Skip to main content

प्रभास खण्ड · अध्याय 490

तुलसी-पत्र एवं काष्ठ की महिमा तथा बलि सहित द्वारका-यात्रा-विधि का वर्णन

अध्याय 489अध्याय-सूचीअध्याय 491

श्लोक 1 (skanda.7.490.1)

प्रह्लाद उवाच । सावित्रीं च भवानीं च दुर्गां चैव सरस्वतीम् । योऽर्चयेत्तुलसीपत्रैः सर्वकामसमन्वितः ॥ १ ॥

prahlāda uvāca | sāvitrīṁ ca bhavānīṁ ca durgāṁ caiva sarasvatīm | yo'rcayettulasīpatraiḥ sarvakāmasamanvitaḥ || 1 ||

प्रह्लाद ने कहा - जो सावित्री, भवानी, दुर्गा तथा सरस्वती का तुलसीपत्रों से पूजन करता है, वह समस्त कामनाओं से युक्त हो जाता है।

श्लोक 2 (skanda.7.490.2)

गृहीत्वा तुलसीपत्रं भक्त्या विष्णुं समर्चयेत् । अर्चितं तेन सकलं सदेवासुरमानुषम् ॥ २ ॥

gṛhītvā tulasīpatraṁ bhaktyā viṣṇuṁ samarcayet | arcitaṁ tena sakalaṁ sadevāsuramānuṣam || 2 ||

तुलसीपत्र लेकर जो भक्तिपूर्वक विष्णु की पूजा करता है, उसके द्वारा देव, असुर और मानव सहित सम्पूर्ण जगत् पूजित हो जाता है।

श्लोक 3 (skanda.7.490.3)

चतुर्द्दश्यां महेशानं पौर्णमास्यां पितामहम् । येऽर्चयन्ति च सप्तम्यां तुलस्या च गणाधिपम् ॥ ३ ॥

caturddaśyāṁ maheśānaṁ paurṇamāsyāṁ pitāmaham | ye'rcayanti ca saptamyāṁ tulasyā ca gaṇādhipam || 3 ||

जो चतुर्दशी को महेश की, पूर्णिमा को पितामह ब्रह्मा की, तथा सप्तमी को गणाधिप गणेश की तुलसी से पूजा करते हैं,

श्लोक 4 (skanda.7.490.4)

शंखोदकं तीर्थवराद्वरिष्ठं पादोदकं तीर्थवराद्वरिष्ठम् । नैवेद्यशेषं क्रतुकोटितुल्यं निर्माल्यशेषं व्रतदानतुल्यम् ॥ ४ ॥

śaṅkhodakaṁ tīrthavarādvariṣṭhaṁ pādodakaṁ tīrthavarādvariṣṭham | naivedyaśeṣaṁ kratukoṭitulyaṁ nirmālyaśeṣaṁ vratadānatulyam || 4 ||

शंख का जल श्रेष्ठ तीर्थ से भी श्रेष्ठ है, चरणामृत श्रेष्ठ तीर्थ से भी श्रेष्ठ है, नैवेद्य का शेष अंश करोड़ों यज्ञों के तुल्य है, निर्माल्य का शेष व्रत-दान के तुल्य है।

श्लोक 5 (skanda.7.490.5)

मुकुन्दाशनशेषं तु यो भुनक्ति दिनेदिने । सिक्थेसिक्थे भवेत्पुण्यं चान्द्रायणशताधिकम् ॥ ५ ॥

mukundāśanaśeṣaṁ tu yo bhunakti dinedine | sikthesikthe bhavetpuṇyaṁ cāndrāyaṇaśatādhikam || 5 ||

जो प्रतिदिन मुकुंद के भोजन के शेष अंश को खाता है, उसे प्रत्येक ग्रास पर सौ चांद्रायण व्रतों से भी अधिक पुण्य प्राप्त होता है।

श्लोक 6 (skanda.7.490.6)

नैवेद्यशेषं तुलसीविमिश्रं विशेषतः पादजलेन विष्णोः । योऽश्नाति नित्यं पुरुषो मुरारेः प्राप्नोति यज्ञायुतकोटिपुण्यम् ॥ ६ ॥

naivedyaśeṣaṁ tulasīvimiśraṁ viśeṣataḥ pādajalena viṣṇoḥ | yo'śnāti nityaṁ puruṣo murāreḥ prāpnoti yajñāyutakoṭipuṇyam || 6 ||

