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प्रभास खण्ड · अध्याय 487

कार्तिक मास में चक्रतीर्थ-स्नान, दान, श्राद्ध आदि के माहात्म्य का वर्णन

अध्याय 486अध्याय-सूचीअध्याय 488

श्लोक 1 (skanda.7.487.1)

श्रीप्रह्लाद उवाच । स्वनामांकित पत्रैस्तु श्रीपतिं योऽर्चयेत वै । सप्तलोकाननुप्राप्य सप्तद्वीपाधिपो भवेत् ॥ १ ॥

śrīprahlāda uvāca | svanāmāṁkitapatraistu śrīpatiṁ yo'rcayeta vai | saptalokānanuprāpya saptadvīpādhipo bhavet || 1 ||

श्रीप्रह्लाद ने कहा - जो अपने नामांकित पत्रों से श्रीपति का पूजन करता है, वह सातों लोकों को प्राप्त कर सप्तद्वीपों का अधिपति होता है।

श्लोक 2 (skanda.7.487.2)

माकान्तवृक्षपत्रैस्तु योऽर्चयेत सदा हरिम् । पुण्यं भवति तस्येह वाजिमेधायुतं कलौ ॥ २ ॥

mākāntavṛkṣapatraistu yo'rcayeta sadā harim | puṇyaṁ bhavati tasyeha vājimedhāyutaṁ kalau || 2 ||

जो सदा मौलश्री वृक्ष के पत्तों से हरि का पूजन करता है, कलियुग में उसे यहाँ दस हजार अश्वमेध यज्ञों का पुण्य प्राप्त होता है।

श्लोक 3 (skanda.7.487.3)

लक्ष्मीं सरस्वतीं देवीं सावित्रीं चंडिकां तथा । पूजयित्वा दिवं याति पत्रैः श्रीवृक्षसंभवैः ॥ ३ ॥

lakṣmīṁ sarasvatīṁ devīṁ sāvitrīṁ caṁḍikāṁ tathā | pūjayitvā divaṁ yāti patraiḥ śrīvṛkṣasaṁbhavaiḥ || 3 ||

लक्ष्मी, देवी सरस्वती, सावित्री तथा चंडिका का श्रीवृक्ष से उत्पन्न पत्तों से पूजन कर मनुष्य स्वर्ग को जाता है।

श्लोक 4 (skanda.7.487.4)

तुलस्या अधिकं प्रोक्तं दलं श्रीवृक्षसंभवम् । तस्मान्नित्यं प्रयत्नेन पूजनीयः सदाऽच्युतः ॥ ४ ॥

tulasyā adhikaṁ proktaṁ dalaṁ śrīvṛkṣasaṁbhavam | tasmānnityaṁ prayatnena pūjanīyaḥ sadā'cyutaḥ || 4 ||

तुलसी के पत्ते को श्रीवृक्ष से उत्पन्न पत्ते से भी अधिक कहा गया है। अतः नित्य प्रयत्नपूर्वक अच्युत की सदा पूजा करनी चाहिए।

श्लोक 5 (skanda.7.487.5)

द्वादश्यां रविवारेण श्रीवृक्षमर्चयन्ति ये । ब्रह्महत्यादिकैः पापैर्न लिप्यंते कृतैरपि ॥ ५ ॥

dvādaśyāṁ ravivāreṇa śrīvṛkṣamarcayanti ye | brahmahatyādikaiḥ pāpairna lipyaṁte kṛtairapi || 5 ||

जो द्वादशी को रविवार के साथ श्रीवृक्ष की पूजा करते हैं, वे ब्रह्महत्या आदि पापों से, भले ही वे किए गए हों, लिप्त नहीं होते।

श्लोक 6 (skanda.7.487.6)

यथा करिपदेऽन्यानि प्रविशंति पदानि च । तथा सर्वाणि पुण्यानि प्रविष्टानि हरेर्दिने ॥ ६ ॥

yathā karipade'nyāni praviśaṁti padāni ca | tathā sarvāṇi puṇyāni praviṣṭāni hareirdine || 6 ||

जैसे हाथी के पद-चिह्न में अन्य सभी पद-चिह्न समा जाते हैं, वैसे ही हरि के दिन में समस्त पुण्य समा जाते हैं।

श्लोक 7 (skanda.7.487.7)

अध्रुवेणैव देहेन प्रतिक्षणविनाशिना । कथं नोपासते जंतुर्द्वादशीं जागरान्विताम् ॥ ७ ॥

adhruveṇaiva dehena pratikṣaṇavināśinā | kathaṁ nopāsate jaṁturdvādaśīṁ jāgarānvitām || 7 ||

इस अध्रुव, प्रतिक्षण विनाशी शरीर से, प्राणी जागरण-सहित द्वादशी की उपासना क्यों नहीं करता?

