प्रभास खण्ड · अध्याय 8
श्रीसोमेश्वरैश्वर्यवर्णनम्
श्लोक 1 (skanda.7.8.1)
देव्युवाच। पुनः कथय देवेश माहात्म्यं लोकशंकर। श्रीसोमेश्वरदेवस्य सर्वपातकनाशनम्। ब्रह्मविष्ण्वीशदैवत्यं तथात्र त्रितयं वद
devyuvāca| punaḥ kathaya deveśa māhātmyaṁ lokaśaṁkara| śrīsomeśvaradevasya sarvapātakanāśanam| brahmaviṣṇvīśadaivatyaṁ tathātra tritayaṁ vada
देवी ने कहा—हे देवेश! हे लोकशंकर! श्रीसोमेश्वर देव का सर्वपाप-नाशक माहात्म्य पुनः कहिये। यहाँ ब्रह्मा-विष्णु-ईश की त्रिदेवता के विषय में भी बताइये।
श्लोक 2 (skanda.7.8.2)
ईश्वर उवाच। शृणुष्वैकमना भूत्वा मम गोप्यं पुरातनम्। तस्मिँल्लिंगे च यद्वृत्तमाश्चर्यं परमं महत्
īśvara uvāca| śṛṇuṣvaikamanā bhūtvā mama gopyaṁ purātanam| tasmim̐lliṁge ca yadvṛttamāścaryaṁ paramaṁ mahat
ईश्वर ने कहा—एकाग्रचित्त होकर मेरा यह पुरातन रहस्य सुनो, जो इस लिंग में घटित हुआ, वह परम आश्चर्यजनक और महान है।
श्लोक 3 (skanda.7.8.3)
षष्टिकोटि सहस्राणि ऋषीणामूर्द्ध्वरेतसाम्। तस्मिँल्लिंगे प्रविष्टानि ते घृताहुतिरिवानले
ṣaṣṭikoṭi sahasrāṇi ṛṣīṇāmūrddhvaretasām| tasmim̐lliṁge praviṣṭāni te ghṛtāhutirivānale
साठ करोड़ हज़ार ऊर्ध्वरेता ऋषि उस लिंग में इस प्रकार प्रविष्ट हुए, जैसे अग्नि में घृत की आहुति।
श्लोक 4 (skanda.7.8.4)
सिद्धिर्वृद्धिस्तथा तुष्टिर्ऋद्धिः पुष्टिस्तु पंचमी। कीर्तिः शांतिस्तथा लक्ष्मीस्तस्मिंल्लिंगे समुत्थिता
siddhirvṛddhistathā tuṣṭirṛddhiḥ puṣṭistu paṁcamī| kīrtiḥ śāṁtistathā lakṣmīstasmilliṁge samutthitā
सिद्धि, वृद्धि, तुष्टि, ऋद्धि और पाँचवीं पुष्टि, तथा कीर्ति, शांति और लक्ष्मी - ये सब उस लिंग से उत्पन्न हुईं।
श्लोक 5 (skanda.7.8.5)
सप्तकोट्यस्तु मंत्राणां सिद्धीनां चैव संभवः। दिव्ययोगरसाश्चान्ये दिव्यौषधिरसायनाः
saptakoṭyastu maṁtrāṇāṁ siddhīnāṁ caiva saṁbhavaḥ| divyayogarasāścānye divyauṣadhirasāyanāḥ
सात करोड़ मंत्रों और सिद्धियों की उत्पत्ति, तथा अन्य दिव्य योग-रस और दिव्य औषधि-रसायन भी यहीं से उत्पन्न हुए।
श्लोक 6 (skanda.7.8.6)
गारुडं भूततंत्रं च खेचर्यो व्यंतरीस्तथा। ते सर्वे सह योगेन तस्माल्लिंगात्समुत्थिताः
gāruḍaṁ bhūtataṁtraṁ ca khecaryo vyaṁtarīstathā| te sarve saha yogena tasmālliṁgātsamutthitāḥ
गारुड़ विद्या, भूततन्त्र, खेचरी और व्यन्तरी विद्याएँ - ये सब योग के साथ उसी लिंग से उत्पन्न हुईं।
श्लोक 7 (skanda.7.8.7)
अन्याश्चैव तु याः काश्चित्सिद्धयोऽष्टौ प्रकीर्तिताः। ताः सर्वाः सह लिंगेन तस्मात्स्थानात्समुत्थिताः
anyāścaiva tu yāḥ kāścitsiddhayo'ṣṭau prakīrtitāḥ| tāḥ sarvāḥ saha liṁgena tasmātsthānātsamutthitāḥ
इसके अतिरिक्त जो भी अन्य आठ सिद्धियाँ कही गयी हैं, वे सभी उस लिंग सहित उसी स्थान से उत्पन्न हुईं।
श्लोक 8 (skanda.7.8.8)
