प्रभास खण्ड · अध्याय 9
प्रभासक्षेत्रे श्रीहरिस्थितिप्रश्नवर्णनम्
श्लोक 1 (skanda.7.9.1)
देव्युवाच। दिव्यं तेजो नमस्यामि यन्मे दृष्टं पुरातने। कालाग्निरुद्रमध्यस्थं प्रभासे शंकरोद्भवम्
devyuvāca| divyaṁ tejo namasyāmi yanme dṛṣṭaṁ purātane| kālāgnirudramadhyasthaṁ prabhāse śaṁkarodbhavam
देवी ने कहा—मैं उस दिव्य तेज को नमस्कार करती हूँ, जो मैंने पूर्वकाल में देखा था, जो कालाग्निरुद्र के मध्य में स्थित और प्रभास में शंकर से उत्पन्न है।
श्लोक 2 (skanda.7.9.2)
यो वेदसंघैर्ऋषिभिः पुराणैर्वेदोक्तयोगैरपि इज्यमानः। तं देवदेवं शरणं व्रजामि सोमेश्वरं पापविनाशहेतुम्
yo vedasaṁghairṛṣibhiḥ purāṇairvedoktayogairapi ijyamānaḥ| taṁ devadevaṁ śaraṇaṁ vrajāmi someśvaraṁ pāpavināśahetum
जो वेद-समूहों, ऋषियों, पुराणों और वेदोक्त योगों द्वारा भी पूजित है, उन देवाधिदेव पाप-विनाशक सोमेश्वर की मैं शरण लेती हूँ।
श्लोक 3 (skanda.7.9.3)
देवदेव जगन्नाथ भक्तानुग्रहकारक। संशयो हृदि मे कश्चित्तं भवाञ्छेत्तुमर्हति
devadeva jagannātha bhaktānugrahakāraka| saṁśayo hṛdi me kaścittaṁ bhavāñchettumarhati
हे देवाधिदेव! हे जगन्नाथ! हे भक्तों पर अनुग्रह करने वाले! मेरे हृदय में कुछ संशय है, आप उसे दूर करने योग्य हैं।
श्लोक 4 (skanda.7.9.4)
ईश्वर उवाच। कः संशयः समुत्पन्नस्तव देवि यशस्विनि। तन्मे कथय कल्याणि तत्सर्वं कथयाम्यहम्
īśvara uvāca| kaḥ saṁśayaḥ samutpannastava devi yaśasvini| tanme kathaya kalyāṇi tatsarvaṁ kathayāmyaham
ईश्वर ने कहा—हे यशस्विनी देवी! तुम्हें क्या संशय उत्पन्न हुआ है? हे कल्याणी! वह मुझे बताओ, मैं वह सब कह दूँगा।
श्लोक 5 (skanda.7.9.5)
देव्युवाच। यदि त्वं च महादेवो मुण्डमाला कथं कृता। अनादि निधनो धाता सृष्टिसंहारकारकः
devyuvāca| yadi tvaṁ ca mahādevo muṇḍamālā kathaṁ kṛtā| anādi nidhano dhātā sṛṣṭisaṁhārakārakaḥ
देवी ने कहा—यदि तुम महादेव हो, तो मुण्डमाला क्यों धारण की? अनादि, अविनाशी, विधाता और सृष्टि-संहार करने वाले, तुम कैसे हो?
