प्रभास खण्ड · अध्याय 13
प्रभासपवित्रनामकरणार्कस्थलोत्पत्तिवर्णनम्
श्लोक 1 (skanda.7.13.1)
देव्युवाच। यदा भ्रमिस्थः सविता तक्षितः क्षुरधारया। श्वशुरेण महादेव जामाता प्रीतिपूर्वकम्
devyuvāca| yadā bhramisthaḥ savitā takṣitaḥ kṣuradhārayā| śvaśureṇa mahādeva jāmātā prītipūrvakam
देवी ने कहा—हे महादेव! जब चक्र पर स्थित सूर्य को ससुर ने प्रेमपूर्वक उस्तरे की धार से छीला।
श्लोक 2 (skanda.7.13.2)
तत्तेजः शातितं भूरि प्रभासे यत्पपात वै। तदभूत्किं तदा देव प्रभासात्कथयस्व मे
tattejaḥ śātitaṁ bhūri prabhāse yatpapāta vai| tadabhūtkiṁ tadā deva prabhāsātkathayasva me
जो प्रचुर तेज पार किया गया, जो प्रभास में गिरा - हे देव! तब वह क्या हुआ, प्रभास से उसका आरम्भ बताइये।
श्लोक 3 (skanda.7.13.3)
ईश्वर उवाच। शृणु देवि प्रवक्ष्यामि सूर्यमाहात्म्यमुत्तमम्। यच्छ्रुत्वा मानवो भक्त्या मुच्यते सर्वपातकैः
īśvara uvāca| śṛṇu devi pravakṣyāmi sūryamāhātmyamuttamam| yacchrutvā mānavo bhaktyā mucyate sarvapātakaiḥ
ईश्वर ने कहा—हे देवी! सुनो, मैं सूर्य का उत्तम माहात्म्य बताता हूँ, जिसे भक्तिपूर्वक सुनकर मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 4 (skanda.7.13.4)
देहावतारो देवस्य प्रभासेऽर्कस्थलस्य च। पुराणाख्यानमाचक्षे तव देवि यशस्विनि
dehāvatāro devasya prabhāse'rkasthalasya ca| purāṇākhyānamācakṣe tava devi yaśasvini
प्रभास में देव के देह-अवतार और अर्कस्थल का यह पुराण-आख्यान, हे यशस्विनी देवी! मैं तुम्हें बताता हूँ।
श्लोक 5 (skanda.7.13.5)
शाकद्वीपे महादेवि भ्रमिस्थस्य तदा रवेः। वर्षाणां तु शतं साग्रं तक्ष्यमाणे विभावसौ
śākadvīpe mahādevi bhramisthasya tadā raveḥ| varṣāṇāṁ tu śataṁ sāgraṁ takṣyamāṇe vibhāvasau
हे महादेवी! शाकद्वीप में जब चक्र पर स्थित सूर्य को, विभावसु को, सौ से भी अधिक वर्षों तक छीला जाता रहा।
श्लोक 6 (skanda.7.13.6)
यदाद्य भागजं तेजस्तत्प्रभासेऽपतत्प्रिये। पतितं तत्र तत्तेजः स्थलाकारं व्यजायत
yadādya bhāgajaṁ tejastatprabhāse'patatpriye| patitaṁ tatra tattejaḥ sthalākāraṁ vyajāyata
जब उसका पहला भाग जनित तेज प्रभास में गिरा, हे प्रिये! वहाँ गिरा हुआ वह तेज स्थल के आकार में परिणत हो गया।
श्लोक 7 (skanda.7.13.7)
जांबूनदमयं देवि तत्पूर्वमभवत्क्षितौ। तिष्यमाहात्म्ययोगेन शैलीभूतं च सांप्रतम्
jāmbūnadamayaṁ devi tatpūrvamabhavatkṣitau| tiṣyamāhātmyayogena śailībhūtaṁ ca sāṁpratam