अन्यद्देवि प्रवक्ष्यामि अत्र सिद्धिं गतास्तु ये। ममांशसंभवाः प्राप्ता अस्मिँल्लिंगे लयं गताः
anyaddevi pravakṣyāmi atra siddhiṁ gatāstu ye| mamāṁśasaṁbhavāḥ prāptā asmim̐lliṁge layaṁ gatāḥ
हे देवी! अब मैं अन्य बात कहूँगा - जो यहाँ सिद्धि को प्राप्त हुए, वे मेरे अंश से उत्पन्न होकर इसी लिंग में लीन हो गये।
श्लोक 9 (skanda.7.8.9)
तेषां च विक्रमान्सर्वान्प्रवक्ष्याम्यनुपूर्वशः। पुराक्रमा ग्रहा मुण्डा गुडकाश्च सहेतुकाः
teṣāṁ ca vikramānsarvānpravakṣyāmyanupūrvaśaḥ| purākramā grahā muṇḍā guḍakāśca sahetukāḥ
उन सभी के पराक्रमों को मैं क्रमशः बताऊँगा। पुराक्रम, ग्रह, मुण्ड, गुडक और सहेतुक।
श्लोक 10 (skanda.7.8.10)
विमला दंडिकाश्चैव सप्तैते कुत्सिकाः स्मृताः। अस्मिंल्लिंगे पुरा सिद्धा योगात्पाशुपतान्मम
vimalā daṁḍikāścaiva saptaite kutsikāḥ smṛtāḥ| asminlliṁge purā siddhā yogātpāśupatānmama
विमला और दण्डिक - ये सातों कुत्सिक नाम से स्मरण किये जाते हैं। ये सभी मेरे पाशुपत योग से इस लिंग में पूर्वकाल में सिद्ध हुए।
श्लोक 11 (skanda.7.8.11)
रुद्रो विप्रस्तथा दानश्चंद्रो मन्थोऽवलोककः। सूर्यावलोकश्चेति गार्गेयाः सप्त कीर्त्तिताः
rudro viprastathā dānaścaṁdro mantho'valokakaḥ| sūryāvalokaśceti gārgeyāḥ sapta kīrttitāḥ
रुद्र, विप्र, दान, चन्द्र, मन्थ, अवलोकक और सूर्यावलोक - ये सात गार्गेय नाम से कहे गये हैं।
श्लोक 12 (skanda.7.8.12)
सोमेश्वरे च ते सिद्धाः प्रभासे वरवर्णिनि। मूकमन्यः शिवश्चैव प्रकाशः कपिलस्तथा
someśvare ca te siddhāḥ prabhāse varavarṇini| mūkamanyaḥ śivaścaiva prakāśaḥ kapilastathā
हे वरवर्णिनि! वे भी सोमेश्वर में, प्रभास में सिद्ध हुए। मूकमन्य, शिव, प्रकाश और कपिल।
श्लोक 13 (skanda.7.8.13)
सत्कुलः कर्णिकारश्च पौरुषेयाः प्रकीर्त्तिताः। सोमेश्वरे पुरा सिद्धाः प्रभासे पापनाशने
satkulaḥ karṇikāraśca pauruṣeyāḥ prakīrttitāḥ| someśvare purā siddhāḥ prabhāse pāpanāśane
सत्कुल और कर्णिकार - ये पौरुषेय नाम से कहे गये हैं। ये सभी पापनाशक प्रभास में सोमेश्वर के पास पूर्वकाल में सिद्ध हुए।
श्लोक 14 (skanda.7.8.14)
युगेयुगे पुरा सिद्धास्तस्मिँल्लिंगे प्रिये मम। एते चान्ये च ये विप्रा भविष्यंति कलौ युगे
yugeyuge purā siddhāstasmim̐lliṁge priye mama| ete cānye ca ye viprā bhaviṣyaṁti kalau yuge
युग-युग में पूर्वकाल से ये मेरे उस प्रिय लिंग में सिद्ध हुए हैं। ये और अन्य जो भी ब्राह्मण कलियुग में होंगे।
श्लोक 15 (skanda.7.8.15)
तत्र सिद्धिं गमिष्यंति दुर्ल्लभां त्रिदशैरपि। एतत्ते सर्वमाख्यातं तल्लिंगं सिद्धिदं परम्
tatra siddhiṁ gamiṣyaṁti durllabhāṁ tridaśairapi| etatte sarvamākhyātaṁ talliṁgaṁ siddhidaṁ param
वे भी वहाँ उस सिद्धि को प्राप्त करेंगे, जो देवताओं को भी दुर्लभ है। यह सब मैंने तुम्हें बता दिया - वह लिंग सिद्धि देने वाला परम है।
