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प्रभास खण्ड · अध्याय 11

राजभट्टारकोत्पत्तिवर्णनम्

अध्याय 10अध्याय-सूचीअध्याय 12

श्लोक 1 (skanda.7.11.1)

सूत उवाच। इति प्रोक्ता तदा देवि विस्मयोत्फुल्ललोचना। रोमांचकञ्चुका सुभ्रूः पुनः पप्रच्छ भूसुराः

sūta uvāca| iti proktā tadā devi vismayotphullalocanā| romāṁcakañcukā subhrūḥ punaḥ papraccha bhūsurāḥ

सूतजी ने कहा—हे भूसुरो! इस प्रकार कहे जाने पर देवी के नेत्र आश्चर्य से खिल उठे, रोमांच से रोमांचित होकर सुन्दर भौंहों वाली देवी ने पुनः पूछा।

श्लोक 2 (skanda.7.11.2)

देव्युवाच। धन्याऽहं कृतपुण्याऽहं तपः सुचरितं मया। यदेष क्षेत्र महिमा महादेवान्मया श्रुतः

devyuvāca| dhanyā'haṁ kṛtapuṇyā'haṁ tapaḥ sucaritaṁ mayā| yadeṣa kṣetra mahimā mahādevānmayā śrutaḥ

देवी ने कहा—मैं धन्य हूँ, मैंने पुण्य किया है, मेरा तप सुसम्पन्न हुआ है, क्योंकि यह क्षेत्र-महिमा मैंने महादेव से सुनी है।

श्लोक 3 (skanda.7.11.3)

भगवन्देवदेवेश संसारार्णवतारक। पृष्टं तु यन्मया पूर्वं तत्सर्वं कथितं हर

bhagavandevadeveśa saṁsārārṇavatāraka| pṛṣṭaṁ tu yanmayā pūrvaṁ tatsarvaṁ kathitaṁ hara

हे भगवन्! हे देवाधिदेव! हे संसार-सागर से तारने वाले! हे हर! मैंने पहले जो पूछा था, वह सब आपने बता दिया।

श्लोक 4 (skanda.7.11.4)

पुनश्च देवदेवेश त्वद्वाक्यामृतरंजिता। न तृप्तिमधिगच्छामि देवदेव महेश्वर

punaśca devadeveśa tvadvākyāmṛtaraṁjitā| na tṛptimadhigacchāmi devadeva maheśvara

फिर भी, हे देवाधिदेव! आपकी वाणी के अमृत से रंजित होकर भी मुझे तृप्ति नहीं हो रही है, हे देवाधिदेव महेश्वर!

श्लोक 5 (skanda.7.11.5)

किंचित्प्रष्टुमनाश्चास्मि प्रभासक्षेत्रविस्तरम्। तन्मे कथय कामेश दयां कृत्वा जगत्प्रभो

kiṁcitpraṣṭumanāścāsmi prabhāsakṣetravistaram| tanme kathaya kāmeśa dayāṁ kṛtvā jagatprabho

मैं प्रभास क्षेत्र के विस्तार के विषय में कुछ और पूछना चाहती हूँ। हे कामेश! हे जगत्प्रभो! दया करके वह मुझे कहिये।

श्लोक 6 (skanda.7.11.6)

ईश्वर उवाच। पृथिव्या मध्यगर्भस्थं जंबूद्वीपमिति स्मृतम्। तच्च वै नवधा भिन्नं वर्षभेदेन सुन्दरि

īśvara uvāca| pṛthivyā madhyagarbhasthaṁ jaṁbūdvīpamiti smṛtam| tacca vai navadhā bhinnaṁ varṣabhedena sundari

ईश्वर ने कहा—पृथ्वी के मध्य-गर्भ में स्थित जो द्वीप है, वह जम्बूद्वीप कहलाता है। हे सुन्दरि! वह वर्ष-भेद से नौ भागों में विभक्त है।

श्लोक 7 (skanda.7.11.7)

तस्याद्यं भारतं वर्षं तच्चापि नवधा स्मृतम्। नवयोजनसाहस्रं दक्षिणोत्तरमानतः

tasyādyaṁ bhārataṁ varṣaṁ taccāpi navadhā smṛtam| navayojanasāhasraṁ dakṣiṇottaramānataḥ

उसका प्रथम भाग भारतवर्ष है, जो स्वयं भी नौ भागों में विभक्त माना गया है। यह दक्षिण-उत्तर में नौ हज़ार योजन के परिमाण का है।

श्लोक 8 (skanda.7.11.8)

अशीतिश्च सहस्राणि पूर्वपश्चायतं स्मृतम्। उत्तरे हिमवानस्ति क्षीरोदो दक्षिणे स्मृतः

aśītiśca sahasrāṇi pūrvapaścāyataṁ smṛtam| uttare himavānasti kṣīrodo dakṣiṇe smṛtaḥ

पूर्व-पश्चिम में यह अस्सी हज़ार योजन विस्तृत माना गया है। उत्तर में हिमवान है और दक्षिण में क्षीरसागर माना गया है।

श्लोक 9 (skanda.7.11.9)

एतस्मिन्नंतरे देवि भारतं क्षेत्रमुत्तमम्। कृतं त्रेता द्वापरं च तिष्यं युगचतुष्टयम्

etasminnaṁtare devi bhārataṁ kṣetramuttamam| kṛtaṁ tretā dvāparaṁ ca tiṣyaṁ yugacatuṣṭayam

इसी अन्तराल में, हे देवी! भारत नामक उत्तम क्षेत्र है, जहाँ कृत, त्रेता, द्वापर और तिष्य (कलि) - ये चार युग होते हैं।

श्लोक 10 (skanda.7.11.10)

अत्रैवैषा युगावस्था चतुर्वर्णश्च वै जनः। चत्वारि त्रीणि च द्वे च तथैवैक शरच्छतम्

atraivaiṣā yugāvasthā caturvarṇaśca vai janaḥ| catvāri trīṇi ca dve ca tathaivaika śaracchatam

यहीं यह युगावस्था और चारों वर्णों के लोग हैं। चार सौ, तीन सौ, दो सौ और एक सौ वर्ष क्रमशः।

श्लोक 11 (skanda.7.11.11)

जीवन्त्यत्र नरा देवि कृतत्रेतादिषु क्रमात्। यदेतत्पार्थिवं पद्मं चतुष्पत्रं मयोदितम्

jīvantyatra narā devi kṛtatretādiṣu kramāt| yadetatpārthivaṁ padmaṁ catuṣpatraṁ mayoditam

यहाँ के मनुष्य क्रमशः कृत, त्रेता आदि युगों में उतने-उतने वर्ष जीते हैं। यह जो पार्थिव कमल है, वह मैंने चार पंखुड़ियों वाला बताया है।

श्लोक 12 (skanda.7.11.12)

वर्षाणि भारताद्यानि पत्राण्यस्य चतुर्द्दिशम्। भारतं केतुमालं च कुरु भद्राश्वमेव च

varṣāṇi bhāratādyāni patrāṇyasya caturddiśam| bhārataṁ ketumālaṁ ca kuru bhadrāśvameva ca

भारत आदि वर्ष इसकी चारों दिशाओं में पंखुड़ियाँ हैं - भारत, केतुमाल, कुरु और भद्राश्व।

श्लोक 13 (skanda.7.11.13)

भारतं नाम यद्वर्षं दाक्षिणात्यं मयोदितम्। दक्षिणापरतो यस्य पूर्वेण च महोदधिः। हिमवानुत्तरेणास्य कार्मुकस्य यथा गुणः

bhārataṁ nāma yadvarṣaṁ dākṣiṇātyaṁ mayoditam| dakṣiṇāparato yasya pūrveṇa ca mahodadhiḥ| himavānuttareṇāsya kārmukasya yathā guṇaḥ

भारत नामक जो वर्ष है, वह दक्षिणी भाग में स्थित है, जिसके दक्षिण-पश्चिम और पूर्व में महासागर है, तथा उत्तर में हिमवान है, जैसे धनुष की डोरी हो।

श्लोक 14 (skanda.7.11.14)

तदेतद्भारतं वर्षं सर्वबीजं वरानने। तत्कर्मभूमिर्नान्यत्र संप्राप्तिः पुण्यपापयोः

tadetadbhārataṁ varṣaṁ sarvabījaṁ varānane| tatkarmabhūmirnānyatra saṁprāptiḥ puṇyapāpayoḥ

यही भारतवर्ष सब बीजों वाला है, हे वरानने! यही कर्मभूमि है; पुण्य और पाप की प्राप्ति अन्यत्र नहीं होती।

श्लोक 15 (skanda.7.11.15)

देवानामपि देवेशि सदैवैष मनोरथः। अपि मानुष्यमाप्स्यामो भारते प्रत्युत क्षितौ

devānāmapi deveśi sadaivaiṣa manorathaḥ| api mānuṣyamāpsyāmo bhārate pratyuta kṣitau

हे देवेशि! देवताओं की भी सदा यही अभिलाषा रहती है कि हम भारत की भूमि पर मनुष्य-जन्म प्राप्त करें।

श्लोक 16 (skanda.7.11.16)

भद्राश्वेऽश्वशिरा विष्णुर्भारते कूर्मसंस्थितः। वराहः केतुमाले च मत्स्यरूपस्तथोत्तरे

bhadrāśve'śvaśirā viṣṇurbhārate kūrmasaṁsthitaḥ| varāhaḥ ketumāle ca matsyarūpastathottare

भद्राश्व में विष्णु अश्वशिर रूप में, भारत में कूर्म रूप में, केतुमाल में वराह रूप में और उत्तर में मत्स्य रूप में स्थित हैं।

श्लोक 17 (skanda.7.11.17)

तेषु नक्षत्रविन्यासाद्विषयाः समवस्थिताः। चतुर्ष्वपि महादेवि विग्रहो नव पादकः

teṣu nakṣatravinyāsādviṣayāḥ samavasthitāḥ| caturṣvapi mahādevi vigraho nava pādakaḥ

उनमें नक्षत्रों की स्थापना के अनुसार प्रदेश स्थित हैं। हे महादेवी! इन चारों में ही शरीर नौ भागों में विभक्त है।

श्लोक 18 (skanda.7.11.18)

भारतो यो महादेवि कूर्मरूपेण संस्थितः। नक्षत्रग्रहविन्यासं तस्य ते कथयाम्यहम्

bhārato yo mahādevi kūrmarūpeṇa saṁsthitaḥ| nakṣatragrahavinyāsaṁ tasya te kathayāmyaham

हे महादेवी! जो भारत कूर्म रूप में स्थित है, उसके नक्षत्रों और ग्रहों की व्यवस्था मैं तुम्हें बताता हूँ।

श्लोक 19 (skanda.7.11.19)

प्राङ्मुखो भगवान्देवो कूर्मरूपी व्यवस्थितः। आक्रम्य भारतं वर्षं नवभेदमिदं प्रिये

prāṅmukho bhagavāndevo kūrmarūpī vyavasthitaḥ| ākramya bhārataṁ varṣaṁ navabhedamidaṁ priye

पूर्वाभिमुख भगवान देव कूर्म रूप में भारतवर्ष को व्याप्त करके स्थित हैं, हे प्रिये! यह नौ भागों में विभक्त है।

श्लोक 20 (skanda.7.11.20)

नवधा संस्थितस्यास्य नक्षत्राणि निबोध मे। कृत्तिका रोहिणी सौम्यं तृतीयं कूर्मपृष्ठिगम्

navadhā saṁsthitasyāsya nakṣatrāṇi nibodha me| kṛttikā rohiṇī saumyaṁ tṛtīyaṁ kūrmapṛṣṭhigam

इस नौ भागों में स्थित के नक्षत्रों को मुझसे सुनो। कृत्तिका, रोहिणी और तीसरा सौम्य - ये कूर्म की पीठ पर स्थित हैं।

श्लोक 21 (skanda.7.11.21)

रौद्रं पुनर्वसुः पुष्यं नक्षत्रत्रितयं मुखे। आश्लेषाख्यं तथा पैत्रं फाल्गुनी प्रथमा प्रिये

raudraṁ punarvasuḥ puṣyaṁ nakṣatratritayaṁ mukhe| āśleṣākhyaṁ tathā paitraṁ phālgunī prathamā priye

रौद्र, पुनर्वसु और पुष्य - यह त्रय मुख में है। आश्लेषा नामक तथा पैत्र और प्रथम फाल्गुनी, हे प्रिये!

श्लोक 22 (skanda.7.11.22)

नक्षत्रत्रितयं पादमाश्रितं पूर्वदक्षिणम्। फाल्गुनी चोत्तरा हस्तं चित्रा चर्क्षत्रयं स्मृतम्

nakṣatratritayaṁ pādamāśritaṁ pūrvadakṣiṇam| phālgunī cottarā hastaṁ citrā carkṣatrayaṁ smṛtam

यह त्रय दक्षिण-पूर्व पाद के आश्रित है। उत्तरा फाल्गुनी, हस्त और चित्रा - यह त्रय स्मरण किया गया है।

श्लोक 23 (skanda.7.11.23)

कूर्मस्य दक्षिणे कुक्षौ चर्क्षपादं तथाऽपरम्। स्वाती विशाखा मैत्रं च नैर्ऋते त्रितयं स्मृतम्

kūrmasya dakṣiṇe kukṣau carkṣapādaṁ tathā'param| svātī viśākhā maitraṁ ca nairṛte tritayaṁ smṛtam

यह कूर्म के दक्षिण उदर में एक और नक्षत्र-पाद है। स्वाती, विशाखा और मैत्र - यह त्रय नैर्ऋत्य में स्मरण किया गया है।

श्लोक 24 (skanda.7.11.24)

ऐंद्रं मूलं तथाषाढा पृष्ठे तु त्रितयं स्मृतम्। आषाढा श्रवणं चैव धनिष्ठा चात्र शब्दिता

aiṁdraṁ mūlaṁ tathāṣāḍhā pṛṣṭhe tu tritayaṁ smṛtam| āṣāḍhā śravaṇaṁ caiva dhaniṣṭhā cātra śabditā

ऐन्द्र, मूल और आषाढ़ा - यह त्रय पीठ में स्मरण किया गया है। आषाढ़ा, श्रवण और धनिष्ठा भी यहाँ कही गयी है।

श्लोक 25 (skanda.7.11.25)

नक्षत्रित्रयं पादे वायव्ये तु यशस्विनि। वारुणं चैव नक्षत्रं तथा प्रोष्ठपदाद्वयम्

nakṣatritrayaṁ pāde vāyavye tu yaśasvini| vāruṇaṁ caiva nakṣatraṁ tathā proṣṭhapadādvayam

यह नक्षत्र-त्रय वायव्य पाद में है, हे यशस्विनी! वारुण नक्षत्र तथा दोनों प्रोष्ठपद।

श्लोक 26 (skanda.7.11.26)

कूर्मस्य वामकुक्षौ तु त्रितयं संस्थितं प्रिये। रेवती चाश्विदैवत्यं याम्यं चर्क्षमिति त्रयम्। ईशपादे समाख्यातं शुभाशुभफलं शृणु

kūrmasya vāmakukṣau tu tritayaṁ saṁsthitaṁ priye| revatī cāśvidaivatyaṁ yāmyaṁ carkṣamiti trayam| īśapāde samākhyātaṁ śubhāśubhaphalaṁ śṛṇu

कूर्म के बायें उदर में यह त्रय स्थित है, हे प्रिये! रेवती, अश्विनी और यम-देवता वाला - यह त्रय ईशान पाद में कहा गया है; अब शुभाशुभ फल सुनो।

श्लोक 27 (skanda.7.11.27)

यस्यर्क्षस्य पतिर्यो वै ग्रहस्तद्धैन्यतो भयम्। तद्देशस्य महादेवि तथोत्कर्षे शुभागमः

yasyarkṣasya patiryo vai grahastaddhainyato bhayam| taddeśasya mahādevi tathotkarṣe śubhāgamaḥ

जिस नक्षत्र का जो स्वामी ग्रह है, उसकी दीनता से उस देश को भय होता है, हे महादेवी! और उसके उत्कर्ष से शुभ की प्राप्ति होती है।

श्लोक 28 (skanda.7.11.28)

एष कूर्मो मयाख्यातो भारते भगवानिह। नारायणो ह्यचिंत्यात्मा यत्र सर्वं प्रतिष्ठितम्

eṣa kūrmo mayākhyāto bhārate bhagavāniha| nārāyaṇo hyaciṁtyātmā yatra sarvaṁ pratiṣṭhitam

यह कूर्म मैंने तुम्हें बताया, जो भारत में साक्षात् भगवान नारायण हैं, जिनकी आत्मा अचिन्त्य है और जिनमें सब कुछ प्रतिष्ठित है।

श्लोक 29 (skanda.7.11.29)