जो पुरुष नित्य विष्णु के चरणामृत के साथ, विशेष रूप से तुलसी-मिश्रित मुरारि के नैवेद्य-शेष को ग्रहण करता है, वह दस हजार करोड़ यज्ञों का पुण्य प्राप्त करता है।

श्लोक 7 (skanda.7.490.7)

यः श्राद्धकाले हरिभुक्तशेषं ददाति भक्त्या पितृदेवतानाम् । तेनैव पिंडात्सुतिलैर्विमिश्रादाकल्पकोटिं पितरः सुतृप्ताः ॥ ७ ॥

yaḥ śrāddhakāle haribhuktaśeṣaṁ dadāti bhaktyā pitṛdevatānām | tenaiva piṇḍātsutilairvimiśrādākalpakoṭiṁ pitaraḥ sutṛptāḥ || 7 ||

जो श्राद्ध के समय हरि द्वारा ग्रहण किए गए भोजन के शेष अंश को, तिलों से मिश्रित पिंड के साथ, भक्तिपूर्वक पितृदेवताओं को अर्पित करता है, उसी से पितर कल्प के अंत तक भलीभाँति तृप्त रहते हैं।

श्लोक 8 (skanda.7.490.8)

स्नानार्चनक्रियाकाले घंटावाद्यं करोति यः । पुरतो वासुदेवस्य गवां कोटिफलं लभेत् ॥ ८ ॥

snānārcanakriyākāle ghaṇṭāvādyaṁ karoti yaḥ | purato vāsudevasya gavāṁ koṭiphalaṁ labhet || 8 ||

स्नान और पूजा की क्रिया के समय जो वासुदेव के सामने घंटा बजाता है, वह करोड़ों गौओं के दान का फल प्राप्त करता है।

श्लोक 9 (skanda.7.490.9)

सर्ववाद्यमयी घंटा केशवस्य सदा प्रिया । वादनाल्लभते पुण्यं यज्ञकोटिफलं नरः ॥ ९ ॥

sarvavādyamayī ghaṇṭā keśavasya sadā priyā | vādanāllabhate puṇyaṁ yajñakoṭiphalaṁ naraḥ || 9 ||

घंटा समस्त वाद्यों का स्वरूप है, तथा केशव को सदा प्रिय है। उसे बजाने से मनुष्य करोड़ों यज्ञों के फल के समान पुण्य प्राप्त करता है।

श्लोक 10 (skanda.7.490.10)

वादित्राणामभावे तु पूजाकाले च सर्वदा । घंटावाद्यं नरैः कार्य्यं सर्ववाद्यमयी यतः ॥ १० ॥

vāditrāṇāmabhāve tu pūjākāle ca sarvadā | ghaṇṭāvādyaṁ narairkāryaṁ sarvavādyamayī yataḥ || 10 ||

वाद्यों के अभाव में, पूजा के समय, सदा मनुष्यों को घंटा बजाना चाहिए, क्योंकि वह समस्त वाद्यों का स्वरूप है।

श्लोक 11 (skanda.7.490.11)

तुलसीकाष्ठसंभूतं चन्दनं यच्छते हरेः । निर्द्दहेत्पातकं सर्वं पूर्वजन्मशतार्जितम् ॥ ११ ॥

tulasīkāṣṭhasaṁbhūtaṁ candanaṁ yacchate hareḥ | nirddahetpātakaṁ sarvaṁ pūrvajanmaśatārjitam || 11 ||

तुलसी की लकड़ी से उत्पन्न चंदन को जो हरि को अर्पित करता है, वह सौ पूर्वजन्मों में अर्जित समस्त पातक को जला देता है।

श्लोक 12 (skanda.7.490.12)

ददाति पितृ पिंडेषु तुलसीकाष्ठचन्दनम् । पितॄणां जायते तृप्तिर्गयाश्राद्धेन वै तथा ॥ १२ ॥

dadāti pitṛpiṇḍeṣu tulasīkāṣṭhacandanam | pitṝṇāṁ jāyate tṛptirgayāśrāddhena vai tathā || 12 ||

जो पितृ-पिंडों में तुलसी-काष्ठ-चंदन देता है, उसके पितरों को वैसी ही तृप्ति प्राप्त होती है, जैसी गया में श्राद्ध करने से होती है।

श्लोक 13 (skanda.7.490.13)