श्लोक 8 (skanda.7.487.8)

अतीतान्पुरुषान्सप्त भविष्यांश्च चतुर्द्दश । नरकात्तारयेत्सर्वाँल्लोकान्कृष्णेति कीर्तनात् । न ते जीवंति लोकेऽस्मिन्यत्रतत्र स्थिता नराः ॥ ८ ॥

atītānpuruṣānsapta bhaviṣyāṁśca caturddaśa | narakāttārayetsarvāḻlokānkṛṣṇeti kīrtanāt | na te jīvaṁti loke'sminyatratatra sthitā narāḥ || 8 ||

सात पूर्ववर्ती तथा चौदह भावी पीढ़ियों को, "कृष्ण" इस कीर्तन से, समस्त लोकों में नरक से तार देता है। जो मनुष्य जहाँ-तहाँ रहते हैं, वे इस संसार में वास्तव में जीवित नहीं हैं।

श्लोक 9 (skanda.7.487.9)

द्वारकायां च संप्राप्तास्त्रिषु लोकेषु वंदिताः । द्वारकायां प्रकुर्वंति यतीनां भोजनं स्थितिम् । ग्रासेग्रासे मखशतं ते लभंते फलं नराः ॥ ९ ॥

dvārakāyāṁ ca saṁprāptāstriṣu lokeṣu vaṁditāḥ | dvārakāyāṁ prakurvaṁti yatīnāṁ bhojanaṁ sthitim | grāsegrāse makhaśataṁ te labhaṁte phalaṁ narāḥ || 9 ||

द्वारका पहुँचे हुए, तीनों लोकों में वंदित पुरुष, द्वारका में यतियों को भोजन तथा निवास प्रदान करते हैं - वे मनुष्य प्रत्येक ग्रास पर सौ यज्ञों का फल प्राप्त करते हैं।

श्लोक 10 (skanda.7.487.10)

यतीनां ये प्रयच्छंति कौपीनाच्छादनादिकम् । वसतां द्वारकामध्ये यथाशक्त्या तु भोजनम् । शृणु पुण्यं प्रवक्ष्यामि समासेन हि दैत्यज ॥ १० ॥

yatīnāṁ ye prayacchaṁti kaupīnācchādanādikam | vasatāṁ dvārakāmadhye yathāśaktyā tu bhojanam | śṛṇu puṇyaṁ pravakṣyāmi samāsena hi daityaja || 10 ||

जो यतियों को कौपीन-वस्त्र आदि देते हैं, द्वारका में रहने वाले यतियों को अपनी शक्ति के अनुसार भोजन देते हैं, हे दैत्यपुत्र! उनका पुण्य संक्षेप में सुनो, मैं कहता हूँ।

श्लोक 11 (skanda.7.487.11)

कोटिभिर्वेदविद्वद्भिर्गयायां पितृवत्सलैः । भोजितैर्यत्समाप्नोति तत्फलं दैत्यनायक ॥ ११ ॥

koṭibhirvedavidvadbhirgayāyāṁ pitṛvatsalaiḥ | bhojitairyatsamāpnoti tatphalaṁ daityanāyaka || 11 ||

हे दैत्यनायक! गया में करोड़ों वेदवेत्ता, पितृ-वत्सल ब्राह्मणों को भोजन कराने से जो फल प्राप्त होता है,

श्लोक 12 (skanda.7.487.12)

एकस्मिन्भोजिते पौत्र भिक्षुके फलमीदृशम् । दातव्यं भिक्षुके चान्नं कुर्य्याद्वै चात्मविक्रयम् ॥ १२ ॥

ekasminbhojite pautra bhikṣuke phalamīdṛśam | dātavyaṁ bhikṣuke cānnaṁ kuryādvai cātmavikrayam || 12 ||

हे पौत्र! वही फल एक ही भिक्षुक को भोजन कराने से मिलता है। भिक्षुक को अन्न अवश्य देना चाहिए, चाहे अपने को ही बेचना क्यों न पड़े।

श्लोक 13 (skanda.7.487.13)

धन्यास्ते यतयः सर्वे ये वसंति कलौ युगे । कृष्णमाश्रित्य दैत्येन्द्र द्वारकायां दिनेदिने ॥ १३ ॥

dhanyāste yatayaḥ sarve ye vasaṁti kalau yuge | kṛṣṇamāśritya daityendra dvārakāyāṁ dinedine || 13 ||

हे दैत्येंद्र! धन्य हैं वे सभी यति, जो कलियुग में कृष्ण का आश्रय लेकर द्वारका में प्रतिदिन निवास करते हैं।

श्लोक 14 (skanda.7.487.14)