मेषवृषौ हृदो मध्ये मुखे च मिथुनादिकौ। प्राग्दक्षिणे तथा पादे कर्कसिंहौ व्यवस्थितौ

meṣavṛṣau hṛdo madhye mukhe ca mithunādikau| prāgdakṣiṇe tathā pāde karkasiṁhau vyavasthitau

मेष और वृष हृदय के मध्य में हैं, मिथुन आदि मुख में हैं। कर्क और सिंह पूर्व-दक्षिण पाद में स्थित हैं।

श्लोक 30 (skanda.7.11.30)

सिंहकन्यातुलाश्चैव कुक्षौ राशित्रयं स्मृतम्। धटोऽध वृश्चिकाश्चोभौ पादे दक्षिणपश्चिमे

siṁhakanyātulāścaiva kukṣau rāśitrayaṁ smṛtam| ghaṭo'dha vṛścikāścobhau pāde dakṣiṇapaścime

सिंह, कन्या और तुला - यह राशि-त्रय उदर में स्मरण किया गया है। घट के नीचे वृश्चिक - दोनों दक्षिण-पश्चिम पाद में हैं।

श्लोक 31 (skanda.7.11.31)

पुच्छे तु वृश्चिकश्चैव सधनुश्च व्यवस्थितः। वायव्ये वामपादे च धनुर्ग्राहादिकं त्रयम्

pucche tu vṛścikaścaiva sadhanuśca vyavasthitaḥ| vāyavye vāmapāde ca dhanurgrāhādikaṁ trayam

पूँछ में वृश्चिक और धनु स्थित हैं। वायव्य दिशा में बायें पाद में धनु आदि तीन राशियाँ हैं।

श्लोक 32 (skanda.7.11.32)

कुम्भ मीनौ तथा चास्य उत्तरां कुक्षिमाश्रितौ। मीनमेषौ महादेवि पादे पूर्वोत्तरे स्थितौ

kumbha mīnau tathā cāsya uttarāṁ kukṣimāśritau| mīnameṣau mahādevi pāde pūrvottare sthitau

कुम्भ और मीन उसके उत्तर उदर के आश्रित हैं। मीन और मेष, हे महादेवी! पूर्वोत्तर पाद में स्थित हैं।

श्लोक 33 (skanda.7.11.33)

कूर्म्मदेशांस्तथर्क्षाणि देशेष्वेतेषु वै प्रिये। राशयश्च तथर्क्षेषु ग्रहा राशिव्यवस्थिताः

kūrmmadeśāṁstatharkṣāṇi deśeṣveteṣu vai priye| rāśayaśca tatharkṣeṣu grahā rāśivyavasthitāḥ

कूर्म के इन देशों में ही नक्षत्र, हे प्रिये! और उन्हीं देशों में राशियाँ हैं; तथा नक्षत्रों में राशियाँ और राशियों में ग्रह स्थित हैं।

श्लोक 34 (skanda.7.11.34)

तस्माद्ग्रहर्क्षपीडासु देशपीडां विनिर्दिशेत्। तत्र स्नानं प्रकुर्वंति दानं होमादिकं तथा

tasmādgraharkṣapīḍāsu deśapīḍāṁ vinirdiśet| tatra snānaṁ prakurvaṁti dānaṁ homādikaṁ tathā

इसलिए जब ग्रह-नक्षत्रों को पीड़ा हो, तो उस देश में पीड़ा जाननी चाहिए। वहाँ स्नान, दान और हवन आदि करते हैं।

श्लोक 35 (skanda.7.11.35)

स एष वैष्णवः पादो देवि मध्ये ग्रहोऽस्य यः। नारायणाख्योऽचिंत्यात्मा कारणं जगतः प्रभुः

sa eṣa vaiṣṇavaḥ pādo devi madhye graho'sya yaḥ| nārāyaṇākhyo'ciṁtyātmā kāraṇaṁ jagataḥ prabhuḥ

यह वैष्णव पाद है, हे देवी! इसके मध्य में जो ग्रह है, वह नारायण नाम से अचिन्त्य-आत्मा, जगत का कारण और प्रभु है।

श्लोक 36 (skanda.7.11.36)

भौमशुक्रबुधेंद्वर्कबुधशुक्रमहीसुताः। गुरुमंदासुराचार्या मेषादीनामधीश्वराः

bhaumaśukrabudheṁdvarkabudhaśukramahīsutāḥ| gurumaṁdāsurācāryā meṣādīnāmadhīśvarāḥ

मंगल, शुक्र, बुध, चन्द्र, सूर्य, बुध, शुक्र, मंगल, गुरु, शनि, शुक्राचार्य - ये मेष आदि राशियों के अधीश्वर हैं।

श्लोक 37 (skanda.7.11.37)

एवंविधो महादेवि कूर्मरूपी जनार्द्दनः। तस्य नैऋतपादे तु सौराष्ट्र इति विश्रुतः

evaṁvidho mahādevi kūrmarūpī janārddanaḥ| tasya nairṛtapāde tu saurāṣṭra iti viśrutaḥ

इस प्रकार, हे महादेवी! कूर्म रूप में जनार्दन स्थित हैं। उनके नैर्ऋत्य पाद में सौराष्ट्र नाम से विख्यात प्रदेश है।

श्लोक 38 (skanda.7.11.38)

स चैवं नवधा भिन्नः पुरभेदेन सुंदरि। तस्य यो नवमो भागः सागरस्य च सन्निधौ

sa caivaṁ navadhā bhinnaḥ purabhedena suṁdari| tasya yo navamo bhāgaḥ sāgarasya ca sannidhau

हे सुन्दरि! वह भी नगरों के भेद से नौ भागों में विभक्त है। उसका जो नवम भाग समुद्र के निकट है।

श्लोक 39 (skanda.7.11.39)

प्रभास इति विख्यातो मम देवि प्रियः सदा। योजनानां दशद्वे च विस्तीर्णः परिमण्डलम्

prabhāsa iti vikhyāto mama devi priyaḥ sadā| yojanānāṁ daśadve ca vistīrṇaḥ parimaṇḍalam

वह प्रभास नाम से विख्यात है, हे देवी! जो मुझे सदा प्रिय है, और बारह योजन के गोलाकार विस्तार वाला है।

श्लोक 40 (skanda.7.11.40)

मध्येस्य पीठिका प्रोक्ता पंचयोजनविस्तृता। तन्मध्ये मद्ग्रहं देवि तिष्ठत्युदधिसंनिधौ

madhyesya pīṭhikā proktā paṁcayojanavistṛtā| tanmadhye madgrahaṁ devi tiṣṭhatyudadhisaṁnidhau

इसके मध्य में पाँच योजन विस्तृत पीठिका कही गयी है। हे देवी! उसके मध्य में मेरा घर समुद्र के निकट स्थित है।

श्लोक 41 (skanda.7.11.41)

तस्य मध्ये महादेवि लिंगरूपो वसाम्यहम्

tasya madhye mahādevi liṁgarūpo vasāmyaham

उसके मध्य में, हे महादेवी! मैं लिंग-रूप में निवास करता हूँ।

श्लोक 42 (skanda.7.11.42)

कृतस्मरात्पश्चिमतो धनुषां च शतत्रये। वसामि तत्र देवेशि त्वया सह वरानने

kṛtasmarātpaścimato dhanuṣāṁ ca śatatraye| vasāmi tatra deveśi tvayā saha varānane

कामदेव-दाह के स्थान से पश्चिम में तीन सौ धनुष की दूरी पर, हे देवेशि! हे वरानने! मैं तुम्हारे साथ वहीं निवास करता हूँ।

श्लोक 43 (skanda.7.11.43)

तन्मे स्थानं महादेवि कैलासादपि वल्लभम्। गोचर्ममात्रं तत्रापि महागोप्यं वरानने

tanme sthānaṁ mahādevi kailāsādapi vallabham| gocarmamātraṁ tatrāpi mahāgopyaṁ varānane

वह मेरा स्थान, हे महादेवी! मुझे कैलास से भी अधिक प्रिय है। वहाँ भी गोचर्म-मात्र का महागोपनीय स्थान है, हे वरानने!

श्लोक 44 (skanda.7.11.44)

अकथ्यं देवदेवेशि तव स्नेहात्प्रकाशितम्। एतत्प्राभासिकं क्षेत्रं प्रभया दीपितं मम

akathyaṁ devadeveśi tava snehātprakāśitam| etatprābhāsikaṁ kṣetraṁ prabhayā dīpitaṁ mama

यह अकथनीय है, हे देवाधिदेवेशि! तुम्हारे स्नेह के कारण ही प्रकट किया गया है। यह प्राभासिक क्षेत्र मेरी ही प्रभा से प्रकाशित है।

श्लोक 45 (skanda.7.11.45)

तेन प्रभासमित्युक्तमादिकल्पे वरानने। द्वितीये तु प्रभा लब्धा सर्वैर्देवैः सवासवैः

tena prabhāsamityuktamādikalpe varānane| dvitīye tu prabhā labdhā sarvairdevaiḥ savāsavaiḥ

इसी कारण प्रथम कल्प में इसे प्रभास कहा गया, हे वरानने! दूसरे कल्प में सब देवताओं ने इन्द्र सहित यहाँ प्रभा प्राप्त की।

श्लोक 46 (skanda.7.11.46)

मम प्रभाभा देवेशि तेन प्राभासिकं स्मृतम्। प्रभाववन्तो देवेशि यत्र संति महासुराः

mama prabhābhā deveśi tena prābhāsikaṁ smṛtam| prabhāvavanto deveśi yatra saṁti mahāsurāḥ

मेरी प्रभा की आभा से, हे देवेशि! इसे प्राभासिक स्मरण किया गया। जहाँ, हे देवेशि! महान प्रभावशाली असुर भी हैं।

श्लोक 47 (skanda.7.11.47)

अथवा तेन लोकेषु प्रभासमिति कीर्त्यते। प्रथमं भासते देवि सर्वेषां भुवि तेजसाम्। तीर्थानामादितीर्थं यत्प्रभासं तेन कीर्त्तितम्

athavā tena lokeṣu prabhāsamiti kīrtyate| prathamaṁ bhāsate devi sarveṣāṁ bhuvi tejasām| tīrthānāmāditīrthaṁ yatprabhāsaṁ tena kīrttitam

अथवा इस कारण भी संसार में इसे प्रभास कहा जाता है - हे देवी! यह पृथ्वी पर समस्त तेजों में सबसे पहले भासित होता है; यह तीर्थों में आदि तीर्थ है, इसी से प्रभास कहा गया।

श्लोक 48 (skanda.7.11.48)

प्रकृष्टं भानुरथवा भासितो विश्वकर्मणा। यत्र साक्षात्प्रभापातो जातः प्राभासिकं ततः

prakṛṣṭaṁ bhānurathavā bhāsito viśvakarmaṇā| yatra sākṣātprabhāpāto jātaḥ prābhāsikaṁ tataḥ

अथवा यहाँ विश्वकर्मा द्वारा सूर्य को अत्यधिक भासित किया गया, जहाँ साक्षात् प्रभा का पात हुआ, इसी से यह प्राभासिक कहलाया।

श्लोक 49 (skanda.7.11.49)

अथवा दक्षसंशप्तेनेन्दुना निष्प्रभेणच। तत्र देवि प्रभा लब्धा तेन प्राभासिकं स्मृतम्। प्रोद्दधे भारती देवी ह्यौर्वाग्निं वडवानलम्

athavā dakṣasaṁśaptenendunā niṣprabheṇaca| tatra devi prabhā labdhā tena prābhāsikaṁ smṛtam| proddadhe bhāratī devī hyaurvāgniṁ vaḍavānalam

अथवा दक्ष द्वारा शापित होकर निष्प्रभ हुए चन्द्रमा ने वहाँ प्रभा प्राप्त की, इसी से इसे प्राभासिक स्मरण किया गया। देवी भारती ने वहीं ऊर्वाग्नि, वडवानल को धारण किया।

श्लोक 50 (skanda.7.11.50)

अथवा तेन देवेशि प्रभासमिति कीर्त्यते। प्रकृष्टा भारती ब्राह्मी विप्रोक्ता श्रूयतेऽध्वनि। सदा यत्र महादेवि प्रभासं तेन कीर्तितम्

athavā tena deveśi prabhāsamiti kīrtyate| prakṛṣṭā bhāratī brāhmī viproktā śrūyate'dhvani| sadā yatra mahādevi prabhāsaṁ tena kīrtitam

अथवा इस कारण भी, हे देवेशि! यह प्रभास कहलाता है - यहाँ सदा उत्कृष्ट ब्राह्मी वाणी ब्राह्मणों द्वारा कही और मार्ग में सुनी जाती है, हे महादेवी! इसी से प्रभास कहा गया।

श्लोक 51 (skanda.7.11.51)

प्रोल्लसद्वीचिभिर्भाति सर्वदा सागरः प्रिये। तेन प्रभास नामेति त्रिषु लोकेषु विश्रुतम्

prollasadvīcibhirbhāti sarvadā sāgaraḥ priye| tena prabhāsa nāmeti triṣu lokeṣu viśrutam

हे प्रिये! उल्लसित तरंगों से सागर सदा यहाँ शोभित होता है, इसी से प्रभास नाम तीनों लोकों में विख्यात हुआ।

श्लोक 52 (skanda.7.11.52)

प्रत्यक्षं भास्करो यत्र सदा तिष्ठति भामिनि। तेन प्रभास नामेति प्रसिद्धिमगमत्क्षितौ

pratyakṣaṁ bhāskaro yatra sadā tiṣṭhati bhāmini| tena prabhāsa nāmeti prasiddhimagamatkṣitau

हे भामिनी! जहाँ सूर्य सदा साक्षात् विराजमान रहते हैं, इसी से प्रभास नाम पृथ्वी पर प्रसिद्धि को प्राप्त हुआ।

श्लोक 53 (skanda.7.11.53)

प्रकृष्टं भाविनां सर्वं कामं तत्र ददाम्यहम्। तेन प्रभासनामेति तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम्

prakṛṣṭaṁ bhāvināṁ sarvaṁ kāmaṁ tatra dadāmyaham| tena prabhāsanāmeti tīrthaṁ trailokyaviśrutam

वहाँ मैं भक्तिपूर्ण जनों की सम्पूर्ण उत्कृष्ट कामनाएँ पूर्ण करता हूँ, इसी से यह तीर्थ प्रभास नाम से त्रिलोक में विख्यात है।

श्लोक 54 (skanda.7.11.54)

कल्पभेदेन नामानि तथैव सुरसुन्दरि। निरुक्तभेदैर्बहुधा भिद्यंते कारणैः प्रिये। प्रभासमिति यन्नाम दातव्यं निश्चलं स्मृतम्

kalpabhedena nāmāni tathaiva surasundari| niruktabhedairbahudhā bhidyaṁte kāraṇaiḥ priye| prabhāsamiti yannāma dātavyaṁ niścalaṁ smṛtam

हे देवसुन्दरि! इसी प्रकार कल्प-भेद से नाम, हे प्रिये! अनेक निरुक्त-भेदों और कारणों से बदलते रहते हैं। किन्तु प्रभास नाम स्थिर रूप से दिया जाने वाला स्मरण किया गया है।

श्लोक 55 (skanda.7.11.55)

अप्तत्त्वे संस्थितं देवि विष्णोराद्यकलेवरे। इति ते कथितं देवि संक्षेपात्क्षेत्रकारणम्

aptattve saṁsthitaṁ devi viṣṇorādyakalevare| iti te kathitaṁ devi saṁkṣepātkṣetrakāraṇam

यह जल-तत्त्व में स्थित है, हे देवी! विष्णु के आद्य शरीर में। इस प्रकार, हे देवी! मैंने संक्षेप में तुम्हें क्षेत्र का कारण बताया।

श्लोक 56 (skanda.7.11.56)

पुनस्ते कथयाम्यद्य यत्पृच्छसि वरानने। तद्ब्रूहि शीघ्रं कल्याणि यत्ते मनसि वर्तते

punaste kathayāmyadya yatpṛcchasi varānane| tadbrūhi śīghraṁ kalyāṇi yatte manasi vartate

अब मैं तुम्हें पुनः बताऊँगा, जो कुछ तुम पूछना चाहती हो, हे वरानने! हे कल्याणी! जो तुम्हारे मन में है, वह शीघ्र कहो।

श्लोक 57 (skanda.7.11.57)

देव्युवाच। अस्मिन्कल्पे यथा जातं क्षेत्रं प्राभासिकं हर। तन्मे विस्तरतो ब्रूहि उत्पत्तिं कारणं तथा

devyuvāca| asminkalpe yathā jātaṁ kṣetraṁ prābhāsikaṁ hara| tanme vistarato brūhi utpattiṁ kāraṇaṁ tathā

