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प्रभास खण्ड · अध्याय 10

प्रभासक्षेत्रस्य सर्वक्षेत्रोत्तमत्ववर्णनम्

अध्याय 9अध्याय-सूचीअध्याय 11

श्लोक 1 (skanda.7.10.1)

ईश्वर उवाच। अन्यच्च कथयिष्यामि रहस्यं तव भामिनि। यत्र कस्य चिदाख्यातं तत्ते वच्मि वरानने

īśvara uvāca| anyacca kathayiṣyāmi rahasyaṁ tava bhāmini| yatra kasya cidākhyātaṁ tatte vacmi varānane

ईश्वर ने कहा—हे भामिनी! अब मैं तुम्हें एक और रहस्य बताऊँगा। जो किसी को भी नहीं बताया गया, वह मैं तुम्हें कहता हूँ, हे वरानने!

श्लोक 2 (skanda.7.10.2)

पृथ्वीभागे स्थितो ब्रह्मा अपां भागे जनार्द्दनः। तेजोभागस्थितो रुद्रो वायुभागे तथेश्वरः

pṛthvībhāge sthito brahmā apāṁ bhāge janārddanaḥ| tejobhāgasthito rudro vāyubhāge tatheśvaraḥ

पृथ्वी-भाग में ब्रह्मा स्थित हैं, जल-भाग में जनार्दन, तेज-भाग में रुद्र और वायु-भाग में ईश्वर स्थित हैं।

श्लोक 3 (skanda.7.10.3)

आकाशभागसंस्थाने स्थितः साक्षात्सदाशिवः

ākāśabhāgasaṁsthāne sthitaḥ sākṣātsadāśivaḥ

आकाश-भाग के स्थान में साक्षात् सदाशिव स्थित हैं।

श्लोक 4 (skanda.7.10.4)

यस्ययस्यैव यो भागस्तस्मिंस्तीर्थानि यानि वै। तस्यतस्य न संदेहः स स एवेश्वरः स्मृतः

yasyayasyaiva yo bhāgastasmiṁstīrthāni yāni vai| tasyatasya na saṁdehaḥ sa sa eveśvaraḥ smṛtaḥ

जिस-जिस तत्त्व का जो भाग है, उसमें जो भी तीर्थ हैं, उन-उनमें निःसन्देह वही-वही ईश्वर स्मरण किया जाता है।

श्लोक 5 (skanda.7.10.5)

छागलंडं दुगण्डं च माकोटं मण्डलेश्वरम्। कालिंजरं वनं चैव शंकुकर्णं स्थलेश्वरम्

chāgalaṁḍaṁ dugaṇḍaṁ ca mākoṭaṁ maṇḍaleśvaram| kāliṁjaraṁ vanaṁ caiva śaṁkukarṇaṁ sthaleśvaram

छागलण्ड, दुगण्ड, माकोट और मण्डलेश्वर, तथा कालिंजरवन और शंकुकर्ण स्थलेश्वर।

श्लोक 6 (skanda.7.10.6)

शूलेश्वरं च विख्यातं पृथ्वीतत्त्वे च संस्थितम्। हरिश्चन्द्रं च श्रीशैलं जल्पेशोन्नांतिकेश्वरम्

śūleśvaraṁ ca vikhyātaṁ pṛthvītattve ca saṁsthitam| hariścandraṁ ca śrīśailaṁ jalpeśonnāṁtikeśvaram

और विख्यात शूलेश्वर - ये पृथ्वी-तत्त्व में स्थित हैं। हरिश्चन्द्र, श्रीशैल, जल्पेश और उन्नांतिकेश्वर।

श्लोक 7 (skanda.7.10.7)

महाकालं मध्यमं च केदारं भैरवं तथा। पवित्राष्टकमेतद्धि जलसंस्थं वरानने

mahākālaṁ madhyamaṁ ca kedāraṁ bhairavaṁ tathā| pavitrāṣṭakametaddhi jalasaṁsthaṁ varānane

महाकाल, मध्यम, केदार और भैरव - हे वरानने! यह पवित्र अष्टक जल-तत्त्व में स्थित है।

श्लोक 8 (skanda.7.10.8)