श्लोक 6 (skanda.7.9.6)
ततो विहस्य देवेशः शंकरो वाक्यमब्रवीत्। अनेकमुण्डकोटीभिर्या मे माला विराजते
tato vihasya deveśaḥ śaṁkaro vākyamabravīt| anekamuṇḍakoṭībhiryā me mālā virājate
तब देवेश शंकर मुस्कुराकर बोले—अनेक करोड़ों मुण्डों से जो मेरी माला सुशोभित है।
श्लोक 7 (skanda.7.9.7)
नारायण सहस्राणां ब्रह्मणामयुतस्य च। कृता शिरःकरोटीभिरनादिनिधना ततः
nārāyaṇa sahasrāṇāṁ brahmaṇāmayutasya ca| kṛtā śiraḥkaroṭībhiranādinidhanā tataḥ
यह हज़ारों नारायणों और दस हज़ार ब्रह्माओं की खोपड़ियों से बनी है, अतः अनादि-अनिधन है।
श्लोक 8 (skanda.7.9.8)
अन्यो विष्णुश्च भवति अन्यो ब्रह्मा भवत्यपि। कल्पे कल्पे मया सृष्टः कल्पे विष्णुः प्रजापतिः
anyo viṣṇuśca bhavati anyo brahmā bhavatyapi| kalpe kalpe mayā sṛṣṭaḥ kalpe viṣṇuḥ prajāpatiḥ
प्रत्येक कल्प में एक नया विष्णु होता है और एक नया ब्रह्मा भी होता है। प्रत्येक कल्प में मेरे द्वारा विष्णु और प्रजापति सृजित किये जाते हैं।
श्लोक 9 (skanda.7.9.9)
अहमेवंविधो देवि क्षेत्रे प्राभासिके स्थितः। कालाग्निलिंगमूले तु मुंडमालाविभूषितः
ahamevaṁvidho devi kṣetre prābhāsike sthitaḥ| kālāgniliṁgamūle tu muṁḍamālāvibhūṣitaḥ
हे देवी! मैं इसी रूप में प्राभासिक क्षेत्र में स्थित हूँ, कालाग्नि लिंग के मूल में मुण्डमाला से विभूषित होकर।
श्लोक 10 (skanda.7.9.10)
अक्षसूत्रधरः शान्त आदिमध्यांतवर्जितः। पद्मासनस्थो वरदो हिमकुन्देन्दुसन्निभः
akṣasūtradharaḥ śānta ādimadhyāṁtavarjitaḥ| padmāsanastho varado himakundendusannibhaḥ
रुद्राक्ष-माला धारण करने वाला, शान्त, आदि-मध्य-अंत से रहित, पद्मासन पर स्थित, वरदान देने वाला, हिम, कुन्द-पुष्प और चन्द्रमा के समान श्वेत।
श्लोक 11 (skanda.7.9.11)
मम वामे स्थितो विष्णुर्दक्षिणे च पितामहः। जठरे चतुरो वेदाः हृदये ब्रह्म शाश्वतम्
mama vāme sthito viṣṇurdakṣiṇe ca pitāmahaḥ| jaṭhare caturo vedāḥ hṛdaye brahma śāśvatam
मेरे बायीं ओर विष्णु और दायीं ओर पितामह ब्रह्मा स्थित हैं। मेरे उदर में चारों वेद और हृदय में शाश्वत ब्रह्म हैं।
श्लोक 12 (skanda.7.9.12)
अग्निः सोमश्च सूर्यश्च लोचनेषु व्यवस्थिताः
agniḥ somaśca sūryaśca locaneṣu vyavasthitāḥ
अग्नि, सोम और सूर्य मेरे नेत्रों में स्थित हैं।
श्लोक 13 (skanda.7.9.13)
एवंविधो महादेवि प्रभासे संव्यवस्थितः। आप्यतत्त्वात्समानीते मा ते भूत्संशयः क्वचित्
evaṁvidho mahādevi prabhāse saṁvyavasthitaḥ| āpyatattvātsamānīte mā te bhūtsaṁśayaḥ kvacit
हे महादेवी! इसी रूप में मैं प्रभास में स्थित हूँ, जल-तत्त्व से सम्बद्ध इस स्थान में। तुम्हें इसमें कभी कोई संशय न हो।
श्लोक 14 (skanda.7.9.14)
एवमुक्ता तदा देवी हर्षगद्गदया गिरा। तुष्टाव देवदेवेशं भक्त्या परमया युता
evamuktā tadā devī harṣagadgadayā girā| tuṣṭāva devadeveśaṁ bhaktyā paramayā yutā
इस प्रकार कहे जाने पर तब देवी ने हर्ष से गद्गद वाणी में, परम भक्ति से युक्त होकर, देवाधिदेव की स्तुति की।
श्लोक 15 (skanda.7.9.15)
देव्युवाच। जय देव महादेव सर्वभावन ईश्वर। नमस्तेऽस्तु सुरेशाय परमेशाय वै नमः
devyuvāca| jaya deva mahādeva sarvabhāvana īśvara| namaste'stu sureśāya parameśāya vai namaḥ
देवी ने कहा—हे महादेव! हे सर्वभावन ईश्वर! तुम्हारी जय हो। हे सुरेश! हे परमेश! तुम्हें नमस्कार हो।