हे देवी! वह पहले पृथ्वी पर स्वर्णमय था, और तिष्य के माहात्म्य के योग से अब वह पाषाणमय हो गया है।
श्लोक 8 (skanda.7.13.8)
तत्र चार्कमयं रूपं कृत्वा देवो दिवाकरः। उत्पन्नः सर्वभूतानां हिताय धरणीतले
tatra cārkamayaṁ rūpaṁ kṛtvā devo divākaraḥ| utpannaḥ sarvabhūtānāṁ hitāya dharaṇītale
वहाँ अर्कमय रूप धारण करके देव दिवाकर सम्पूर्ण प्राणियों के हित के लिए इस धरातल पर उत्पन्न हुए।
श्लोक 9 (skanda.7.13.9)
हिरण्यगर्भनामेति कृते सूर्येति कीर्तितम्। त्रेतायां सवितानाम द्वापरे भास्करः स्मृतः
hiraṇyagarbhanāmeti kṛte sūryeti kīrtitam| tretāyāṁ savitānāma dvāpare bhāskaraḥ smṛtaḥ
कृतयुग में यह हिरण्यगर्भ और सूर्य नाम से कीर्तित हुआ, त्रेता में सविता नाम से, द्वापर में भास्कर नाम से स्मरण किया गया।
श्लोक 10 (skanda.7.13.10)
कलौ चार्कस्थलोनाम त्रिषु लोकेषु कीर्तितः। अवतीर्णमिदं देवि स्वयमेव प्रतिष्ठितम्
kalau cārkasthalonāma triṣu lokeṣu kīrtitaḥ| avatīrṇamidaṁ devi svayameva pratiṣṭhitam
कलियुग में यह अर्कस्थल नाम से तीनों लोकों में कीर्तित हुआ। यह अवतरित होकर स्वयं ही प्रतिष्ठित हुआ है, हे देवी!
श्लोक 11 (skanda.7.13.11)
यदा स्वारोचिषो देवि द्वितीयोऽभून्मनुः पुरा। तस्मिन्कालेऽवतीर्णोऽसौ देवस्तत्र दिवाकरः
yadā svārociṣo devi dvitīyo'bhūnmanuḥ purā| tasminkāle'vatīrṇo'sau devastatra divākaraḥ
हे देवी! जब पूर्वकाल में स्वारोचिष नामक दूसरे मनु हुए, उसी काल में वहाँ देव दिवाकर अवतरित हुए।
श्लोक 12 (skanda.7.13.12)
भक्तिमुक्ति प्रदो देवि व्याधिदुःखविनाशकृत्। तस्य तेजोद्भवैर्व्याप्तं रेणुभिः पञ्चयोजनम्
bhaktimukti prado devi vyādhiduḥkhavināśakṛt| tasya tejodbhavairvyāptaṁ reṇubhiḥ pañcayojanam
हे देवी! भक्ति और मुक्ति देने वाले, व्याधि और दुःख का नाश करने वाले, उसके तेज से उत्पन्न कणों से पाँच योजन व्याप्त है।
श्लोक 13 (skanda.7.13.13)
दक्षिणोत्तरतो देवि पञ्चपूर्वापरेण तु। उत्तरेण समुद्रस्य यावन्माहेश्वरी नदी
dakṣiṇottarato devi pañcapūrvāpareṇa tu| uttareṇa samudrasya yāvanmāheśvarī nadī
हे देवी! दक्षिण-उत्तर में पाँच योजन तथा पूर्व-पश्चिम में भी पाँच योजन, उत्तर में समुद्र से लेकर माहेश्वरी नदी तक।
श्लोक 14 (skanda.7.13.14)
न्यंकुमत्याश्चापरतो यावदेव कृतस्मरम्। एतद्व्याप्तं महादेवि तत्तेजोरेणुभिः शुभैः
nyaṁkumatyāścāparato yāvadeva kṛtasmaram| etadvyāptaṁ mahādevi tattejoreṇubhiḥ śubhaiḥ
और न्यंकुमती नदी के पश्चिम से लेकर कृतस्मर तक - यह सब, हे महादेवी! उस तेज के शुभ कणों से व्याप्त है।