अमरेशं प्रभासं च नैमिषं पुष्करं तथा। आषाढिं चैव दण्डिं च भारभूतिं च लांगलम्

amareśaṁ prabhāsaṁ ca naimiṣaṁ puṣkaraṁ tathā| āṣāḍhiṁ caiva daṇḍiṁ ca bhārabhūtiṁ ca lāṁgalam

अमरेश, प्रभास, नैमिष, पुष्कर, आषाढ़ि, दण्डि, भारभूति और लांगल।

श्लोक 9 (skanda.7.10.9)

आदि गुह्याष्टकं ह्येतत्तेजस्तत्त्वे प्रतिष्ठितम्। गया चैव कुरुक्षेत्रं तीर्थं कनखलं तथा

ādi guhyāṣṭakaṁ hyetattejastattve pratiṣṭhitam| gayā caiva kurukṣetraṁ tīrthaṁ kanakhalaṁ tathā

यह प्रथम गुह्य-अष्टक तेज-तत्त्व में प्रतिष्ठित है। गया, कुरुक्षेत्र और कनखल तीर्थ।

श्लोक 10 (skanda.7.10.10)

विमलं चाट्टहासं च माहेन्द्रं भीमसंज्ञकम्। गुह्याद्गुह्यतरं ह्येतत्प्रोक्तं वाय्वष्टकं तव

vimalaṁ cāṭṭahāsaṁ ca māhendraṁ bhīmasaṁjñakam| guhyādguhyataraṁ hyetatproktaṁ vāyvaṣṭakaṁ tava

विमल, अट्टहास, माहेन्द्र और भीम नाम वाला - यह गुह्य से भी अधिक गुह्य वायु-अष्टक तुम्हें कहा गया।

श्लोक 11 (skanda.7.10.11)

वस्त्रापथं रुद्रकोटिर्ज्येष्ठेश्वरं महालयम्। गोकर्णं रुद्रकर्णं च वर्णाख्यं स्थापसंज्ञकम्

vastrāpathaṁ rudrakoṭirjyeṣṭheśvaraṁ mahālayam| gokarṇaṁ rudrakarṇaṁ ca varṇākhyaṁ sthāpasaṁjñakam

वस्त्रापथ, रुद्रकोटि, ज्येष्ठेश्वर, महालय, गोकर्ण, रुद्रकर्ण, वर्णाख्य और स्थापसंज्ञक।

श्लोक 12 (skanda.7.10.12)

पवित्राष्टकमेतद्धि आकाशस्थं वरानने। एतानि तत्त्वतीर्थानि सर्वाणि कथितानि वै

pavitrāṣṭakametaddhi ākāśasthaṁ varānane| etāni tattvatīrthāni sarvāṇi kathitāni vai

यह पवित्र अष्टक आकाश-तत्त्व में स्थित है, हे वरानने! ये सभी तत्त्व-तीर्थ तुम्हें बताये गये हैं।

श्लोक 13 (skanda.7.10.13)

यो यस्मिन्देवता तत्त्वे सा तन्माहात्म्यसूचिका। औदकं च महातत्त्वं विष्णोश्चातिप्रियं प्रिये

yo yasmindevatā tattve sā tanmāhātmyasūcikā| audakaṁ ca mahātattvaṁ viṣṇoścātipriyaṁ priye

जो देवता जिस तत्त्व में स्थित है, वह उसी के माहात्म्य का सूचक है। हे प्रिये! जल-महातत्त्व विष्णु को अत्यन्त प्रिय है।

श्लोक 14 (skanda.7.10.14)

जलशायी स्मृतस्तेन नारायण इति श्रुतिः। आप्यतत्त्वं तु तीर्थानि यानि प्रोक्तानि ते मया

jalaśāyī smṛtastena nārāyaṇa iti śrutiḥ| āpyatattvaṁ tu tīrthāni yāni proktāni te mayā

इसी से वे जलशायी नारायण नाम से श्रुतियों में कहे गये हैं। जल-तत्त्व में जो भी तीर्थ हैं, वे मैंने तुम्हें बताये।

श्लोक 15 (skanda.7.10.15)

तानि प्रियाणि देवेशि ध्रुवं नारायणस्य वै। औदकं चैव यत्तत्त्वं तस्मिन्प्राभासिकं स्मृतम्

tāni priyāṇi deveśi dhruvaṁ nārāyaṇasya vai| audakaṁ caiva yattattvaṁ tasminprābhāsikaṁ smṛtam

