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प्रभास खण्ड · अध्याय 14

सिद्धेश्वरोत्पत्तिवर्णनम्

अध्याय 13अध्याय-सूचीअध्याय 15

श्लोक 1 (skanda.7.14.1)

देव्युवाच। यदेतद्भवता प्रोक्तं माहात्म्यं सूर्यदैवतम्। तन्मे विस्तरतो ब्रूहि देवदेव जगत्पते

devyuvāca| yadetadbhavatā proktaṁ māhātmyaṁ sūryadaivatam| tanme vistarato brūhi devadeva jagatpate

देवी ने कहा—आपने जो यह सूर्य-देवता का माहात्म्य बताया, हे देवाधिदेव! हे जगत्पते! वह मुझे विस्तार से कहिये।

श्लोक 2 (skanda.7.14.2)

कथमर्कस्थलो भूतः प्रभासक्षेत्रभूषणः। पूजनीयो महादेवः सम्यग्यात्राफलेप्सुभिः

kathamarkasthalo bhūtaḥ prabhāsakṣetrabhūṣaṇaḥ| pūjanīyo mahādevaḥ samyagyātrāphalepsubhiḥ

अर्कस्थल, जो प्रभास क्षेत्र का आभूषण है, कैसे हुआ? यह महादेव, जो यात्रा के फल की इच्छा रखने वालों द्वारा भलीभाँति पूजनीय है।

श्लोक 3 (skanda.7.14.3)

के मंत्राः किं विधानं तु केषु पर्वसु पूजयेत्। जैगीषव्येश्वरो भूत्वा ह्यभूत्सिद्धेश्वरः कथम्। तन्मे कथय देवेश विस्तरात्सर्वमेव हि

ke maṁtrāḥ kiṁ vidhānaṁ tu keṣu parvasu pūjayet| jaigīṣavyeśvaro bhūtvā hyabhūtsiddheśvaraḥ katham| tanme kathaya deveśa vistarātsarvameva hi

क्या मंत्र हैं, क्या विधान है, किन पर्वों में पूजा करनी चाहिए? जैगीषव्येश्वर होकर वह सिद्धेश्वर कैसे हुआ? हे देवेश! यह सब मुझे विस्तार से कहिये।

श्लोक 4 (skanda.7.14.4)

पाताले विवरं तत्र योगिन्यस्तत्र किं पुरा। तथा मातृगणश्चैव कथमेतदभूत्पुरा

pātāle vivaraṁ tatra yoginyastatra kiṁ purā| tathā mātṛgaṇaścaiva kathametadabhūtpurā

वहाँ पाताल का द्वार कैसे बना, वहाँ योगिनियाँ पूर्वकाल में कैसे आयीं, तथा मातृगण भी - यह सब पूर्वकाल में कैसे हुआ?

श्लोक 5 (skanda.7.14.5)

एतत्सर्वमशेषेण दयां कृत्वा जगत्पते। ममाचक्ष्व विरूपाक्ष यद्यहं ते प्रिया हर

etatsarvamaśeṣeṇa dayāṁ kṛtvā jagatpate| mamācakṣva virūpākṣa yadyahaṁ te priyā hara

यह सब सम्पूर्ण रूप से, हे जगत्पते! दया करके मुझे बताइये। हे विरूपाक्ष! हे हर! यदि मैं तुम्हारी प्रिया हूँ।

श्लोक 6 (skanda.7.14.6)

ईश्वर उवाच। साधु पृष्टं त्वया देवि कथयामि समासतः। सिद्धेश्वरो ह्यभूद्येन जैगीषव्येश्वरो हरः

īśvara uvāca| sādhu pṛṣṭaṁ tvayā devi kathayāmi samāsataḥ| siddheśvaro hyabhūdyena jaigīṣavyeśvaro haraḥ

ईश्वर ने कहा—हे देवी! तुमने भलीभाँति पूछा है, मैं संक्षेप में कहता हूँ। जिस कारण जैगीषव्येश्वर हर सिद्धेश्वर हुआ।

श्लोक 7 (skanda.7.14.7)

पूजाविधानं विस्तीर्य तन्मे निगदतः शृणु। आसीदस्मिन्कृते देवि सर्व ज्ञानविशारदः

pūjāvidhānaṁ vistīrya tanme nigadataḥ śṛṇu| āsīdasminkṛte devi sarva jñānaviśāradaḥ

पूजा-विधान का विस्तार करते हुए, मेरे कहने को सुनो। इस कृतयुग में, हे देवी! एक सर्वज्ञानविशारद पुरुष था।

श्लोक 8 (skanda.7.14.8)

पुत्रः शतकलाकस्य जैगीषव्य इति श्रुतः। प्रभासक्षेत्रमासाद्य स चक्रे दुश्चरं तपः

putraḥ śatakalākasya jaigīṣavya iti śrutaḥ| prabhāsakṣetramāsādya sa cakre duścaraṁ tapaḥ

शतकलाक का पुत्र, जो जैगीषव्य नाम से सुना जाता था, उसने प्रभास क्षेत्र को प्राप्त कर दुष्कर तप किया।

श्लोक 9 (skanda.7.14.9)

अतिष्ठद्वायुभक्षश्च वर्षाणां शतकं किल। अम्बुभक्षः सहस्रं तु शाकाहारोऽयुतं तथा

atiṣṭhadvāyubhakṣaśca varṣāṇāṁ śatakaṁ kila| ambubhakṣaḥ sahasraṁ tu śākāhāro'yutaṁ tathā

