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प्रभास खण्ड · अध्याय 71

उषेश्वरमाहात्म्यवर्णनम्

अध्याय 70अध्याय-सूचीअध्याय 72

श्लोक 1 (skanda.7.71.1)

ततो गच्छेन्महादेवि लिंगं तत्रैव संस्थितम्। दक्षिणे वरुणेशस्य धनुषां त्रितये स्थितम्

tato gacchenmahādevi liṅgaṁ tatraiva saṁsthitam| dakṣiṇe varuṇeśasya dhanuṣāṁ tritaye sthitam

हे महादेवी, इसके पश्चात् वहीं स्थित लिंग के पास जाना चाहिए, जो वरुणेश्वर से दक्षिण दिशा में तीन धनुष की दूरी पर स्थित है।

श्लोक 2 (skanda.7.71.2)

भार्यया वरुणस्यैव उषा नाम्न्या वरानने। कृत्वा तपो महाघोरं भर्तृदुःखपरीतया

bhāryayā varuṇasyaiva uṣā nāmnyā varānane| kṛtvā tapo mahāghoraṁ bhartṛduḥkhaparītayā

हे वरानने, वरुण की उषा नामक पत्नी ने, पति के दुःख से व्याकुल होकर, अत्यंत घोर तप किया।

श्लोक 3 (skanda.7.71.3)

स्थापितं तु महल्लिंगं सर्वसिद्धिप्रदायकम्। उषेश्वरेति विख्यातं सर्वसिद्धिप्रपूजितम्

sthāpitaṁ tu mahalliṅgaṁ sarvasiddhipradāyakam| uṣeśvareti vikhyātaṁ sarvasiddhiprapūjitam

उसने समस्त सिद्धियाँ प्रदान करने वाला महालिंग स्थापित किया, जो 'उषेश्वर' नाम से विख्यात हुआ और समस्त सिद्धियों की कामना करने वालों द्वारा पूजित है।

श्लोक 4 (skanda.7.71.4)

यस्तत्पूजयते भक्त्या लिंगं पापप्रणाशनम्। महापापौघयुक्तोऽपि स गच्छेत्परमां गतिम्

yastatpūjayate bhaktyā liṅgaṁ pāpapraṇāśanam| mahāpāpaughayukto'pi sa gacchetparamāṁ gatim

जो भक्तिपूर्वक उस पाप-नाशक लिंग की पूजा करता है, वह चाहे महापापों के समूह से युक्त क्यों न हो, परम गति को प्राप्त होता है।

श्लोक 5 (skanda.7.71.5)

स्त्रीणां सौभाग्यफलदं दुःखदौर्भाग्यनाशनम्

strīṇāṁ saubhāgyaphaladaṁ duḥkhadaurbhāgyanāśanam

यह स्त्रियों को सौभाग्य का फल देने वाला तथा दुःख और दुर्भाग्य का नाश करने वाला है।

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