हे देवेशि! वे निश्चय ही नारायण को प्रिय हैं। जो जल-तत्त्व है, उसी में प्राभासिक क्षेत्र स्मरण किया गया है।

श्लोक 16 (skanda.7.10.16)

तत्र देवो लयं याति हरिर्जन्मनिजन्मनि। स वासुदेवः सूक्ष्मात्मा परात्परतरे स्थितः

tatra devo layaṁ yāti harirjanmanijanmani| sa vāsudevaḥ sūkṣmātmā parātparatare sthitaḥ

वहीं देव हरि जन्म-जन्म में लय को प्राप्त होते हैं। वे वासुदेव सूक्ष्म-आत्मा, परम से भी परे स्थित हैं।

श्लोक 17 (skanda.7.10.17)

स शिवः परमं व्योम अनादिनिधनो विभुः। तस्मात्परतरं नास्ति सर्वशास्त्रागमेषु च

sa śivaḥ paramaṁ vyoma anādinidhano vibhuḥ| tasmātparataraṁ nāsti sarvaśāstrāgameṣu ca

वे शिव, परम व्योम, अनादि-अनन्त, सर्वव्यापी हैं। समस्त शास्त्रों और आगमों में उनसे परे कुछ भी नहीं है।

श्लोक 18 (skanda.7.10.18)

सिद्धांतागमवेदांतदर्शनेषु विशेषतः। तेषु चैव न भिन्नस्तु मया सार्द्धं यशस्विनि

siddhāṁtāgamavedāṁtadarśaneṣu viśeṣataḥ| teṣu caiva na bhinnastu mayā sārddhaṁ yaśasvini

विशेष रूप से सिद्धान्त-आगम और वेदान्त-दर्शन में भी, हे यशस्विनी! वे मुझसे अभिन्न ही हैं।

श्लोक 19 (skanda.7.10.19)

तस्मिन्स्थाने हरिः साक्षात्प्रत्यक्षेण तु संस्थितः। लिंगैश्चतुर्भिः संयुक्तो ज्ञायते न च केनचित्

tasminsthāne hariḥ sākṣātpratyakṣeṇa tu saṁsthitaḥ| liṁgaiścaturbhiḥ saṁyukto jñāyate na ca kenacit

उस स्थान में हरि साक्षात् प्रत्यक्ष रूप में स्थित हैं, चार लिंगों से युक्त होकर, किन्तु उन्हें कोई नहीं जानता।

श्लोक 20 (skanda.7.10.20)

मोक्षार्थं नैष्ठिकैर्वर्णैर्व्रतैश्चैव तु यत्फलम्। तत्फलं समवाप्नोति भल्लुकातीर्थदर्शनात्

mokṣārthaṁ naiṣṭhikairvarṇairvrataiścaiva tu yatphalam| tatphalaṁ samavāpnoti bhallukātīrthadarśanāt

मोक्ष के लिए निष्ठावान वर्णों द्वारा व्रतों से जो फल प्राप्त होता है, वह फल भल्लुका तीर्थ के दर्शन मात्र से प्राप्त हो जाता है।

श्लोक 21 (skanda.7.10.21)

गोचर्ममात्रं तत्स्थानं समंतात्परिमण्डलम्। न हि कश्चिद्विजानाति विना शास्त्रेण भामिनि

gocarmamātraṁ tatsthānaṁ samaṁtātparimaṇḍalam| na hi kaścidvijānāti vinā śāstreṇa bhāmini

वह स्थान चारों ओर से मात्र एक गोचर्म परिमाण का मण्डलाकार है। हे भामिनी! शास्त्र के बिना कोई इसे नहीं जान पाता।

श्लोक 22 (skanda.7.10.22)

विषुवं वहते तत्र नृणामद्यापि पार्वति। पंचलिंगानि तत्रैव पंचवक्त्राणि कानि चित्

viṣuvaṁ vahate tatra nṛṇāmadyāpi pārvati| paṁcaliṁgāni tatraiva paṁcavaktrāṇi kāni cit

हे पार्वती! वहाँ आज भी मनुष्यों के लिए विषुव बहती है। वहीं कुछ पाँच लिंग हैं, जो पंचमुखी हैं।

श्लोक 23 (skanda.7.10.23)

