दति । महीं विजयते राजा शत्रूंश्चाप्यधितिष्ठति ॥ १३ ॥

puṇyaṁ śrutvā purāṇaṁ vai dīrghamāyuśca vindati | mahīṁ vijayate rājā śatrūṁścāpyadhitiṣṭhati || 13 ||

इस पुण्य पुराण को सुनकर मनुष्य दीर्घायु प्राप्त करता है। राजा पृथ्वी पर विजय पाता है, और शत्रुओं पर भी अधिकार जमाता है।

श्लोक 14 (skanda.7.491.14)

वेदविच्च भविद्विप्रः क्षत्रियो राज्यमाप्नुयात् । धनं धान्यं तथा वैश्यः शूद्रः सुखमवाप्नुयात् ॥ १४ ॥

vedavicca bhaviddvipraḥ kṣatriyo rājyamāpnuyāt | dhanaṁ dhānyaṁ tathā vaiśyaḥ śūdraḥ sukhamavāpnuyāt || 14 ||

ब्राह्मण वेदज्ञ बन जाता है, क्षत्रिय राज्य प्राप्त करता है, वैश्य धन-धान्य प्राप्त करता है, तथा शूद्र सुख प्राप्त करता है।

श्लोक 15 (skanda.7.491.15)

अध्यायमेकं शृणुयाच्छ्लोकं श्लोकार्धमेव वा । यः श्लोकपादं शृणुयाद्विष्णुलोकं स गच्छति ॥ १५ ॥

adhyāyamekaṁ śṛṇuyācchlokaṁ ślokārdhameva vā | yaḥ ślokapādaṁ śṛṇuyādviṣṇulokaṁ sa gacchati || 15 ||

जो एक अध्याय सुने, अथवा एक श्लोक, अथवा आधा श्लोक ही सुने, जो एक श्लोक-चरण भी सुनता है, वह विष्णुलोक को जाता है।

श्लोक 16 (skanda.7.491.16)

श्रुत्वा पुराणमेतद्धि वाचकं यस्तु पूजयेत् । तेन ब्रह्मा च विष्णुश्च रुद्रश्चैव प्रपूजितः ॥ १६ ॥

śrutvā purāṇametaddhi vācakaṁ yastu pūjayet | tena brahmā ca viṣṇuśca rudraścaiva prapūjitaḥ || 16 ||

इस पुराण को सुनकर जो इसके वाचक की पूजा करता है, उसके द्वारा ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र भी पूजित हो जाते हैं।

श्लोक 17 (skanda.7.491.17)

एकमप्यक्षरं यस्तु गुरुः शिष्ये निवेदयेत् । पृथिव्यां नास्ति तद्द्रव्यं यद्दत्त्वा ह्यनृणी भवेत् ॥ १७ ॥

ekamapyakṣaraṁ yastu guruḥ śiṣye nivedayet | pṛthivyāṁ nāsti taddravyaṁ yaddattvā hyanṛṇī bhavet || 17 ||

गुरु जो एक भी अक्षर शिष्य को सिखाता है, उसके बदले ऐसी कोई वस्तु पृथ्वी पर नहीं है, जिसे देकर शिष्य ऋणमुक्त हो सके।

श्लोक 18 (skanda.7.491.18)

अतः संपूजनीयस्तु व्यासः शास्त्रोपदेशकः । गोभू हिरण्यवस्त्राद्यैर्भोजनैः सार्वकामिकैः ॥ १८ ॥

ataḥ saṁpūjanīyastu vyāsaḥ śāstropadeśakaḥ | gobhū hiraṇyavastrādyairbhojanaiḥ sārvakāmikaiḥ || 18 ||

अतः शास्त्र का उपदेश देने वाले व्यास की गौ, भूमि, स्वर्ण, वस्त्र आदि तथा समस्त इच्छित भोजन से पूजा करनी चाहिए।

श्लोक 19 (skanda.7.491.19)

य एवं भक्तियुक्तस्तु श्रुत्वा शास्त्रमनुत्तमम् । पूजयेदुपदेष्टारं स शैवं पदमाप्नुयात् ॥ १९ ॥

ya evaṁ bhaktiyuktastu śrutvā śāstramanuttamam | pūjayedupadeṣṭāraṁ sa śaivaṁ padamāpnuyāt || 19 ||

जो इस प्रकार भक्तियुक्त होकर इस सर्वोत्तम शास्त्र को सुनकर, अपने उपदेशक की पूजा करता है, वह शिवपद को प्राप्त करता है।

श्लोक 20 (skanda.7.491.20)

पुराणश्रवणादेव अनेकभवसंचितम् । पापं प्रशममायाति सर्वतीर्थफलं लभेत् ॥ २० ॥

purāṇaśravaṇādeva anekabhavasaṁcitam | pāpaṁ praśamamāyāti sarvatīrthaphalaṁ labhet || 20 ||

