प्रभास खण्ड · अध्याय 488
गोमती-स्नान, कृष्ण-पूजन, यति-भोजन एवं श्राद्ध के शुभ फल का वर्णन
श्लोक 1 (skanda.7.488.1)
श्रीप्रह्लाद उवाच । धन्यास्तु नरलोकास्ते गोमत्यां तु कृतोदकाः । पूजयिष्यंति ये कृष्णं केतकीतुलसीदलैः ॥ १ ॥
śrīprahlāda uvāca | dhanyāstu naralokāste gomatyāṁ tu kṛtodakāḥ | pūjayiṣyaṁti ye kṛṣṇaṁ ketakītulasīdalaiḥ || 1 ||
श्रीप्रह्लाद ने कहा - धन्य हैं वे मनुष्य, जो गोमती में तर्पण कर केतकी और तुलसी के पत्तों से कृष्ण की पूजा करेंगे।
श्लोक 2 (skanda.7.488.2)
न तेषां संभवोऽस्तीह घोरसंसारगह्वरे । तेषां मृत्युः पुनर्नास्ति ह्यमरत्वं हि ते गताः ॥ २ ॥
na teṣāṁ saṁbhavo'stīha ghorasaṁsāragahvare | teṣāṁ mṛtyuḥ punarnāsti hyamaratvaṁ hi te gatāḥ || 2 ||
उनका पुनर्जन्म इस भयंकर संसार-गहन में नहीं होता, उनकी मृत्यु भी पुनः नहीं होती, वे अमरत्व को प्राप्त हो जाते हैं।
श्लोक 3 (skanda.7.488.3)
अन्यत्र वै यतीनां तु कोटीनां यत्फलं भवेत् । द्वारकायां तु चैकेन भोजितेन ततोऽधिकम् ॥ ३ ॥
anyatra vai yatīnāṁ tu koṭīnāṁ yatphalaṁ bhavet | dvārakāyāṁ tu caikena bhojitena tato'dhikam || 3 ||
अन्यत्र करोड़ों यतियों को भोजन कराने से जो फल होता है, द्वारका में एक ही यति को भोजन कराने से उससे भी अधिक फल प्राप्त होता है।
श्लोक 4 (skanda.7.488.4)
अतीतं वर्त्तमानं च भविष्यद्यच्च पातकम् । निर्द्दहेन्नास्ति संदेहो द्वारका मनसा स्मृता ॥ ४ ॥
atītaṁ varttamānaṁ ca bhaviṣyadyacca pātakam | nirddahennāsti saṁdeho dvārakā manasā smṛtā || 4 ||
भूत, वर्तमान तथा भविष्य का जो भी पातक है, उसे द्वारका, मन से स्मरण करने मात्र से ही, जला देती है, इसमें कोई संदेह नहीं।
श्लोक 5 (skanda.7.488.5)
ज्ञात्वा कलियुगे घोरे हाहाभूतमचेतनम् । द्वारकां ये न मुञ्चन्ति कृतार्थास्ते नरोत्तमाः ॥ ५ ॥
jñātvā kaliyuge ghore hāhābhūtamacetanam | dvārakāṁ ye na muñcaṁti kṛtārthāste narottamāḥ || 5 ||
भयंकर कलियुग में जगत् को हाय-हाय से भरा तथा अचेतन जानकर, जो द्वारका को नहीं छोड़ते, वे श्रेष्ठ मनुष्य कृतार्थ हैं।
श्लोक 6 (skanda.7.488.6)
मृतानां यत्र जंतूनां श्वेतद्वीपे स्थितिः सदा ॥ ६ ॥
mṛtānāṁ yatra jaṁtūnāṁ śvetadvīpe sthitiḥ sadā || 6 ||
जहाँ मरे हुए प्राणियों की सदा श्वेतद्वीप में स्थिति होती है।
श्लोक 7 (skanda.7.488.7)
अग्निष्वात्ता बर्हिषद आज्यपाः सोमपाश्च ये । एकविंशतिः पितृगणा द्वारकायां वसंति ते ॥ ७ ॥
agniṣvāttā barhiṣada ājyapāḥ somapāśca ye | ekaviṁśatiḥ pitṛgaṇā dvārakāyāṁ vasaṁti te || 7 ||
अग्निष्वात्त, बर्हिषद, आज्यप तथा सोमप - इक्कीस पितृगण द्वारका में निवास करते हैं।