देवी ने कहा—हे हर! इस कल्प में प्राभासिक क्षेत्र जैसे उत्पन्न हुआ, वह मुझे विस्तार से बताइये, तथा उसकी उत्पत्ति का कारण भी।

श्लोक 58 (skanda.7.11.58)

ईश्वर उवाच। शृणु देवि प्रवक्ष्यामि यथावत्क्षेत्रकारणम्। यच्छ्रुत्वा मानवो भक्त्या मुच्यते सर्वपातकैः

īśvara uvāca| śṛṇu devi pravakṣyāmi yathāvatkṣetrakāraṇam| yacchrutvā mānavo bhaktyā mucyate sarvapātakaiḥ

ईश्वर ने कहा—हे देवी! सुनो, मैं क्षेत्र के कारण को यथावत् बताता हूँ, जिसे भक्तिपूर्वक सुनकर मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 59 (skanda.7.11.59)

आदिक्षेत्रस्य माहात्म्यं रहस्यं पापनाशनम्। कथयिष्ये वरारोहे तव स्नेहेन भामिनि

ādikṣetrasya māhātmyaṁ rahasyaṁ pāpanāśanam| kathayiṣye varārohe tava snehena bhāmini

आदिक्षेत्र के माहात्म्य का पाप-नाशक रहस्य, हे वरारोहे! हे भामिनी! तुम्हारे स्नेह के कारण मैं बताऊँगा।

श्लोक 60 (skanda.7.11.60)

अस्मिन्कल्पे तु यद्देवि आदावेव वरानने। स्वायंभुवे मनौ तत्र ब्रह्मणः सृजतः पुरा

asminkalpe tu yaddevi ādāveva varānane| svāyaṁbhuve manau tatra brahmaṇaḥ sṛjataḥ purā

इस कल्प में, हे देवी! हे वरानने! सबसे पहले, स्वायम्भुव मनु के समय में, जब ब्रह्मा सृष्टि कर रहे थे।

श्लोक 61 (skanda.7.11.61)

दक्षिणाल्लोचनाज्जातः पूर्वं सूर्य इति प्रिये। ततः कालान्तरे तस्य भार्ये द्वे च बभूवतुः

dakṣiṇāllocanājjātaḥ pūrvaṁ sūrya iti priye| tataḥ kālāntare tasya bhārye dve ca babhūvatuḥ

उनके दक्षिण नेत्र से पहले सूर्य उत्पन्न हुए, हे प्रिये! फिर कुछ काल बाद उनकी दो पत्नियाँ हुईं।

श्लोक 62 (skanda.7.11.62)

तयोस्तु राज्ञी द्यौर्ज्ञेया निक्षुभा पृथिवी स्मृता। सौम्यमासस्य सप्तम्यां द्यौः सूर्येण च युज्यते

tayostu rājñī dyaurjñeyā nikṣubhā pṛthivī smṛtā| saumyamāsasya saptamyāṁ dyauḥ sūryeṇa ca yujyate

उनमें से रानी द्यौ जानी जाती है और निक्षुभा पृथ्वी कही गयी है। सौम्य मास की सप्तमी को द्यौ सूर्य से मिलती है।

श्लोक 63 (skanda.7.11.63)

माघमासे तु सप्तम्यां मह्या सह भवेद्रविः। भूश्चादित्यश्च भगवान्गच्छते संगमं तदा

māghamāse tu saptamyāṁ mahyā saha bhavedraviḥ| bhūścādityaśca bhagavāngacchate saṁgamaṁ tadā

माघ मास की सप्तमी को सूर्य पृथ्वी के साथ मिलते हैं। भूमि और भगवान आदित्य तभी संगम को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 64 (skanda.7.11.64)

ऋतुस्नाता मही तत्र गर्भं गृह्णाति भास्करात्। द्यौर्जलं सूयते गर्भं वर्षास्वास्विह भूतले

ṛtusnātā mahī tatra garbhaṁ gṛhṇāti bhāskarāt| dyaurjalaṁ sūyate garbhaṁ varṣāsvāsviha bhūtale

ऋतुस्नाता पृथ्वी वहाँ सूर्य से गर्भ धारण करती है। द्यौ जल के गर्भ को इस भूतल पर वर्षाओं में प्रसव करती है।

श्लोक 65 (skanda.7.11.65)

ततस्त्रैलोक्यवृत्त्यर्थं मही सस्यानि सूयते। सस्योपयोगात्संहृष्टा जुह्वत्याहुतिभिर्द्विजाः

tatastrailokyavṛttyarthaṁ mahī sasyāni sūyate| sasyopayogātsaṁhṛṣṭā juhvatyāhutibhirdvijāḥ

फिर त्रिलोक की जीविका के लिए पृथ्वी फसलें उत्पन्न करती है। फसलों के उपयोग से हर्षित होकर ब्राह्मण आहुतियों से हवन करते हैं।

श्लोक 66 (skanda.7.11.66)

स्वाहाकारस्वधाकारैर्यजंति पितृदेवताः। निःक्षुधः कुरुते यस्माद्गर्भौषधिसुधाऽमृतैः। मर्त्यान्पितॄंश्च देवांश्च तेन भूर्निक्षुभा स्मृता

svāhākārasvadhākārairyajaṁti pitṛdevatāḥ| niḥkṣudhaḥ kurute yasmādgarbhauṣadhisudhā'mṛtaiḥ| martyānpitṝṁśca devāṁśca tena bhūrnikṣubhā smṛtā

स्वाहा और स्वधा के उच्चारण से पितरों और देवताओं का यजन करते हैं। जिससे वह गर्भ-औषधि रूपी सुधा-अमृत से मनुष्यों, पितरों और देवताओं को निराहार करती है, इसी से पृथ्वी को निक्षुभा कहा गया है।

श्लोक 67 (skanda.7.11.67)

यथा राज्ञी च संजाता यस्य चेयं सुता मता

yathā rājñī ca saṁjātā yasya ceyaṁ sutā matā

जिस प्रकार वह रानी के रूप में उत्पन्न हुई, और जिसकी यह पुत्री मानी गयी है।

श्लोक 68 (skanda.7.11.68)

अपत्यानि च यान्यस्यास्तानि वक्ष्याम्यशेषतः। मरीचिर्ब्रह्मणः पुत्रो मारीचः कश्यपः स्मृतः

apatyāni ca yānyasyāstāni vakṣyāmyaśeṣataḥ| marīcirbrahmaṇaḥ putro mārīcaḥ kaśyapaḥ smṛtaḥ

उसकी जो सन्तानें हैं, उन्हें मैं सम्पूर्ण रूप से बताऊँगा। मरीचि ब्रह्मा के पुत्र हैं, मारीच कश्यप उन्हीं से स्मरण किये जाते हैं।

श्लोक 69 (skanda.7.11.69)

तस्माद्धिरण्यकशिपुः प्रह्रादस्तस्य चात्मजः। प्रह्रादस्य सुतो नाम्ना विरोचन इति स्मृतः

tasmāddhiraṇyakaśipuḥ prahrādastasya cātmajaḥ| prahrādasya suto nāmnā virocana iti smṛtaḥ

उनसे हिरण्यकशिपु और उनके पुत्र प्रह्लाद हुए। प्रह्लाद के पुत्र का नाम विरोचन स्मरण किया गया है।

श्लोक 70 (skanda.7.11.70)

विरोचनस्य भगिनी संज्ञा या जननी तु सा। हिरण्यकशिपोः पौत्री दितेः पुत्रस्य सा स्मृता

virocanasya bhaginī saṁjñā yā jananī tu sā| hiraṇyakaśipoḥ pautrī diteḥ putrasya sā smṛtā

विरोचन की बहन संज्ञा है, जो जननी हैं; वह हिरण्यकशिपु की पौत्री और दिति-पुत्र की सन्तान मानी गयी है।

श्लोक 71 (skanda.7.11.71)

सा विश्वकर्मणः पत्नी प्राह्लादी प्रोच्यते बुधैः

sā viśvakarmaṇaḥ patnī prāhlādī procyate budhaiḥ

वह विश्वकर्मा की पत्नी है, विद्वानों द्वारा वह प्राह्लादी कही जाती है।

श्लोक 72 (skanda.7.11.72)

अथ नाम्नातिरूपेति मरीचिदुहिता शुभा। पत्नी ह्यंगिरसः सा तु जननी च बृहस्पतेः

atha nāmnātirūpeti marīciduhitā śubhā| patnī hyaṁgirasaḥ sā tu jananī ca bṛhaspateḥ

फिर अतिरूपा नाम की मरीचि की शुभ पुत्री, जो अंगिरा की पत्नी और बृहस्पति की जननी है।

श्लोक 73 (skanda.7.11.73)

बृहस्पतेस्तु भगिनी विश्रुता ब्रह्मवादिनी। प्रभासस्य तु सा पत्नी वसूनामष्टमस्य वै

bṛhaspatestu bhaginī viśrutā brahmavādinī| prabhāsasya tu sā patnī vasūnāmaṣṭamasya vai

बृहस्पति की बहन ब्रह्मवादिनी के रूप में विख्यात है, वह प्रभास नामक आठवें वसु की पत्नी है।

श्लोक 74 (skanda.7.11.74)

प्रसूता विश्वकर्माणं सर्वशिल्पवतां वरम्। स चैव नाम्ना त्वष्टा तु पुनस्त्रिदशवार्द्धकिः

prasūtā viśvakarmāṇaṁ sarvaśilpavatāṁ varam| sa caiva nāmnā tvaṣṭā tu punastridaśavārddhakiḥ

उसने विश्वकर्मा को जन्म दिया, जो समस्त शिल्पियों में श्रेष्ठ हैं। वे ही त्वष्टा नाम से और देवताओं के शिल्पी के रूप में भी जाने जाते हैं।

श्लोक 75 (skanda.7.11.75)

देवाचार्यस्य तस्येयं दुहिता विश्वकर्मणः। सुरेणुरिति विख्याता त्रिषु लोकेषु भामिनी

devācāryasya tasyeyaṁ duhitā viśvakarmaṇaḥ| sureṇuriti vikhyātā triṣu lokeṣu bhāminī

उन देवाचार्य विश्वकर्मा की यह पुत्री सुरेणु नाम से तीनों लोकों में विख्यात, तेजस्विनी है।

श्लोक 76 (skanda.7.11.76)

प्रह्रादपुत्री या प्रोक्ता भार्या वष्टुस्तु सा स्मृता। तस्यां स जनयामास पुत्रीस्ता लोकमातरः

prahrādaputrī yā proktā bhāryā vaṣṭustu sā smṛtā| tasyāṁ sa janayāmāsa putrīstā lokamātaraḥ

जो प्रह्लाद की पुत्री कही गयी, वह त्वष्टा की पत्नी मानी गयी; उसी में उन्होंने कन्याएँ उत्पन्न कीं, जो लोकमाताएँ बनीं।

श्लोक 77 (skanda.7.11.77)

राज्ञी संज्ञा च द्यौस्त्वष्ट्री प्रभा सैव विभाव्यते। तस्यास्तु वलया छाया निक्षुभा सा महीयसी

rājñī saṁjñā ca dyaustvaṣṭrī prabhā saiva vibhāvyate| tasyāstu valayā chāyā nikṣubhā sā mahīyasī

रानी संज्ञा ही द्यौ और त्वष्टा की पुत्री प्रभा के रूप में जानी जाती है। उसकी छाया वलया है, वह महिमामयी निक्षुभा है।

श्लोक 78 (skanda.7.11.78)

सा तु भार्या भगवती मार्तंडस्य महात्मनः। साध्वी पतिव्रता देवी रूपयौवनशालिनी

sā tu bhāryā bhagavatī mārtaṁḍasya mahātmanaḥ| sādhvī pativratā devī rūpayauvanaśālinī

वह भगवान महात्मा मार्तण्ड की पत्नी, साध्वी, पतिव्रता देवी, रूप और यौवन से सुशोभित है।

श्लोक 79 (skanda.7.11.79)

न तु तां नररूपेण भार्यां भजति वै पुरा। आदित्यस्येह तप्तत्वं महता स्वेन तेजसा

na tu tāṁ nararūpeṇa bhāryāṁ bhajati vai purā| ādityasyeha taptatvaṁ mahatā svena tejasā

पूर्वकाल में वह अपनी पत्नी का मनुष्य-रूप में भोग नहीं करते थे, क्योंकि आदित्य का यह तेज अपनी महान ऊष्मा से अत्यन्त तप्त था।

श्लोक 80 (skanda.7.11.80)

गात्रेष्वप्रतिरूपेषु मासिकांतमिवाभवत्। संज्ञा च रविणा दृष्टा निमीलयति लोचने। यतस्ततः सरोषोऽर्कः संज्ञां वचनमब्रवीत्

gātreṣvapratirūpeṣu māsikāṁtamivābhavat| saṁjñā ca raviṇā dṛṣṭā nimīlayati locane| yatastataḥ saroṣo'rkaḥ saṁjñāṁ vacanamabravīt

उसके अंगों पर मानो मासिक धर्म का काला रंग सा हो गया था। जब भी सूर्य द्वारा देखी जाती, संज्ञा अपने नेत्र मूँद लेती थी। इस कारण क्रुद्ध होकर सूर्य ने संज्ञा से यह वचन कहा।

श्लोक 81 (skanda.7.11.81)

रविरुवाच। मयि दृष्टे सदा यस्मात्कुरुषे नेत्रसंक्षयम्। तस्माज्जनिष्यसे मूढे प्रजासंयमनं यमम्

raviruvāca| mayi dṛṣṭe sadā yasmātkuruṣe netrasaṁkṣayam| tasmājjaniṣyase mūḍhe prajāsaṁyamanaṁ yamam

सूर्य ने कहा—चूँकि जब भी मुझे देखा जाता है, तुम सदा अपने नेत्र बन्द कर लेती हो, इसलिए हे मूढ़े! तुम प्रजाओं को संयमित करने वाले यम को जन्म दोगी।

श्लोक 82 (skanda.7.11.82)

ईश्वर उवाच। ततः सा चपला दृष्टिं देवी चक्रे भयाकुला। विलोलितदृशं दृष्ट्वा पुनराह च तां रविः

īśvara uvāca| tataḥ sā capalā dṛṣṭiṁ devī cakre bhayākulā| vilolitadṛśaṁ dṛṣṭvā punarāha ca tāṁ raviḥ

ईश्वर ने कहा—तब वह देवी भय से व्याकुल होकर चंचल दृष्टि करने लगी। उसकी चंचल दृष्टि देखकर सूर्य ने फिर उससे कहा।

श्लोक 83 (skanda.7.11.83)

रविरुवाच। यस्माद्विलोलिता दृष्टिर्मयि दृष्टे त्वया पुनः। तस्माद्विलोलां तनयां नदीं त्वं प्रसविष्यसि

raviruvāca| yasmādvilolitā dṛṣṭirmayi dṛṣṭe tvayā punaḥ| tasmādvilolāṁ tanayāṁ nadīṁ tvaṁ prasaviṣyasi

सूर्य ने कहा—चूँकि जब भी तुम मुझे पुनः देखती हो, तुम्हारी दृष्टि चंचल हो जाती है, इसलिए तुम एक चंचल नदी नामक पुत्री को जन्म दोगी।

श्लोक 84 (skanda.7.11.84)

ईश्वर उवाच। ततस्तस्यास्तु संजज्ञे भर्तृशापेन तेन वै। यमश्च यमुना चेयं प्रख्याता सुमहानदी। तृतीयं च सुतं जज्ञे श्राद्धदेवं मनुं शुभम्

īśvara uvāca| tatastasyāstu saṁjajñe bhartṛśāpena tena vai| yamaśca yamunā ceyaṁ prakhyātā sumahānadī| tṛtīyaṁ ca sutaṁ jajñe śrāddhadevaṁ manuṁ śubham

ईश्वर ने कहा—फिर पति के उस शाप से उससे यम और यह प्रसिद्ध महानदी यमुना उत्पन्न हुई। तीसरे पुत्र के रूप में उसने शुभ श्राद्धदेव मनु को जन्म दिया।

श्लोक 85 (skanda.7.11.85)

सापि संज्ञा रवेस्तेजो गोलाकारं महाप्रभम्। असहन्ती च सा चित्ते चिन्तयामास वै तदा

sāpi saṁjñā ravestejo golākāraṁ mahāprabham| asahantī ca sā citte ciṁtayāmāsa vai tadā

वह संज्ञा भी सूर्य के गोलाकार महाप्रभावशाली तेज को सहन न कर पाती थी, और तब उसने मन में विचार किया।

श्लोक 86 (skanda.7.11.86)

किं करोमि क्व यास्यामि क्व गतायाश्च निर्वृतिः। भवेन्मम कथं भर्ता कोपमर्क्कश्च नेष्यति

kiṁ karomi kva yāsyāmi kva gatāyāśca nirvṛtiḥ| bhavenmama kathaṁ bhartā kopamarkkaśca neṣyati

मैं क्या करूँ, कहाँ जाऊँ, कहाँ जाने पर मुझे शान्ति मिलेगी? मेरे पति सूर्य क्रोध को कैसे न करें, यह कैसे हो?

