प्रभास खण्ड · अध्याय 72
जलवासगणपतिमाहात्म्यवर्णनम्
श्लोक 1 (skanda.7.72.1)
ईश्वर उवाच। तत्रैव संस्थितं पश्येद्विघ्नेशं जलवाससम्। सर्वविघ्नविनाशाय सर्वकार्यप्रसिद्धये
īśvara uvāca| tatraiva saṁsthitaṁ paśyedvighneśaṁ jalavāsasam| sarvavighnavināśāya sarvakāryaprasiddhaye
ईश्वर ने कहा—वहीं स्थित जलवास (जल में निवास करने वाले) विघ्नेश (गणेश) का दर्शन करना चाहिए, जो समस्त विघ्नों का नाश करने तथा समस्त कार्यों की सिद्धि के लिए हैं।
श्लोक 2 (skanda.7.72.2)
वरुणेन महादेवि तपोनिर्विघ्नहेतवे। पूजितो जलजैर्भक्त्या जलवासास्ततः स्मृतः
varuṇena mahādevi taponirvighnahetave| pūjito jalajairbhaktyā jalavāsāstataḥ smṛtaḥ
हे महादेवी, अपनी तपस्या को निर्विघ्न बनाने के लिए वरुण ने जल में उत्पन्न पुष्पों से भक्तिपूर्वक उनकी पूजा की, इसीलिए वे तभी से 'जलवास' नाम से स्मृत हुए।
श्लोक 3 (skanda.7.72.3)
चतुर्थ्यां तर्पयेद्भक्त्या गन्धैः पुष्पैः स मोदकैः। यथाभक्त्यनुसारेण तस्य तुष्येद्गणाधिपः
caturthyāṁ tarpayedbhaktyā gandhaiḥ puṣpaiḥ sa modakaiḥ| yathābhaktyanusāreṇa tasya tuṣyedgaṇādhipaḥ
जो चतुर्थी को भक्तिपूर्वक गंध, पुष्प और मोदकों से उनका तर्पण करता है, उसकी भक्ति के अनुसार वह गणाधिप (गणेश) प्रसन्न होते हैं।