श्लोक 16 (skanda.7.9.16)
अनादिसृष्टिकर्त्रे च नमः सर्वगताय च। सर्वस्थाय नमस्तुभ्यं धाम्नां धाम्ने नमोऽस्तु ते
anādisṛṣṭikartre ca namaḥ sarvagatāya ca| sarvasthāya namastubhyaṁ dhāmnāṁ dhāmne namo'stu te
अनादि सृष्टिकर्ता को नमस्कार, सर्वव्यापी को नमस्कार। सर्वत्र स्थित तुम्हें नमस्कार, तेजों के तेज तुम्हें नमस्कार हो।
श्लोक 17 (skanda.7.9.17)
षडंताय नमस्तुभ्यं द्वादशान्ताय ते नमः। हंसभेद नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं च मोक्षद
ṣaḍaṁtāya namastubhyaṁ dvādaśāntāya te namaḥ| haṁsabheda namastubhyaṁ namastubhyaṁ ca mokṣada
छह अंत वाले को नमस्कार, बारह अंत वाले तुम्हें नमस्कार। हंसभेद तुम्हें नमस्कार, और हे मोक्षदाता तुम्हें नमस्कार।
श्लोक 18 (skanda.7.9.18)
इति स्तुतस्तदा देव्या प्रचलच्चन्द्रशेखरः। ततस्तुष्टस्तु भगवानिदं वचनमब्रवीत्
iti stutastadā devyā pracalaccandraśekharaḥ| tatastuṣṭastu bhagavānidaṁ vacanamabravīt
इस प्रकार देवी द्वारा स्तुति किये जाने पर चन्द्रशेखर हर्ष से कम्पित हो उठे। तब प्रसन्न होकर भगवान ने यह वचन कहा।
श्लोक 19 (skanda.7.9.19)
ईश्वर उवाच। साधुसाधु महाप्राज्ञे तुष्टोऽहं व्रियतां वरः
īśvara uvāca| sādhusādhu mahāprājñe tuṣṭo'haṁ vriyatāṁ varaḥ
ईश्वर ने कहा—साधु, साधु, हे महाप्राज्ञे! मैं प्रसन्न हूँ, वर माँगो।
श्लोक 20 (skanda.7.9.20)
देव्युवाच। यदि तुष्टोऽसि देवेश वरार्हा यदि वाप्यहम्। प्रभास क्षेत्रमाहात्म्यं पुनर्विस्तरतो वद
devyuvāca| yadi tuṣṭo'si deveśa varārhā yadi vāpyaham| prabhāsa kṣetramāhātmyaṁ punarvistarato vada
देवी ने कहा—हे देवेश! यदि आप प्रसन्न हैं और यदि मैं वर पाने योग्य हूँ, तो प्रभास क्षेत्र के माहात्म्य को पुनः विस्तार से कहिये।
श्लोक 21 (skanda.7.9.21)
भूतेश भगवान्विष्णुर्दैत्यानामन्तकाग्रणीः। स कस्माद्द्वारकां हित्वा प्रभासक्षेत्रमाश्रितः
bhūteśa bhagavānviṣṇurdaityānāmantakāgraṇīḥ| sa kasmāddvārakāṁ hitvā prabhāsakṣetramāśritaḥ
हे भूतेश! भगवान विष्णु, जो दैत्यों के विनाश में अग्रगण्य हैं, वे द्वारका को छोड़कर प्रभास क्षेत्र में क्यों आश्रित हुए?
श्लोक 22 (skanda.7.9.22)
षष्टि तीर्थसहस्राणि षष्टिकोटिशतानि च। द्वारकामध्यसंस्थानि कथं न्यक्कृतवान्हरिः
ṣaṣṭi tīrthasahasrāṇi ṣaṣṭikoṭiśatāni ca| dvārakāmadhyasaṁsthāni kathaṁ nyakkṛtavānhariḥ
साठ हज़ार तीर्थ और साठ सौ करोड़ तीर्थ जो द्वारका के मध्य में स्थित हैं, हरि ने उन्हें तिरस्कृत करके ऐसा क्यों किया?
श्लोक 23 (skanda.7.9.23)
अमरैरावृतां पुण्यां पुण्यकृद्भिर्निषेविताम्। एवं तां द्वारकां त्यक्त्वा प्रभासं कथमागतः
amarairāvṛtāṁ puṇyāṁ puṇyakṛdbhirniṣevitām| evaṁ tāṁ dvārakāṁ tyaktvā prabhāsaṁ kathamāgataḥ
अमरों से आवृत, पवित्र, पुण्यकर्मियों से सेवित उस द्वारका को त्यागकर वे प्रभास में कैसे आये?
श्लोक 24 (skanda.7.9.24)
देवमानुषयोर्नेता द्योभुवोः प्रभवो हरिः। किमर्थं द्वारकां त्यक्त्वा प्रभासे निधनं गतः
devamānuṣayornetā dyobhuvoḥ prabhavo hariḥ| kimarthaṁ dvārakāṁ tyaktvā prabhāse nidhanaṁ gataḥ
देवों और मनुष्यों के नेता, स्वर्ग और पृथ्वी के उद्गम हरि, किस कारण द्वारका त्यागकर प्रभास में मृत्यु को प्राप्त हुए?
