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प्रभास खण्ड · अध्याय 489

द्वारका-माहात्म्य के श्रवण आदि के फल का वर्णन

अध्याय 488अध्याय-सूचीअध्याय 490

श्लोक 1 (skanda.7.489.1)

प्रह्लाद उवाच । वृषोत्सर्गं करिष्यंति वैशाख्यां चैव कार्तिके । द्वारकायां पिशाचत्वं मुक्त्वा यांति पितामहाः ॥ १ ॥

prahlāda uvāca | vṛṣotsargaṁ kariṣyaṁti vaiśākhyāṁ caiva kārtike | dvārakāyāṁ piśācatvaṁ muktvā yāṁti pitāmahāḥ || 1 ||

प्रह्लाद ने कहा - जो वैशाख और कार्तिक मास में वृषोत्सर्ग करेंगे, उनके पितामह द्वारका में पिशाचत्व से मुक्त होकर सद्गति को जाते हैं।

श्लोक 2 (skanda.7.489.2)

ब्रह्महत्या सुरापानं स्तेयं गुर्वंगनागमः । एवंविधानि पापानि कृत्वा चैव गुरूण्यपि ॥ २ ॥

brahmahatyā surāpānaṁ steyaṁ gurvaṁganāgamaḥ | evaṁvidhāni pāpāni kṛtvā caiva gurūṇyapi || 2 ||

ब्रह्महत्या, सुरापान, चोरी, गुरु-पत्नी-गमन - ऐसे ही अन्य गुरुतर पाप करके भी,

श्लोक 3 (skanda.7.489.3)

स्नानमात्रेण गोमत्यां श्रीकृष्णस्य च दर्शनात् । विलयं याति दैत्येन्द्र कल्पकोटिकृतान्यपि ॥ ३ ॥

snānamātreṇa gomatyāṁ śrīkṛṣṇasya ca darśanāt | vilayaṁ yāti daityendra kalpakoṭikṛtānyapi || 3 ||

हे दैत्येंद्र! गोमती में स्नान मात्र से तथा श्रीकृष्ण के दर्शन से, करोड़ों कल्पों में किए गए पाप भी विलीन हो जाते हैं।

श्लोक 4 (skanda.7.489.4)

रुक्मिणीं ये प्रपश्यंति भक्तियुक्ताः कलौ नराः । पुरीं प्रदक्षिणां कृत्वा जप्त्वा नामसहस्रकम् ॥ ४ ॥

rukmiṇīṁ ye prapaśyaṁti bhaktiyuktāḥ kalau narāḥ | purīṁ pradakṣiṇāṁ kṛtvā japtvā nāmasahasrakam || 4 ||

कलियुग में जो भक्तियुक्त मनुष्य रुक्मिणी का दर्शन करते हैं, पुरी की प्रदक्षिणा करके सहस्रनाम का जप करते हैं,

श्लोक 5 (skanda.7.489.5)

प्रदक्षिणीकृतं सर्वं ब्रह्मांडं नात्र संशयः । महादानैस्तु चान्यत्र यत्फलं परिकीर्तितम् । द्वारकायां तु रुक्मिण्यां दृष्टायां जायते तदा ॥ ५ ॥

pradakṣiṇīkṛtaṁ sarvaṁ brahmāṁḍaṁ nātra saṁśayaḥ | mahādānaistu cānyatra yatphalaṁ parikīrtitam | dvārakāyāṁ tu rukmiṇyāṁ dṛṣṭāyāṁ jāyate tadā || 5 ||

वे मानो सम्पूर्ण ब्रह्मांड की प्रदक्षिणा कर लेते हैं, इसमें कोई संदेह नहीं। अन्यत्र महादानों से जो फल कहा गया है, वह द्वारका में रुक्मिणी के दर्शन मात्र से प्राप्त हो जाता है।

श्लोक 6 (skanda.7.489.6)

द्वादशीवासरे प्राप्ते माहात्म्यं द्वारकाभवम् । पठते संनिधौ विष्णोः शृणु वक्ष्यामि तत्फलम् ॥ ६ ॥

dvādaśīvāsare prāpte māhātmyaṁ dvārakābhavam | paṭhate saṁnidhau viṣṇoḥ śṛṇu vakṣyāmi tatphalam || 6 ||

द्वादशी का दिन आने पर जो विष्णु की समीपता में द्वारका से संबंधित माहात्म्य पढ़ता है, उसका फल सुनो, मैं कहता हूँ।

श्लोक 7 (skanda.7.489.7)