प्राणिनो ये मृताः केचिद्द्वारकां कृष्णसन्निधौ । पापिनस्तत्पदं यांति भित्त्वा सूर्यस्य मंडलम् ॥ १४ ॥

prāṇino ye mṛtāḥ kecid dvārakāṁ kṛṣṇasannidhau | pāpinastatpadaṁ yāṁti bhittvā sūryasya maṇḍalam || 14 ||

कोई भी प्राणी, चाहे पापी ही क्यों न हो, यदि द्वारका में कृष्ण की समीपता में मरता है, तो वह सूर्यमंडल को भेदकर उस परम पद को प्राप्त करता है।

श्लोक 15 (skanda.7.487.15)

द्वारकाचक्रतीर्थे ये निवसंति नरोत्तमाः । तेषां निवारिताः सर्वे यमेन यमकिंकराः ॥ १५ ॥

dvārakācakratīrthe ye nivasaṁti narottamāḥ | teṣāṁ nivāritāḥ sarve yamena yamakiṁkarāḥ || 15 ||

द्वारका के चक्रतीर्थ में जो श्रेष्ठ मनुष्य निवास करते हैं, उन सबके लिए यम के किंकरों को यम स्वयं रोक देते हैं।

श्लोक 16 (skanda.7.487.16)

स्नात्वा पश्यंति गोमत्यां कृष्णं कलिमलापहम् । न तेषां विषये यूयं न चास्मद्विषये तु ते ॥ १६ ॥

snātvā paśyaṁti gomatyāṁ kṛṣṇaṁ kalimalāpaham | na teṣāṁ viṣaye yūyaṁ na cāsmadviṣaye tu te || 16 ||

गोमती में स्नान कर जो कलि के मल को हरने वाले कृष्ण का दर्शन करते हैं, वे न तुम्हारे अधिकार-क्षेत्र में हैं और न ही हमारे अधिकार-क्षेत्र में।

श्लोक 17 (skanda.7.487.17)

अपि कीटः पतंगो वा वृक्षा वा ये तदाश्रिताः । यांति ते कृष्णसदनं संसारे न पुनर्हिं ते ॥ १७ ॥

api kīṭaḥ pataṁgo vā vṛkṣā vā ye tadāśritāḥ | yāṁti te kṛṣṇasadanaṁ saṁsāre na punarhiṁ te || 17 ||

यहाँ तक कि कीड़े, पतंगे अथवा वृक्ष भी, जो उसका आश्रय लेते हैं, वे कृष्ण के धाम को जाते हैं, वे संसार में पुनः नहीं आते।

श्लोक 18 (skanda.7.487.18)

किं पुनर्द्विजवर्य्याश्च क्षत्रियाश्च विशेषतः । त्रिवर्णपूजासंयुक्ताः शूद्रास्तत्र निवासिनः ॥ १८ ॥

kiṁ punardvijavaryāśca kṣatriyāśca viśeṣataḥ | trivarṇapūjāsaṁyuktāḥ śūdrāstatra nivāsinaḥ || 18 ||

फिर श्रेष्ठ ब्राह्मणों और विशेष रूप से क्षत्रियों की तो बात ही क्या! तीनों वर्णों द्वारा पूजित शूद्र भी वहाँ के निवासी हैं।

श्लोक 19 (skanda.7.487.19)

गीतां पठंति कृष्णाग्रे कार्तिकं सकलं द्विजाः । एकभक्तेन नक्तेन तथैवायाचितेन च ॥ १९ ॥

gītāṁ paṭhaṁti kṛṣṇāgre kārtikaṁ sakalaṁ dvijāḥ | ekabhaktena naktena tathaivāyācitena ca || 19 ||

द्विज लोग सम्पूर्ण कार्तिक मास में कृष्ण के सामने गीता का पाठ करते हैं, एक बार भोजन से, रात्रि-भोजन से तथा अयाचित भोजन से व्रत रखते हुए,

श्लोक 20 (skanda.7.487.20)

त्रिरात्रेणापि कृच्छ्रेण तथा चान्द्रायणेन च । यावकैस्तप्तकृच्छ्राद्यैः पक्षमासमुपोषणैः ॥ २० ॥

trirātreṇāpi kṛcchreṇa tathā cāndrāyaṇena ca | yāvakaistaptakṛcchrādyaiḥ pakṣamāsamupoṣaṇaiḥ || 20 ||

तीन रात्रियों के व्रत से, कृच्छ्र व्रत से, चांद्रायण व्रत से, यावक भोजन से, तप्तकृच्छ्र आदि से, तथा पक्ष या मास भर के उपवासों से,

श्लोक 21 (skanda.7.487.21)

क्षपयंति च ये मासं कार्तिकं व्रतचारिणः । स्नात्वा वै गोमतीनीरे तथा वै रुक्मिणीह्रदे ॥ २१ ॥

kṣapayaṁti ca ye māsaṁ kārtikaṁ vratacāriṇaḥ | snātvā vai gomatīnīre tathā vai rukmiṇīhrade || 21 ||