श्लोक 8 (skanda.7.488.8)
पुष्करादीनि तीर्थानि गंगाद्याः सरितस्तथा । कुरुक्षेत्रादि क्षेत्राणि काश्यादीन्यूषराणि च ॥ ८ ॥
puṣkarādīni tīrthāni gaṁgādyāḥ saritastathā | kurukṣetrādi kṣetrāṇi kāśyādīnyūṣarāṇi ca || 8 ||
पुष्कर आदि तीर्थ, गंगा आदि नदियाँ, कुरुक्षेत्र आदि क्षेत्र, तथा काशी आदि तीर्थभूमियाँ भी,
श्लोक 9 (skanda.7.488.9)
गयादिपितृतीर्थानि प्रभासाद्यानि यानि च । स्थानानि यानि पुण्यानि ग्रामाश्च निवसंति वै ॥ ९ ॥
gayādipitṛtīrthāni prabhāsādyāni yāni ca | sthānāni yāni puṇyāni grāmāśca nivasaṁti vai || 9 ||
गया आदि पितृ-तीर्थ, प्रभास आदि, जो भी पुण्य स्थान और ग्राम हैं, वे सब द्वारका में निवास करते हैं।
श्लोक 10 (skanda.7.488.10)
काश्यादिपुर्यो या नित्यं निवसंति कलौ युगे । नित्यं कृष्णस्य सदने पापिनां मुक्तिदे सदा ॥ १० ॥
kāśyādipuryo yā nityaṁ nivasaṁti kalau yuge | nityaṁ kṛṣṇasya sadane pāpināṁ muktide sadā || 10 ||
काशी आदि पुरियाँ, जो कलियुग में नित्य निवास करती हैं, वे सदा कृष्ण के सदन में, पापियों को सदा मुक्ति देने वाली होकर निवास करती हैं।
श्लोक 11 (skanda.7.488.11)
वैशाखशुक्लद्वादश्यां प्रबोधिन्यां शेषतः । वैशाख्यां दैत्यशार्दूल कल्पादिषु युगादिषु ॥ ११ ॥
vaiśākhaśukladvādaśyāṁ prabodhinyāṁ śeṣataḥ | vaiśākhyāṁ daityaśārdūla kalpādiṣu yugādiṣu || 11 ||
वैशाख शुक्ल द्वादशी को, प्रबोधिनी को, और शेष रूप में वैशाख में, हे दैत्यशार्दूल! कल्पादि तथा युगादि तिथियों में,
श्लोक 12 (skanda.7.488.12)
चंद्रसूर्योपरागेषु मन्वादिषु न संशयः । व्यतीपातेषु संक्रांतौ वैधृतौ दैत्यनायक ॥ १२ ॥
caṁdrasūryoparāgeṣu manvādiṣu na saṁśayaḥ | vyatīpāteṣu saṁkrāṁtau vaidhṛtau daityanāyaka || 12 ||
चंद्र-सूर्य ग्रहणों में, मन्वादि तिथियों में - इसमें कोई संदेह नहीं - व्यतीपात में, संक्रांति में, तथा वैधृति योग में, हे दैत्यनायक!
श्लोक 13 (skanda.7.488.13)
तिलोदकं च यद्दत्त तत्स्थले पितृभक्तितः । तत्सर्वमक्षयं प्रोक्तं गोमत्यां स्नानपूर्वकम् ॥ १३ ॥
tilodakaṁ ca yaddatta tatsthale pitṛbhaktitaḥ | tatsarvamakṣayaṁ proktaṁ gomatyāṁ snānapūrvakam || 13 ||
उस स्थल पर पितृ-भक्ति से जो भी तिलोदक दिया जाता है, वह सब गोमती में स्नानपूर्वक करने से अक्षय कहा गया है।
श्लोक 14 (skanda.7.488.14)
येऽत्र श्राद्धं प्रकुर्वंति पिंडदानपुरःसरम् । तेषामत्राक्षया तृप्तिः पितॄणामुपजायते ॥ १४ ॥
ye'tra śrāddhaṁ prakurvaṁti piṁḍadānapuraḥsaram | teṣāmatrākṣayā tṛptiḥ pitṝṇāmupajāyate || 14 ||
जो यहाँ पिंडदान-पूर्वक श्राद्ध करते हैं, उनके पितरों को यहाँ अक्षय तृप्ति प्राप्त होती है।