सर्वेषु चैव लोकेषु कामचारी विराजते । पद्मवर्णेन यानेन किंकिणीजालमालिना ॥ ७ ॥

sarveṣu caiva lokeṣu kāmacārī virājate | padmavarṇena yānena kiṁkiṇījālamālinā || 7 ||

वह समस्त लोकों में स्वेच्छाचारी होकर विराजमान होता है, पद्म-वर्ण के, घंटियों के जाल से सुसज्जित विमान पर,

श्लोक 8 (skanda.7.489.8)

दिव्यश्वेताश्वयुक्तेन कामगेन यथासुखम् । आभूतसंप्लवं यावत्क्रीडतेऽप्सरसां गणैः ॥ ८ ॥

divyaśvetāśvayuktena kāmagena yathāsukham | ābhūtasaṁplavaṁ yāvatkrīḍate'psarasāṁ gaṇaiḥ || 8 ||

दिव्य श्वेत घोड़ों से युक्त, इच्छानुसार चलने वाले उस विमान पर सुखपूर्वक बैठकर, वह प्रलय तक अप्सराओं के समूहों के साथ क्रीड़ा करता है।

श्लोक 9 (skanda.7.489.9)

कृतकृत्यश्च भवति कल्पकोटिसमन्वितः । यथा निर्मथनादग्निः सर्वकाष्ठेषु दृश्यते । तथा च दृश्यते धर्मो द्वादशीसेवनान्नरे ॥ ९ ॥

kṛtakṛtyaśca bhavati kalpakoṭisamanvitaḥ | yathā nirmathanādagniḥ sarvakāṣṭheṣu dṛśyate | tathā ca dṛśyate dharmo dvādaśīsevanānnare || 9 ||

वह कृतकृत्य होकर करोड़ों कल्पों तक वहाँ रहता है। जैसे मंथन करने से अग्नि सभी लकड़ियों में देखी जाती है, वैसे ही द्वादशी की सेवा से मनुष्य में धर्म प्रकट होता दिखता है।

श्लोक 10 (skanda.7.489.10)

अतः परं प्रवक्ष्यामि पितृभिः परिकीर्तितम् । अपि स्यात्स कुलेऽस्माकं गोमत्यां श्रद्धया नरः । स्नात्वा संपूज्य कृष्णं च श्राद्धं कुर्यात्सपिण्डकम् ॥ १० ॥

ataḥ paraṁ pravakṣyāmi pitṛbhiḥ parikīrtitam | api syātsa kule'smākaṁ gomatyāṁ śraddhayā naraḥ | snātvā saṁpūjya kṛṣṇaṁ ca śrāddhaṁ kuryātsapiṇḍakam || 10 ||

अब मैं वह कहता हूँ, जो पितरों द्वारा घोषित किया गया है - "क्या हमारे कुल में भी कोई ऐसा मनुष्य होगा, जो गोमती में श्रद्धापूर्वक स्नान कर, कृष्ण की पूजा कर, पिंड सहित श्राद्ध करेगा?"

श्लोक 11 (skanda.7.489.11)

अपि स्यात्स कुलेऽस्माकं गोमत्युदधिसंगमे । स्नात्वा पश्यति यः कृष्णमस्माकं तारणाय वै ॥ ११ ॥

api syātsa kule'smākaṁ gomatyudadhisaṁgame | snātvā paśyati yaḥ kṛṣṇamasmākaṁ tāraṇāya vai || 11 ||

"क्या हमारे कुल में भी वह होगा, जो गोमती और समुद्र के संगम में स्नान कर, हमारे उद्धार के लिए कृष्ण का दर्शन करेगा?"

श्लोक 12 (skanda.7.489.12)

अपिस्यात्स कुलऽस्माकं यः श्रुत्वा ब्राह्मणाननात् । द्वारकामाहात्म्यमिदं पूजयिष्यति भक्तितः ॥ १२ ॥

api syātsa kule'smākaṁ yaḥ śrutvā brāhmaṇānanāt | dvārakāmāhātmyamidaṁ pūjayiṣyati bhaktitaḥ || 12 ||

"क्या हमारे कुल में भी वह होगा, जो ब्राह्मण के मुख से यह द्वारका-माहात्म्य सुनकर, भक्तिपूर्वक इसकी पूजा करेगा?"

श्लोक 13 (skanda.7.489.13)

भविष्यति कुलेऽस्माकं यो गच्छेद्द्वारकां पुरीम् । संप्राप्य द्वादशीं शुद्धां यः करिष्यति जागरम् ॥ १३ ॥

bhaviṣyati kule'smākaṁ yo gaccheddvārakāṁ purīm | saṁprāpya dvādaśīṁ śuddhāṁ yaḥ kariṣyati jāgaram || 13 ||

"क्या हमारे कुल में वह होगा, जो द्वारकापुरी जाएगा, और शुद्ध द्वादशी को प्राप्त कर जागरण करेगा?"