सर्वेषामेव देवानां तुलसीकाष्ठचन्दनम् । पितॄणां च विशेषेण सदाऽभीष्टं हरेः कलौ ॥ १३ ॥

sarveṣāmeva devānāṁ tulasīkāṣṭhacandanam | pitṝṇāṁ ca viśeṣeṇa sadā'bhīṣṭaṁ hareḥ kalau || 13 ||

तुलसी-काष्ठ-चंदन समस्त देवताओं को तथा विशेष रूप से पितरों को सदा प्रिय है, और कलियुग में हरि को भी अभीष्ट है।

श्लोक 14 (skanda.7.490.14)

हरेर्भागवता भूत्वा तुलसीकाष्ठचन्दनम् । नार्पयति सदा विष्णोर्न ते भागवताः कलौ ॥ १४ ॥

harerbhāgavatā bhūtvā tulasīkāṣṭhacandanam | nārpayati sadā viṣṇorna te bhāgavatāḥ kalau || 14 ||

जो हरि के भागवत होकर भी तुलसी-काष्ठ-चंदन को सदा विष्णु को अर्पित नहीं करते, वे कलियुग में भागवत नहीं हैं।

श्लोक 15 (skanda.7.490.15)

शरीरं दह्यते यस्य तुलसीकाष्ठवह्निना । नीयमानो यमेनापि विष्णुलोकं स गच्छति ॥ १५ ॥

śarīraṁ dahyate yasya tulasīkāṣṭhavahninā | nīyamāno yamenāpi viṣṇulokaṁ sa gacchati || 15 ||

जिसका शरीर तुलसी-काष्ठ की अग्नि से जलाया जाता है, वह यम द्वारा ले जाया जाकर भी विष्णुलोक को जाता है।

श्लोक 16 (skanda.7.490.16)

यद्येकं तुलसीकाष्ठं मध्ये काष्ठस्य यस्य हि । दाहकाले भवेन्मुक्तः पापकोटिशतायुतैः ॥ १६ ॥

yadyekaṁ tulasīkāṣṭhaṁ madhye kāṣṭhasya yasya hi | dāhakāle bhavenmuktaḥ pāpakoṭiśatāyutaiḥ || 16 ||

यदि जिसकी चिता की लकड़ी के मध्य एक भी तुलसी-काष्ठ हो, तो वह दाह के समय ही सैकड़ों करोड़ों पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 17 (skanda.7.490.17)

दह्यमानं नरं दृष्ट्वा तुलसीकाष्ठवह्निना । जन्मकोटिसहस्रैस्तु तोषितस्तैर्जनार्दनः ॥ १७ ॥

dahyamānaṁ naraṁ dṛṣṭvā tulasīkāṣṭhavahninā | janmakoṭisahasraistu toṣitastairjanārdanaḥ || 17 ||

तुलसी-काष्ठ की अग्नि से दग्ध होते हुए मनुष्य को देखकर, जनार्दन उन करोड़ों-सहस्रों जन्मों के लिए संतुष्ट हो जाते हैं।

श्लोक 18 (skanda.7.490.18)

दह्यमानं नरं सर्वे तुलसीकाष्ठवह्निना । विमानस्थाः सुरगणाः क्षिपंति कुसुमांजलीन् ॥ १८ ॥

dahyamānaṁ naraṁ sarve tulasīkāṣṭhavahninā | vimānasthāḥ suragaṇāḥ kṣipaṁti kusumāṁjalīn || 18 ||

तुलसी-काष्ठ की अग्नि से दग्ध होते हुए उस मनुष्य पर, विमानों में स्थित समस्त देवगण पुष्पांजलि बरसाते हैं।

श्लोक 19 (skanda.7.490.19)

नृत्यंत्योऽप्सरसो हृष्टा गीतं गायन्ति सुस्वरम् । ज्वलते यत्र दैत्येन्द्र तुलसीकाष्ठपावकः ॥ १९ ॥

nṛtyaṁtyo'psaraso hṛṣṭā gītaṁ gāyaṁti susvaram | jvalate yatra daityendra tulasīkāṣṭhapāvakaḥ || 19 ||

हे दैत्येंद्र! जहाँ तुलसी-काष्ठ की अग्नि जलती है, वहाँ हर्षित अप्सराएँ नृत्य करती हैं और सुमधुर स्वर में गीत गाती हैं।

श्लोक 20 (skanda.7.490.20)