श्लोक 25 (skanda.7.9.25)
यश्चक्रं वर्त्तयत्येको मानुषाणां मनोमयम्। प्रभासे स कथं कालं चक्रे चक्रभृतां वरः
yaścakraṁ varttayatyeko mānuṣāṇāṁ manomayam| prabhāse sa kathaṁ kālaṁ cakre cakrabhṛtāṁ varaḥ
जो अकेले मनुष्यों के मनोमय चक्र को चलाता है, वह चक्रधारियों में श्रेष्ठ प्रभास में कैसे काल का ग्रास बना?
श्लोक 26 (skanda.7.9.26)
गोपायनं यः कुरुते जगतः सार्वलौकिकम्। स कथं भगवान्विष्णुः प्रभासक्षेत्रमाश्रितः
gopāyanaṁ yaḥ kurute jagataḥ sārvalaukikam| sa kathaṁ bhagavānviṣṇuḥ prabhāsakṣetramāśritaḥ
जो सम्पूर्ण जगत का सार्वलौकिक पालन करता है, वे भगवान विष्णु प्रभास क्षेत्र में क्यों आश्रित हुए?
श्लोक 27 (skanda.7.9.27)
योंतकाले जलं पीत्वा कृत्वा तोयमयं वपुः। लोकमेकार्णवं चक्रे दृष्ट्या दृष्टेन चात्मना
yoṁtakāle jalaṁ pītvā kṛtvā toyamayaṁ vapuḥ| lokamekārṇavaṁ cakre dṛṣṭyā dṛṣṭena cātmanā
जिसने प्रलयकाल में जल पीकर अपना शरीर जलमय बनाकर, अपनी दृष्टि से देखे गये आत्मा द्वारा सम्पूर्ण लोक को एक अर्णव बना दिया।
श्लोक 28 (skanda.7.9.28)
स कथं पञ्चतां प्राप प्रभासे पार्वतीपते। यः पुराणे पुराणात्मा वाराहं वपुरास्थितः
sa kathaṁ pañcatāṁ prāpa prabhāse pārvatīpate| yaḥ purāṇe purāṇātmā vārāhaṁ vapurāsthitaḥ
हे पार्वतीपते! वह प्रभास में मृत्यु को कैसे प्राप्त हुआ, जो पुरातन काल में पुराणपुरुष होकर वराह-शरीर धारण करता था?
श्लोक 29 (skanda.7.9.29)
उद्दधार महीं कृत्स्नां सशैलवनकाननाम्। स कथं त्यक्तवान्गात्रं प्रभासे पापनाशने
uddadhāra mahīṁ kṛtsnāṁ saśailavanakānanām| sa kathaṁ tyaktavāngātraṁ prabhāse pāpanāśane
जिसने पर्वतों, वनों और काननों सहित सम्पूर्ण पृथ्वी को उद्धार किया, वह पापनाशक प्रभास में अपना शरीर कैसे त्याग बैठा?
श्लोक 30 (skanda.7.9.30)
येन सिंहं वपुः कृत्वा हिरण्यकशिपुर्हतः। स कथं देवदेवेशः प्रभासं क्षेत्रमाश्रितः
yena siṁhaṁ vapuḥ kṛtvā hiraṇyakaśipurhataḥ| sa kathaṁ devadeveśaḥ prabhāsaṁ kṣetramāśritaḥ
जिसने सिंह का शरीर धारण करके हिरण्यकशिपु का वध किया, वह देवाधिदेव प्रभास क्षेत्र में क्यों आश्रित हुआ?
श्लोक 31 (skanda.7.9.31)
सहस्रचरणं देवं सहस्राक्षं महाप्रभम्। सहस्रशिरसं वेदा यमाहुर्वै युगेयुगे
sahasracaraṇaṁ devaṁ sahasrākṣaṁ mahāprabham| sahasraśirasaṁ vedā yamāhurvai yugeyuge
जिसे वेद युग-युग में सहस्र-चरण, सहस्र-नेत्र और महाप्रभावशाली सहस्र-शिर वाला कहते हैं।
श्लोक 32 (skanda.7.9.32)
तत्याज स कथं देवः प्रभासे स्वं कलेवरम्। नाभ्यरण्यां समुद्भूतं यस्य पैतामहं गृहम्
tatyāja sa kathaṁ devaḥ prabhāse svaṁ kalevaram| nābhyaraṇyāṁ samudbhūtaṁ yasya paitāmahaṁ gṛham
उस देव ने प्रभास में अपना शरीर कैसे त्यागा? जिसकी नाभि-कमल से उत्पन्न वन में पितामह ब्रह्मा का घर है।
श्लोक 33 (skanda.7.9.33)
एकार्णवगते लोके तत्पंकजमपंकजम्। येनोद्धृतं क्षणेनैव प्रभासस्थः स किं हरिः
ekārṇavagate loke tatpaṁkajamapaṁkajam| yenoddhṛtaṁ kṣaṇenaiva prabhāsasthaḥ sa kiṁ hariḥ
जब सम्पूर्ण लोक एक समुद्र में लीन हो गया था, तब जिसने उस कीचड़रहित कमल को क्षणभर में ऊपर उठाया - क्या वही हरि प्रभास में स्थित हुआ?