कुक्कुटांडकमानानि महास्थूलानि कानिचित्। सर्पेण वेष्टितान्येव चिह्नितानि त्रिशूलिभिः

kukkuṭāṁḍakamānāni mahāsthūlāni kānicit| sarpeṇa veṣṭitānyeva cihnitāni triśūlibhiḥ

कुछ कुक्कुट-अंडे के परिमाण के हैं, कुछ अत्यन्त स्थूल हैं, सर्प से वेष्टित और त्रिशूल से चिह्नित हैं।

श्लोक 24 (skanda.7.10.24)

तेषां दर्शनमात्रेण कोटिलिंगार्चनफलम्। तस्मादिदं महाक्षेत्रं ब्रह्माद्यैः सेव्यते सदा

teṣāṁ darśanamātreṇa koṭiliṁgārcanaphalam| tasmādidaṁ mahākṣetraṁ brahmādyaiḥ sevyate sadā

उनके दर्शन मात्र से ही करोड़ों लिंगों की पूजा का फल प्राप्त होता है। इसी से यह महाक्षेत्र सदा ब्रह्मा आदि देवताओं द्वारा सेवित होता है।

श्लोक 25 (skanda.7.10.25)

श्रुतिमद्भिश्च विप्रेंद्रैः संसिद्धैश्च तपस्विभिः। प्रतिमासं तथाष्टम्यां प्रतिमासं चतुर्दशीम्

śrutimadbhiśca viprendraiḥ saṁsiddhaiśca tapasvibhiḥ| pratimāsaṁ tathāṣṭamyāṁ pratimāsaṁ caturdaśīm

वेदज्ञ श्रेष्ठ ब्राह्मणों द्वारा और सिद्ध तपस्वियों द्वारा प्रतिमास अष्टमी को और प्रतिमास चतुर्दशी को।

श्लोक 26 (skanda.7.10.26)

शशिभानूपरागे वा कार्त्तिक्यां तु विशेषतः। प्रभासस्थानि लिंगानि प्रपूज्यन्ते वरानने

śaśibhānūparāge vā kārttikyāṁ tu viśeṣataḥ| prabhāsasthāni liṁgāni prapūjyaṁte varānane

या चन्द्र-सूर्य ग्रहण के समय, और विशेष रूप से कार्तिकी पूर्णिमा को, हे वरानने! प्रभास में स्थित लिंगों की पूजा की जाती है।

श्लोक 27 (skanda.7.10.27)

संनिहत्यां कुरुक्षेत्रे सर्वस्तीर्थायुतैः सह। पुष्करं नैमिषं चैवं प्रयागं संपृथूदकम्

saṁnihatyāṁ kurukṣetre sarvastīrthāyutaiḥ saha| puṣkaraṁ naimiṣaṁ caivaṁ prayāgaṁ saṁpṛthūdakam

कुरुक्षेत्र में संनिहत्य तीर्थ पर, समस्त तीर्थों सहित, पुष्कर, नैमिष, प्रयाग और पृथूदक भी।

श्लोक 28 (skanda.7.10.28)

षष्टि तीर्थसहस्राणि षष्टिकोटिशतानि च। माघ्यांमाघ्यां समेष्यंति सरस्वत्यब्धिसंगमे

ṣaṣṭi tīrthasahasrāṇi ṣaṣṭikoṭiśatāni ca| māghyāṁmāghyāṁ sameṣyaṁti sarasvatyabdhisaṁgame

साठ हज़ार तीर्थ और साठ सौ करोड़ तीर्थ, प्रत्येक माघ मास में सरस्वती और समुद्र के संगम पर एकत्र होते हैं।

श्लोक 29 (skanda.7.10.29)

स्मरणात्तस्य तीर्थस्य नामसंकीर्तनादपि। मृत्युकालभवाद्वापि पापं त्यक्ष्यति सुव्रते

smaraṇāttasya tīrthasya nāmasaṁkīrtanādapi| mṛtyukālabhavādvāpi pāpaṁ tyakṣyati suvrate

उस तीर्थ के स्मरण मात्र से या नाम-संकीर्तन से भी, हे सुव्रते! मृत्युकाल में हुआ पाप भी नष्ट हो जाता है।

श्लोक 30 (skanda.7.10.30)