जो व्रतधारी लोग कार्तिक मास को इस प्रकार बिताते हैं, गोमती के जल में तथा रुक्मिणी के सरोवर में स्नान करके,

श्लोक 22 (skanda.7.487.22)

शंखचक्रगदा हस्ताः कृष्णरूपा भवंति ते । उपोष्यैकादशीं शुद्धां दशमीसंगवर्जिताम् ॥ २२ ॥

śaṁkhacakragadāhastāḥ kṛṣṇarūpā bhavaṁti te | upoṣyaikādaśīṁ śuddhāṁ daśamīsaṁgavarjitām || 22 ||

वे शंख, चक्र, गदा हाथों में धारण किए हुए कृष्ण के रूप हो जाते हैं। दशमी के संसर्ग से रहित शुद्ध एकादशी का उपवास करके,

श्लोक 23 (skanda.7.487.23)

श्राद्धं कुर्वंति द्वादश्यां चक्रतीर्थे च निर्मले । ब्राह्मणान्भोजयित्वा च मधुपायससर्पिषा ॥ २३ ॥

śrāddhaṁ kurvaṁti dvādaśyāṁ cakratīrthe ca nirmale | brāhmaṇānbhojayitvā ca madhupāyasasarpiṣā || 23 ||

द्वादशी को निर्मल चक्रतीर्थ में श्राद्ध करते हैं, ब्राह्मणों को मधु, खीर और घी से भोजन कराकर,

श्लोक 24 (skanda.7.487.24)

संतर्प्य विधिवद्भक्त्या शक्त्या दत्त्वा तु दक्षिणाम् । गोभूहिरण्यवासांसि तांबूलं च फलानि च ॥ २४ ॥

saṁtarpya vidhivadbhaktyā śaktyā dattvā tu dakṣiṇām | gobhūhiraṇyavāsāṁsi tāṁbūlaṁ ca phalāni ca || 24 ||

विधिपूर्वक भक्ति से तृप्त कर, अपनी शक्ति के अनुसार दक्षिणा देकर - गौ, भूमि, स्वर्ण, वस्त्र, तांबूल और फल,

श्लोक 25 (skanda.7.487.25)

उपानहौ च्छत्रसुमं जलपूर्णा घटास्तथा । पक्वान्नसंयुताः शुभ्राः सफला दक्षिणान्विताः ॥ २५ ॥

upānahau cchatrasumaṁ jalapūrṇā ghaṭāstathā | pakvānnasaṁyutāḥ śubhrāḥ saphalā dakṣiṇānvitāḥ || 25 ||

जूते, छत्र, फूल, तथा जल से भरे शुभ्र घट, पक्वान्न-सहित, फल-सहित, दक्षिणा-सहित देते हैं।

श्लोक 26 (skanda.7.487.26)

एवं यः कुरुते सम्यक्कृष्णमुद्दिश्य कार्तिके । मार्कंडेय समा प्रीतिः पितॄणां जायते ध्रुवम् ॥ २६ ॥

evaṁ yaḥ kurute samyakkṛṣṇamuddiśya kārtike | mārkaṁḍeyasamā prītiḥ pitṝṇāṁ jāyate dhruvam || 26 ||

इस प्रकार जो कार्तिक मास में कृष्ण के उद्देश्य से भली प्रकार यह सब करता है, उसके पितरों को मार्कंडेय के समान प्रीति निश्चय ही प्राप्त होती है।

श्लोक 27 (skanda.7.487.27)

कृष्णस्य त्रिदशैः सार्द्धं तुष्टिर्भवति चाक्षया ॥ २७ ॥

kṛṣṇasya tridaśaiḥ sārddhaṁ tuṣṭirbhavati cākṣayā || 27 ||

तथा कृष्ण की, देवताओं सहित, अक्षय संतुष्टि प्राप्त होती है।

श्लोक 28 (skanda.7.487.28)

ये कार्तिके पुण्यतमा मनुष्यास्तिष्ठंति मासं व्रतदानयुक्ताः । रथांगतीर्थे कृतपूतगात्रास्ते यांति पुण्यं पदमव्ययं च ॥ २८ ॥

ye kārtike puṇyatamā manuṣyāstiṣṭhaṁti māsaṁ vratadānayuktāḥ | rathāṁgatīrthe kṛtapūtagātrāste yāṁti puṇyaṁ padamavyayaṁ ca || 28 ||

जो अत्यंत पुण्यशाली मनुष्य कार्तिक मास में व्रत-दान से युक्त होकर एक मास तक रहते हैं, वे रथांगतीर्थ (चक्रतीर्थ) में अपने शरीर को पवित्र कर, पुण्यमय अविनाशी पद को प्राप्त होते हैं।

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