श्लोक 34 (skanda.7.9.34)
उत्तरांशे समुद्रस्य क्षीरोदस्या मृतोदधेः। यः शेते शाश्वतं योगमास्थाय परवीरहा। स कथं त्यक्तवान्देहं प्रभासे परमेश्वरः
uttarāṁśe samudrasya kṣīrodasyā mṛtodadheḥ| yaḥ śete śāśvataṁ yogamāsthāya paravīrahā| sa kathaṁ tyaktavāndehaṁ prabhāse parameśvaraḥ
जो क्षीरसागर के अमृतमय उत्तरी भाग में, शाश्वत योग में स्थित होकर शयन करता है, वह शत्रुसूदन परमेश्वर प्रभास में अपनी देह कैसे त्याग बैठा?
श्लोक 35 (skanda.7.9.35)
हव्यादान्यः सुरांश्चक्रे कव्यादांश्च पितॄ नपि। स कथं देवदेवेशः प्रभासं क्षेत्रमाश्रितः
havyādānyaḥ surāṁścakre kavyādāṁśca pitṝ napi| sa kathaṁ devadeveśaḥ prabhāsaṁ kṣetramāśritaḥ
जिसने देवताओं को हव्यभोजी और पितरों को कव्यभोजी बनाया, वह देवाधिदेव प्रभास क्षेत्र में क्यों आश्रित हुआ?
श्लोक 36 (skanda.7.9.36)
युगानुरूपं यः कृत्वा रूपं लोकहिताय वै। धर्ममुद्धरते देवः स कथं क्षेत्रमाश्रितः
yugānurūpaṁ yaḥ kṛtvā rūpaṁ lokahitāya vai| dharmamuddharate devaḥ sa kathaṁ kṣetramāśritaḥ
जो युग के अनुरूप रूप धारण करके लोक-हित के लिए धर्म का उद्धार करता है, वह देव क्षेत्र में क्यों आश्रित हुआ?
श्लोक 37 (skanda.7.9.37)
त्रयो वर्णास्त्रयो लोकास्त्रैविद्यं पाठकास्त्रयः। त्रैकाल्यं त्रीणि कर्माणि त्रयो देवास्त्रयो गुणाः। सृष्टं येन पुरा देवः स कथं क्षेत्रमाश्रितः
trayo varṇāstrayo lokāstraividyaṁ pāṭhakāstrayaḥ| traikālyaṁ trīṇi karmāṇi trayo devāstrayo guṇāḥ| sṛṣṭaṁ yena purā devaḥ sa kathaṁ kṣetramāśritaḥ
तीन वर्ण, तीन लोक, त्रयी विद्या, तीन पाठक, त्रिकाल, तीन कर्म, तीन देवता और तीन गुण - जिस देव ने इन सबकी सृष्टि की, वह क्षेत्र में क्यों आश्रित हुआ?
श्लोक 38 (skanda.7.9.38)
या गतिर्द्धर्मयुक्तानामगतिः पापकर्मिणाम्। चातुर्वर्ण्यस्य प्रभवश्चातुर्वर्ण्यस्य रक्षिता
yā gatirddharmayuktānāmagatiḥ pāpakarmiṇām| cāturvarṇyasya prabhavaścāturvarṇyasya rakṣitā
जो धर्मयुक्तों की गति है और पापकर्मियों की अगति है, जो चातुर्वर्ण्य का उद्भव और उसका रक्षक है।
श्लोक 39 (skanda.7.9.39)
चातुर्विद्यस्य यो वेत्ता चातुराश्रम्यसंस्थितः। कस्मात्स द्वारकां हित्वा प्रभासे पंचतां गतः
cāturvidyasya yo vettā cāturāśramyasaṁsthitaḥ| kasmātsa dvārakāṁ hitvā prabhāse pañcatāṁ gataḥ
जो चतुर्विद्या का ज्ञाता और चार आश्रमों में स्थित है, वह द्वारका को त्यागकर प्रभास में मृत्यु को क्यों प्राप्त हुआ?