आनर्त्तसारं सौम्यं च तथा भुवनभूषणम्। दिव्यं पांचनदं पुण्यमादिगुह्यं महोदयम्

ānarttasāraṁ saumyaṁ ca tathā bhuvanabhūṣaṇam| divyaṁ pāṁcanadaṁ puṇyamādiguhyaṁ mahodayam

आनर्तसार, सौम्य, भुवनभूषण, दिव्य पांचनद, पुण्य आदिगुह्य और महोदय।

श्लोक 31 (skanda.7.10.31)

सिद्ध रत्नाकरं नाम समुद्रावरणं तथा। धर्माकारं कलाधारं शिवगर्भगृहं तथा

siddha ratnākaraṁ nāma samudrāvaraṇaṁ tathā| dharmākāraṁ kalādhāraṁ śivagarbhagṛhaṁ tathā

सिद्धरत्नाकर नाम, समुद्रावरण, धर्माकार, कलाधार और शिवगर्भगृह।

श्लोक 32 (skanda.7.10.32)

सर्वदेवनिवेशं च सर्वपातकनाशनम्। अस्य क्षेत्रस्य नामानि कल्पे कल्पे पृथक्प्रिये

sarvadevaniveśaṁ ca sarvapātakanāśanam| asya kṣetrasya nāmāni kalpe kalpe pṛthakpriye

सर्वदेवनिवेश और सर्वपातकनाशन - इस क्षेत्र के ये नाम प्रत्येक कल्प में, हे प्रिये! भिन्न-भिन्न हैं।

श्लोक 33 (skanda.7.10.33)

आयामादीनि जानीहि गुह्यानि सुरसुन्दरि। आद्ये कल्पे पुरा देवि प्रमोदनमिति स्मृतम्

āyāmādīni jānīhi guhyāni surasundari| ādye kalpe purā devi pramodanamiti smṛtam

हे देवसुन्दरि! इनके विस्तार आदि गुह्य बातें जानो। प्रथम कल्प में पूर्वकाल में यह प्रमोदन नाम से स्मरण किया गया।

श्लोक 34 (skanda.7.10.34)

नन्दनं परितस्तस्य तस्यापि परतः शिवम्। शिवात्परतरं चोग्रं भद्रिकं परतः पुनः

naṁdanaṁ paritastasya tasyāpi parataḥ śivam| śivātparataraṁ cograṁ bhadrikaṁ parataḥ punaḥ

उसके पश्चात् नन्दन, उसके भी आगे शिव, शिव से भी आगे उग्र, और उसके आगे फिर भद्रिक नाम था।

श्लोक 35 (skanda.7.10.35)

समिंधनं परं तस्मात्कामदं च ततः परम्। सिद्धिदं चापि धर्मज्ञं वैश्वरूपं च मुक्तिदम्

samiṁdhanaṁ paraṁ tasmātkāmadaṁ ca tataḥ param| siddhidaṁ cāpi dharmajñaṁ vaiśvarūpaṁ ca muktidam

उसके बाद समिन्धन, फिर कामद, फिर सिद्धिद, धर्मज्ञ, वैश्वरूप और मुक्तिद नाम था।

श्लोक 36 (skanda.7.10.36)

तथा श्रीपद्मनाभं तु श्रीवत्सं तु महाप्रभम्। तथा च पापसंहारं सर्वकामप्रदं तथा

tathā śrīpadmanābhaṁ tu śrīvatsaṁ tu mahāprabham| tathā ca pāpasaṁhāraṁ sarvakāmapradaṁ tathā

और श्रीपद्मनाभ, महाप्रभावशाली श्रीवत्स, तथा पापसंहार और सर्वकामप्रद नाम भी था।

श्लोक 37 (skanda.7.10.37)

मोक्षमार्गं वरा रोहे तथा देवि सुदर्शनम्। धर्मगर्भं तु धर्माणां प्रभासं पापनाशनम्। अतः परं भवन्तीह उत्पलावर्त्तिकानि च

mokṣamārgaṁ varā rohe tathā devi sudarśanam| dharmagarbhaṁ tu dharmāṇāṁ prabhāsaṁ pāpanāśanam| ataḥ paraṁ bhavaṁtīha utpalāvarttikāni ca

मोक्षमार्ग, हे वरारोहे! तथा सुदर्शन, धर्मगर्भ, पापनाशन प्रभास - इसके आगे यहाँ उत्पलावर्तिक नाम भी होते हैं।

