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प्रभास खण्ड · अध्याय 70

वरुणेश्वरमाहात्म्यवर्णनम्

अध्याय 69अध्याय-सूचीअध्याय 71

श्लोक 1 (skanda.7.70.1)

ईश्वर उवाच। ततो गच्छेन्महादेवि वरुणेश्वरमुत्तमम्। गौरीतपोवनाग्नेय्यां धनुषां विंशतौ स्थितम्। लिंगं महाप्रभावं हि वरुणेन प्रतिष्ठितम्

īśvara uvāca| tato gacchenmahādevi varuṇeśvaramuttamam| gaurītapovanāgneyyāṁ dhanuṣāṁ viṁśatau sthitam| liṅgaṁ mahāprabhāvaṁ hi varuṇena pratiṣṭhitam

ईश्वर ने कहा—हे महादेवी, इसके पश्चात् उत्तम वरुणेश्वर के पास जाना चाहिए, जो गौरी के तपोवन से आग्नेय (दक्षिण-पूर्व) दिशा में बीस धनुष की दूरी पर स्थित है। यह महाप्रभावशाली लिंग वरुण द्वारा प्रतिष्ठित किया गया था।

श्लोक 2 (skanda.7.70.2)

पूर्वं पीतो यदा देवि समुद्रः कुम्भजन्मना। तदा कोपेन सन्तप्तो वरुणः सरितां पतिः

pūrvaṁ pīto yadā devi samudraḥ kumbhajanmanā| tadā kopena santapto varuṇaḥ saritāṁ patiḥ

हे देवी, पूर्वकाल में जब कुम्भ से उत्पन्न (अगस्त्य) मुनि ने समुद्र का पान कर लिया, तब नदियों के स्वामी वरुण क्रोध से संतप्त हो उठे।

श्लोक 3 (skanda.7.70.3)

कामिकं तु समाज्ञाय क्षेत्रं प्राभासिकं तदा। तत्रातपद्देवि तपः स वै परमदुश्चरम्

kāmikaṁ tu samājñāya kṣetraṁ prābhāsikaṁ tadā| tatrātapaddevi tapaḥ sa vai paramaduścaram

तब उसने अपनी इच्छा पूर्ण करने वाले प्राभासिक क्षेत्र को जानकर, हे देवी, वहीं जाकर अत्यंत दुष्कर तप किया।

श्लोक 4 (skanda.7.70.4)

प्रतिष्ठाप्य महालिंगं संपूजयति भक्तितः। वर्षाणामयुतं साग्रं पूजितो वृषभध्वजः

pratiṣṭhāpya mahāliṅgaṁ saṁpūjayati bhaktitaḥ| varṣāṇāmayutaṁ sāgraṁ pūjito vṛṣabhadhvajaḥ

महालिंग की स्थापना करके वह भक्तिपूर्वक उसकी पूजा करता रहा; इस प्रकार दस हजार से अधिक वर्षों तक वृषभध्वज (शिव) की पूजा की गई।

श्लोक 5 (skanda.7.70.5)

ततः प्रसन्नो देवेशि निजगंगाजलेन तु। पूरयामास तं रिक्तं समुद्रं यादसांपतिम्

tataḥ prasanno deveśi nijagaṁgājalena tu| pūrayāmāsa taṁ riktaṁ samudraṁ yādasāṁpatim

हे देवेशी, तब प्रसन्न होकर भगवान् ने अपनी गंगा के जल से उस रिक्त हो चुके जलचरों के स्वामी समुद्र को पुनः भर दिया।

श्लोक 6 (skanda.7.70.6)

छंदयामास तं लिंगं वरदानैरनेकधा। तत्प्रभृत्येव ते सर्वे समुद्राः परिपूरिताः

chaṁdayāmāsa taṁ liṅgaṁ varadānairanekadhā| tatprabhṛtyeva te sarve samudrāḥ paripūritāḥ

