प्रभास खण्ड · अध्याय 12
यमेश्वरोत्पत्तिवर्णनम्
श्लोक 1 (skanda.7.12.1)
ईश्वर उवाच। या संज्ञा सा स्मृता राज्ञी छाया या सा तु निक्षुभा। राजृ दीप्तौ स्मृतो धातू राजा राजति यः सदा
īśvara uvāca| yā saṁjñā sā smṛtā rājñī chāyā yā sā tu nikṣubhā| rājṛ dīptau smṛto dhātū rājā rājati yaḥ sadā
ईश्वर ने कहा—जो संज्ञा है, वही रानी कहलाती है; जो छाया है, वही निक्षुभा है। 'राजृ' धातु दीप्ति के अर्थ में स्मरण की जाती है, जो सदा राजता है, वह राजा है।
श्लोक 2 (skanda.7.12.2)
अधिकं सर्वभूतेभ्यस्तस्माद्राजा स उच्यते। राजपत्नी तु सा यस्मात्तस्माद्राज्ञी प्रकीर्तिता
adhikaṁ sarvabhūtebhyastasmādrājā sa ucyate| rājapatnī tu sā yasmāttasmādrājñī prakīrtitā
समस्त प्राणियों से अधिक होने के कारण वह राजा कहलाता है। और चूँकि वह राजा की पत्नी है, इसलिए वह रानी कही गयी है।
श्लोक 3 (skanda.7.12.3)
क्षुभ संचलने धातुर्निश्चला तेन निक्षुभा। भवंति ह्यथवा यस्मात्स्वांगीयाः क्षुद्विवर्जिताः
kṣubha saṁcalane dhāturniścalā tena nikṣubhā| bhavaṁti hyathavā yasmātsvāṁgīyāḥ kṣudvivarjitāḥ
'क्षुभ' धातु चलायमान होने के अर्थ में है; चूँकि वह निश्चल है, इसलिए वह निक्षुभा है। अथवा, चूँकि उसके अपने अंगज सन्तान क्षुधा-रहित होते हैं।
श्लोक 4 (skanda.7.12.4)
छाया तां विशते दिव्या स्मृता सा तेन निक्षुभा। सांप्रतं वर्तते योऽयं मनुर्लोके महामते
chāyā tāṁ viśate divyā smṛtā sā tena nikṣubhā| sāṁprataṁ vartate yo'yaṁ manurloke mahāmate
वह दिव्य छाया उसमें प्रवेश करती है, इसी से वह निक्षुभा स्मरण की गयी है। हे महामते! जो यह मनु अभी संसार में वर्तमान हैं।
श्लोक 5 (skanda.7.12.5)
तस्यान्ववाये जातस्तु शंखचकगदाधरः। यमस्तु मात्रा संशप्तो हीनपादो धरातले
tasyānvavāye jātastu śaṁkhacakagadādharaḥ| yamastu mātrā saṁśapto hīnapādo dharātale
उसी की वंश-परम्परा में शंख, चक्र और गदा धारण करने वाला उत्पन्न हुआ। यम, जो अपनी माता द्वारा शापित होकर धरातल पर पैर से हीन हुआ।
श्लोक 6 (skanda.7.12.6)
प्रभासक्षेत्रमासाद्य चचार विपुलं तपः। वर्षाणामयुतं साग्रं लिंगं पूजितवान्प्रिये
prabhāsakṣetramāsādya cacāra vipulaṁ tapaḥ| varṣāṇāmayutaṁ sāgraṁ liṁgaṁ pūjitavānpriye
प्रभास क्षेत्र में पहुँचकर विशाल तप किया, हे प्रिये! दस हज़ार वर्षों से भी अधिक समय तक लिंग की पूजा की।
श्लोक 7 (skanda.7.12.7)
तुष्टश्चाहं ततस्तस्य वराणां च शतं ददौ। अद्यापि तत्र देवेशि यमेश्वरमिति श्रुतम्। यमद्वितीयायां दृष्ट्वा यमलोकं न पश्यति
tuṣṭaścāhaṁ tatastasya varāṇāṁ ca śataṁ dadau| adyāpi tatra deveśi yameśvaramiti śrutam| yamadvitīyāyāṁ dṛṣṭvā yamalokaṁ na paśyati
मैं प्रसन्न हुआ और उसे सौ वरदान दिये। हे देवेशि! आज भी वहाँ यमेश्वर नाम से यह सुना जाता है। यमद्वितीया के दिन उसका दर्शन करने पर मनुष्य यमलोक को नहीं देखता।