श्लोक 14 (skanda.7.489.14)

भविष्यति कुलेऽस्माकं पुत्रो वा दुहिता तथा । स्तुवन्नामसहस्रं तु कृष्णस्याग्रे पठिष्यति ॥ १४ ॥

bhaviṣyati kule'smākaṁ putro vā duhitā tathā | stuvannāmasahasraṁ tu kṛṣṇasyāgre paṭhiṣyati || 14 ||

"क्या हमारे कुल में वह पुत्र या पुत्री होगी, जो स्तुति करते हुए कृष्ण के सामने सहस्रनाम का पाठ करेगी?"

श्लोक 15 (skanda.7.489.15)

अपि स्यात्स कुलेऽस्माकं भविष्यति धृतव्रतः । गोपीचन्दनदानेन यस्तोषयति वैष्णवान् ॥ १५ ॥

api syātsa kule'smākaṁ bhaviṣyati dhṛtavrataḥ | gopīcandanadānena yastoṣayati vaiṣṇavān || 15 ||

"क्या हमारे कुल में वह व्रतधारी होगा, जो गोपीचंदन के दान से वैष्णवों को संतुष्ट करेगा?"

श्लोक 16 (skanda.7.489.16)

अपि स्यात्स कुलेऽस्माकं वैष्णवानां तु सन्निधौ । द्वारकायाश्च माहात्म्यं पठिष्यति जितेन्द्रियः ॥ १६ ॥

api syātsa kule'smākaṁ vaiṣṇavānāṁ tu sannidhau | dvārakāyāśca māhātmyaṁ paṭhiṣyati jitendriyaḥ || 16 ||

"क्या हमारे कुल में वह जितेंद्रिय होगा, जो वैष्णवों की समीपता में द्वारका के माहात्म्य का पाठ करेगा?"

श्लोक 17 (skanda.7.489.17)

भविष्यति कुलेऽस्माकं माहात्म्यं द्वारकाभवम् । लिखित्वा कृष्णतुष्ट्यर्थं स्वगृहे धारयिष्यति ॥ १७ ॥

bhaviṣyati kule'smākaṁ māhātmyaṁ dvārakābhavam | likhitvā kṛṣṇatuṣṭyarthaṁ svagṛhe dhārayiṣyati || 17 ||

"क्या हमारे कुल में वह होगा, जो कृष्ण को संतुष्ट करने के लिए द्वारका के माहात्म्य को लिखकर अपने घर में रखेगा?"

श्लोक 18 (skanda.7.489.18)

स्वर्णदानं च गोदानं भूमिदानं तथैव च । यावज्जीवं भवेद्दत्तं येनेदं धारितं कलौ ॥ १८ ॥

svarṇadānaṁ ca godānaṁ bhūmidānaṁ tathaiva ca | yāvajjīvaṁ bhaveddattaṁ yenedaṁ dhāritaṁ kalau || 18 ||

सुवर्ण-दान, गौ-दान, तथा भूमि-दान भी जो जीवनभर किया जाए, वही फल कलियुग में उसे मिलता है, जो इसे धारण करता है।

श्लोक 19 (skanda.7.489.19)

तप्तकृच्छ्रं महाकृच्छ्रं मासोपोषणमेव च । यावज्जीवं कृतं तेन येनेदं श्रावितं कलौ ॥ १९ ॥

taptakṛcchraṁ mahākṛcchraṁ māsopoṣaṇameva ca | yāvajjīvaṁ kṛtaṁ tena yenedaṁ śrāvitaṁ kalau || 19 ||

तप्तकृच्छ्र, महाकृच्छ्र तथा मासोपवास भी जो जीवनभर किया जाए, वह उसके द्वारा किया गया माना जाता है, जो इसे कलियुग में दूसरों को सुनाता है।

श्लोक 20 (skanda.7.489.20)

प्रायश्चित्तानि चीर्णानि पापानां नाशनाय । द्वारकायाश्च माहात्म्यं येन विस्तारितं कलौ ॥ २० ॥

prāyaścittāni cīrṇāni pāpānāṁ nāśanāya | dvārakāyāśca māhātmyaṁ yena vistāritaṁ kalau || 20 ||

पापों के नाश के लिए किए गए समस्त प्रायश्चित्त - वे सब उसके द्वारा किए गए माने जाते हैं, जिसने कलियुग में द्वारका के माहात्म्य का विस्तार किया।