श्लोक 15 (skanda.7.13.15)
तस्य सूक्ष्मा प्रभा या तु आदितेजोविनिःसृता। तया व्याप्तं महादेवि यावद्द्वादशयोजनम्
tasya sūkṣmā prabhā yā tu āditejoviniḥsṛtā| tayā vyāptaṁ mahādevi yāvaddvādaśayojanam
उसकी सूक्ष्म प्रभा, जो आदि तेज से निःसृत हुई है, हे महादेवी! उससे बारह योजन तक व्याप्त है।
श्लोक 16 (skanda.7.13.16)
उत्तरे भास्करसुता दक्षिणे सरितां पतिः। पूर्वपश्चिमतो देवि रुक्मिणीद्वितयं स्मृतम्
uttare bhāskarasutā dakṣiṇe saritāṁ patiḥ| pūrvapaścimato devi rukmiṇīdvitayaṁ smṛtam
उत्तर में भास्कर-सुता, दक्षिण में सरितों का पति, पूर्व-पश्चिम में, हे देवी! दो रुक्मिणी नदियाँ स्मरण की गयी हैं।
श्लोक 17 (skanda.7.13.17)
एतस्मिन्नन्तरे देवि सौरं तेजः प्रसर्प्पितम्। तेन पावित्र्यमानीतं क्षेत्रं द्वादशयोजनम्
etasminnantare devi sauraṁ tejaḥ prasarppitam| tena pāvitryamānītaṁ kṣetraṁ dvādaśayojanam
इस अन्तराल में, हे देवी! सूर्य का तेज फैला हुआ है, जिससे बारह योजन का यह क्षेत्र पवित्रता को प्राप्त हुआ है।
श्लोक 18 (skanda.7.13.18)
तस्य मध्यस्य यन्मध्यं तद्गृहं मम सुन्दरि। तेजोमण्डलमध्यस्थं मम स्थानं महेश्वरि
tasya madhyasya yanmadhyaṁ tadgṛhaṁ mama sundari| tejomaṇḍalamadhyasthaṁ mama sthānaṁ maheśvari
उसके मध्य का जो मध्य है, वह मेरा घर है, हे सुन्दरि! तेज-मण्डल के मध्य में स्थित मेरा स्थान है, हे महेश्वरि!
श्लोक 19 (skanda.7.13.19)
चक्षुर्मंडलमध्ये तु यथा देवि कनीनिका। पूर्वपश्चिमतो देवि गोमुखादाऽऽश्वमेधिकम्
cakṣurmaṁḍalamadhye tu yathā devi kanīnikā| pūrvapaścimato devi gomukhādā'śvamedhikam
जैसे नेत्र-मण्डल के मध्य में पुतली होती है, वैसे ही, हे देवी! पूर्व-पश्चिम में गोमुख से लेकर अश्वमेधिक तक।
श्लोक 20 (skanda.7.13.20)
दक्षिणोत्तरतो देवि समुद्रात्कौरवेश्वरीम्। एतस्मिन्नंतरे क्षेत्रे क्षेत्रज्ञोऽहं वरानने
dakṣiṇottarato devi samudrātkauraveśvarīm| etasminnaṁtare kṣetre kṣetrajño'haṁ varānane
दक्षिण-उत्तर में, हे देवी! समुद्र से कौरवेश्वरी तक - इस क्षेत्र के भीतर मैं ही क्षेत्रज्ञ हूँ, हे वरानने!
श्लोक 21 (skanda.7.13.21)
यस्मादर्कस्य तेजोभिर्भासितं मम तद्गृहम्। तस्मात्प्रभासनामेति कल्पेऽस्मिन्प्रथितं प्रिये
yasmādarkasya tejobhirbhāsitaṁ mama tadgṛham| tasmātprabhāsanāmeti kalpe'sminprathitaṁ priye
चूँकि सूर्य के तेज से मेरा वह घर प्रकाशित हुआ, इसी कारण इस कल्प में यह प्रभास नाम से प्रसिद्ध हुआ, हे प्रिये!