पुराण के श्रवण मात्र से ही अनेक जन्मों में संचित पाप शांत हो जाता है, और मनुष्य समस्त तीर्थों का फल प्राप्त करता है।

श्लोक 21 (skanda.7.491.21)

अमृतेनोदरस्थेन म्रियन्ते सर्वदेवताः । कण्ठस्थितविषेणापि यो जीवति स पातु वः ॥ २१ ॥

amṛtenodarasthena mriyante sarvadevatāḥ | kaṇṭhasthitaviṣeṇāpi yo jīvati sa pātu vaḥ || 21 ||

उदर में स्थित अमृत से भी समस्त देवता मर सकते हैं, किंतु जो कंठ में विष धारण किए हुए भी जीवित रहते हैं, वे साक्षात् शिव तुम्हारी रक्षा करें।

श्लोक 22 (skanda.7.491.22)

व्यास उवाच । इत्युक्त्वोपरते सूते शौनकादि महर्षयः । संपूज्य विधिवत्सूतं प्रशस्याथाभ्यनन्दयन् ॥ २२ ॥

vyāsa uvāca | ityuktvoparate sūte śaunakādi maharṣayaḥ | saṁpūjya vidhivatsūtaṁ praśasyāthābhyanandayan || 22 ||

व्यास ने कहा - यह कहकर सूत के चुप हो जाने पर, शौनक आदि महर्षियों ने विधिपूर्वक सूत की पूजा करके, उनकी प्रशंसा करते हुए उनका अभिनंदन किया।

श्लोक 23 (skanda.7.491.23)

ऋषय ऊचुः । कथितो भवता सर्गः प्रतिसर्गस्तथैव च । वंशानुवंशचरितं पुराणानामनुक्रमः ॥ २३ ॥

ṛṣaya ūcuḥ | kathito bhavatā sargaḥ pratisargastathaiva ca | vaṁśānuvaṁśacaritaṁ purāṇānāmanukramaḥ || 23 ||

ऋषियों ने कहा - आपने सृष्टि, प्रतिसृष्टि, वंश-अनुवंश-चरित तथा पुराणों का क्रम कह दिया है।

श्लोक 24 (skanda.7.491.24)

मन्वन्तरप्रमाणं च ब्रह्माण्डस्य च विस्तरः । ज्योतिश्चक्रस्वरूपं च यथावदनुवर्णितम् ॥ २४ ॥

manvaṁtarapramāṇaṁ ca brahmāṇḍasya ca vistaraḥ | jyotiścakrasvarūpaṁ ca yathāvadanuvarṇitam || 24 ||

मन्वंतरों का प्रमाण, ब्रह्मांड का विस्तार, तथा ज्योतिश्चक्र का स्वरूप भी आपने यथावत् वर्णन किया है।

श्लोक 25 (skanda.7.491.25)

धन्याः स्म कृतकृत्याः स्म वयं तव मुखाम्बुजात् । स्कान्दं महापुराण हि श्रुत्वा सूतातिहर्षिताः ॥ २५ ॥

dhanyāḥ sma kṛtakṛtyāḥ sma vayaṁ tava mukhāmbujāt | skāndaṁ mahāpurāṇa hi śrutvā sūtātiharṣitāḥ || 25 ||

हे सूत! हम धन्य हैं, हम कृतकृत्य हैं, कि हमने आपके मुख-कमल से इस स्कंद महापुराण को सुना है, हम अत्यंत हर्षित हैं।

श्लोक 26 (skanda.7.491.26)

वयं महर्षयो विप्राः प्रदद्मोऽद्य तवाऽऽशिषः । व्यासशिष्य महाप्राज्ञ चिरं जीव सुखी भव ॥ २६ ॥

vayaṁ maharṣayo viprāḥ pradadmo'dya tavāśiṣaḥ | vyāsaśiṣya mahāprājña ciraṁ jīva sukhī bhava || 26 ||

हम महर्षि ब्राह्मण आज आपको आशीर्वाद देते हैं - हे व्यास के शिष्य! हे महाप्राज्ञ! चिरंजीवी हो, सुखी रहो।

श्लोक 27 (skanda.7.491.27)

इति दत्त्वाऽऽशिषस्तस्मै दत्त्वा वासोविभूषणम् । विसृज्य लोमशं सूतं यज्ञकर्माण्यथाचरन् ॥ २७ ॥

iti dattvāśiṣastasmai dattvā vāsovibhūṣaṇam | visṛjya lomaśaṁ sūtaṁ yajñakarmāṇyathācaran || 27 ||

इस प्रकार उसे आशीर्वाद देकर, वस्त्र और आभूषण देकर, लोमश सूत को विदा कर, उन्होंने फिर यज्ञ-कर्म करना आरंभ किया।

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