श्लोक 38 (skanda.7.10.38)

क्षेत्रस्य मध्ये यद्देवि मम गर्भगृहं स्मृतम्। तस्य नामानि ते देवि कथितान्यनुपूर्वशः

kṣetrasya madhye yaddevi mama garbhagṛhaṁ smṛtam| tasya nāmāni te devi kathitānyanupūrvaśaḥ

हे देवी! क्षेत्र के मध्य में जो मेरा गर्भगृह स्मरण किया जाता है, हे देवी! उसके नाम मैंने तुम्हें क्रमशः बताये हैं।

श्लोक 39 (skanda.7.10.39)

श्रुत्वा नामान्यशेषाणि क्षेत्रमाहात्म्यमेव च। तेषां तु वांछिता सिद्धिर्भविष्यति न संशयः

śrutvā nāmānyaśeṣāṇi kṣetramāhātmyameva ca| teṣāṁ tu vāṁchitā siddhirbhaviṣyati na saṁśayaḥ

इन सभी नामों और क्षेत्र के माहात्म्य को सुनकर, निःसन्देह उनकी वांछित सिद्धि प्राप्त होगी।

श्लोक 40 (skanda.7.10.40)

एतत्कीर्त्तयमानस्य त्रिकालं तु महोदयम्। संध्याकालांतरं पापमहोरात्रं विनश्यति

etatkīrttayamānasya trikālaṁ tu mahodayam| saṁdhyākālāṁtaraṁ pāpamahorātraṁ vinaśyati

इस महोदय नाम का तीनों कालों में कीर्तन करने वाले का, दो संध्याओं के बीच के काल में किया गया पाप और एक दिन-रात का पाप भी नष्ट हो जाता है।

श्लोक 41 (skanda.7.10.41)

अपि वै दांभिकाश्चैव ये वसंत्यल्पबुद्धयः। मूढा जीवनिका विप्रास्तेऽपि यांति मृता दिवम्

api vai dāṁbhikāścaiva ye vasaṁtyalpabuddhayaḥ| mūḍhā jīvanikā viprāste'pi yāṁti mṛtā divam

यहाँ तक कि जो पाखंडी और अल्पबुद्धि निवास करते हैं, जो मूढ़ और मात्र जीविकावृत्ति करने वाले ब्राह्मण हैं, वे भी मरने पर स्वर्ग को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 42 (skanda.7.10.42)

अस्य क्षेत्रस्य मध्ये तु रवियोजनमध्यतः। उपक्षेत्राणि देवेशि संत्यन्यानि सहस्रशः

asya kṣetrasya madhye tu raviyojanamadhyataḥ| upakṣetrāṇi deveśi saṁtyanyāni sahasraśaḥ

इस क्षेत्र के मध्य में, एक योजन के परिमाण में, हे देवेशि! हज़ारों अन्य उपक्षेत्र हैं।

श्लोक 43 (skanda.7.10.43)

कानिचित्पद्मरूपाणि यवाकाराणि कानिचित्। षट्कोणानि त्रिकोणानि दण्डाकाराणि कानिचित्

kānicitpadmarūpāṇi yavākārāṇi kānicit| ṣaṭkoṇāni trikoṇāni daṇḍākārāṇi kānicit

कुछ कमल के आकार के, कुछ जौ के आकार के, कुछ षट्कोण, त्रिकोण और दण्ड के आकार के हैं।

श्लोक 44 (skanda.7.10.44)

चंद्रबिंबार्द्धभेदानि चतुरस्रप्रभेदतः। ब्रह्मादिदैवतानीशे क्षेत्रमध्ये स्थितानि तु

caṁdrabiṁbārddhabhedāni caturasraprabhedataḥ| brahmādidaivatānīśe kṣetramadhye sthitāni tu

कुछ अर्धचन्द्राकार, कुछ चतुष्कोण के भेद वाले हैं, जिनमें ब्रह्मा आदि देवता ईश के क्षेत्र-मध्य में स्थित हैं।

श्लोक 45 (skanda.7.10.45)

कानिचिद्योजनार्द्धानि तदर्धार्धानि कानिचित्। निवर्त्तनप्रमाणेन दण्डमानेन कानिचित्

kānicidyojanārddhāni tadardhārdhāni kānicit| nivarttanapramāṇena daṇḍamānena kānicit

