प्रभास खण्ड · अध्याय 73
कुमारेश्वरमाहात्म्यवर्णनम्
श्लोक 1 (skanda.7.73.1)
ईश्वर उवाच। ततो गच्छेन्महादेवि कुमारेश्वरमुत्तमम्। लिंगं महाप्रभावं हि महापातकनाशनम्
īśvara uvāca| tato gacchenmahādevi kumāreśvaramuttamam| liṅgaṁ mahāprabhāvaṁ hi mahāpātakanāśanam
ईश्वर ने कहा—हे महादेवी, इसके पश्चात् उत्तम कुमारेश्वर के पास जाना चाहिए—यह महाप्रभावशाली लिंग महापापों का नाश करने वाला है।
श्लोक 2 (skanda.7.73.2)
धनुषां त्रिंशता देवि वरुणान्नैऋते स्थितम्। गौरीतपोवनाद्देवि दक्षिण स्थानसंस्थितम्
dhanuṣāṁ triṁśatā devi varuṇānnaiṛte sthitam| gaurītapovanāddevi dakṣiṇa sthānasaṁsthitam
हे देवी, यह वरुण से नैऋत्य (दक्षिण-पश्चिम) दिशा में तीस धनुष की दूरी पर स्थित है, तथा हे देवी, गौरी के तपोवन से दक्षिण दिशा में स्थित है।
श्लोक 3 (skanda.7.73.3)
षण्मुखेन महादेवि तत्र कृत्वा महत्तपः। प्रतिष्ठितं महालिंगं कुमारेशस्ततोऽभवत्
ṣaṇmukhena mahādevi tatra kṛtvā mahattapaḥ| pratiṣṭhitaṁ mahāliṅgaṁ kumāreśastato'bhavat
हे महादेवी, षण्मुख (कार्तिकेय) ने वहाँ महान् तप करके महालिंग की स्थापना की, तभी से वह कुमारेश कहलाया।
श्लोक 4 (skanda.7.73.4)
यस्तं पूजयते भक्त्या मासमेकं निरन्तरम्। षण्मासस्यार्चनेनैव यत्पुण्यमुपजायते
yastaṁ pūjayate bhaktyā māsamekaṁ nirantaram| ṣaṇmāsasyārcanenaiva yatpuṇyamupajāyate
जो कोई एक मास तक निरंतर भक्तिपूर्वक उसकी पूजा करता है, उसे छह मास की पूजा के समान पुण्य प्राप्त होता है।
श्लोक 5 (skanda.7.73.5)
तत्पुण्यं सकलं तस्य कुमारेशार्चनात्सकृत्। लभते दिवसैकेन विधिना यदि पूजयेत्
tatpuṇyaṁ sakalaṁ tasya kumāreśārcanātsakṛt| labhate divasaikena vidhinā yadi pūjayet
वह सम्पूर्ण पुण्य मनुष्य को कुमारेश की एक बार की पूजा से ही एक ही दिन में प्राप्त हो जाता है, यदि वह विधिपूर्वक पूजा करे।
श्लोक 6 (skanda.7.73.6)
कामं क्रोधं तथा लोभं रागं त्यक्त्वा तु मत्सरम्। ब्रह्मचारी यतिर्भूत्वा सकृदप्येनमर्चयेत्
kāmaṁ krodhaṁ tathā lobhaṁ rāgaṁ tyaktvā tu matsaram| brahmacārī yatirbhūtvā sakṛdapyenamarcayet
काम, क्रोध, लोभ, राग तथा मत्सर का त्याग करके, ब्रह्मचारी और संयमी होकर, यदि कोई एक बार भी उसकी पूजा करे,
श्लोक 7 (skanda.7.73.7)
एवं संपूजिते देवि सम्यग्यात्रा फलं लभेत्
evaṁ saṁpūjite devi samyagyātrā phalaṁ labhet
हे देवी, इस प्रकार उसकी सम्यक् पूजा करने पर मनुष्य पूर्ण यात्रा का फल प्राप्त करता है।