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प्रभास खण्ड · अध्याय 79

लकुलीश्वरमाहात्म्यवर्णनम्

अध्याय 78अध्याय-सूचीअध्याय 80

श्लोक 1 (skanda.7.79.1)

ईश्वर उवाच। ततो गच्छेन्महादेवि लकुलीशं महाप्रभम्। तस्य पश्चिमदिग्भागे धनुषां सप्तके स्थितम्

īśvara uvāca| tato gacchenmahādevi lakulīśaṁ mahāprabham| tasya paścimadigbhāge dhanuṣāṁ saptake sthitam

ईश्वर ने कहा—हे महादेवी, इसके पश्चात् महाप्रभावशाली लकुलीश के पास जाना चाहिए, जो उसके पश्चिम दिशा में सात धनुष की दूरी पर स्थित हैं।

श्लोक 2 (skanda.7.79.2)

पापघ्नं सर्वजंतूनां शांतं मूर्तिस्थितं प्रभुम्। समायातं महाक्षेत्रे तत्र कायावरोहणात्

pāpaghnaṁ sarvajaṁtūnāṁ śāṁtaṁ mūrtisthitaṁ prabhum| samāyātaṁ mahākṣetre tatra kāyāvarohaṇāt

यह प्रभु समस्त प्राणियों के पाप का नाश करने वाले, शांत तथा मूर्तिरूप में स्थित हैं; वे इस महाक्षेत्र में कायावरोहण से यहाँ पधारे।

श्लोक 3 (skanda.7.79.3)

कृत्वा तत्र तपश्चोग्रं दीक्षयित्वात्मशिष्य कान्। कुशकादींश्च चतुर उक्त्वा शास्त्राण्यनेकशः

kṛtvā tatra tapaścograṁ dīkṣayitvātmaśiṣya kān| kuśakādīṁśca catura uktvā śāstrāṇyanekaśaḥ

वहाँ घोर तप करके उन्होंने कुशक (कुशिक) आदि अपने चार शिष्यों को दीक्षा दी, और उन्हें अनेक शास्त्रों का उपदेश दिया।

श्लोक 4 (skanda.7.79.4)

न्यायवैशेषिकादीनि ततः सिद्धिं परां गतः। एवं ज्ञात्वा तु यः सम्यक्तं समर्चयते नरः

nyāyavaiśeṣikādīni tataḥ siddhiṁ parāṁ gataḥ| evaṁ jñātvā tu yaḥ samyaktaṁ samarcayate naraḥ

न्याय, वैशेषिक आदि दर्शनों का, तत्पश्चात् वे परम सिद्धि को प्राप्त हुए। इस प्रकार जानकर जो मनुष्य भलीभाँति उनकी अर्चना करता है,

श्लोक 5 (skanda.7.79.5)

कार्त्तिक्यां तु विशेषेण अयने चोत्तरेपि वा। विद्यादानं च तत्रैव दद्याद्विप्राय शालिने

kārttikyāṁ tu viśeṣeṇa ayane cottarepi vā| vidyādānaṁ ca tatraiva dadyādviprāya śāline

विशेष रूप से कार्तिकी पूर्णिमा को अथवा उत्तरायण के समय, वहीं किसी शालीन (सुसंस्कृत) ब्राह्मण को विद्या-दान देना चाहिए।

श्लोक 6 (skanda.7.79.6)

सप्तजन्मानि विप्रस्य धनाढ्यस्य कुले शुभे। जायते मतिमान्धीमाञ्छ्रीमानेवं पुनःपुनः

saptajanmāni viprasya dhanāḍhyasya kule śubhe| jāyate matimāndhīmāñchrīmānevaṁ punaḥpunaḥ

वह सात जन्मों तक धनाढ्य ब्राह्मण के शुभ कुल में जन्म लेता है, और इस प्रकार बार-बार बुद्धिमान्, प्रज्ञावान् तथा श्रीमान् होता है।

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