श्लोक 87 (skanda.7.11.87)

इति संचिन्त्य बहुधा प्रजापतिसुता तदा। बहु मेने महाभागा पितृसंश्रयमेव च

iti saṁciṁtya bahudhā prajāpatisutā tadā| bahu mene mahābhāgā pitṛsaṁśrayameva ca

इस प्रकार अनेक प्रकार से विचार करके प्रजापति की पुत्री, वह महाभागा, पिता की शरण लेना ही श्रेष्ठ मानने लगी।

श्लोक 88 (skanda.7.11.88)

ततः पितृगृहं गन्तुं कृतबुद्धिर्यशस्विनी। छायामयीमात्मतनुं प्रत्यंगमिव निर्मिताम्

tataḥ pitṛgṛhaṁ gantuṁ kṛtabuddhiryaśasvinī| chāyāmayīmātmatanuṁ pratyaṁgamiva nirmitām

फिर उस यशस्विनी ने पिता के घर जाने का निश्चय किया और अपने ही शरीर के समान, अंग-प्रत्यंग में निर्मित, एक छायामयी देह बना ली।

श्लोक 89 (skanda.7.11.89)

सम्मुखं प्रेक्ष्य तां देवीं स्वां छायां वाक्यमब्रवीत्

sammukhaṁ prekṣya tāṁ devīṁ svāṁ chāyāṁ vākyamabravīt

उस देवी ने सामने देखकर अपनी छाया से यह वचन कहा।

श्लोक 90 (skanda.7.11.90)

संज्ञोवाच। अहं यास्यामि भद्रं ते स्वकं च भवनं पितुः। निर्विकारं त्वया त्वत्र स्थेयं मच्छासनाच्छुभे

saṁjñovāca| ahaṁ yāsyāmi bhadraṁ te svakaṁ ca bhavanaṁ pituḥ| nirvikāraṁ tvayā tvatra stheyaṁ macchāsanācchubhe

संज्ञा ने कहा—तुम्हारा कल्याण हो, मैं अपने पिता के घर जाऊँगी। हे शुभे! तुम मेरी आज्ञा से यहाँ बिना किसी विकार के रहना।

श्लोक 91 (skanda.7.11.91)

इमौ च बालकौ मह्यं कन्या च वरवर्णिनी। संभाव्या नैव चाख्येयमिदं भगवते त्वया

imau ca bālakau mahyaṁ kanyā ca varavarṇinī| saṁbhāvyā naiva cākhyeyamidaṁ bhagavate tvayā

इन दोनों बालकों और मेरी सुन्दर कन्या का लालन-पालन करना, और यह बात भगवान को कभी नहीं बतानी।

श्लोक 92 (skanda.7.11.92)

पृष्टयापि न वाच्यं ते तथैतद्गमनं मम। तेनास्मि नामसंज्ञेति वाच्यसे तत्प्रतिष्ठया

pṛṣṭayāpi na vācyaṁ te tathaitadgamanaṁ mama| tenāsmi nāmasaṁjñeti vācyase tatpratiṣṭhayā

पूछे जाने पर भी तुम्हें यह मेरा गमन नहीं बताना है। इसी कारण तुम मेरे संज्ञा नाम की प्रतिष्ठा से पुकारी जाओगी।

श्लोक 93 (skanda.7.11.93)

छायोवाच। आ केशग्रहणाद्देवि आ शापान्नैव कर्हिचित्। आख्यास्यामि मतं तुभ्यं गम्यतां यत्र वांछितम्

chāyovāca| ā keśagrahaṇāddevi ā śāpānnaiva karhicit| ākhyāsyāmi mataṁ tubhyaṁ gamyatāṁ yatra vāṁchitam

छाया ने कहा—हे देवी! बाल पकड़े जाने तक या शाप दिये जाने तक भी मैं कभी नहीं बताऊँगी। तुम्हारी इच्छा है, तुम्हें जहाँ जाना है, वहाँ जाओ।

श्लोक 94 (skanda.7.11.94)

ईश्वर उवाच। इत्युक्ता सा तदा देवी जगाम भवनं पितुः। ददर्श तत्र त्वष्टारं तपसा धूतकल्मषम्

īśvara uvāca| ityuktā sā tadā devī jagāma bhavanaṁ pituḥ| dadarśa tatra tvaṣṭāraṁ tapasā dhūtakalmaṣam

ईश्वर ने कहा—यह कहकर वह देवी तब अपने पिता के घर गयी। वहाँ उसने त्वष्टा को देखा, जो तप से कल्मष-रहित हो चुके थे।

श्लोक 95 (skanda.7.11.95)

बहुमानाच्च तेनापि पूजिता विश्वकर्मणा। वर्षाणां च सहस्रं तु वसमाना पितुर्गृहे। तस्थौ पितृगृहे सा तु किंचित्कालमनिंदिता

bahumānācca tenāpi pūjitā viśvakarmaṇā| varṣāṇāṁ ca sahasraṁ tu vasamānā piturgṛhe| tasthau pitṛgṛhe sā tu kiṁcitkālamaniṁditā

विश्वकर्मा ने भी उसे बड़े आदर से सम्मानित किया। वह निन्दारहित देवी पिता के घर में एक हज़ार वर्ष तक निवास करती रही, कुछ काल तक वहीं ठहरी।

श्लोक 96 (skanda.7.11.96)

ततस्तां प्राह चार्वंगीं पिता नातिचिरोषिताम्। स्तुत्वा तु तनयां प्रेम्णा बहुमानपुरःसरम्

tatastāṁ prāha cārvaṁgīṁ pitā nāticiroṣitām| stutvā tu tanayāṁ premṇā bahumānapuraḥsaram

फिर, जब वह अधिक समय तक नहीं ठहरी थी, तब उस सुन्दरांगी को पिता ने प्रेम और बहुत आदर के साथ, अपनी पुत्री की प्रशंसा करके, कहा।

श्लोक 97 (skanda.7.11.97)

विश्वकर्मोवाच। त्वामेव पश्यतो वत्से दिनानि सुबहून्यपि। मुहूर्तार्द्धसमानि स्युः किं तु धर्मो विलुप्यते

viśvakarmovāca| tvāmeva paśyato vatse dināni subahūnyapi| muhūrtārddhasamāni syuḥ kiṁ tu dharmo vilupyate

विश्वकर्मा ने कहा—हे वत्से! तुम्हें देखते हुए, अनेक दिन भी आधे मुहूर्त के समान प्रतीत होते हैं; किन्तु धर्म का लोप हो जाता है।

श्लोक 98 (skanda.7.11.98)

बांधवेषु चिरं वासो नारीणां न यशस्करः। मनोरथा बांधवानां नार्या भर्तृगृहे स्थितिः

bāṁdhaveṣu ciraṁ vāso nārīṇāṁ na yaśaskaraḥ| manorathā bāṁdhavānāṁ nāryā bhartṛgṛhe sthitiḥ

स्त्रियों का बान्धवों के यहाँ दीर्घकाल तक रहना यशस्कर नहीं है। स्त्री का पति के घर में रहना ही बान्धवों के मन का मनोरथ है।

श्लोक 99 (skanda.7.11.99)

सा त्वं त्रैलोक्यनाथेन भर्त्रा सूर्येण संयुता। पितुर्गृहे चिरं कालं वस्तुं नार्हसि पुत्रिके

sā tvaṁ trailokyanāthena bhartrā sūryeṇa saṁyutā| piturgṛhe ciraṁ kālaṁ vastuṁ nārhasi putrike

तुम त्रिलोकनाथ पति सूर्य से संयुक्त हो, हे पुत्रिके! तुम्हें पिता के घर में दीर्घकाल तक रहना उचित नहीं है।

श्लोक 100 (skanda.7.11.100)

तत्त्वं भर्तृगृहं गच्छ दृष्टोऽहं पूजितासि मे। पुनरागमनं कार्यं दर्शनाय शुचिस्मिते

tattvaṁ bhartṛgṛhaṁ gaccha dṛṣṭo'haṁ pūjitāsi me| punarāgamanaṁ kāryaṁ darśanāya śucismite

इसलिए तुम पति के घर जाओ, मुझे देख लिया, तुमने मुझे सम्मान दे दिया। हे शुचिस्मिते! पुनः दर्शन के लिए आना।

श्लोक 101 (skanda.7.11.101)

ईश्वर उवाच। इत्युक्ता सा तदा पित्रा गच्छगच्छेति सा पुनः। संपूजयित्वा पितरं वडवारूपधारिणी

īśvara uvāca| ityuktā sā tadā pitrā gacchagaccheti sā punaḥ| saṁpūjayitvā pitaraṁ vaḍavārūpadhāriṇī

ईश्वर ने कहा—पिता द्वारा 'जाओ, जाओ' यह कहे जाने पर, वह पिता की पूजा करके, फिर घोड़ी का रूप धारण करके चल पड़ी।

श्लोक 102 (skanda.7.11.102)

मेरोरुत्तरतस्तत्र वर्षं यद्धनुषाकृति। उत्तराः कुरवो लोके प्रख्याता ये यशस्विनि

meroruttaratastatra varṣaṁ yaddhanuṣākṛti| uttarāḥ kuravo loke prakhyātā ye yaśasvini

मेरु के उत्तर में जो धनुषाकार वर्ष है, हे यशस्विनी! वह उत्तरकुरु नाम से संसार में विख्यात है।

श्लोक 103 (skanda.7.11.103)

तत्र तेपे तपः साध्वी निराहाराऽश्वरूपिणी। एतस्मिन्नंतरे देवि तस्याश्छाया विवस्वतः

tatra tepe tapaḥ sādhvī nirāhārā'śvarūpiṇī| etasminnaṁtare devi tasyāśchāyā vivasvataḥ

वहाँ वह साध्वी अश्व-रूपधारिणी निराहार तप करने लगी। इसी बीच, हे देवी! उसकी छाया सूर्य के पास थी।

श्लोक 104 (skanda.7.11.104)

समीपस्था तदा देवी संज्ञाया वाक्यतत्परा। तस्यां च भगवान्सूर्यो द्वितीयायां दिवस्पतिः

samīpasthā tadā devī saṁjñāyā vākyatatparā| tasyāṁ ca bhagavānsūryo dvitīyāyāṁ divaspatiḥ

वह देवी संज्ञा के वचन के अनुसार पास में रहती थी। उस दूसरी में ही भगवान सूर्य, दिवस्पति।

श्लोक 105 (skanda.7.11.105)

संज्ञेयमिति मन्वानो रूपौदार्येण मोहितः। तस्यां च जनयामास द्वौ पुत्रौ कन्यकां तथा

saṁjñeyamiti manvāno rūpaudāryeṇa mohitaḥ| tasyāṁ ca janayāmāsa dvau putrau kanyakāṁ tathā

उसे संज्ञा ही मानकर और उसके सौन्दर्य से मोहित होकर, उसी में उन्होंने दो पुत्र और एक कन्या को जन्म दिया।

श्लोक 106 (skanda.7.11.106)

पूर्वं यस्तु मनोस्तुल्यः सावर्णिस्तेन सोऽभवत्। यः सूर्यात्प्रथमं जातः पुत्रयोः सुरसुन्दरि

pūrvaṁ yastu manostulyaḥ sāvarṇistena so'bhavat| yaḥ sūryātprathamaṁ jātaḥ putrayoḥ surasundari

जो पहले मनु के समान था, वह सावर्णि हुआ; हे देवसुन्दरि! दोनों पुत्रों में जो सूर्य से पहले जन्मा।

श्लोक 107 (skanda.7.11.107)

द्वितीयो योऽभवच्चान्यः स ग्रहोऽभूच्छनैश्चरः। कन्या ऽभूत्तपती या तां वव्रे संवरणो नृपः

dvitīyo yo'bhavaccānyaḥ sa graho'bhūcchanaiścaraḥ| kanyā'bhūttapatī yā tāṁ vavre saṁvaraṇo nṛpaḥ

जो दूसरा हुआ, वह ग्रह शनैश्चर बना। जो कन्या हुई, वह तपती थी, जिसे राजा संवरण ने वरण किया।

श्लोक 108 (skanda.7.11.108)

तापीनाम नदी चेयं विंध्यमूलाद्विनिःसृता। नित्यं पुण्यजला स्नाने पश्चिमोदधिगामिनी

tāpīnāma nadī ceyaṁ viṁdhyamūlādviniḥsṛtā| nityaṁ puṇyajalā snāne paścimodadhigāminī

यह ताप्ती नामक नदी विंध्य के मूल से निकली है, सदा पवित्र जल वाली, स्नान के लिए उत्तम, पश्चिम समुद्र की ओर बहने वाली।

श्लोक 109 (skanda.7.11.109)

अन्या चैव तथा भद्रा जाता पुत्री महाप्रभा। संज्ञा तु पार्थिवी छाया आत्मजानां यथाकरोत्

anyā caiva tathā bhadrā jātā putrī mahāprabhā| saṁjñā tu pārthivī chāyā ātmajānāṁ yathākarot

इसके अतिरिक्त एक अन्य पुत्री भद्रा भी उत्पन्न हुई, जो अत्यन्त तेजस्वी थी। पार्थिवी संज्ञा (छाया) ने अपने पुत्रों के प्रति जैसा किया।

श्लोक 110 (skanda.7.11.110)

स्नेहं न पूर्वजातानां तथा कृतवती सती। लालनाद्युपभोगेषु विशेषमनुवासरम्

snehaṁ na pūrvajātānāṁ tathā kṛtavatī satī| lālanādyupabhogeṣu viśeṣamanuvāsaram

उसने पहले जन्मे बच्चों के प्रति वैसा स्नेह नहीं किया, जैसा उसने अपनी सन्तानों के प्रति किया। लालन-पालन आदि उपभोगों में प्रतिदिन भेद रखा।

श्लोक 111 (skanda.7.11.111)

यथा स्वेष्वनुवर्तेत न तथान्येषु भामिनी। मनुस्तु क्षांतवांस्तस्या भविष्यो यो हि पार्वति

yathā sveṣvanuvarteta na tathānyeṣu bhāminī| manustu kṣāṁtavāṁstasyā bhaviṣyo yo hi pārvati

जैसा व्यवहार वह अपनी सन्तानों के प्रति करती थी, वैसा अन्यों के प्रति नहीं करती थी। हे पार्वती! जो भावी मनु हैं, उन्होंने उसे क्षमा कर दिया।

श्लोक 112 (skanda.7.11.112)

मेरौ तिष्ठति सोऽद्यापि तपः कुर्वन्वरानने। सर्वं तत्क्षांतवान्मातुर्यमस्तस्या न चक्षमे

merau tiṣṭhati so'dyāpi tapaḥ kurvanvarānane| sarvaṁ tatkṣāṁtavānmāturyamastasyā na cakṣame

वह आज भी मेरु पर तप करते हुए स्थित हैं, हे वरानने! उसने माता की सारी बातें सहन कर लीं, किन्तु यम ने उसे क्षमा नहीं किया।

श्लोक 113 (skanda.7.11.113)

बहुशो याचमानस्तु छाययाऽतीव कोपितः। स वै कोपाच्च बाल्याच्च भाविनोऽर्थस्य वै बलात्

bahuśo yācamānastu chāyayā'tīva kopitaḥ| sa vai kopācca bālyācca bhāvino'rthasya vai balāt

बार-बार अनुनय करने पर भी छाया द्वारा वह अत्यन्त क्रोधित किया गया। वह क्रोध, बाल्यावस्था और भावी घटना के बल से।

श्लोक 114 (skanda.7.11.114)

ताडनाय ततः कोपात्पादस्तेन समुद्यतः। तथा पुनः क्षांतिमता न तु देहे निपातितः

tāḍanāya tataḥ kopātpādastena samudyataḥ| tathā punaḥ kṣāṁtimatā na tu dehe nipātitaḥ

क्रोध में उसने उसे ताड़ना देने के लिए पैर उठाया। किन्तु क्षमाशील होने के कारण उसने वह देह पर नहीं गिराया।

श्लोक 115 (skanda.7.11.115)

पदा संतर्जयामास छायां संज्ञासुतो यमः

padā saṁtarjayāmāsa chāyāṁ saṁjñāsuto yamaḥ

यम, जो संज्ञा का पुत्र माना जाता था, ने पैर से छाया को धमकाया।

श्लोक 116 (skanda.7.11.116)

तं शशाप ततश्छाया क्रुद्धा सा पार्थिवी भृशम्। किंचित्प्रस्फुरमाणोष्ठी विचलत्पाणिपल्लवा

taṁ śaśāpa tataśchāyā kruddhā sā pārthivī bhṛśam| kiṁcitprasphuramāṇoṣṭhī vicalatpāṇipallavā