कुरुते वीक्षणं विष्णुः सन्तुष्टः सह शंभुना ॥ २० ॥

kurute vīkṣaṇaṁ viṣṇuḥ saṁtuṣṭaḥ saha śaṁbhunā || 20 ||

संतुष्ट हुए विष्णु शंभु के साथ उस पर दृष्टिपात करते हैं।

श्लोक 21 (skanda.7.490.21)

गृहीत्वा तं करे शौरिः पुरुषं स्वयमग्रतः । मार्जते तस्य पापानि पश्यतां त्रिदिवौकसाम् । महोत्सवं च कृत्वा तु जयशब्दपुरःसरम् ॥ २१ ॥

gṛhītvā taṁ kare śauriḥ puruṣaṁ svayamagrataḥ | mārjate tasya pāpāni paśyatāṁ tridivaukasām | mahotsavaṁ ca kṛtvā tu jayaśabdapuraḥsaram || 21 ||

शौरि विष्णु स्वयं उस पुरुष को हाथ में लेकर आगे कर, स्वर्गवासियों के देखते हुए, जय-जयकार के साथ महोत्सव मनाते हुए, उसके पापों को धो देते हैं।

श्लोक 22 (skanda.7.490.22)

सूत उवाच । प्रह्लादेनोदितं श्रुत्वा माहात्म्यं द्वारकाभवम् । प्रहृष्टा ऋषयः सर्वे तथा दैत्येश्वरो बलिः ॥ २२ ॥

sūta uvāca | prahlādenoditaṁ śrutvā māhātmyaṁ dvārakābhavam | prahṛṣṭā ṛṣayaḥ sarve tathā daityeśvaro baliḥ || 22 ||

सूत ने कहा - प्रह्लाद द्वारा कहे गए द्वारका के इस माहात्म्य को सुनकर, समस्त ऋषि तथा दैत्येश्वर बलि अत्यंत हर्षित हुए।

श्लोक 23 (skanda.7.490.23)

ततः सर्वेऽभिनन्द्यैनं प्रह्लादं दैत्यपुङ्गवम् । उद्युक्ता द्वारकां गत्वा द्रष्टुं कृष्णमुखाम्बुजम् ॥ २३ ॥

tataḥ sarve'bhinandyainaṁ prahlādaṁ daityapuṁgavam | udyuktā dvārakāṁ gatvā draṣṭuṁ kṛṣṇamukhāmbujam || 23 ||

तब सबने उस दैत्यपुंगव प्रह्लाद का अभिनंदन कर, द्वारका जाकर कृष्ण के मुख-कमल का दर्शन करने के लिए उद्यत हुए।

श्लोक 24 (skanda.7.490.24)

ततस्ते बलिना सार्धं मुनयः संशितव्रताः । आगत्य द्वारकां स्नात्वा गोमत्यां विधिपूर्वकम् ॥ २४ ॥

tataste balinā sārdhaṁ munayaḥ saṁśitavratāḥ | āgatya dvārakāṁ snātvā gomatyāṁ vidhipūrvakam || 24 ||

तब वे मुनिगण, कठोर व्रत धारण किए हुए, बलि के साथ द्वारका आकर, विधिपूर्वक गोमती में स्नान कर,

श्लोक 25 (skanda.7.490.25)

कृष्णं दृष्ट्वा समभ्यर्च्य कृत्वा यात्रां यथाविधि । दत्त्वा दानानि बहुशः कृतकृत्यास्ततोऽभवन् ॥ २५ ॥

kṛṣṇaṁ dṛṣṭvā samabhyarcya kṛtvā yātrāṁ yathāvidhi | dattvā dānāni bahuśaḥ kṛtakṛtyāstato'bhavan || 25 ||

कृष्ण का दर्शन कर, भली प्रकार पूजा करके, विधिपूर्वक यात्रा पूर्ण कर, अनेक दान देकर, वे कृतकृत्य हुए।

श्लोक 26 (skanda.7.490.26)

जग्मुः स्वीयानि स्थानानि बलिः पातालमाययौ । प्रह्लादं च प्रणम्याशु मेने स्वस्य कृतार्थताम् ॥ २६ ॥

jagmuḥ svīyāni sthānāni baliḥ pātālamāyayau | prahlādaṁ ca praṇamyāśu mene svasya kṛtārthatām || 26 ||

वे अपने-अपने स्थानों को चले गए, बलि पाताल को गया, और प्रह्लाद को शीघ्र प्रणाम कर उसने अपनी सफलता मानी।

अध्याय 489अध्याय-सूचीअध्याय 491