श्लोक 21 (skanda.7.489.21)

तावत्तिष्ठंति पुरुषे ब्रह्महत्यादिकानि च । यावन्न लिखते जंतुर्माहात्म्यं द्वारकाभवम् ॥ २१ ॥

tāvattiṣṭhaṁti puruṣe brahmahatyādikāni ca | yāvanna likhate jaṁturmāhātmyaṁ dvārakābhavam || 21 ||

ब्रह्महत्या आदि पाप मनुष्य में तभी तक स्थित रहते हैं, जब तक प्राणी द्वारका के माहात्म्य को लिखता नहीं है।

श्लोक 22 (skanda.7.489.22)

दानैः सर्वैश्च किं तस्य सर्वतीर्थावगाहनैः । द्वारकायाश्च माहात्म्यं येनेदं लिखितं गृहे ॥ २२ ॥

dānaiḥ sarvaiśca kiṁ tasya sarvatīrthāvagāhanaiḥ | dvārakāyāśca māhātmyaṁ yenedaṁ likhitaṁ gṛhe || 22 ||

जिसने यह द्वारका का माहात्म्य अपने घर में लिख रखा है, उसके लिए समस्त दानों और समस्त तीर्थों में स्नान करने से क्या लाभ?

श्लोक 23 (skanda.7.489.23)

सर्व दुःखप्रशमनं सर्वकार्य्यप्रसाधनम् । चतुर्वर्गप्रदं नित्यं हरिभक्तिविवर्द्धनम् ॥ २३ ॥

sarvaduḥkhapraśamanaṁ sarvakāryaprasādhanam | caturvargapradaṁ nityaṁ haribhaktivivarddhanam || 23 ||

यह समस्त दुःखों को शांत करने वाला, समस्त कार्यों को सिद्ध करने वाला, चारों पुरुषार्थों को देने वाला, तथा हरि-भक्ति को सदा बढ़ाने वाला है।

श्लोक 24 (skanda.7.489.24)

न चाधिर्भवते नूनं याम्यं तस्य भयं नहि । माहात्म्यं पठते यत्र द्वारकायाः समुद्भवम् ॥ २४ ॥

na cādhirbhavate nūnaṁ yāmyaṁ tasya bhayaṁ nahi | māhātmyaṁ paṭhate yatra dvārakāyāḥ samudbhavam || 24 ||

निश्चय ही उसे कोई मानसिक पीड़ा नहीं होती, और उसे यम का भय भी नहीं होता, जो द्वारका से उत्पन्न इस माहात्म्य को पढ़ता है।

श्लोक 25 (skanda.7.489.25)

लिखितं तिष्ठते यस्य गृहे तत्तीर्थमेव च । बलाच्छुणुष्व माहात्म्यं द्वारकायाः समुद्भवम् ॥ २५ ॥

likhitaṁ tiṣṭhate yasya gṛhe tattīrthameva ca | balācchruṇuṣva māhātmyaṁ dvārakāyāḥ samudbhavam || 25 ||

जिसके घर में यह लिखित होकर रहता है, वह घर ही तीर्थ है। द्वारका से उत्पन्न इस माहात्म्य को बलपूर्वक सुनो।

श्लोक 26 (skanda.7.489.26)

विधि मन्त्रक्रियाहीनां पूजां गृह्णाति केशवः । माहात्म्यं तिष्ठते नित्यं लिखितं यस्य वेश्मनि । न तस्यागःसहस्रैस्तु कृतैर्लिप्यति मानवः ॥ २६ ॥

vidhi mantrakriyāhīnāṁ pūjāṁ gṛhṇāti keśavaḥ | māhātmyaṁ tiṣṭhate nityaṁ likhitaṁ yasya veśmani | na tasyāgaḥsahasraistu kṛtairlipyati mānavaḥ || 26 ||

केशव उस पूजा को भी स्वीकार करते हैं, जो विधि और मंत्र-क्रिया से रहित हो, यदि उसके घर में यह माहात्म्य सदा लिखित रहता है। ऐसा मनुष्य सहस्रों किए गए अपराधों से भी लिप्त नहीं होता।

श्लोक 27 (skanda.7.489.27)

यः पठेच्छृणुते वापि माहात्म्यं द्वारकाभवम् । न भवेद्भूतवैकल्यं धर्मवैकल्यमेव च ॥ २७ ॥

yaḥ paṭheccchṛṇute vāpi māhātmyaṁ dvārakābhavam | na bhavedbhūtavaikalyaṁ dharmavaikalyameva ca || 27 ||