श्लोक 22 (skanda.7.13.22)
तत्र पश्यति यः सूर्यमर्क्करूपं नरोत्तमः। सर्वपापविनिर्मुक्तः सूर्यलोके महीयते
tatra paśyati yaḥ sūryamarkkarūpaṁ narottamaḥ| sarvapāpavinirmuktaḥ sūryaloke mahīyate
जो उत्तम मनुष्य वहाँ अर्क-रूप सूर्य का दर्शन करता है, वह सब पापों से मुक्त होकर सूर्यलोक में पूजित होता है।
श्लोक 23 (skanda.7.13.23)
स स्नातः सर्वतीर्थेषु तेन चेष्टं महामखैः। सर्वदानानि दत्तानि पूर्वजास्तेन तोषिताः
sa snātaḥ sarvatīrtheṣu tena ceṣṭaṁ mahāmakhaiḥ| sarvadānāni dattāni pūrvajāstena toṣitāḥ
उसने मानो सब तीर्थों में स्नान कर लिया, उसने मानो महायज्ञों से यजन कर लिया। उसने मानो सब दान दे दिये, उसके पूर्वज उससे सन्तुष्ट हो गये।
श्लोक 24 (skanda.7.13.24)
अर्करूपी यतः सूर्यस्तत्र जातो महीतले। तस्मात्त्याज्यः सदा चार्को भोजनेऽत्र न संशयः
arkarūpī yataḥ sūryastatra jāto mahītale| tasmāttyājyaḥ sadā cārko bhojane'tra na saṁśayaḥ
चूँकि वहाँ अर्करूपी सूर्य इस भूतल पर उत्पन्न हुए, इसलिए यहाँ भोजन में अर्क का सदा त्याग करना चाहिए, इसमें कोई संशय नहीं।
श्लोक 25 (skanda.7.13.25)
यो दृष्ट्वार्कस्थलं मर्त्त्यश्चार्कपत्रेषु भुंजति। गोमांसभक्षणं तेन कृतं भवति भामिनि
yo dṛṣṭvārkasthalaṁ marttyaścārkapatreṣu bhuṁjati| gomāṁsabhakṣaṇaṁ tena kṛtaṁ bhavati bhāmini
जो मनुष्य अर्कस्थल का दर्शन करके अर्क-पत्तों पर भोजन करता है, हे भामिनी! उसके द्वारा मानो गोमांस-भक्षण किया गया समझना चाहिए।
श्लोक 26 (skanda.7.13.26)
भक्षितो भास्करस्तेन स कुष्ठी जायते नरः। तस्मात्सर्वप्रयत्नेन चार्कपत्राणि वर्जयेत्
bhakṣito bhāskarastena sa kuṣṭhī jāyate naraḥ| tasmātsarvaprayatnena cārkapatrāṇi varjayet
उसके द्वारा मानो भास्कर का भक्षण किया गया; वह मनुष्य कोढ़ी हो जाता है। इसलिए हर प्रकार से प्रयत्नपूर्वक अर्क-पत्तों का त्याग करना चाहिए।
श्लोक 27 (skanda.7.13.27)
यात्रायां प्रथमं देवि दृष्टो येनार्कभास्करः। तं दृष्ट्वा महिषीं दद्याद्ब्राह्मणाय विपश्चिते
yātrāyāṁ prathamaṁ devi dṛṣṭo yenārkabhāskaraḥ| taṁ dṛṣṭvā mahiṣīṁ dadyādbrāhmaṇāya vipaścite
हे देवी! यात्रा में जिसने सबसे पहले अर्क-भास्कर का दर्शन किया, वह उसे देखकर विद्वान ब्राह्मण को भैंस का दान दे।
श्लोक 28 (skanda.7.13.28)
ताम्रवर्णं रक्तवस्त्रं ततस्तुष्यति भास्करः। तस्य चैव तु सांनिध्ये वह्निकोणे व्यवस्थितम्
tāmravarṇaṁ raktavastraṁ tatastuṣyati bhāskaraḥ| tasya caiva tu sāṁnidhye vahnikoṇe vyavasthitam
ताम्रवर्ण की एक और लाल वस्त्र, तब भास्कर प्रसन्न होते हैं। उसी के सान्निध्य में, अग्निकोण में स्थित।
श्लोक 29 (skanda.7.13.29)
नातिदूरे महाभागे सिद्धेश्वरमिति स्मृतम्। सर्वसिद्धिप्रदं देवि लिंगं त्रैलोक्यपूजितम्