तब वह पार्थिवी छाया अत्यन्त क्रुद्ध होकर उसे शाप देने लगी, उसके ओठ कुछ काँप रहे थे और हाथ-पल्लव चंचल हो रहे थे।

श्लोक 117 (skanda.7.11.117)

छायोवाच। पितुः पत्नीममर्याद यन्मां तर्जयसे पदा। भुवि तस्मादयं पादस्तवाद्यैव पतिष्यति

chāyovāca| pituḥ patnīmamaryāda yanmāṁ tarjayase padā| bhuvi tasmādayaṁ pādastavādyaiva patiṣyati

छाया ने कहा—हे मर्यादाहीन! तुम अपने पिता की पत्नी को पैर से धमकाते हो, इसलिए आज ही यह तुम्हारा पैर पृथ्वी पर गिर जाएगा।

श्लोक 118 (skanda.7.11.118)

ईश्वर उवाच। यमस्तु तेन शापेन भृशं पीडितमानसः। मनुना सह धर्मात्मा पित्रे सर्वं न्यवेदयत्

īśvara uvāca| yamastu tena śāpena bhṛśaṁ pīḍitamānasaḥ| manunā saha dharmātmā pitre sarvaṁ nyavedayat

ईश्वर ने कहा—उस शाप से यम अत्यन्त पीड़ित मन वाला हुआ। धर्मात्मा यम ने मनु के साथ पिता को सब कुछ बताया।

श्लोक 119 (skanda.7.11.119)

यम उवाच। तातैतन्महदाश्चर्यं न दृष्टमिह केनचित्। माता वात्सल्यमुत्सृज्य शापं पुत्रे प्रयच्छति

yama uvāca| tātaitanmahadāścaryaṁ na dṛṣṭamiha kenacit| mātā vātsalyamutsṛjya śāpaṁ putre prayacchati

यम ने कहा—हे तात! यह महान आश्चर्य है, जो कभी किसी ने नहीं देखा - माता अपना वात्सल्य त्यागकर पुत्र को शाप देती है।

श्लोक 120 (skanda.7.11.120)

स्नेहेन तुल्यमस्मासु माताद्य नैव वर्त्तते। विसृज्य ज्यायसो यस्मात्कनीयःसु बुभूषति

snehena tulyamasmāsu mātādya naiva vartate| visṛjya jyāyaso yasmātkanīyaḥsu bubhūṣati

आज माता का स्नेह हम सबमें समान नहीं रहा; क्योंकि वे बड़ों को त्यागकर छोटों को अधिक चाहती हैं।

श्लोक 121 (skanda.7.11.121)

तस्या मयोद्यतः पादो न तु देहे निपातितः। बाल्याद्वा यदि वा मोहात्तद्भवान्क्षंतुमर्हति

tasyā mayodyataḥ pādo na tu dehe nipātitaḥ| bālyādvā yadi vā mohāttadbhavānkṣaṁtumarhati

मैंने उसके प्रति पैर उठाया था, किन्तु उसकी देह पर नहीं गिराया। यह बाल्यावस्था के कारण हो या मोह के कारण, आप इसे क्षमा करें।

श्लोक 122 (skanda.7.11.122)

शप्तोऽहं तात कोपेन तया सुत इति स्फुटम्। अतो न मह्यं जननी सा भवेद्वदतां वर

śapto'haṁ tāta kopena tayā suta iti sphuṭam| ato na mahyaṁ jananī sā bhavedvadatāṁ vara

हे तात! उसने क्रोध में मुझे स्पष्ट रूप से शाप दिया, यद्यपि मैं उसका पुत्र हूँ। इसलिए, हे वक्ताओं में श्रेष्ठ! वह मेरी माता नहीं हो सकती।

श्लोक 123 (skanda.7.11.123)

निगुर्णेष्वपि पुत्रेषु न माता निर्गुणा भवेत्। पादस्ते पततां पुत्र कथमेतत्तयोदितम्

nirguṇeṣvapi putreṣu na mātā nirguṇā bhavet| pādaste patatāṁ putra kathametattayoditam

गुणहीन पुत्रों के प्रति भी माता गुणहीन नहीं होती। 'हे पुत्र, तुम्हारा पैर गिर जाए' - यह उसने कैसे कहा?

श्लोक 124 (skanda.7.11.124)

तव प्रसादाच्चरणो न पतेद्भगवन्यथा। मातृशापादयं मेऽद्य तथा चिंतय गोपते

tava prasādāccaraṇo na patedbhagavanyathā| mātṛśāpādayaṁ me'dya tathā ciṁtaya gopate

आपकी कृपा से यह पाँव न गिरे, हे भगवन्! मातृशाप से आज मेरा यह जो कष्ट है, हे गोपते! उसका उपाय सोचिये।

श्लोक 125 (skanda.7.11.125)

रविरुवाच। असंशयं महत्पुत्र भविष्यत्यत्र कारणम्। येन ते ह्याविशत्क्रोधो धर्मज्ञस्य महात्मनः

raviruvāca| asaṁśayaṁ mahatputra bhaviṣyatyatra kāraṇam| yena te hyāviśatkrodho dharmajñasya mahātmanaḥ

सूर्य ने कहा—हे पुत्र! निःसन्देह इसमें कोई महान कारण होगा, जिससे तुम जैसे धर्मज्ञ महात्मा में भी क्रोध का प्रवेश हुआ।

श्लोक 126 (skanda.7.11.126)

सर्वेषामेव शापानां प्रतिघातोऽपि विद्यते। न तु मात्राभिशप्तानां क्वचिच्छापनिवर्त्तनम्

sarveṣāmeva śāpānāṁ pratighāto'pi vidyate| na tu mātrābhiśaptānāṁ kvaciccchāpanivarttanam

सभी शापों का कोई न कोई प्रतिकार होता है, किन्तु माता द्वारा दिये गये शाप का निवारण कहीं नहीं होता।

श्लोक 127 (skanda.7.11.127)

न युक्तमेतन्मिथ्या तु कर्तुँ मातुर्वचस्तव। किंचित्ते संविधास्यामि पुत्रस्नेहादनुग्रहम्

na yuktametanmithyā tu kartuṁ māturvacastava| kiṁcitte saṁvidhāsyāmi putrasnehādanugraham

इसलिए तुम्हारी माता के वचन को झूठा करना उचित नहीं। किन्तु पुत्र-स्नेह के कारण मैं तुम्हारे लिए कुछ अनुग्रह की व्यवस्था करूँगा।

श्लोक 128 (skanda.7.11.128)

कृमयो मांसमादाय प्रयास्यंति महीतलम्। कृतं तस्या वचः सत्यं त्वं च त्रातो भविष्यसि

kṛmayo māṁsamādāya prayāsyaṁti mahītalam| kṛtaṁ tasyā vacaḥ satyaṁ tvaṁ ca trāto bhaviṣyasi

कीड़े मांस लेकर पृथ्वीतल पर गिरेंगे; इस प्रकार उसका वचन सत्य हो जाएगा, और तुम भी सुरक्षित रहोगे।

श्लोक 129 (skanda.7.11.129)

ईश्वर उवाच। आदित्यस्त्वब्रवीच्छायां किमर्थं तनयेषु वै। तुल्येष्वप्यधिकः स्नेह एकत्र क्रियते त्वया

īśvara uvāca| ādityastvabravīcchāyāṁ kimarthaṁ tanayeṣu vai| tulyeṣvapyadhikaḥ sneha ekatra kriyate tvayā

ईश्वर ने कहा—फिर आदित्य ने छाया से कहा—समान होते हुए भी पुत्रों में से एक के प्रति तुम अधिक स्नेह क्यों करती हो?

श्लोक 130 (skanda.7.11.130)

नूनं न चैषां जननी त्वं संज्ञा क्वापि सा गता। विकलेष्वप्यपत्येषु न माता शापदा भवेत्

nūnaṁ na caiṣāṁ jananī tvaṁ saṁjñā kvāpi sā gatā| vikaleṣvapyapatyeṣu na mātā śāpadā bhavet

निश्चय ही तुम इनकी वास्तविक माता नहीं हो; संज्ञा कहीं और चली गयी है। दोषयुक्त सन्तानों को भी माता शाप नहीं देती।

श्लोक 131 (skanda.7.11.131)

अपि दोषसहस्राणि यदि पुत्रः समाचरेत्। प्राणद्रोहेऽपि निरतो न माता पापमाचरेत्। तस्मात्सत्यं मम ब्रूहि मा शापवशगा भव

api doṣasahasrāṇi yadi putraḥ samācaret| prāṇadrohe'pi nirato na mātā pāpamācaret| tasmātsatyaṁ mama brūhi mā śāpavaśagā bhava

यदि पुत्र सहस्रों दोष भी करे, यहाँ तक कि प्राणघात में लीन हो, तब भी माता पाप नहीं करती। इसलिए मुझे सत्य बताओ, शाप के वशीभूत मत होओ।

श्लोक 132 (skanda.7.11.132)

ईश्वर उवाच। तं शप्तुमुद्यतं दृष्ट्वा छायासंज्ञा दिनाधिपम्। भयेन कंपती देवी यथावृत्तं महासती

īśvara uvāca| taṁ śaptumudyataṁ dṛṣṭvā chāyāsaṁjñā dinādhipam| bhayena kaṁpatī devī yathāvṛttaṁ mahāsatī

ईश्वर ने कहा—सूर्य को शाप देने के लिए उद्यत देखकर छाया-संज्ञा भय से काँपने लगी, वह महासती देवी।

श्लोक 133 (skanda.7.11.133)

सा चाह तनया त्वष्टुरहं संज्ञा विभावसो। पत्नी तव त्वया पत्या पतियुक्ता दिवाकर

sā cāha tanayā tvaṣṭurahaṁ saṁjñā vibhāvaso| patnī tava tvayā patyā patiyuktā divākara

उसने कहा—हे विभावसो! मैं त्वष्टा की पुत्री संज्ञा, तुम्हारी पत्नी हूँ, हे दिवाकर! मैं तुम्हारे साथ, अपने पति के साथ युक्त हूँ।

श्लोक 134 (skanda.7.11.134)

इत्थं विवस्वतः सा तु बहुशः पृच्छतोऽन्यथा। न वाचा भाषते क्रुद्धः शापं दातुं समुद्यतः

itthaṁ vivasvataḥ sā tu bahuśaḥ pṛcchato'nyathā| na vācā bhāṣate kruddhaḥ śāpaṁ dātuṁ samudyataḥ

इस प्रकार विवस्वान के बार-बार अन्यथा पूछने पर भी, क्रुद्ध होकर वह वाणी से कुछ नहीं बोला और शाप देने के लिए उद्यत हो गया।

श्लोक 135 (skanda.7.11.135)

शापोद्यतकरं दृष्ट्वा सूर्यं छाया विवस्वतः। कथयामास तत्सर्वं संज्ञायाः सुविचेष्टितम्

śāpodyatakaraṁ dṛṣṭvā sūryaṁ chāyā vivasvataḥ| kathayāmāsa tatsarvaṁ saṁjñāyāḥ suviceṣṭitam

सूर्य को शाप देने के लिए हाथ उठाये देखकर, विवस्वान की छाया ने संज्ञा के उस सारे कृत्य को बता दिया।

श्लोक 136 (skanda.7.11.136)

तच्छ्रुत्वा भगवान्सूर्यो जगाम त्वष्टुरालयम्। ततः संपूजयामास तदा त्रैलोक्यपूजितम्

tacchrutvā bhagavānsūryo jagāma tvaṣṭurālayam| tataḥ saṁpūjayāmāsa tadā trailokyapūjitam

यह सुनकर भगवान सूर्य त्वष्टा के घर गये। तब त्वष्टा ने त्रिलोक-पूजित सूर्य की पूजा की।

श्लोक 137 (skanda.7.11.137)

निर्दग्धुकामं रोषेण सान्त्वयामास पार्वति। भास्वंतं निजया दीप्त्या निजगेहमुपागतम्। क्व संज्ञेति च पृच्छन्तं कथयामास विश्वकृत्

nirdagdhukāmaṁ roṣeṇa sāntvayāmāsa pārvati| bhāsvaṁtaṁ nijayā dīptyā nijagehamupāgatam| kva saṁjñeti ca pṛcchaṁtaṁ kathayāmāsa viśvakṛt

हे पार्वती! क्रोध से जलाने की इच्छा रखने वाले उस सूर्य को, जो अपनी दीप्ति से चमकते हुए स्वयं अपने घर आया था, विश्वकर्मा ने शान्त किया। जब उसने पूछा 'संज्ञा कहाँ है?', तब विश्वकर्मा ने बताया।

श्लोक 138 (skanda.7.11.138)

विश्वकर्म्मोवाच। आगतैव हि मे वेश्म भवता श्रूयतां वचः। विख्यातं तेजसाऽऽढ्यं त इदं रूपं सुदुःसहम्

viśvakarmmovāca| āgataiva hi me veśma bhavatā śrūyatāṁ vacaḥ| vikhyātaṁ tejasā'ḍhyaṁ ta idaṁ rūpaṁ suduḥsaham

विश्वकर्मा ने कहा—वह तो मेरे घर आई ही थी, आप मेरी बात सुनें। यह आपका तेज से समृद्ध, विख्यात रूप अत्यन्त असहनीय है।

श्लोक 139 (skanda.7.11.139)

असहन्ती ततः संज्ञा वने चरति वै तपः। द्रक्ष्यसे तां भवानद्य स्वभार्यां शुभचारिणीम्

asahantī tataḥ saṁjñā vane carati vai tapaḥ| drakṣyase tāṁ bhavānadya svabhāryāṁ śubhacāriṇīm

इसे सहन न कर पाने के कारण संज्ञा वन में जाकर तप कर रही है। आप आज अपनी उस शुभचारिणी पत्नी को देखेंगे।

श्लोक 140 (skanda.7.11.140)

रूपार्थं चरतेऽरण्यं चरंती सुमहत्तपः। मतं मे ब्रह्मणो वाक्याद्यदि ते देव रोचते। रूपं निर्वर्त्तयाम्यद्य तव कांतं दिवस्पते

rūpārthaṁ carate'raṇyaṁ carantī sumahattapaḥ| mataṁ me brahmaṇo vākyādyadi te deva rocate| rūpaṁ nirvarttayāmyadya tava kāṁtaṁ divaspate

अपने ही रूप के कारण वह वन में जाकर महान तप कर रही है। ब्रह्मा के वचन से यह मेरा मत है, यदि आपको रुचिकर लगे, हे देव! तो हे दिवस्पते! मैं आज आपके इस तेज को मनोहर रूप में परिणत कर दूँ।

श्लोक 141 (skanda.7.11.141)

ईश्वर उवाच। यतो हि भास्वतो रूपं प्रागासीत्परिमंडलम्। ततस्तथेति तं प्राह त्वष्टारं भगवान्रविः

īśvara uvāca| yato hi bhāsvato rūpaṁ prāgāsītparimaṁḍalam| tatastatheti taṁ prāha tvaṣṭāraṁ bhagavānraviḥ

ईश्वर ने कहा—चूँकि सूर्य का रूप पहले गोलाकार था, अतः भगवान रवि ने त्वष्टा से 'तथास्तु' कहा।

श्लोक 142 (skanda.7.11.142)

विश्वकर्मात्वनुज्ञातः शाकद्वीपे विवस्वता। भूमिमारोप्य तत्तेजः शातनायोपचक्रमे

viśvakarmātvanujñātaḥ śākadvīpe vivasvatā| bhūmimāropya tattejaḥ śātanāyopacakrame

विश्वकर्मा, विवस्वान से अनुमति पाकर, शाकद्वीप में उस तेज को धरती पर स्थापित करके उसे कम करने का प्रयास करने लगे।

श्लोक 143 (skanda.7.11.143)

भ्रमताऽशेषजगतामधिभूतेन भास्वता। समुद्रा द्रविणोपेताश्चुक्षुभुश्च समन्ततः

bhramatā'śeṣajagatāmadhibhūtena bhāsvatā| samudrā draviṇopetāścukṣubhuśca samantataḥ

समस्त जगतों के अधिष्ठाता उस चक्कर लगाते हुए सूर्य से, धन-सम्पन्न समुद्र भी चारों ओर से क्षुब्ध हो उठे।

श्लोक 144 (skanda.7.11.144)

भ्रमता खलु देवेशि सचंद्रग्रहतारकम्। अधोगति महाभागे बभूवाक्षिप्तमाकुलम्

bhramatā khalu deveśi sacaṁdragrahatārakam| adhogati mahābhāge babhūvākṣiptamākulam

