प्रभास खण्ड · अध्याय 54
गन्धर्वेश्वरमाहात्म्यवर्णनम्
श्लोक 1 (skanda.7.54.1)
ईश्वर उवाच। ततो गच्छेन्महादेवि गंधर्वेश्वरमुत्तमम्। दण्डपाणेस्तु भवनादुत्तरे निकटे स्थितम्
īśvara uvāca| tato gacchenmahādevi gaṁdharveśvaramuttamam| daṇḍapāṇestu bhavanāduttare nikaṭe sthitam
ईश्वर ने कहा—तदनन्तर हे महादेवि, दण्डपाणि के भवन से उत्तर दिशा में निकट स्थित उत्तम गन्धर्वेश्वर को जाना चाहिए।
श्लोक 2 (skanda.7.54.2)
यत्र गंधर्वराजो वै घनवाहेति विश्रुतः। तस्य गंधर्वसेनेति ख्याता पुत्री महाप्रभा
yatra gaṁdharvarājo vai ghanavāheti viśrutaḥ| tasya gaṁdharvaseneti khyātā putrī mahāprabhā
जहाँ घनवाह नाम से विख्यात गन्धर्वराज थे; उनकी गन्धर्वसेना नाम से प्रसिद्ध महाप्रभावशाली पुत्री थी।
श्लोक 3 (skanda.7.54.3)
शिखंडिना गणेनैव सा शप्ता रूपगर्विता। ततो गोशृंगऋषिणा दत्तस्तस्या अनुग्रहः
śikhaṁḍinā gaṇenaiva sā śaptā rūpagarvitā| tato gośṛṁgaṛṣiṇā dattastasyā anugrahaḥ
वह अपने रूप के अभिमान से गर्वित होकर शिखण्डी नामक गण द्वारा शप्त हो गई; तब गोशृंग ऋषि द्वारा उसे अनुग्रह प्रदान किया गया।
श्लोक 4 (skanda.7.54.4)
सोमवारव्रतेनैव सोमेशाराधनं प्रति। ततः क्षेत्रं समागत्य तपः कृत्वा सुदुश्चरम्
somavāravratenaiva someśārādhanaṁ prati| tataḥ kṣetraṁ samāgatya tapaḥ kṛtvā suduścaram
सोमवार-व्रत के द्वारा ही सोमेश की आराधना करते हुए, तत्पश्चात् क्षेत्र में आकर अत्यन्त दुष्कर तप करके,
श्लोक 5 (skanda.7.54.5)
लिंगं प्रतिष्ठयामास तत्र गंधर्वराट् स्वयम्। तथैव पुत्र्या तस्यैव तत्र लिंगं प्रतिष्ठितम्
liṅgaṁ pratiṣṭhayāmāsa tatra gaṁdharvarāṭ svayam| tathaiva putryā tasyaiva tatra liṅgaṁ pratiṣṭhitam
गन्धर्वराज ने स्वयं वहाँ एक लिंग प्रतिष्ठित किया; और उसी प्रकार उनकी पुत्री ने भी वहाँ एक लिंग प्रतिष्ठित किया।
श्लोक 6 (skanda.7.54.6)
अथ तत्रैव देवेशि दंडपाणेः समीपतः। घनवाहेश्वरं नाम यो लिंगं यत्नतोऽर्चयेत्
atha tatraiva deveśi daṁḍapāṇeḥ samīpataḥ| ghanavāheśvaraṁ nāma yo liṅgaṁ yatnato'rcayet
हे देवेशि, अब वहीं दण्डपाणि के समीप जो घनवाहेश्वर नामक लिंग का यत्नपूर्वक पूजन करता है,
श्लोक 7 (skanda.7.54.7)
गंधर्वलोकमाप्नोति दृष्ट्वा स प्रयतः शुचिः। इति ते कथितं देवि गांधर्वं लिंगमुत्तमम्
gaṁdharvalokamāpnoti dṛṣṭvā sa prayataḥ śuciḥ| iti te kathitaṁ devi gāṁdharvaṁ liṅgamuttamam
वह पवित्र और संयमी होकर दर्शन करने पर गन्धर्वलोक को प्राप्त करता है। हे देवि, इस प्रकार तुम्हें यह उत्तम गान्धर्व लिंग बताया गया।
श्लोक 8 (skanda.7.54.8)
तृतीयं सर्वपापानां नाशनं पुण्यवर्द्धनम्। अग्नितीर्थे नरः स्नात्वा पूज्य गंधर्वपूजितम्
tṛtīyaṁ sarvapāpānāṁ nāśanaṁ puṇyavarddhanam| agnitīrthe naraḥ snātvā pūjya gaṁdharvapūjitam
यह तीसरा लिंग समस्त पापों का नाशक और पुण्य बढ़ाने वाला है। अग्नितीर्थ में स्नान करके मनुष्य गन्धर्वों द्वारा पूजित इस लिंग की पूजा करके,
श्लोक 9 (skanda.7.54.9)
अयने चोत्तरे प्राप्ते निर्वाणमधिगच्छति। श्रुत्वाऽभिनंद्य माहात्म्यं मुच्यते महतो भयात्
ayane cottare prāpte nirvāṇamadhigacchati| śrutvā'bhinaṁdya māhātmyaṁ mucyate mahato bhayāt
उत्तरायण के आने पर निर्वाण को प्राप्त करता है। इस माहात्म्य को सुनकर और उसका अभिनन्दन करके मनुष्य महान् भय से मुक्त हो जाता है।