कुछ आधे योजन के, कुछ उसके भी आधे के, कुछ निवर्तन-प्रमाण के, और कुछ दण्ड-प्रमाण के हैं।

श्लोक 46 (skanda.7.10.46)

गोचर्ममानमध्यानि कानिचिद्धनुषांतरम्। यज्ञोपवीतमात्राणि प्रभासे संति कोटिशः

gocarmamānamadhyāni kānicidddhanuṣāṁtaram| yajñopavītamātrāṇi prabhāse saṁti koṭiśaḥ

कुछ गोचर्म-मान के मध्य के, कुछ धनुष के अन्तर के हैं; यज्ञोपवीत-मात्र भी प्रभास में करोड़ों की संख्या में हैं।

श्लोक 47 (skanda.7.10.47)

अंगुल्यष्टम भागोऽपि नभोस्ति कमलेक्षणे। न संति यस्मिंस्तीर्थानि दिव्यानि च नभस्तले

aṁgulyaṣṭama bhāgo'pi nabhosti kamalekṣaṇe| na saṁti yasmiṁstīrthāni divyāni ca nabhastale

हे कमललोचने! आकाश का आठवाँ अंगुल-भाग भी ऐसा नहीं है, जिसमें दिव्य तीर्थ न हों, आकाश में भी।

श्लोक 48 (skanda.7.10.48)

प्रभासक्षेत्रमासाद्य तिष्ठंति प्रलयादनु। केदारे चैव यल्लिंगं यच्च देवि महालये

prabhāsakṣetramāsādya tiṣṭhaṁti pralayādanu| kedāre caiva yalliṁgaṁ yacca devi mahālaye

प्रभास क्षेत्र में पहुँचकर वे प्रलय के बाद भी स्थित रहते हैं। जो लिंग केदार में है और जो, हे देवी! महालय में है।

श्लोक 49 (skanda.7.10.49)

मध्यमेश्वरसंस्थं च तथा पाशुपतेश्वरम्। शंकुकर्णेश्वरं चैव भद्रेश्वरमथापि च

madhyameśvarasaṁsthaṁ ca tathā pāśupateśvaram| śaṁkukarṇeśvaraṁ caiva bhadreśvaramathāpi ca

मध्यमेश्वर में स्थित, तथा पाशुपतेश्वर, शंकुकर्णेश्वर और भद्रेश्वर में भी जो लिंग हैं।

श्लोक 50 (skanda.7.10.50)

सोमेश्वरमथैकाग्रं कालेश्वरमजेश्वरम्। भैरवेश्वरमीशानं तथा कायावरोहणम्

someśvaramathaikāgraṁ kāleśvaramajeśvaram| bhairaveśvaramīśānaṁ tathā kāyāvarohaṇam

सोमेश्वर, एकाग्र, कालेश्वर, अजेश्वर, भैरवेश्वर, ईशान और कायावरोहण में जो लिंग हैं।

श्लोक 51 (skanda.7.10.51)

चापटेश्वरकं पुण्यं तथा बदरिकाश्रमम्। रुद्रकोटिर्महाकोटिस्तथा श्रीपर्वतं शुभम्

cāpaṭeśvarakaṁ puṇyaṁ tathā badarikāśramam| rudrakoṭirmahākoṭistathā śrīparvataṁ śubham

पवित्र चापटेश्वर, बदरिकाश्रम, रुद्रकोटि, महाकोटि और शुभ श्रीपर्वत में जो लिंग हैं।

श्लोक 52 (skanda.7.10.52)

कपाली चैव देवेशः करवीरं तथा पुनः। ओंकारं परमं पुण्यं वशिष्ठाश्रममेव च। यत्र कोटिः स्मृता देवि रुद्राणां कामरूपिणाम्

kapālī caiva deveśaḥ karavīraṁ tathā punaḥ| oṁkāraṁ paramaṁ puṇyaṁ vaśiṣṭhāśramameva ca| yatra koṭiḥ smṛtā devi rudrāṇāṁ kāmarūpiṇām

कपाली देवेश, करवीर, परम पुण्य ओंकार और वशिष्ठाश्रम में जो लिंग हैं, जहाँ हे देवी! कामरूपधारी रुद्रों की एक करोड़ संख्या स्मरण की जाती है।