श्लोक 40 (skanda.7.9.40)
दिगंतरं नभोभूमिरापो वायुर्विभावसुः। चंद्रसूर्यद्वयं ज्योतिर्युगेशः क्षणदातनुः
digaṁtaraṁ nabhobhūmirāpo vāyurvibhāvasuḥ| caṁdrasūryadvayaṁ jyotiryugeśaḥ kṣaṇadātanuḥ
जो दिशाओं के अन्तराल, आकाश, पृथ्वी, जल, वायु और अग्नि है, जो चन्द्र-सूर्य दोनों ज्योतियाँ, युगेश और रात्रि-स्वरूप है।
श्लोक 41 (skanda.7.9.41)
यः परं श्रूयते ज्योतिर्यः परं श्रूयते तपः। यः परं परतः प्रोक्तः परं यः परमात्मवान्
yaḥ paraṁ śrūyate jyotiryaḥ paraṁ śrūyate tapaḥ| yaḥ paraṁ parataḥ proktaḥ paraṁ yaḥ paramātmavān
जो श्रुतियों में परम ज्योति कहा गया है, जो परम तप कहा गया है, जो परतः भी परम कहा गया है, जो परमात्मा-स्वरूप परम है।
श्लोक 42 (skanda.7.9.42)
आदित्यादिश्च यो दिव्यो यश्च दैत्यांतको विभुः। स कथं देवकीसूनुः प्रभासे सिद्धिमीयिवान्
ādityādiśca yo divyo yaśca daityāṁtako vibhuḥ| sa kathaṁ devakīsūnuḥ prabhāse siddhimīyivān
जो आदित्य आदि दिव्य देवताओं का मूल है और दैत्यों का अन्त करने वाला विभु है, वह देवकीनन्दन प्रभास में सिद्धि को कैसे प्राप्त हुआ?
श्लोक 43 (skanda.7.9.43)
युगांते चांतको यश्च यश्च लोकांतकांतकः। सेतुर्यो लोकसत्तानां मेध्यो यो मेध्यकर्मणाम्
yugāṁte cāṁtako yaśca yaśca lokāṁtakāṁtakaḥ| seturyo lokasattānāṁ medhyo yo medhyakarmaṇām
जो युग के अन्त में संहारक है और लोकों के अन्तक का भी अन्त करने वाला है, जो संसार के प्राणियों का सेतु है, जो यज्ञकर्मों में पवित्रता है।
श्लोक 44 (skanda.7.9.44)
वेत्ता यो वेदविदुषां प्रभुर्यः प्रभवात्मनाम्। सोमभूतस्तु भूतानामग्निभूतोऽग्निवर्त्मनाम्
vettā yo vedaviduṣāṁ prabhuryaḥ prabhavātmanām| somabhūtastu bhūtānāmagnibhūto'gnivartmanām
जो वेदवेत्ताओं का ज्ञाता है, जो सामर्थ्यवान आत्माओं का स्वामी है, जो प्राणियों के लिए सोमरूप और अग्निमार्गियों के लिए अग्निरूप है।
श्लोक 45 (skanda.7.9.45)
मनुष्याणां मनोभूतस्तपोभूतस्तपस्विनाम्। विनयो नयभूतानां तेजस्तेजस्विनामपि
manuṣyāṇāṁ manobhūtastapobhūtastapasvinām| vinayo nayabhūtānāṁ tejastejasvināmapi
जो मनुष्यों के लिए मन-स्वरूप और तपस्वियों के लिए तप-स्वरूप है, जो नीतिवानों के लिए विनय-स्वरूप और तेजस्वियों के लिए तेज-स्वरूप है।
श्लोक 46 (skanda.7.9.46)
विग्रहो विग्रहाणां यो गतिर्गतिमतामपि। स कथं द्वारकां हित्वा प्रभासक्षेत्रमाश्रितः
vigraho vigrahāṇāṁ yo gatirgatimatāmapi| sa kathaṁ dvārakāṁ hitvā prabhāsakṣetramāśritaḥ
जो युद्धों में युद्ध-स्वरूप है और गतिमानों के लिए गति-स्वरूप भी है, वह द्वारका को त्यागकर प्रभास क्षेत्र में क्यों आश्रित हुआ?
श्लोक 47 (skanda.7.9.47)
आकाशप्रभवो वायुर्वायुप्राणो हुताशनः। देवा हुताशनप्राणाः प्राणोऽग्नेर्मधुसूदनः। सकथं पद्मजप्राणः प्रभासं क्षेत्रमाश्रितः
ākāśaprabhavo vāyurvāyuprāṇo hutāśanaḥ| devā hutāśanaprāṇāḥ prāṇo'gnermadhusūdanaḥ| sakathaṁ padmajaprāṇaḥ prabhāsaṁ kṣetramāśritaḥ
आकाश से वायु उत्पन्न होता है, वायु से अग्नि उत्पन्न होती है, अग्नि से देवता प्राणवान होते हैं, और अग्नि के प्राण स्वयं मधुसूदन हैं। वह पद्मज के भी प्राण-स्वरूप, प्रभास क्षेत्र में क्यों आश्रित हुए?