हे देवेशि! उसके चक्कर लगाने से चन्द्र, ग्रह और तारे सहित सब कुछ, हे महाभागे! नीचे की ओर उलट-पुलट होकर व्याकुल हो उठा।

श्लोक 145 (skanda.7.11.145)

विक्षिप्तसलिलाः सर्वे बभूवुश्च तथा नदाः। व्यभिद्यंत तथा शैलाः शीर्णसानुनिबंधनाः

vikṣiptasalilāḥ sarve babhūvuśca tathā nadāḥ| vyabhidyaṁta tathā śailāḥ śīrṇasānunibaṁdhanāḥ

सभी नदियाँ भी अपना जल इधर-उधर बिखेरने लगीं। पर्वत भी विदीर्ण हो गये, उनकी चोटियाँ टूटकर बिखर गयीं।

श्लोक 146 (skanda.7.11.146)

ध्रुवाधाराण्यशेषाणि धिष्ण्यानि वरवर्णिनि। भ्राम्यद्रश्मिनिबद्धानि अधो जग्मुः सहस्रशः

dhruvādhārāṇyaśeṣāṇi dhiṣṇyāni varavarṇini| bhrāmyadraśminibaddhāni adho jagmuḥ sahasraśaḥ

हे वरवर्णिनि! ध्रुव के आश्रित समस्त तारे-समूह, उस घूमती किरणों से बँधे हुए, हज़ारों की संख्या में नीचे गिर पड़े।

श्लोक 147 (skanda.7.11.147)

व्यशीर्यंत महामेघा घोरारावविराविणः। भास्वद्भ्रमणविभ्रांतभूम्याकाशमहीतलम्

vyaśīryaṁta mahāmeghā ghorārāvavirāviṇaḥ| bhāsvadbhramaṇavibhrāṁtabhūmyākāśamahītalam

भयंकर गर्जन करते हुए महामेघ छिन्न-भिन्न हो गये। सूर्य के घूर्णन से पृथ्वी, आकाश और भूतल सभी भ्रान्त हो उठे।

श्लोक 148 (skanda.7.11.148)

जगदाकुलमत्यर्थं तदाऽऽसीद्वरवर्णिनि। त्रैलोक्ये सकले देवि भ्रममाणे महर्षर्यः। देवाश्च ब्रह्मणा सार्द्धं भास्वंतमभितुष्टुवुः

jagadākulamatyarthaṁ tadā'sīdvaravarṇini| trailokye sakale devi bhramamāṇe maharṣaryaḥ| devāśca brahmaṇā sārddhaṁ bhāsvaṁtamabhituṣṭuvuḥ

हे वरवर्णिनि! तब समस्त जगत अत्यन्त व्याकुल हो गया। हे देवी! सम्पूर्ण त्रिलोक के घूमते रहने पर महर्षियों और ब्रह्मा सहित देवताओं ने सूर्य की स्तुति की।

श्लोक 149 (skanda.7.11.149)

देवा ऊचुः। आदिदेवोऽसि देवानां जातमेतत्स्वयं तव। सर्गस्थित्यंतकालेषु त्रिधा भेदेन तिष्ठसि

devā ūcuḥ| ādidevo'si devānāṁ jātametatsvayaṁ tava| sargasthityaṁtakāleṣu tridhā bhedena tiṣṭhasi

देवताओं ने कहा—तुम देवताओं के आदिदेव हो, यह सब सृष्टि स्वयं तुमसे उत्पन्न है। सृष्टि, स्थिति और प्रलय के कालों में तुम तीन रूपों में स्थित रहते हो।

श्लोक 150 (skanda.7.11.150)

स्वस्ति तेऽस्तु जगन्नाथ घर्मवर्षहिमाकर। इंद्र आगम्य तं देवं लिख्यमानमथास्तवीत्। जय देव जगत्स्वामिञ्जय देव जगत्पते

svasti te'stu jagannātha gharmavarṣahimākara| iṁdra āgamya taṁ devaṁ likhyamānamathāstavīt| jaya deva jagatsvāmiñjaya deva jagatpate

हे जगन्नाथ! हे ग्रीष्म, वर्षा और हिम के निर्माता! तुम्हारा कल्याण हो। इन्द्र आकर उस छीले जा रहे देव की स्तुति करने लगे - जय हो, हे देव! हे जगत्स्वामी! जय हो, हे देव! हे जगत्पते!

श्लोक 151 (skanda.7.11.151)

ऋषयश्च ततः सप्त वसिष्ठात्रिपुरोगमाः। तुष्टुवुर्विविधैः स्तोत्रैः स्वस्ति स्वस्तीति वादिनः। वेदोक्तिभिरथाग्र्याभिर्वालखिल्याश्च तुष्टुवुः

ṛṣayaśca tataḥ sapta vasiṣṭhātripurogamāḥ| tuṣṭuvurvividhaiḥ stotraiḥ svasti svastīti vādinaḥ| vedoktibhirathāgryābhirvālakhilyāśca tuṣṭuvuḥ

फिर वसिष्ठ और अत्रि आदि सप्तर्षियों ने विविध स्तोत्रों से 'स्वस्ति स्वस्ति' कहते हुए स्तुति की। वालखिल्य मुनियों ने भी उत्कृष्ट वैदिक उक्तियों से स्तुति की।

श्लोक 152 (skanda.7.11.152)

वालखिल्या ऊचुः। नमस्त ऋक्स्वरूपाय सामरूपाय ते नमः। यजुःस्वरूपरूपाय साम्नां धामग ते नमः

vālakhilyā ūcuḥ| namasta ṛksvarūpāya sāmarūpāya te namaḥ| yajuḥsvarūparūpāya sāmnāṁ dhāmaga te namaḥ

वालखिल्यों ने कहा—ऋक्-स्वरूप तुम्हें नमस्कार, साम-रूप तुम्हें नमस्कार। यजुः-स्वरूप-रूप, सामों के धाम में गमन करने वाले तुम्हें नमस्कार।

श्लोक 153 (skanda.7.11.153)

ज्ञानैकरूपदेहाय निर्धूततमसे नमः। शुद्धज्योतिःस्वरूपाय त्रिमूर्तायामलात्मने

jñānaikarūpadehāya nirdhūtatamase namaḥ| śuddhajyotiḥsvarūpāya trimūrtāyāmalātmane

ज्ञान-एकरूप देह वाले, अन्धकार से रहित तुम्हें नमस्कार। शुद्ध ज्योति-स्वरूप, त्रिमूर्ति, निर्मल आत्मा वाले तुम्हें नमस्कार।

श्लोक 154 (skanda.7.11.154)

वरिष्ठाय वरेण्याय सर्वस्मै परमात्मने। नमोऽखिलजगद्व्यापिरूपायानंतमूर्त्तये

variṣṭhāya vareṇyāya sarvasmai paramātmane| namo'khilajagadvyāpirūpāyānaṁtamūrttaye

श्रेष्ठतम, वरण करने योग्य, सर्वस्वरूप परमात्मा को नमस्कार। सम्पूर्ण जगत में व्याप्त रूप वाले, अनन्त मूर्ति वाले को नमस्कार।

श्लोक 155 (skanda.7.11.155)

सर्वकारणभूताय निष्ठाय ज्ञान चेतसाम्। नमः सूर्यस्वरूपाय प्रकाशालक्ष्यरूपिणे

sarvakāraṇabhūtāya niṣṭhāya jñāna cetasām| namaḥ sūryasvarūpāya prakāśālakṣyarūpiṇe

समस्त कारणों के मूल, ज्ञानचित्त वालों के आश्रय, सूर्य-स्वरूप, प्रकाशमय अलक्ष्य रूप वाले को नमस्कार।

श्लोक 156 (skanda.7.11.156)

भास्कराय नमस्तुभ्यं तथा दिनकृते नमः। सर्वस्मै हेतवे चैव संध्याज्योत्स्नाकृते नमः

bhāskarāya namastubhyaṁ tathā dinakṛte namaḥ| sarvasmai hetave caiva saṁdhyājyotsnākṛte namaḥ

भास्कर तुम्हें नमस्कार, दिन के निर्माता को नमस्कार। समस्त कारणस्वरूप और संध्या-ज्योत्स्ना के निर्माता को नमस्कार।

श्लोक 157 (skanda.7.11.157)

त्वं सर्वमेतद्भगवञ्जगच्च भ्रमता त्वया। भ्रमत्याविश्वमखिलं ब्रह्मांडं सचराचरम्। त्वदंशुभिरिदं सर्वं स्पृष्टं वै जायते शुचि

tvaṁ sarvametadbhagavañjagacca bhramatā tvayā| bhramatyāviśvamakhilaṁ brahmāṁḍaṁ sacarācaram| tvadaṁśubhiridaṁ sarvaṁ spṛṣṭaṁ vai jāyate śuci

हे भगवन्! तुम ही यह सम्पूर्ण जगत हो, तुम्हारे घूमने से ही यह सम्पूर्ण विश्व, चराचरयुक्त ब्रह्माण्ड घूमता है। तुम्हारी किरणों से स्पृष्ट होकर यह सब पवित्र हो जाता है।

श्लोक 158 (skanda.7.11.158)

क्रियते त्वत्करस्पर्शैर्जलादीनां पवित्रता

kriyate tvatkarasparśairjalādīnāṁ pavitratā

तुम्हारी किरणों के स्पर्श से ही जल आदि की पवित्रता होती है।

श्लोक 159 (skanda.7.11.159)

होमदानादिको धर्मो नोपकाराय जायते। तात यावन्न संयोगि जगदेतत्त्वदंशुभिः

homadānādiko dharmo nopakārāya jāyate| tāta yāvanna saṁyogi jagadetattvadaṁśubhiḥ

हे तात! जब तक यह जगत तुम्हारी किरणों से संयुक्त न हो, तब तक हवन-दान आदि धर्म भी उपकार के लिए फलित नहीं होते।

श्लोक 160 (skanda.7.11.160)

ऋचस्ते सकला ह्येतास्तथा यानि यजूंषि च। सकलानि च सामानि निपतंति त्वदंगतः

ṛcaste sakalā hyetāstathā yāni yajūṁṣi ca| sakalāni ca sāmāni nipataṁti tvadaṁgataḥ

ये सम्पूर्ण ऋचाएँ, जो भी यजुष् हैं, तथा सम्पूर्ण साम - ये सब तुम्हारे ही अंगों से उत्पन्न होते हैं।

श्लोक 161 (skanda.7.11.161)

ऋङ्मयस्त्वं जगन्नाथ त्वमेव च यजुर्मयः। यतः साममयश्चैव ततो नाथ त्रयीमयः

ṛṅmayastvaṁ jagannātha tvameva ca yajurmayaḥ| yataḥ sāmamayaścaiva tato nātha trayīmayaḥ

हे जगन्नाथ! तुम ऋक्-मय हो, तुम ही यजुः-मय हो, और चूँकि तुम साम-मय भी हो, इसलिए हे नाथ! तुम त्रयी के स्वरूप हो।

श्लोक 162 (skanda.7.11.162)

त्वमेव ब्रह्मणो रूपं परं चापरमेव च। मूर्त्तामूर्त्तं तथा सूक्ष्मं स्थूलं रूपेण संस्थितः

tvameva brahmaṇo rūpaṁ paraṁ cāparameva ca| mūrttāmūrttaṁ tathā sūkṣmaṁ sthūlaṁ rūpeṇa saṁsthitaḥ

तुम ही ब्रह्म के परम और अपर दोनों रूप हो। मूर्त-अमूर्त, सूक्ष्म-स्थूल रूप में स्थित हो।

श्लोक 163 (skanda.7.11.163)

निमेषकाष्ठादिमयः कालरूपक्षणात्मकः। प्रसीद स्वेच्छया रूपं स्वं तेजः शमनं कुरु। त्वं देव जगतां हेतोर्दुःखं सहसि दुःसहम्

nimeṣakāṣṭhādimayaḥ kālarūpakṣaṇātmakaḥ| prasīda svecchayā rūpaṁ svaṁ tejaḥ śamanaṁ kuru| tvaṁ deva jagatāṁ hetordukhaṁ sahasi duḥsaham

निमेष, काष्ठा आदि समय-मापों से युक्त, काल-रूप और क्षण-स्वरूप। प्रसन्न होओ और अपनी इच्छा से अपने तेज को शान्त करो। हे देव! तुम जगत के हेतु दुःसह दुःख सहते हो।

श्लोक 164 (skanda.7.11.164)

त्वं नाथ मोक्षिणां मोक्षो ध्येयस्त्वं ध्यायतां वरः। त्वं गतिः सर्वभूतानां कर्मकांडनिवर्तिनाम्

tvaṁ nātha mokṣiṇāṁ mokṣo dhyeyastvaṁ dhyāyatāṁ varaḥ| tvaṁ gatiḥ sarvabhūtānāṁ karmakāṁḍanivartinām

हे नाथ! तुम मुमुक्षुओं के लिए मोक्ष हो, तुम ध्यान करने वालों के लिए श्रेष्ठ ध्येय हो। कर्मकाण्ड से निवृत्त समस्त प्राणियों की तुम ही गति हो।

श्लोक 165 (skanda.7.11.165)

शं प्रजाभ्योऽस्तु देवेश शन्नोऽस्तु जगतांपते

śaṁ prajābhyo'stu deveśa śanno'stu jagatāṁpate

हे देवेश! प्रजाओं का कल्याण हो, हे जगत्पते! हम सबका कल्याण हो।

श्लोक 166 (skanda.7.11.166)

त्वं धाता विसृजसि विश्वमेक एव त्वं पाता स्थितिकरणाय संप्रवृत्तः। त्वय्यंते लयमखिलं प्रयाति चैतत्त्वत्तोन्यो न हि तपनास्ति सर्वदाता

tvaṁ dhātā visṛjasi viśvameka eva tvaṁ pātā sthitikaraṇāya saṁpravṛttaḥ| tvayyaṁte layamakhilaṁ prayāti caitattvattonyo na hi tapanāsti sarvadātā

तुम ही विधाता हो, तुम अकेले ही इस विश्व की सृष्टि करते हो, तुम ही पालक होकर स्थिति के लिए प्रवृत्त होते हो। तुम्हारे ही अन्त में यह सब लय को प्राप्त होता है; हे सूर्य! तुमसे अन्य कोई सर्वदाता नहीं है।

श्लोक 167 (skanda.7.11.167)

त्वं ब्रह्मा हरिहरसंज्ञितस्त्वमिन्द्रो वित्तेशः पितृपितरंबुपः समीरः। सोमोऽग्निर्गगनमहाधरादिरूपः किं न त्वं सकलमनोरथप्रदाता

tvaṁ brahmā hariharasaṁjñitastvamindro vitteśaḥ pitṛpitaraṁbupaḥ samīraḥ| somo'gnirgaganamahādharādirūpaḥ kiṁ na tvaṁ sakalamanorathapradātā

तुम ब्रह्मा, तुम हरि-हर नाम वाले, तुम इन्द्र, कुबेर, पितृ, वरुण, वायु हो। तुम सोम, अग्नि, आकाश और पर्वत आदि रूप हो; क्या तुम सम्पूर्ण मनोरथों के दाता नहीं हो?