श्लोक 53 (skanda.7.10.53)

यानि चान्यानि स्थानानि पुण्यानि मम भूतले। प्रयागं पुरतः कृत्वा प्रभासे निवसंति च

yāni cānyāni sthānāni puṇyāni mama bhūtale| prayāgaṁ purataḥ kṛtvā prabhāse nivasaṁti ca

और मेरे जो अन्य पवित्र स्थान पृथ्वी पर हैं, वे भी प्रयाग को आगे करके प्रभास में निवास करते हैं।

श्लोक 54 (skanda.7.10.54)

उत्तरे रविपुत्री तु दक्षिणे सागरं स्मृतम्। दक्षिणोत्तरमानोऽयं क्षेत्रस्यास्य प्रकीर्त्तितः

uttare raviputrī tu dakṣiṇe sāgaraṁ smṛtam| dakṣiṇottaramāno'yaṁ kṣetrasyāsya prakīrttitaḥ

उत्तर में रविपुत्री और दक्षिण में सागर स्मरण किया गया है। यही इस क्षेत्र का दक्षिण-उत्तर परिमाण कहा गया है।

श्लोक 55 (skanda.7.10.55)

रुक्मिण्याः पूर्वतश्चैव तप्ततोयाच्च पश्चिमे। पूर्वपश्चिममानोऽयं प्रभासस्य प्रकीर्त्तितः

rukmiṇyāḥ pūrvataścaiva taptatoyācca paścime| pūrvapaścimamāno'yaṁ prabhāsasya prakīrttitaḥ

पूर्व में रुक्मिणी नदी से और पश्चिम में तप्ततोया से - यही प्रभास का पूर्व-पश्चिम परिमाण कहा गया है।

श्लोक 56 (skanda.7.10.56)

एतदन्तरमासाद्य तीर्थानि सुरसुन्दरि। पातालादिकटाहांतं तानि तत्र वसंति वै

etadaṁtaramāsādya tīrthāni surasundari| pātālādikaṭāhāṁtaṁ tāni tatra vasaṁti vai

हे देवसुन्दरि! इस अन्तराल को प्राप्त कर पाताल से लेकर ब्रह्माण्ड-कटाह के अन्त तक के तीर्थ वहीं निवास करते हैं।

श्लोक 57 (skanda.7.10.57)

एवं ज्ञात्वा महादेवि सर्वदेवमयो हरिः। प्रभासक्षेत्रमासाद्य तत्याज स्वं कलेवरम्

evaṁ jñātvā mahādevi sarvadevamayo hariḥ| prabhāsakṣetramāsādya tatyāja svaṁ kalevaram

हे महादेवी! यह जानकर ही सर्वदेवमय हरि ने प्रभास क्षेत्र को प्राप्त कर अपना शरीर त्यागा।

श्लोक 58 (skanda.7.10.58)

दिव्यं ममेदं चरितं हि रौद्रं श्रोष्यंति ये पर्वसु वा सदा वा। ते चापि यास्यंति मम प्रसादात्त्रिविष्टपं पुण्यजनाधिवासम्

divyaṁ mamedaṁ caritaṁ hi raudraṁ śroṣyaṁti ye parvasu vā sadā vā| te cāpi yāsyaṁti mama prasādāttriviṣṭapaṁ puṇyajanādhivāsam

जो लोग इस दिव्य रौद्र चरित्र को पर्वों में या सदा सुनेंगे, वे भी मेरी कृपा से पुण्यजनों के निवासस्थान स्वर्ग को प्राप्त करेंगे।

श्लोक 59 (skanda.7.10.59)

इति कथितमशेषमेव चित्रं चरितमिदं तव देवि पुण्ययुक्तम्। इतरमपि तवातिवल्लभं यद्वद कथयामि महोदयं मुनीनाम्

iti kathitamaśeṣameva citraṁ caritamidaṁ tava devi puṇyayuktam| itaramapi tavātivallabhaṁ yadvada kathayāmi mahodayaṁ munīnām

इस प्रकार, हे देवी! यह सम्पूर्ण अद्भुत और पुण्ययुक्त चरित्र तुम्हें कहा गया। तुम्हें जो अत्यन्त प्रिय अन्य बात भी हो, वह कहो, मैं मुनियों के लिए वह महोदय कथा भी कहूँगा।

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