श्लोक 16 (skanda.7.8.16)
दुर्ल्लभं सर्वमर्त्त्यानां प्रभासे तु व्यवस्थितम्। न च कश्चिद्विजानाति अशुभैः कर्मभिर्वृतः
durllabhaṁ sarvamarttyānāṁ prabhāse tu vyavasthitam| na ca kaścidvijānāti aśubhaiḥ karmabhirvṛtaḥ
यह सभी मनुष्यों के लिए दुर्लभ है, यद्यपि यह प्रभास में स्थित है। अशुभ कर्मों से घिरा हुआ कोई भी इसे नहीं जान पाता।
श्लोक 17 (skanda.7.8.17)
ग्रहदोषास्तु ये केचिद्भूतदोषास्तथा परे। डाकिनीप्रेतवेताला राक्षसा ग्रहपूतनाः
grahadoṣāstu ye kecidbhūtadoṣāstathā pare| ḍākinīpretavetālā rākṣasā grahapūtanāḥ
जो भी ग्रह-दोष हैं और अन्य भूत-दोष हैं, डाकिनी, प्रेत, वेताल, राक्षस, ग्रह और पूतना।
श्लोक 18 (skanda.7.8.18)
पिशाचा यातुधानाश्च मातरो जातहारिकाः। बालग्रहास्तथा चान्ये बुद्धाश्चैव तु ये ग्रहाः
piśācā yātudhānāśca mātaro jātahārikāḥ| bālagrahāstathā cānye buddhāścaiva tu ye grahāḥ
पिशाच, यातुधान, माताएँ, जातहारिका, बालग्रह और अन्य भी जो बुद्ध-ग्रह हैं।
श्लोक 19 (skanda.7.8.19)
ज्वरभूत ग्रहाश्चान्ये ह्यतिसारभगंदराः। अश्मरी मूत्रकृच्छ्रं च रोगाश्चान्ये सहस्रशः
jvarabhūta grahāścānye hyatisārabhagaṁdarāḥ| aśmarī mūtrakṛcchraṁ ca rogāścānye sahasraśaḥ
ज्वर उत्पन्न करने वाले भूत-ग्रह और अन्य, अतिसार, भगन्दर, अश्मरी, मूत्रकृच्छ्र और हज़ारों अन्य रोग।
श्लोक 20 (skanda.7.8.20)
दुर्नामकास्तथा चान्ये कुष्ठरोगास्तथा परे। क्षयरोगास्तथा चान्ये वातगुल्मास्तथैव च। अन्ये चैव तु ये केचिद्व्याधयस्तु प्रकीर्त्तिताः
durnāmakāstathā cānye kuṣṭharogāstathā pare| kṣayarogāstathā cānye vātagulmāstathaiva ca| anye caiva tu ye kecidvyādhayastu prakīrttitāḥ
दुर्नामक रोग, कुष्ठरोग, क्षयरोग और वातगुल्म आदि, तथा अन्य भी जो व्याधियाँ कही गयी हैं।
श्लोक 21 (skanda.7.8.21)
सोमेश्वरं समासाद्य तस्य लिंगस्य दर्शनात्। सर्व एव विनश्यंति वह्नौ क्षिप्तमिवेन्धनम्
someśvaraṁ samāsādya tasya liṁgasya darśanāt| sarva eva vinaśyaṁti vahnau kṣiptamivendhanam
सोमेश्वर को प्राप्त कर, उस लिंग के दर्शन मात्र से, ये सब उसी प्रकार नष्ट हो जाते हैं, जैसे अग्नि में डाला गया ईंधन।
श्लोक 22 (skanda.7.8.22)
उपसर्गाश्च चान्ये सर्पघोणपवृश्चिकाः। सर्वे तत्र विनश्यंति श्रीसोमेश्वरदर्शनात्
upasargāśca cānye sarpaghoṇapavṛścikāḥ| sarve tatra vinaśyaṁti śrīsomeśvaradarśanāt
अन्य उपद्रव [मूल पाठ का एक अंश यहाँ अस्पष्ट/त्रुटित है] तथा सर्प, बिच्छू आदि के दंश - ये सब वहाँ श्रीसोमेश्वर के दर्शन मात्र से नष्ट हो जाते हैं।
श्लोक 23 (skanda.7.8.23)
योऽसौ सोमेश्वरो नाम्ना पश्चिमो भैरवः स्मृतः। कालाग्निरुद्रनाथेति पर्यायैर्नामभिः श्रुतः
yo'sau someśvaro nāmnā paścimo bhairavaḥ smṛtaḥ| kālāgnirudranātheti paryāyairnāmabhiḥ śrutaḥ