श्लोक 48 (skanda.7.9.48)
सूत उवाच। इति प्रोक्तस्तदा देव्या शंकरो लोकशंकरः। उवाच प्रहसन्वाक्यं पार्वतीं द्विजसत्तमाः
sūta uvāca| iti proktastadā devyā śaṁkaro lokaśaṁkaraḥ| uvāca prahasanvākyaṁ pārvatīṁ dvijasattamāḥ
सूतजी ने कहा—हे द्विजश्रेष्ठो! इस प्रकार देवी द्वारा कहे जाने पर, लोक-कल्याणकारी शंकर ने हँसते हुए पार्वती से यह वचन कहा।
श्लोक 49 (skanda.7.9.49)
ईश्वर उवाच। शृणु देवि प्रवक्ष्यामि प्रभासक्षेत्रविस्तरम्। रहस्यं सर्वपापघ्नं देवानामपि दुर्ल्लभम्
īśvara uvāca| śṛṇu devi pravakṣyāmi prabhāsakṣetravistaram| rahasyaṁ sarvapāpaghnaṁ devānāmapi durllabham
ईश्वर ने कहा—हे देवी! सुनो, मैं प्रभास क्षेत्र का विस्तार बताता हूँ, जो सर्वपापनाशक रहस्य है और देवताओं के लिए भी दुर्लभ है।
श्लोक 50 (skanda.7.9.50)
देवि क्षेत्राण्यनेकानि पृथिव्यां संति भामिनि। तीर्थानि कोटिसंख्यानि प्रभावस्तेषु संख्यया
devi kṣetrāṇyanekāni pṛthivyāṁ saṁti bhāmini| tīrthāni koṭisaṁkhyāni prabhāvasteṣu saṁkhyayā
हे देवी! हे भामिनी! पृथ्वी पर अनेक क्षेत्र हैं, करोड़ों की संख्या में तीर्थ हैं, उनका प्रभाव भी उतनी ही गणना में है।
श्लोक 51 (skanda.7.9.51)
असंख्येय प्रभावं हि प्रभासं परिकीर्तितम्। ब्रह्मतत्त्वं विष्णुतत्त्वं रौद्रतत्त्वं तथैव च
asaṁkhyeya prabhāvaṁ hi prabhāsaṁ parikīrtitam| brahmatattvaṁ viṣṇutattvaṁ raudratattvaṁ tathaiva ca
किन्तु प्रभास असंख्य प्रभाव वाला कहा गया है। ब्रह्मतत्त्व, विष्णुतत्त्व और रौद्रतत्त्व - ये तीनों।
श्लोक 52 (skanda.7.9.52)
तत्र भूयः समायोगो दुर्ल्लभोऽन्येषु पार्वति। प्रभासे देवदेवेशि तत्त्वानां त्रितयं स्थितम्
tatra bhūyaḥ samāyogo durllabho'nyeṣu pārvati| prabhāse devadeveśi tattvānāṁ tritayaṁ sthitam
हे पार्वती! इनका संयोग अन्य स्थानों में अत्यन्त दुर्लभ है। हे देवाधिदेवेशि! प्रभास में इन तीनों तत्त्वों का समागम स्थित है।
श्लोक 53 (skanda.7.9.53)
चतुर्विंशतितत्त्वैश्च ब्रह्मा लोकपितामहः। बालरूपी च नाम्नां च तत्र स्थाने स्थितः स्वयम्
caturviṁśatitattvaiśca brahmā lokapitāmahaḥ| bālarūpī ca nāmnāṁ ca tatra sthāne sthitaḥ svayam
चौबीस तत्त्वों के साथ लोकपितामह ब्रह्मा बाल-रूप में स्वयं उस स्थान में स्थित हैं।
श्लोक 54 (skanda.7.9.54)
पंचविशतितत्त्वानाम धिपो देवताग्रणीः। तस्मिन्स्थाने स्थितः साक्षाद्दैत्यानामंतकः शुभे
paṁcaviśatitattvānāmadhipo devatāgraṇīḥ| tasminsthāne sthitaḥ sākṣāddaityānāmaṁtakaḥ śubhe
हे शुभे! पच्चीस तत्त्वों के अधिपति, देवताओं में अग्रगण्य, दैत्यों का अन्त करने वाले विष्णु उसी स्थान में साक्षात् स्थित हैं।
श्लोक 55 (skanda.7.9.55)
अहं देवि त्वया सार्द्धं षट्त्रिंशत्तत्त्वसंयुतः। निवसामि महाभागे प्रभासे पापनाशने
ahaṁ devi tvayā sārddhaṁ ṣaṭtriṁśattattvasaṁyutaḥ| nivasāmi mahābhāge prabhāse pāpanāśane
