प्रभास खण्ड · अध्याय 50
राहु लिंग माहात्म्य वर्णन
श्लोक 1 (skanda.7.50.1)
॥ ईश्वर उवाच ॥ ततो गच्छेन्महादेवि लिंगं राहुप्रतिष्ठितम् ॥ शनैश्चरेश्वराद्देवि वायव्ये संप्रतिष्ठितम्
|| īśvara uvāca || tato gacchenmahādevi liṁgaṁ rāhupratiṣṭhitam || śanaiścareśvarāddevi vāyavye saṁpratiṣṭhitam
ईश्वर ने कहा - फिर हे महादेवि! राहु द्वारा प्रतिष्ठित लिंग के पास जाना चाहिए, जो शनैश्चरेश्वर से वायव्य दिशा में स्थित है।
श्लोक 2 (skanda.7.50.2)
अजादेव्याश्चोत्तरतो धनुषां सप्तके स्थितम् ॥ मंगलायाः समीपस्थं नातिदूरे व्यवस्थितम्
ajādevyāścottarato dhanuṣāṁ saptake sthitam || maṁgalāyāḥ samīpasthaṁ nātidūre vyavasthitam
यह अजादेवी से उत्तर में सात धनुष की दूरी पर, मंगला के समीप, अधिक दूर नहीं, स्थित है।
श्लोक 3 (skanda.7.50.3)
लिंगं महाप्रभावं तु सैंहिकेयप्रतिष्ठितम् ॥ तत्र वर्षसहस्रं तु वैप्रचित्तिस्तपोऽकरोत्
liṁgaṁ mahāprabhāvaṁ tu saiṁhikeyapratiṣṭhitam || tatra varṣasahasraṁ tu vaipracittistapo'karot
यह महाप्रभावशाली लिंग है, जो सैंहिकेय (राहु) द्वारा प्रतिष्ठित है; वहाँ वैप्रचित्ति ने एक सहस्र वर्ष तक तपस्या की।
श्लोक 4 (skanda.7.50.4)
स्वर्भानुः स महावीर्यो वक्त्रयोधी महासुराः ॥ समाराध्य महादेवं दिव्येन तपसा प्रभुम्
svarbhānuḥ sa mahāvīryo vaktrayodhī mahāsurāḥ || samārādhya mahādevaṁ divyena tapasā prabhum
वह महाबली, मुखयोद्धा महासुर स्वर्भानु, दिव्य तपस्या से प्रभु महादेव की आराधना करके -
श्लोक 5 (skanda.7.50.5)
लिंगेऽवतारयामास जगद्दीपं महेश्वरम् ॥ यश्चैनं पूजयेद्भक्त्या नरः सम्यक्च पश्यति ॥ तस्य पापं क्षयं याति अपि ब्रह्मवधोद्भवम्
liṁge'vatārayāmāsa jagaddīpaṁ maheśvaram || yaścainaṁ pūjayedbhaktyā naraḥ samyakca paśyati || tasya pāpaṁ kṣayaṁ yāti api brahmavadhodbhavam
- जगद्दीप महेश्वर को इस लिंग में अवतरित किया। जो मनुष्य इसकी भक्तिपूर्वक पूजा करता है तथा भलीभाँति दर्शन करता है, उसका पाप नष्ट हो जाता है, चाहे वह ब्रह्महत्या से उत्पन्न हुआ हो।
श्लोक 6 (skanda.7.50.6)
नांधो न बधिरो मूको न रोगी न च निर्द्धनः ॥ कदाचिज्जायते मर्त्यस्तेन दृष्टेन भूतले
nāṁdho na badhiro mūko na rogī na ca nirddhanaḥ || kadācijjāyate martyastena dṛṣṭena bhūtale
उसके दर्शन से मनुष्य पृथ्वीतल पर कभी अंधा, बहरा, गूँगा, रोगी अथवा निर्धन उत्पन्न नहीं होता।
श्लोक 7 (skanda.7.50.7)
सुखसौभाग्यसंपन्नस्तदा भवति रूपवान् ॥ सर्वकामसमृद्धात्मा मोदते दिवि देववत्
sukhasaubhāgyasaṁpannastadā bhavati rūpavān || sarvakāmasamṛddhātmā modate divi devavat
वह तब सुख-सौभाग्य से सम्पन्न तथा रूपवान होता है; सभी कामनाओं से समृद्ध आत्मा वाला होकर स्वर्ग में देवता के समान आनंदित होता है।
श्लोक 8 (skanda.7.50.8)
इति ते कथितं देवि माहात्म्यं राहुदैवतम् ॥ श्रुत्वा तु मोहनिर्यातो नरो निष्कल्मषो भवेत्
iti te kathitaṁ devi māhātmyaṁ rāhudaivatam || śrutvā tu mohaniryāto naro niṣkalmaṣo bhavet
इस प्रकार, हे देवि! तुम्हें राहुदेवता संबंधी महिमा बताई गई; इसे सुनकर मनुष्य मोह से मुक्त होकर निष्कलंक हो जाता है।