श्लोक 168 (skanda.7.11.168)

यज्ञैस्त्वामनुदिनमात्मकर्म्मसक्ताः स्तुवन्तो विविधपदैर्द्विजा यजंति। ध्यायन्तः सविनयचेतसो भवन्तं योगस्थाः परमपदं प्रयांति मर्त्त्याः

yajñaistvāmanudinamātmakarmmasaktāḥ stuvanto vividhapadairdvijā yajaṁti| dhyāyantaḥ savinayacetaso bhavaṁtaṁ yogasthāḥ paramapadaṁ prayāṁti marttyāḥ

अपने-अपने कर्मों में लीन द्विज प्रतिदिन यज्ञों से, विविध पदों से स्तुति करते हुए तुम्हारा यजन करते हैं। विनम्र चित्त से तुम्हारा ध्यान करते हुए, योगस्थ मनुष्य परम पद को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 169 (skanda.7.11.169)

तपसि पचसि विश्वं पासि भस्मीकरोषि प्रकटयसि मयूखैर्ह्लादयतस्यंशुगर्भैः। सृजसि कमलजन्मा पालयस्यच्युताख्यः क्षपयसि च युगांते रुद्ररूपस्त्वमेकः

tapasi pacasi viśvaṁ pāsi bhasmīkaroṣi prakaṭayasi mayūkhairhlādayatasyaṁśugarbhaiḥ| sṛjasi kamalajanmā pālayasyacyutākhyaḥ kṣapayasi ca yugāṁte rudrarūpastvamekaḥ

तुम तप्त करते हो, पकाते हो, रक्षा करते हो, विश्व को भस्म करते हो, अपनी किरणों से प्रकट करते हो और अपने अंशुओं के भीतरी भाग से आह्लादित भी करते हो। कमल से उत्पन्न ब्रह्मा के रूप में सृजन करते हो, अच्युत नाम से पालन करते हो, और युग के अन्त में एक अकेले रुद्र-रूप में संहार करते हो।

श्लोक 170 (skanda.7.11.170)

ईश्वर उवाच। लिखमानस्ततो भानुं विश्वकर्मा प्रजापतिः। उद्भूतपुलकः स्तोत्रमिदंचक्रे विवस्वतः

īśvara uvāca| likhamānastato bhānuṁ viśvakarmā prajāpatiḥ| udbhūtapulakaḥ stotramidaṁcakre vivasvataḥ

ईश्वर ने कहा—फिर उस सूर्य को छीलते हुए, प्रजापति विश्वकर्मा ने, रोमांचित होकर, विवस्वान का यह स्तोत्र रचा।

श्लोक 171 (skanda.7.11.171)

विवस्वते प्रणतजनानुकम्पिने महात्मने समजवसप्तसप्तये। सतेजसे कमलकुलालिबंधवे सदा तमःपटलपटावपाटिने

vivasvate praṇatajanānukampine mahātmane samajavasaptasaptaye| satejase kamalakulālibaṁdhave sadā tamaḥpaṭalapaṭāvapāṭine

जो शरणागत जनों पर अनुकम्पा करने वाले महात्मा विवस्वान हैं, जिनके सात समान-वेग वाले घोड़े हैं, जो तेजस्वी हैं, कमल-समूह के भँवरों के बन्धु हैं, जो सदा अन्धकार के पटल को फाड़ने वाले हैं।

श्लोक 172 (skanda.7.11.172)

पावनातिशयसर्वचक्षुषे नैककामविषयप्रदायिने। भासुरामलमयूखमालिने सर्वभूतहितकारिणे नमः

pāvanātiśayasarvacakṣuṣe naikakāmaviṣayapradāyine| bhāsurāmalamayūkhamāline sarvabhūtahitakāriṇe namaḥ

अत्यन्त पवित्र, सबकी आँखों के लिए साक्षी, अनेक कामनाओं के विषय प्रदान करने वाले, दीप्त निर्मल किरण-मालाधारी, सब प्राणियों का हित करने वाले को नमस्कार।

श्लोक 173 (skanda.7.11.173)

अजाय लोकत्रयभावनाय भूतात्मने गोपतये वृषाय। नमो महाकारुणिकोत्तमाय सूर्याय वस्तुप्रभवालयाय

ajāya lokatrayabhāvanāya bhūtātmane gopataye vṛṣāya| namo mahākāruṇikottamāya sūryāya vastuprabhavālayāya

अजन्मा, तीनों लोकों को सम्भव करने वाले, भूतों की आत्मा, गोपति, धर्मस्वरूप। महाकारुणिकों में श्रेष्ठ, सर्व वस्तुओं की उत्पत्ति के आश्रय सूर्य को नमस्कार।

श्लोक 174 (skanda.7.11.174)

विवस्वते ज्ञानभृतेऽन्तरात्मने जगत्प्रतिष्ठाय जगद्धितैषिणे। स्वयंभुवे निर्मललोकचक्षुषे सुरोत्तमायामिततेजसे नमः

vivasvate jñānabhṛte'ntarātmane jagatpratiṣṭhāya jagaddhitaiṣiṇe| svayaṁbhuve nirmalalokacakṣuṣe surottamāyāmitatejase namaḥ

ज्ञान को धारण करने वाले अन्तरात्मा विवस्वान को, जगत की प्रतिष्ठा और जगत के हित की कामना करने वाले को। स्वयंभू, निर्मल लोक-चक्षु, देवताओं में श्रेष्ठ, अपरिमित तेज वाले को नमस्कार।

श्लोक 175 (skanda.7.11.175)

क्षणमुदयाचलभालितार्च्चिः सुरगणगीतिगरिष्ठगीतः। त्वमुत मयूखसहस्रवज्जगति विकासितपद्मनाभः

kṣaṇamudayācalabhālitārccciḥ suragaṇagītigariṣṭhagītaḥ| tvamuta mayūkhasahasravajjagati vikāsitapadmanābhaḥ

उदयाचल पर क्षणभर अपनी किरणों को दर्शाते हुए, देवगणों के गीतों में सबसे उच्च गीत से गाये गये। तुम सहस्र किरणों वाले, जगत में विकसित कमलों की नाभि के समान हो।

श्लोक 176 (skanda.7.11.176)

तव तिमिरासवपानमदाद्भवति विलोहितविग्रहता। मिहिरविभासतया सुतरां त्रिभुवनभावनमात्रपरः

tava timirāsavapānamadādbhavati vilohitavigrahatā| mihiravibhāsatayā sutarāṁ tribhuvanabhāvanamātraparaḥ

अन्धकार के मद्यपान के मद से मानो तुम्हारे शरीर में लालिमा उत्पन्न होती है। हे मिहिर! अपनी प्रभा से तुम अत्यधिक केवल त्रिभुवन के कल्याण में ही तत्पर रहते हो।

श्लोक 177 (skanda.7.11.177)

रथमारुह्य समावयवं रुचिरविकलितदिव्यहयम्। सततमरिबले भगवंश्चरसि जगद्धितबद्धरसः

rathamāruhya samāvayavaṁ ruciravikalitadivyahayam| satatamaribale bhagavaṁścarasi jagaddhitabaddharasaḥ

समान अंगों वाले, सुन्दर और अखण्डित दिव्य अश्वों वाले रथ पर आरूढ़ होकर, हे भगवन्! तुम निरन्तर शत्रु-सेना के बीच से भी विचरण करते हो, जगत के हित में ही तत्पर रस वाले।

श्लोक 178 (skanda.7.11.178)

अमृतमयेन रसेन समं विबुधपितॄनपि तर्प्पयसे। अरिगणसूदन तेन तव प्रणतिमुपेत्य लिखामि वपुः

amṛtamayena rasena samaṁ vibudhapitṝnapi tarppayase| arigaṇasūdana tena tava praṇatimupetya likhāmi vapuḥ

अमृतमय रस से तुम देवताओं और पितरों को भी समान रूप से तृप्त करते हो। हे शत्रु-समूह के संहारक! इसी कारण तुम्हें प्रणाम करके मैं तुम्हारे शरीर को छील रहा हूँ।

श्लोक 179 (skanda.7.11.179)

शुभसमवर्णमयं रचितं तव पदपांसुपवित्रतमम्। नतजनवत्सल मां प्रणतं त्रिभुवनपावन पाहि रवे

śubhasamavarṇamayaṁ racitaṁ tava padapāṁsupavitratamam| natajanavatsala māṁ praṇataṁ tribhuvanapāvana pāhi rave

तुम्हारे चरणों की धूल से अत्यन्त पवित्र, शुभ और समान वर्ण से रचित यह स्तोत्र है। हे नत-जनों पर वत्सल! हे त्रिभुवन-पावन! हे रवि! मुझ नतमस्तक की रक्षा करो।

श्लोक 180 (skanda.7.11.180)

इति सकलजगत्प्रसूति भूतं त्रिभुवनभावनधामहेतुमेकम्। रविमखिलजगत्प्रदीपभूतं त्रिदशवरं प्रणतोऽस्मि देवदेवम्

iti sakalajagatprasūti bhūtaṁ tribhuvanabhāvanadhāmahetumekam| ravimakhilajagatpradīpabhūtaṁ tridaśavaraṁ praṇato'smi devadevam

इस प्रकार सम्पूर्ण जगत की उत्पत्ति के मूल, त्रिभुवन के आधार-धाम के एकमात्र कारण, सम्पूर्ण जगत के प्रदीप-स्वरूप, देवताओं में श्रेष्ठ उस रवि देवाधिदेव को मैं प्रणाम करता हूँ।

श्लोक 181 (skanda.7.11.181)

ईश्वर उवाच। हाहाहूहश्च गन्धर्वो नारदस्तुंबरुस्तथा। उपगातुं समारब्धा गांधर्वकुशला रविम्

īśvara uvāca| hāhāhūhaśca gaṁdharvo nāradastuṁbarustathā| upagātuṁ samārabdhā gāṁdharvakuśalā ravim

ईश्वर ने कहा—हाहा और हूहू नामक गन्धर्व, नारद और तुम्बुरु - गान्धर्व-विद्या में कुशल इन सबने सूर्य के समक्ष गाना आरम्भ किया।

श्लोक 182 (skanda.7.11.182)

षड्जमध्यमगांधारग्रामत्रयविशारदाः। मूर्छनाभिश्च तानैश्च सुप्रयोगैः सुखप्रदम्

ṣaḍjamadhyamagāṁdhāragrāmatrayaviśāradāḥ| mūrchanābhiśca tānaiśca suprayogaiḥ sukhapradam

षड्ज, मध्यम और गान्धार - इन तीनों ग्रामों में निपुण, मूर्च्छनाओं और तानों के सुन्दर प्रयोगों से सुखप्रद गान करते हुए।

श्लोक 183 (skanda.7.11.183)

सप्तस्वरविनिर्वृत्तं यतित्रयविभूषितम्। सप्तधातुसमायुक्तं षड्जाति त्रिगुणाश्रयम्

saptasvaravinirvṛttaṁ yatitrayavibhūṣitam| saptadhātusamāyuktaṁ ṣaḍjāti triguṇāśrayam

सात स्वरों से निर्मित, तीन यतियों से विभूषित, सात धातुओं से युक्त, षड्ज-जाति और तीन गुणों का आश्रय लेने वाला गान।

श्लोक 184 (skanda.7.11.184)

चतुर्गीतसमायुक्तं चतुवर्णसमुत्थितम्। चतुर्वर्णप्रतीकारं सप्तालंकारभूषितम्

caturgītasamāyuktaṁ caturvarṇasamutthitam| caturvarṇapratīkāraṁ saptālaṁkārabhūṣitam

चार प्रकार के गीतों से युक्त, चार वर्णों से उत्पन्न, चार वर्णों के प्रतीकार वाला, सात अलंकारों से सुशोभित।

श्लोक 185 (skanda.7.11.185)

त्रिस्थानशुद्धं त्रिलयं सम्यक्कालव्यवस्थितम्। चित्ते चित्ते च नृत्ये च रसेषु लयसंयुतम्

tristhānaśuddhaṁ trilayaṁ samyakkālavyavasthitam| citte citte ca nṛtye ca raseṣu layasaṁyutam

तीन स्थानों में शुद्ध, तीन लयों वाला, ठीक-ठीक काल में व्यवस्थित, चित्त-चित्त में और नृत्य में, रसों में लय से युक्त।

श्लोक 186 (skanda.7.11.186)

चतुर्विंशद्गुणैर्युक्तं जगुर्गीतं च गायनाः। विश्वार्ची च घृताची च उर्वश्यथ तिलोत्तमा

caturviṁśadguṇairyuktaṁ jagurgītaṁ ca gāyanāḥ| viśvārcī ca ghṛtācī ca urvaśyatha tilottamā

चौबीस गुणों से युक्त गीत को गायकों ने गाया। विश्वाची, घृताची, उर्वशी और तिलोत्तमा।

श्लोक 187 (skanda.7.11.187)

मेनका सहजन्या च रंभा चाप्सरसां वरा। चतुर्विधपदं तालं त्रिप्रकारं लयत्रयम्

menakā sahajanyā ca raṁbhā cāpsarasāṁ varā| caturvidhapadaṁ tālaṁ triprakāraṁ layatrayam

मेनका, सहजन्या और अप्सराओं में श्रेष्ठ रम्भा। चार प्रकार के पदों वाला ताल, तीन प्रकार का, तीन लयों वाला।

श्लोक 188 (skanda.7.11.188)

यतित्रयं तथाऽऽतोद्यं नाट्यं चैव चतुर्विधम्। ननृतुर्जगतामीशे लिख्यमाने विभावसौ

yatitrayaṁ tathā'todyaṁ nāṭyaṁ caiva caturvidham| nanṛturjagatāmīśe likhyamāne vibhāvasau

तीन यतियों, वाद्यों और चार प्रकार के नाट्य के साथ, जगत के स्वामी विभावसु के छीले जाते समय अप्सराएँ नृत्य करने लगीं।

श्लोक 189 (skanda.7.11.189)

भावान्भावविशारद्यः कुर्वन्त्यो विधिवद्बहून्। देवदुन्दुभयः शंखाः शतशोऽथ सहस्रशः

bhāvānbhāvaviśāradyaḥ kurvantyo vidhivadbahūn| devadundubhayaḥ śaṁkhāḥ śataśo'tha sahasraśaḥ

भाव-प्रदर्शन में कुशल वे अनेक भावों को विधिपूर्वक प्रकट करती हुईं। देवताओं के दुन्दुभि और शंख सैकड़ों-हज़ारों की संख्या में।

श्लोक 190 (skanda.7.11.190)

अनाहता महादेवि नेदिरे घननिस्वनाः। गायद्भिश्चैव गंधर्वैर्नृत्यद्भिश्चाप्सरोगणैः

anāhatā mahādevi nedire ghananisvanāḥ| gāyadbhiścaiva gaṁdharvairnṛtyadbhiścāpsarogaṇaiḥ

हे महादेवी! बिना बजाये ही गम्भीर स्वर से बजने लगे, गान करते गन्धर्वों और नृत्य करती अप्सराओं के समूहों के साथ।

श्लोक 191 (skanda.7.11.191)

अवाद्यंत ततस्तत्र वेणुवीणादिझर्झराः। पणवाः पुष्कराश्चैव मृदंगपटहानकाः

avādyaṁta tatastatra veṇuvīṇādijharjharāḥ| paṇavāḥ puṣkarāścaiva mṛdaṁgapaṭahānakāḥ

फिर वहाँ बाँसुरी, वीणा, झर्झर, पणव, पुष्कर, मृदंग, पटह और आनक बजने लगे।

श्लोक 192 (skanda.7.11.192)

तूर्यवादित्रघोषैश्च सर्वं कोलाहलीकृतम्। ततः कृतांजलिपुटा भक्तिनम्रात्ममूर्त्तयः

tūryavāditraghoṣaiśca sarvaṁ kolāhalīkṛtam| tataḥ kṛtāṁjalipuṭā bhaktinamrātmamūrttayaḥ

तुरही और वाद्य-यन्त्रों की ध्वनियों से सब कुछ कोलाहलमय हो गया। तब हाथ जोड़े हुए, भक्तिपूर्वक नतमस्तक होकर।

श्लोक 193 (skanda.7.11.193)

ततः कलकले तस्मिन्सर्वदेवसमागमे। संवत्सरं भ्रमस्थस्य विश्वकर्मा रवेस्ततः

tataḥ kalakale tasmintsarvadevasamāgame| saṁvatsaraṁ bhramasthasya viśvakarmā ravestataḥ

फिर उस कोलाहलमय सम्पूर्ण देव-समागम में, एक वर्ष तक चक्कर लगाते रहे सूर्य के तेज को विश्वकर्मा ने।

श्लोक 194 (skanda.7.11.194)

तेजसः शातनं चक्रे स्तूयमानस्य दैवतैः। देवं चक्रे समारोप्य भ्रामयामास सूत्रभृत्

tejasaḥ śātanaṁ cakre stūyamānasya daivataiḥ| devaṁ cakre samāropya bhrāmayāmāsa sūtrabhṛt

देवताओं द्वारा स्तुति किये जाते हुए उस सूर्य के तेज को विश्वकर्मा ने कम करना जारी रखा। उस देव को चक्र पर चढ़ाकर, सूत्रधर ने उसे घुमाया।

श्लोक 195 (skanda.7.11.195)

मृत्पिंडवत्कुलालस्य संस्पृशन्क्षुरधारया। पतंगस्य स्तवं कुर्वन्विश्वकर्मा दिवस्पतेः

mṛtpiṁḍavatkulālasya saṁspṛśankṣuradhārayā| pataṁgasya stavaṁ kurvanviśvakarmā divaspateḥ

मिट्टी के पिण्ड के समान, कुम्हार की भाँति उस्तरे की धार से स्पर्श करते हुए, दिवस्पति सूर्य की स्तुति करते हुए विश्वकर्मा ने।

श्लोक 196 (skanda.7.11.196)

तेजसः षोडशं भागं मण्डलस्थमधारयत्। शातितं तस्य तत्तेजो यावत्पादौ वरानने

tejasaḥ ṣoḍaśaṁ bhāgaṁ maṇḍalasthamadhārayat| śātitaṁ tasya tattejo yāvatpādau varānane

उसके तेज का सोलहवाँ भाग मण्डल-रूप में रख छोड़ा। हे वरानने! उसका वह तेज तब तक छीला गया, जब तक वह पैरों तक न पहुँच गया।

श्लोक 197 (skanda.7.11.197)