हे देवी! मैं छत्तीस तत्त्वों से युक्त होकर तुम्हारे साथ, हे महाभागे! पापनाशक प्रभास में निवास करता हूँ।
श्लोक 56 (skanda.7.9.56)
एवं तत्त्वमयं क्षेत्रं सर्वतीर्थमयं शुभम्। प्रभासमेव जानीहि मा कार्षीः संशयं क्वचित्
evaṁ tattvamayaṁ kṣetraṁ sarvatīrthamayaṁ śubham| prabhāsameva jānīhi mā kārṣīḥ saṁśayaṁ kvacit
इस प्रकार सभी तत्त्वों से युक्त, सभी तीर्थों से युक्त, शुभ क्षेत्र को प्रभास ही जानो, इसमें कहीं भी संशय मत करो।
श्लोक 57 (skanda.7.9.57)
अपि कीटपतंगा ये म्रियंते तत्र ये नराः। तेऽपि यांति परं स्थानं नात्र कार्या विचारणा
api kīṭapataṁgā ye mriyaṁte tatra ye narāḥ| te'pi yāṁti paraṁ sthānaṁ nātra kāryā vicāraṇā
यहाँ तक कि कीड़े-पतंगे और जो भी मनुष्य वहाँ मरते हैं, वे भी परम स्थान को प्राप्त होते हैं, इसमें कोई विचार नहीं करना चाहिए।
श्लोक 58 (skanda.7.9.58)
स्त्रियो म्लेच्छाश्च शूद्राश्च पशवः पक्षिणो मृगाः। प्रभासे तु मृता देवि शिवलोकं व्रजंति ते
striyo mlecchāśca śūdrāśca paśavaḥ pakṣiṇo mṛgāḥ| prabhāse tu mṛtā devi śivalokaṁ vrajaṁti te
स्त्रियाँ, म्लेच्छ, शूद्र, पशु, पक्षी और मृग - हे देवी! प्रभास में मरने पर वे शिवलोक को जाते हैं।
श्लोक 59 (skanda.7.9.59)
कामक्रोधेन ये बद्धा लोभेन च वशीकृताः। अज्ञानतिमिराक्रांता मायातत्त्वे च संस्थिताः
kāmakrodhena ye baddhā lobhena ca vaśīkṛtāḥ| ajñānatimirākrāṁtā māyātattve ca saṁsthitāḥ
जो काम और क्रोध से बंधे हैं, लोभ से वशीभूत हैं, अज्ञान के अंधकार से घिरे हैं और माया-तत्त्व में स्थित हैं।
श्लोक 60 (skanda.7.9.60)
कालपाशेन ये बद्धास्तृष्णाजालेन मोहिताः। अधर्मनिरता ये च ये च तिष्ठंति पापिनः
kālapāśena ye baddhāstṛṣṇājālena mohitāḥ| adharmaniratā ye ca ye ca tiṣṭhaṁti pāpinaḥ
जो काल के पाश से बंधे हैं, तृष्णा के जाल से मोहित हैं, अधर्म में लीन हैं और जो पापी बने रहते हैं।
श्लोक 61 (skanda.7.9.61)
ब्रह्मघ्नाश्च कृतघ्नाश्च ये चान्ये गुरुतल्पगाः। महापातकिनश्चापि ते यान्ति परमां गतिम्
brahmaghnāśca kṛtaghnāśca ye cānye gurutalpagāḥ| mahāpātakinaścāpi te yāṁti paramāṁ gatim
ब्रह्महत्यारे, कृतघ्न और गुरु-पत्नी-गामी, तथा अन्य महापातकी भी वहाँ परम गति को प्राप्त करते हैं।
श्लोक 62 (skanda.7.9.62)
मातृहंता नरो यस्तु पितृहंता तथैव च। ते सर्वे मुक्तिमायांति किं पुनः शुभकारिणः
mātṛhaṁtā naro yastu pitṛhaṁtā tathaiva ca| te sarve muktimāyāṁti kiṁ punaḥ śubhakāriṇaḥ
जो मनुष्य माता का हत्यारा है और जो पिता का हत्यारा है, वे सभी भी मुक्ति को प्राप्त करते हैं, फिर शुभकर्मियों की तो बात ही क्या?
श्लोक 63 (skanda.7.9.63)
इति ज्ञात्वा महादेवि दैत्यानामंतको हरिः। प्रभासक्षेत्रमासाद्य त्यक्तवान्स्वं कलेवरम्
iti jñātvā mahādevi daityānāmaṁtako hariḥ| prabhāsakṣetramāsādya tyaktavānsvaṁ kalevaram
हे महादेवी! यह जानकर ही दैत्यों का अन्त करने वाले हरि ने प्रभास क्षेत्र को प्राप्त कर अपना शरीर त्यागा।