nātidūre mahābhāge siddheśvaramiti smṛtam| sarvasiddhipradaṁ devi liṁgaṁ trailokyapūjitam
बहुत दूर नहीं, हे महाभागे! सिद्धेश्वर नाम से स्मरण किया गया, सर्वसिद्धि देने वाला, त्रिलोक-पूजित लिंग है।
श्लोक 30 (skanda.7.13.30)
जैगीषव्येश्वरंनाम पूर्वं कृतयुगेऽभवत्। कलौ सिद्धेश्वरमिति प्रसिद्धिमगमत्प्रिये
jaigīṣavyeśvaraṁnāma pūrvaṁ kṛtayuge'bhavat| kalau siddheśvaramiti prasiddhimagamatpriye
पूर्वकाल में कृतयुग में इसका नाम जैगीषव्येश्वर था। हे प्रिये! कलियुग में यह सिद्धेश्वर नाम से प्रसिद्धि को प्राप्त हुआ।
श्लोक 31 (skanda.7.13.31)
तं दृष्ट्वा मनुजो देवि सर्वसिद्धिमवाप्नुयात्। तत्रैव देवदेवेशि नातिदूरे व्यवस्थितम्
taṁ dṛṣṭvā manujo devi sarvasiddhimavāpnuyāt| tatraiva devadeveśi nātidūre vyavasthitam
उसका दर्शन करके, हे देवी! मनुष्य सब सिद्धियों को प्राप्त कर लेता है। वहीं, हे देवाधिदेवेशि! न अधिक दूर पर स्थित है।
श्लोक 32 (skanda.7.13.32)
सूर्यदक्षिणनैर्ऋत्ये पातालविवरं प्रिये। मंदेहा राक्षसा यत्र तथा शालकटंकटाः
sūryadakṣiṇanairṛtye pātālavivaraṁ priye| maṁdehā rākṣasā yatra tathā śālakaṭaṁkaṭāḥ
सूर्य के दक्षिण-नैर्ऋत्य में, हे प्रिये! पाताल का द्वार है, जहाँ मन्देह राक्षस और शालकटंकट राक्षस रहते थे।
श्लोक 33 (skanda.7.13.33)
सूर्यस्य तेजसा दग्धाः पातालमगमन्पुरा। कलौ तद्द्वारमेवास्ति न पाताले गतिः प्रिये
sūryasya tejasā dagdhāḥ pātālamagamanpurā| kalau taddvāramevāsti na pātāle gatiḥ priye
सूर्य के तेज से दग्ध होकर वे पूर्वकाल में पाताल चले गये। कलियुग में वह द्वार तो है, किन्तु उससे पाताल तक जाना सम्भव नहीं, हे प्रिये!
श्लोक 34 (skanda.7.13.34)
योगिन्यस्तत्र रक्षंति ब्राह्म्याद्या मातरस्तथा। माघेकृष्णचतुर्दश्यां रात्रौ मातृगणान्यजेत्। बलिपुष्पोपहारैश्च ततः सिद्धिर्भविष्यति
yoginyastatra rakṣaṁti brāhmyādyā mātarastathā| māghekṛṣṇacaturdaśyāṁ rātrau mātṛgaṇānyajet| balipuṣpopahāraiśca tataḥ siddhirbhaviṣyati
वहाँ योगिनियाँ और ब्राह्मी आदि मातृकाएँ रक्षा करती हैं। माघ मास की कृष्ण चतुर्दशी की रात्रि में मातृगणों का पूजन करे। बलि, पुष्प और उपहारों से तब सिद्धि प्राप्त होगी।
श्लोक 35 (skanda.7.13.35)
इति हि सकलधर्मभावहेतोर्हरकमलासनविष्णुसंस्तुतस्य। तनुपरिलिखनं निशम्य भानोर्व्रजति दिवाकरलोकमायुषोंऽते
iti hi sakaladharmabhāvahetorharakamalāsanaviṣṇusaṁstutasya| tanuparilikhanaṁ niśamya bhānorvrajati divākaralokamāyuṣoṁ'te
इस प्रकार, सम्पूर्ण धर्म-भाव के हेतुभूत, हर, कमलासन और विष्णु द्वारा संस्तुत उस सूर्य के शरीर के छीले जाने के वृत्तान्त को सुनकर, मनुष्य आयु के अन्त में दिवाकर के लोक को प्राप्त होता है।