यत्तस्य ऋङ्मयं तेजस्तत्प्रभासेऽपतत्प्रिये। यजुर्मयेन देवेशि भाविता द्यौर्महाप्रभोः

yattasya ṛṅmayaṁ tejastatprabhāse'patatpriye| yajurmayena deveśi bhāvitā dyaurmahāprabhoḥ

जो उसका ऋक्-मय तेज था, वह प्रभास में गिरा, हे प्रिये! यजुः-मय तेज से, हे देवेशि! उस महाप्रभु की स्वर्ग निर्मित हुई।

श्लोक 198 (skanda.7.11.198)

स्वर्गं साममयेनापि भूर्भुवःस्वरितिस्थितम्। ततस्तैस्तेजसो भागैर्दशभिः पंचभिस्तथा

svargaṁ sāmamayenāpi bhūrbhuvaḥsvaritisthitam| tatastaistejaso bhāgairdaśabhiḥ paṁcabhistathā

साम-मय भाग से स्वर्ग भी भूः-भुवः-स्वः के रूप में स्थित हुआ। फिर उन दस और पाँच तेज के भागों से।

श्लोक 199 (skanda.7.11.199)

तेन वै निर्मितं चक्रं विष्णोः शूलं हरस्य च। महाप्रभं महाकायं शिबिका धनदस्य च

tena vai nirmitaṁ cakraṁ viṣṇoḥ śūlaṁ harasya ca| mahāprabhaṁ mahākāyaṁ śibikā dhanadasya ca

उन्हीं से विष्णु का चक्र और शिव का शूल निर्मित हुआ, महाप्रभावशाली और महाकाय, तथा कुबेर की शिबिका।

श्लोक 200 (skanda.7.11.200)

दण्डः प्रेतपतेः शक्तिर्देवसेनापतेस्तथा। अन्येषां च सुराणां च अस्त्राण्युक्तानि यानि वै

daṇḍaḥ pretapateḥ śaktirdevasenāpatestathā| anyeṣāṁ ca surāṇāṁ ca astrāṇyuktāni yāni vai

प्रेतपति का दण्ड और देवसेनापति की शक्ति, तथा अन्य देवताओं के जो अस्त्र कहे गये हैं।

श्लोक 201 (skanda.7.11.201)

यक्षविद्याधराणां च तानि चक्रे स विश्वकृत्। ततः षोडशमं भागं बिभर्त्ति भगवान्रविः। तत्तेजो रविभागश्च खस्थो विचरति प्रिये

yakṣavidyādharāṇāṁ ca tāni cakre sa viśvakṛt| tataḥ ṣoḍaśamaṁ bhāgaṁ bibhartti bhagavānraviḥ| tattejo ravibhāgaśca khastho vicarati priye

यक्षों और विद्याधरों के भी अस्त्र उस विश्वकर्मा ने बनाये। फिर भगवान सूर्य अपने तेज का सोलहवाँ भाग धारण करते हैं। हे प्रिये! सूर्य का वह भाग आकाश में स्थित होकर विचरण करता है।

श्लोक 202 (skanda.7.11.202)

इति शातिततेजाः स श्वशुरेणातिशोभनम्। वपुर्दधार मार्त्तंडः पुष्पबाणमनोरमम्

iti śātitatejāḥ sa śvaśureṇātiśobhanam| vapurdadhāra mārttaṁḍaḥ puṣpabāṇamanoramam

इस प्रकार अपने ससुर द्वारा तेज कम किये जाने पर, मार्तण्ड ने अत्यन्त शोभन और कामदेव के समान मनोहर शरीर धारण किया।

श्लोक 203 (skanda.7.11.203)

ततः सुरूप धृग्भानुरुत्तरानगमत्कुरून्। ददृशे तत्र संज्ञां तु वडवारूपधारिणीम्

tataḥ surūpa dhṛgbhānuruttarānagamatkurūn| dadṛśe tatra saṁjñāṁ tu vaḍavārūpadhāriṇīm

फिर उस सुन्दर रूप को धारण किये भानु उत्तरकुरु गये। वहाँ उन्होंने घोड़ी का रूप धारण किये हुए संज्ञा को देखा।

श्लोक 204 (skanda.7.11.204)

अपापां सर्वभूतानां तपसा नियमेन च। सा च दृष्ट्वा तमायांतं परपुंसो विशंकया। जगाम संमुखं तस्य अश्वरूपधरस्य च

apāpāṁ sarvabhūtānāṁ tapasā niyamena ca| sā ca dṛṣṭvā tamāyāṁtaṁ parapuṁso viśaṁkayā| jagāma saṁmukhaṁ tasya aśvarūpadharasya ca

जो तप और नियम से सभी प्राणियों के प्रति निष्पाप थी। जब उसने उसे आते देखा, तो पराये पुरुष की आशंका से, वह उस अश्वरूपधारी सूर्य के सम्मुख गयी।

श्लोक 205 (skanda.7.11.205)

ततश्च नासिकायोगे तयोस्तत्र समेतयोः। नासत्यदस्रौ तनयावश्ववक्त्रौ विनिर्गतौ

tataśca nāsikāyoge tayostatra sametayoḥ| nāsatyadasrau tanayāvaśvavaktrau vinirgatau

फिर उन दोनों के नासिका-संयोग से, वहाँ दो अश्वमुखी पुत्र नासत्य और दस्र उत्पन्न हुए।

श्लोक 206 (skanda.7.11.206)

रेतसोन्ते च रेवन्तः खड्गी छत्री तनुत्रभृत्। पितुर्गृह्योत्तमं सोऽश्वं जातमात्रः पलायत

retasoṁte ca revaṁtaḥ khaḍgī chattrī tanutrabhṛt| piturgṛhyottamaṁ so'śvaṁ jātamātraḥ palāyata

और वीर्य के अन्त में रेवन्त उत्पन्न हुए, जो खड्गधारी, छत्रधारी और कवचधारी थे। जन्म लेते ही वे पिता के श्रेष्ठ अश्व को लेकर भाग गये।

श्लोक 207 (skanda.7.11.207)

स तस्मिन्सकृदारूढस्तमश्वं नैव मुंचति। ततोर्केण समादिष्टौ दंडनायकपिंगलौ

sa tasminsakṛdārūḍhastamaśvaṁ naiva muṁcati| tatorkeṇa samādiṣṭau daṁḍanāyakapiṁgalau

एक बार उस अश्व पर चढ़कर वह उसे छोड़ता ही नहीं था। तब सूर्य ने दण्डनायक और पिंगल को आदेश दिया।

श्लोक 208 (skanda.7.11.208)

अश्वं प्रत्यानयध्वं मे मा बलाच्छिद्रतोऽस्यतु। पार्श्वस्थौ तिष्ठतस्तस्य अश्वच्छिद्राभिकांक्षिणौ

aśvaṁ pratyānayadhvaṁ me mā balācchidrato'syatu| pārśvasthau tiṣṭhatastasya aśvacchidrābhikāṁkṣiṇau

मेरे अश्व को वापस लाओ, किन्तु बलपूर्वक छल से मत छीनना। वे दोनों उसके पार्श्व में खड़े होकर अश्व के छिद्र की प्रतीक्षा करने लगे।

श्लोक 209 (skanda.7.11.209)

न च च्छिद्रं लभेते तौ तस्याद्यापि महात्मनः। अग्रे गच्छति रेवंते पृष्ठगौ दण्डपिंगलौ

na ca chidraṁ labhete tau tasyādyāpi mahātmanaḥ| agre gacchati revaṁte pṛṣṭhagau daṇḍapiṁgalau

किन्तु उस महात्मा का वह अवसर वे आज तक नहीं पा सके। रेवन्त आगे-आगे चलते हैं, दण्ड और पिंगल उनके पीछे-पीछे।

श्लोक 210 (skanda.7.11.210)

उत्तरेभ्यः कुरुभ्यस्तु निर्गतौ वेगवत्तरौ। दक्षिणं भारतं प्राप्तौ यत्र क्षेत्र प्रभासिकम्

uttarebhyaḥ kurubhyastu nirgatau vegavattarau| dakṣiṇaṁ bhārataṁ prāptau yatra kṣetra prābhāsikam

उत्तरकुरु से निकलकर वे दोनों अत्यन्त वेगपूर्वक चले और दक्षिण भारत पहुँचे, जहाँ प्राभासिक क्षेत्र है।

श्लोक 211 (skanda.7.11.211)

अत्यर्थं वेगखिन्नौ तौ स च रेवंतकोऽपि हि। प्रस्विन्नगात्रः सोच्छ्वासो रेवंतस्तत्र संस्थितः

atyarthaṁ vegakhinnau tau sa ca revaṁtako'pi hi| prasvinnagātraḥ socchvāsaḥ revaṁtastatra saṁsthitaḥ

वे दोनों अत्यन्त वेग से थक गये, और स्वयं रेवन्त भी थक गये। पसीने से लथपथ, हाँफते हुए रेवन्त वहीं ठहर गये।

श्लोक 212 (skanda.7.11.212)

मुहूर्तेन समाक्रान्तं लक्षयोजनमंडलम्। उत्तराद्दक्षिणं देवि रेवतेन महात्मना

muhūrtena samākrāntaṁ lakṣayojanamaṁḍalam| uttarāddakṣiṇaṁ devi revatena mahātmanā

एक मुहूर्त में ही, हे देवी! महात्मा रेवत ने उत्तर से दक्षिण तक एक लाख योजन के मण्डल को पार कर लिया।

श्लोक 213 (skanda.7.11.213)

स्विन्नगात्रस्ततो देवि प्रभासे समवस्थितः। दण्डपिंगलकसंयुक्तो ह्यश्वारूढः स तिष्ठति

svinnagātrastato devi prabhāse samavasthitaḥ| daṇḍapiṁgalakasaṁyukto hyaśvārūḍhaḥ sa tiṣṭhati

अपने पसीने से भीगे शरीर के साथ वे, हे देवी! प्रभास में स्थित हो गये। दण्ड और पिंगल के साथ, अश्व पर आरूढ़ होकर वे वहीं स्थित हैं।

श्लोक 214 (skanda.7.11.214)

सावित्र्या नैर्ऋते भागे नातिदूरे व्यवस्थितः। राज्ञीपुत्रो यतो देवि राजा भट्टारकस्ततः

sāvitryā nairṛte bhāge nātidūre vyavasthitaḥ| rājñīputro yato devi rājā bhaṭṭārakastataḥ

सावित्री के नैर्ऋत्य भाग में, अधिक दूर नहीं, वे स्थित हैं। हे देवी! चूँकि वे रानी के पुत्र हैं, इसलिए वे राजा भट्टारक कहलाते हैं।

श्लोक 215 (skanda.7.11.215)

लोके ख्यातिं समायाति राजभट्टारिकेति च। गुह्यभट्टारकत्वे च रेवंतो विनियोजितः

loke khyātiṁ samāyāti rājabhaṭṭāriketi ca| guhyabhaṭṭārakatve ca revaṁto viniyojitaḥ

संसार में वे राजभट्टारिका नाम से भी विख्यात हुए। रेवन्त को गुह्य-भट्टारक पद पर भी नियुक्त किया गया।

श्लोक 216 (skanda.7.11.216)

एवमभ्येत्याह ततो भगवाँल्लोकतापनः। त्वमप्यशेषलोकस्य पूज्यो वत्स भविष्यसि

evamabhyetyāha tato bhagavām̐llokatāpanaḥ| tvamapyaśeṣalokasya pūjyo vatsa bhaviṣyasi

इस प्रकार आकर भगवान लोकतापन ने कहा—हे वत्स! तुम भी सम्पूर्ण लोक के पूज्य बनोगे।

श्लोक 217 (skanda.7.11.217)

अरण्ये च महादावे वैरिदस्युभयेषु च। त्वां स्मरिष्यंति ये मर्त्त्या मोक्ष्यन्ते ते महापदः

araṇye ca mahādāve vairidasyubhayeṣu ca| tvāṁ smariṣyaṁti ye marttyā mokṣyaṁte te mahāpadaḥ

वन में, महाभीषण अग्नि में, शत्रु और डाकुओं के भय में - जो मनुष्य तुम्हारा स्मरण करेंगे, वे महाविपत्ति से मुक्त हो जाएँगे।

श्लोक 218 (skanda.7.11.218)

क्षेममृद्धिं सुखं राज्यमारोग्यं कीर्तिमुन्नतिम्। नराणामतितुष्टस्त्वं पूजितः संप्रदास्यसि

kṣemamṛddhiṁ sukhaṁ rājyamārogyaṁ kīrtimunnatim| narāṇāmatituṣṭastvaṁ pūjitaḥ saṁpradāsyasi

मनुष्यों को तुम, पूजित होकर अत्यन्त प्रसन्न होकर, क्षेम, समृद्धि, सुख, राज्य, आरोग्य, कीर्ति और उन्नति प्रदान करोगे।

श्लोक 219 (skanda.7.11.219)

अश्विनौ देवभिषजौ कृतौ पित्रा महात्मना। धर्मदृष्टिर्यमश्चासौ समो मित्रे तथाऽहिते

aśvinau devabhiṣajau kṛtau pitrā mahātmanā| dharmadṛṣṭiryamaścāsau samo mitre tathā'hite

महात्मा पिता ने अश्विनी कुमारों को देवताओं के वैद्य बनाया। यह यम धर्म-दृष्टि वाला और मित्र तथा शत्रु के प्रति समान है।

श्लोक 220 (skanda.7.11.220)

ततो नियोगं तं चास्य चकार तिमिरापहः। यमुनां च नदीं चक्रे कलिन्दान्तरवाहिनीम्

tato niyogaṁ taṁ cāsya cakāra timirāpahaḥ| yamunāṁ ca nadīṁ cakre kalindāntaravāhinīm

फिर उस अन्धकार-नाशक सूर्य ने उसे यह कार्यभार सौंपा। यमुना नदी को उन्होंने कलिन्द पर्वत के बीच से बहने वाली नदी बनाया।

श्लोक 221 (skanda.7.11.221)

छायासंज्ञासुतश्चापि सावर्णिस्तु महायशाः। भाव्यः सोनागते काले मनुः सावर्णिकोष्टमः

chāyāsaṁjñāsutaścāpi sāvarṇistu mahāyaśāḥ| bhāvyaḥ sonāgate kāle manuḥ sāvarṇikoṣṭamaḥ

छाया-संज्ञा का पुत्र सावर्णि, जो महायशस्वी है, वह आने वाले काल में आठवें सावर्णि मनु होगा।

श्लोक 222 (skanda.7.11.222)

मेरुपृष्ठे तपो घोरमद्यापि चरति प्रभुः। भ्राता शनैश्चरस्तस्य ग्रहोऽभूच्च प्रिये ध्रुवम्

merupṛṣṭhe tapo ghoramadyāpi carati prabhuḥ| bhrātā śanaiścarastasya graho'bhūcca priye dhruvam

वह प्रभु आज भी मेरु के शिखर पर घोर तप कर रहे हैं। हे प्रिये! उनके भाई शनैश्चर निश्चय ही ग्रह बने।

श्लोक 223 (skanda.7.11.223)

एवं तेभ्यो वरान्दत्त्वा रेवंतस्यापि भास्करः। पुनर्नाम निरुक्तं स रेवंतस्याकरोत्प्रमुः

evaṁ tebhyo varāndattvā revaṁtasyāpi bhāskaraḥ| punarnāma niruktaṁ sa revaṁtasyākarotpramuḥ

इस प्रकार उन सबको वर देकर, भास्कर ने रेवन्त के नाम की भी निरुक्ति की, उस प्रभु ने।

श्लोक 224 (skanda.7.11.224)

एवंगच्छत्यसौ यस्मात्संज्ञायाः शांतिदः सुतः। अश्वानामाधिपत्ये तु भानुना च नियोजितः

evaṁgacchatyasau yasmātsaṁjñāyāḥ śāṁtidaḥ sutaḥ| aśvānāmādhipatye tu bhānunā ca niyojitaḥ

चूँकि वह इस प्रकार जाता है, इसलिए संज्ञा का यह शान्ति देने वाला पुत्र 'रेवन्त' कहलाया, और भानु द्वारा अश्वों के अधिपति पद पर नियुक्त किया गया।

श्लोक 225 (skanda.7.11.225)

क्षेमेण गच्छतेऽध्वानं यस्तु पूजयते पथि। सुखप्रसाद्यो मर्त्त्यानां सदा च वरवर्णिनि

kṣemeṇa gacchate'dhvānaṁ yastu pūjayate pathi| sukhaprasādyo marttyānāṁ sadā ca varavarṇini

जो भी मार्ग में उसकी पूजा करता है, वह मार्ग में क्षेमपूर्वक यात्रा करता है। हे वरवर्णिनि! वह मनुष्यों के लिए सदा सुखपूर्वक प्रसन्न होने वाला है।

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