उसने उस लिंग को अनेक प्रकार के वरदानों से संतुष्ट किया; तभी से वे सभी समुद्र पूर्ण रूप से भर गए।

श्लोक 7 (skanda.7.70.7)

वरुणेश्वरनामेति तल्लिंगं तत्प्रभृत्यभूत्

varuṇeśvaranāmeti talliṅgaṁ tatprabhṛtyabhūt

तभी से वह लिंग 'वरुणेश्वर' नाम से प्रसिद्ध हुआ।

श्लोक 8 (skanda.7.70.8)

को ह्यर्थो बहुभिर्लिंगैर्दृष्टैर्वा सुरसुन्दरि। वरुणेशेन दृष्टेन सर्वतीर्थफलं लभेत्

ko hyartho bahubhirliṅgairdṛṣṭairvā surasundari| varuṇeśena dṛṣṭena sarvatīrthaphalaṁ labhet

हे सुरसुन्दरी, अनेक लिंगों के दर्शन से क्या प्रयोजन है? वरुणेश्वर के दर्शन मात्र से मनुष्य समस्त तीर्थों के फल को प्राप्त कर लेता है।

श्लोक 9 (skanda.7.70.9)

अष्टम्यां च चतुर्दश्यां तद्दध्ना स्नापयेद्यदि। स ब्राह्मणश्चतुर्वेदो जायते नात्र संशयः

aṣṭamyāṁ ca caturdaśyāṁ taddadhnā snāpayedyadi| sa brāhmaṇaścaturvedo jāyate nātra saṁśayaḥ

यदि कोई अष्टमी और चतुर्दशी को उसे दही से स्नान कराए, तो वह निश्चय ही अगले जन्म में चारों वेदों का ज्ञाता ब्राह्मण होता है, इसमें कोई संशय नहीं।

श्लोक 10 (skanda.7.70.10)

ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्चान्ये वरानने। मूकांधबधिरा बालाः स्त्रियश्चैव नपुंसकाः

brāhmaṇāḥ kṣatriyā vaiśyāḥ śūdrāścānye varānane| mūkāṁdhabadhirā bālāḥ striyaścaiva napuṁsakāḥ

हे वरानने, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र तथा अन्य सभी—गूंगे, अंधे, बहरे, बालक, स्त्रियाँ और नपुंसक भी—

श्लोक 11 (skanda.7.70.11)

दृष्ट्वा गच्छंति ते देवि स्वर्गं धर्मपरायणाः। स्नानं जाप्यं बलिं होमं पूजां स्तोत्रं च नर्तनम्। तस्मिन्स्थाने तु यः कुर्यात्तत्सर्वं चाक्षयं भवेत्

dṛṣṭvā gacchaṁti te devi svargaṁ dharmaparāyaṇāḥ| snānaṁ jāpyaṁ baliṁ homaṁ pūjāṁ stotraṁ ca nartanam| tasminsthāne tu yaḥ kuryāttatsarvaṁ cākṣayaṁ bhavet

हे देवी, उसका दर्शन करके धर्मपरायण होकर स्वर्ग को जाते हैं। जो कोई उस स्थान पर स्नान, जप, बलि, हवन, पूजा, स्तोत्रपाठ अथवा नृत्य करता है, वह सब कुछ अक्षय हो जाता है।

श्लोक 12 (skanda.7.70.12)

हैमं पद्मं मौक्तिकं च दानं तत्रैव दापयेत्। सम्यग्यात्राफलापेक्षी स्वर्गापेक्षी तथा नरः

haimaṁ padmaṁ mauktikaṁ ca dānaṁ tatraiva dāpayet| samyagyātrāphalāpekṣī svargāpekṣī tathā naraḥ

जो पुण्य-यात्रा के पूर्ण फल की तथा स्वर्ग की कामना रखता हो, ऐसे मनुष्य को वहीं स्वर्ण, कमल और मोती का दान करना चाहिए।

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