जो यह सोमेश्वर नाम से जाना जाता है, वही पश्चिम दिशा में भैरव नाम से स्मरण किया जाता है, तथा कालाग्निरुद्रनाथ आदि पर्याय नामों से भी सुना जाता है।
श्लोक 24 (skanda.7.8.24)
तस्मिंस्तिष्ठामि देवेशि भक्तानुग्रहकारकः। सर्वं च दुष्कृतं नृणां भक्षयामि न संशयः
tasmiṁstiṣṭhāmi deveśi bhaktānugrahakārakaḥ| sarvaṁ ca duṣkṛtaṁ nṛṇāṁ bhakṣayāmi na saṁśayaḥ
उसी में मैं स्थित रहता हूँ, हे देवेशि! भक्तों पर अनुग्रह करने वाला बनकर। मनुष्यों के समस्त दुष्कृत्यों को मैं निःसन्देह भक्षण कर जाता हूँ।
श्लोक 25 (skanda.7.8.25)
योऽसौ प्राणः शरीरस्थो देहिनां देहसंचरः। ब्रह्मांडमेतद्यस्यांतरेको यश्चाप्यनेकधा
yo'sau prāṇaḥ śarīrastho dehināṁ dehasaṁcaraḥ| brahmāṁḍametadyasyāṁtareko yaścāpyanekadhā
जो यह प्राण देहधारियों के शरीर में स्थित होकर देह में संचरण करता है, जिसके भीतर यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड है, जो एक होते हुए भी अनेक रूप वाला है।
श्लोक 26 (skanda.7.8.26)
वेदाः सर्वेऽपि यं देवं प्रशंसंति महर्षयः। परस्य ब्रह्मणो रूपं यस्य द्वारेण लभ्यते
vedāḥ sarve'pi yaṁ devaṁ praśaṁsaṁti maharṣayaḥ| parasya brahmaṇo rūpaṁ yasya dvāreṇa labhyate
जिस देव की सब वेद और महर्षि प्रशंसा करते हैं, जिसके द्वार से परब्रह्म का स्वरूप प्राप्त होता है।
श्लोक 27 (skanda.7.8.27)
सोऽयं देवि महादेवः प्रभासे संव्यवस्थितः। यथा गुप्तं गृहे रत्नं न कश्चिद्विंदते नरः
so'yaṁ devi mahādevaḥ prabhāse saṁvyavasthitaḥ| yathā guptaṁ gṛhe ratnaṁ na kaścidviṁdate naraḥ
वही यह महादेव, हे देवी! प्रभास में स्थित है, जैसे घर में छिपा हुआ रत्न कोई मनुष्य नहीं ढूँढ पाता।
श्लोक 28 (skanda.7.8.28)
प्रभासे तु स्थितं तद्वद्रत्नभूतं गृहे मम। तच्च लिंगं पुरा कल्पे सप्तपातालभेदकम्
prabhāse tu sthitaṁ tadvadratnabhūtaṁ gṛhe mama| tacca liṁgaṁ purā kalpe saptapātālabhedakam
उसी प्रकार यह प्रभास में मेरे घर में रत्न के समान छिपा हुआ स्थित है। पूर्वकाल के कल्प में वह लिंग सातों पातालों को भेदने वाला था।
श्लोक 29 (skanda.7.8.29)
कथितं कोटि सूर्यस्य प्रलयानलसंनिभम्। तेनकालाग्निरुद्रेति प्रोक्तं सोमेश्वरः पुरा
kathitaṁ koṭi sūryasya pralayānalasaṁnibham| tenakālāgnirudreti proktaṁ someśvaraḥ purā
इसे करोड़ों सूर्यों के समान और प्रलय-अग्नि के समान कहा गया है। इसी कारण सोमेश्वर को पूर्वकाल में कालाग्निरुद्र कहा गया।
श्लोक 30 (skanda.7.8.30)
इति देवि समासेन कथितं तव पार्वति। सोमेश्वरस्य माहात्म्यं सर्वपातकनाशनम्
iti devi samāsena kathitaṁ tava pārvati| someśvarasya māhātmyaṁ sarvapātakanāśanam
इस प्रकार, हे देवी पार्वती! मैंने संक्षेप में तुम्हें सोमेश्वर का माहात्म्य बता दिया, जो समस्त पापों का नाशक है।