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प्रभास खण्ड · अध्याय 52

सिद्धेश्वरमाहात्म्यवर्णनम्

अध्याय 51अध्याय-सूचीअध्याय 53

श्लोक 1 (skanda.7.52.1)

ईश्वर उवाच। पञ्चाथ सिद्धलिङ्गानि कथयामि यशस्विनि। येषां दर्शनतो देवि सिद्धा यात्रा भवेन्नृणाम्

īśvara uvāca| pañcātha siddhaliṅgāni kathayāmi yaśasvini| yeṣāṁ darśanato devi siddhā yātrā bhavennṛṇām

ईश्वर ने कहा—हे यशस्विनि, अब मैं पाँच सिद्धलिंगों के विषय में कहता हूँ, जिनके दर्शन मात्र से हे देवि, मनुष्यों की यात्रा सिद्ध (सफल) हो जाती है।

श्लोक 2 (skanda.7.52.2)

सोमेशादीशदिग्भागे वरारोहेति या स्मृता। तस्याश्च पूर्वदिग्भागे देवं सिद्धेश्वरं परम्। अभिगम्य नरो भक्त्या अणिमादिकमाप्नुयात्

someśādīśadigbhāge varāroheti yā smṛtā| tasyāśca pūrvadigbhāge devaṁ siddheśvaraṁ param| abhigamya naro bhaktyā aṇimādikamāpnuyāt

सोमेश से ईशान दिशा में वरारोहा नाम से प्रसिद्ध जो स्थान है, उसके पूर्व दिशा भाग में परम देव सिद्धेश्वर के पास भक्तिपूर्वक जाकर मनुष्य अणिमा आदि सिद्धियाँ प्राप्त करता है।

श्लोक 3 (skanda.7.52.3)

सिद्धैः प्रतिष्ठितं लिंगं दृष्ट्वा भक्त्या तु मानवः। मुच्यते पातकैः सर्वैः सिद्धलोकं स गच्छति

siddhaiḥ pratiṣṭhitaṁ liṅgaṁ dṛṣṭvā bhaktyā tu mānavaḥ| mucyate pātakaiḥ sarvaiḥ siddhalokaṁ sa gacchati

सिद्धों द्वारा प्रतिष्ठित लिंग का भक्तिपूर्वक दर्शन करके मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है और सिद्धलोक को प्राप्त होता है।

श्लोक 4 (skanda.7.52.4)

विघ्नानि नाशमायांति तत्र क्षेत्रनिवासिनाम्। कामः क्रोधो भय लोभो रागो मत्सर एव च

vighnāni nāśamāyānti tatra kṣetranivāsinām| kāmaḥ krodho bhaya lobho rāgo matsara eva ca

वहाँ क्षेत्रवासियों के विघ्न नष्ट हो जाते हैं—काम, क्रोध, भय, लोभ, राग और मत्सर,

श्लोक 5 (skanda.7.52.5)

ईर्ष्या दंभस्तथाऽऽलस्यं निद्रा मोहस्त्वहंकृतिः। एतानि विघ्नरूपाणि सिद्धेर्विघ्नकराणि तु

īrṣyā daṁbhastathālasyaṁ nidrā mohastvahaṁkṛtiḥ| etāni vighnarūpāṇi siddhervighnakarāṇi tu

तथा ईर्ष्या, दंभ, आलस्य, निद्रा, मोह और अहंकार—ये सब विघ्न के रूप हैं जो सिद्धि में बाधा डालते हैं।

श्लोक 6 (skanda.7.52.6)

तानि नाशं समायांति तत्र सिद्धेश्वरार्चनात्। एवं ज्ञात्वा तु यत्नेन तत्र यात्रां समाचरेत्

tāni nāśaṁ samāyānti tatra siddheśvarārcanāt| evaṁ jñātvā tu yatnena tatra yātrāṁ samācaret

वे सब वहाँ सिद्धेश्वर की अर्चना से नष्ट हो जाते हैं। ऐसा जानकर मनुष्य को प्रयत्नपूर्वक वहाँ की यात्रा करनी चाहिए।

श्लोक 7 (skanda.7.52.7)

इत्येवं कथितं देवि सिद्धेश्वरमहोदयम्। सर्वकामप्रदं नृणां श्रुतं पातकनाशनम्

ityevaṁ kathitaṁ devi siddheśvaramahodayam| sarvakāmapradaṁ nṛṇāṁ śrutaṁ pātakanāśanam

हे देवि, इस प्रकार सिद्धेश्वर का यह महान् माहात्म्य कहा गया, जो मनुष्यों की सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाला और सुनने मात्र से पापों का नाश करने वाला है।

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