प्रभास खण्ड · अध्याय 76
लकुलीशलिंगद्वयमाहात्म्यवर्णनम्
श्लोक 1 (skanda.7.76.1)
ईश्वर उवाच। तस्यैव देवदेवस्य समीपस्थं विराजते। लिंगद्वयं महापुण्यं लकुलीशप्रतिष्ठितम्
īśvara uvāca| tasyaiva devadevasya samīpasthaṁ virājate| liṅgadvayaṁ mahāpuṇyaṁ lakulīśapratiṣṭhitam
ईश्वर ने कहा—उसी देवाधिदेव के समीप, महान् पुण्यमय लिंगद्वय (दो लिंग) विराजमान हैं, जो लकुलीश द्वारा प्रतिष्ठित किए गए हैं।
श्लोक 2 (skanda.7.76.2)
लकुलेश्वरनामास्ति तस्य लिंगद्वयस्य वै। तद्दृष्ट्वा देवदेवस्य लिंगद्वयमनुत्तमम्
lakuleśvaranāmāsti tasya liṅgadvayasya vai| taddṛṣṭvā devadevasya liṅgadvayamanuttamam
उन दोनों लिंगों का नाम लकुलेश्वर है; उस देवाधिदेव के उन अनुपम दोनों लिंगों का दर्शन करने से—
श्लोक 3 (skanda.7.76.3)
मुच्यते सकलात्पापादाजन्ममरणांतिकात्। तत्र शुक्लचतुर्द्दश्यां मासि भाद्रपदे प्रिये
mucyate sakalātpāpādājanmamaraṇāṁtikāt| tatra śuklacaturddaśyāṁ māsi bhādrapade priye
मनुष्य जन्म से लेकर मृत्युपर्यंत किए गए समस्त पापों से मुक्त हो जाता है। हे प्रिये, वहाँ भाद्रपद मास की शुक्ल चतुर्दशी को—
श्लोक 4 (skanda.7.76.4)
उपवासपरो भूत्वा यः करोति प्रजागरम्। मूर्त्तिमंतं तु संपूज्य लकुलीशं महाप्रभम्
upavāsaparo bhūtvā yaḥ karoti prajāgaram| mūrttimaṁtaṁ tu saṁpūjya lakulīśaṁ mahāprabham
जो उपवासपूर्वक रात्रि-जागरण करता है, वह महाप्रभावशाली मूर्तिधारी लकुलीश की भलीभाँति पूजा करके—
श्लोक 5 (skanda.7.76.5)
ततः संपूज्य विधिना तत्र लिंगद्वयं पृथक्। सम्यक्पूजाविधानेन स्तुतिमंत्रैरनुक्रमात्। स याति परमं स्थानं यत्र देवो महेश्वरः
tataḥ saṁpūjya vidhinā tatra liṅgadvayaṁ pṛthak| samyakpūjāvidhānena stutimaṁtrairanukramāt| sa yāti paramaṁ sthānaṁ yatra devo maheśvaraḥ
फिर विधिपूर्वक वहाँ दोनों लिंगों की अलग-अलग पूजा करके, सम्यक् पूजाविधि तथा स्तुति-मंत्रों के क्रम से, वह उस परम स्थान को प्राप्त होता है जहाँ भगवान् महेश्वर निवास करते हैं।