जो द्वारका से संबंधित इस माहात्म्य को पढ़ता है अथवा सुनता है, उसे न तो भूत-बाधा होती है और न ही धर्म-भ्रष्टता होती है।

श्लोक 28 (skanda.7.489.28)

यः स्मरेत्प्रातरुत्थाय माहात्म्यं द्वारकाभवम् । द्वादशीनां च सर्वासां यच्चोक्तं लभते फलम् ॥ २८ ॥

yaḥ smaretprātarutthāya māhātmyaṁ dvārakābhavam | dvādaśīnāṁ ca sarvāsāṁ yaccoktaṁ labhate phalam || 28 ||

जो प्रातः उठकर इस द्वारका के माहात्म्य का स्मरण करता है, वह समस्त द्वादशियों का जो फल कहा गया है, उसे प्राप्त करता है।

श्लोक 29 (skanda.7.489.29)

त्रिदशैः पूज्यते नित्यं वन्द्यते सिद्धचारणैः । माहात्म्यं पठते यो वै द्वारकायाः समुद्भवम् ॥ २९ ॥

tridaśaiḥ pūjyate nityaṁ vandyate siddhacāraṇaiḥ | māhātmyaṁ paṭhate yo vai dvārakāyāḥ samudbhavam || 29 ||

जो इस द्वारका से उत्पन्न माहात्म्य को पढ़ता है, वह नित्य देवताओं द्वारा पूजित होता है और सिद्ध-चारणों द्वारा वंदित होता है।

श्लोक 30 (skanda.7.489.30)

द्वारका वसते यत्र तत्र विष्णुः सनातनः । तत्र तीर्थानि सर्वाणि सर्वे देवाः सवासवाः । यज्ञा वेदाश्च ऋषयस्त्रैलोक्यं सचरा चरम् ॥ ३० ॥

dvārakā vasate yatra tatra viṣṇuḥ sanātanaḥ | tatra tīrthāni sarvāṇi sarve devāḥ savāsavāḥ | yajñā vedāśca ṛṣayastrailokyaṁ sacarācaram || 30 ||

जहाँ द्वारका निवास करती है, वहाँ सनातन विष्णु भी निवास करते हैं। वहाँ समस्त तीर्थ, इंद्र सहित समस्त देवता, यज्ञ, वेद, ऋषिगण तथा चराचर सहित त्रिलोक भी निवास करते हैं।

श्लोक 31 (skanda.7.489.31)

शक्तो हि द्वारकां गंतुं मानवो न हि पुत्रक । कृष्णदर्शनजं पुण्यं माहात्म्यं पठतो भवेत् ॥ ३१ ॥

śakto hi dvārakāṁ gaṁtuṁ mānavo na hi putraka | kṛṣṇadarśanajaṁ puṇyaṁ māhātmyaṁ paṭhato bhavet || 31 ||

हे पुत्र! जो मनुष्य द्वारका जाने में समर्थ नहीं है, उसे इस माहात्म्य को पढ़ने से ही कृष्ण-दर्शन से उत्पन्न पुण्य प्राप्त हो जाता है।

श्लोक 32 (skanda.7.489.32)

सत्यं शौचं श्रुतं वित्तं सुशीलं च क्षमाऽऽर्जवम् । सर्वं च निष्फलं तस्य माहात्म्यं न शृणोति यः ॥ ३२ ॥

satyaṁ śaucaṁ śrutaṁ vittaṁ suśīlaṁ ca kṣamārjavam | sarvaṁ ca niṣphalaṁ tasya māhātmyaṁ na śṛṇoti yaḥ || 32 ||

सत्य, शौच, वेदज्ञान, धन, सुशीलता, क्षमा तथा सरलता - ये सब उस व्यक्ति के लिए निष्फल हो जाते हैं, जो इस माहात्म्य को नहीं सुनता।

श्लोक 33 (skanda.7.489.33)

षण्मासे च भवेत्पुत्रो लक्ष्मीश्चैव विवर्द्धते । तस्य यः शृणुते भक्त्या माहात्म्यं द्वारकाभवम् ॥ ३३ ॥

ṣaṇmāse ca bhavetputro lakṣmīścaiva vivarddhate | tasya yaḥ śṛṇute bhaktyā māhātmyaṁ dvārakābhavam || 33 ||

जो भक्तिपूर्वक इस द्वारका के माहात्म्य को सुनता है, उसे छह महीने में ही पुत्र की प्राप्ति होती है और उसकी लक्ष्मी भी बढ़ती है।

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