वह वायु-भक्षण करते हुए सौ वर्षों तक स्थित रहा। फिर जल-भक्षण करते हुए एक हज़ार वर्षों तक, और शाकाहार से दस हज़ार वर्षों तक।

श्लोक 10 (skanda.7.14.10)

चांद्रायणसहस्रं च कृतं सांतपनं पुनः। शोषयित्वा मिताहारो दिग्वासाः समपद्यत

cāṁdrāyaṇasahasraṁ ca kṛtaṁ sāṁtapanaṁ punaḥ| śoṣayitvā mitāhāro digvāsāḥ samapadyata

फिर एक हज़ार चान्द्रायण व्रत और सान्तपन व्रत किया। शरीर को सुखाकर, मिताहारी और दिगम्बर हो गया।

श्लोक 11 (skanda.7.14.11)

पूर्वे कल्पे स्वयं भूतं महोदयमिति श्रुतम्। स लिंगं देवदेवस्य प्रतिष्ठाप्यार्चयन्नपि

pūrve kalpe svayaṁ bhūtaṁ mahodayamiti śrutam| sa liṁgaṁ devadevasya pratiṣṭhāpyārcayannapi

पूर्व कल्प में स्वयं उत्पन्न हुआ, जो महोदय नाम से सुना जाता था, उस देवाधिदेव के लिंग को उसने प्रतिष्ठित करके पूजा भी की।

श्लोक 12 (skanda.7.14.12)

भस्मशायी भस्मदिग्धो नृत्त गीतैरतोषयत्। जपेन वृषनादैश्च तपसा भावितः शुचिः

bhasmaśāyī bhasmadigdho nṛtta gītairatoṣayat| japena vṛṣanādaiśca tapasā bhāvitaḥ śuciḥ

भस्म पर शयन करते हुए, भस्म से लिप्त होकर, नृत्य और गान से उसने संतुष्ट किया। जप और वृष-नाद से, तप से भावित, पवित्र होकर।

श्लोक 13 (skanda.7.14.13)

तमेवं तोषयाणं तु भक्त्या परमया युतम्। भगवांश्च तमभ्येत्य इदं वचनमब्रवीत्

tamevaṁ toṣayāṇaṁ tu bhaktyā paramayā yutam| bhagavāṁśca tamabhyetya idaṁ vacanamabravīt

उसे इस प्रकार परम भक्ति से युक्त होकर संतुष्ट करते देख, भगवान उसके पास आकर यह वचन बोले।

श्लोक 14 (skanda.7.14.14)

जैगीषव्य महाबुद्धे पश्य मां दिव्यचक्षुषा। तुष्टोऽस्मि वरदश्चाहं ब्रूहि यत्ते मनोगतम्

jaigīṣavya mahābuddhe paśya māṁ divyacakṣuṣā| tuṣṭo'smi varadaścāhaṁ brūhi yatte manogatam

हे महाबुद्धिमान जैगीषव्य! दिव्य नेत्रों से मुझे देखो। मैं प्रसन्न हूँ और वरदान देने वाला हूँ, जो तुम्हारे मन में हो, वह कहो।

श्लोक 15 (skanda.7.14.15)

स एवमुक्तो देवेन देवं दृष्ट्वा त्रिलोचनम्। प्रणम्य शिरसा पादाविदं वचनमब्रवीत्

sa evamukto devena devaṁ dṛṣṭvā trilocanam| praṇamya śirasā pādāvidaṁ vacanamabravīt

इस प्रकार देव द्वारा कहे जाने पर, त्रिलोचन देव को देखकर, सिर से उनके चरणों में प्रणाम करके उसने यह वचन कहा।

श्लोक 16 (skanda.7.14.16)

जैगीषव्य उवाच। भगवन्देवदेवेश मम तुष्टो यदि प्रभो। ज्ञानयोगं हि मे देहि यः संसारनिकृन्तनम्

jaigīṣavya uvāca| bhagavandevadeveśa mama tuṣṭo yadi prabho| jñānayogaṁ hi me dehi yaḥ saṁsāranikṛntanam

जैगीषव्य ने कहा—हे भगवन्! हे देवाधिदेव! हे प्रभो! यदि आप मुझसे प्रसन्न हैं, तो मुझे वह ज्ञानयोग दीजिए, जो संसार का छेदन करने वाला है।

श्लोक 17 (skanda.7.14.17)

भगवन्नान्यदिच्छामि योगात्परतरं हितम्। त्वयि भक्तिश्च नित्यं मे देव्यां स्कन्दे गणेश्वरे

bhagavannānyadicchāmi yogātparataraṁ hitam| tvayi bhaktiśca nityaṁ me devyāṁ skande gaṇeśvare

हे भगवन्! योग से बढ़कर मुझे कोई अन्य कल्याण नहीं चाहिए। मेरी नित्य भक्ति आपमें, देवी में, स्कन्द में और गणेश्वर में हो।

श्लोक 18 (skanda.7.14.18)

न च व्याधिभयं भूयान्न च तेजोऽपमानता। अनुत्सेकं तथा क्षांतिं दमं शममथापि च

na ca vyādhibhayaṁ bhūyānna ca tejo'pamānatā| anutsekaṁ tathā kṣāṁtiṁ damaṁ śamamathāpi ca

मुझे व्याधि का भय न हो और तेज का अपमान भी न हो। तथा अहंकार-रहितता, क्षमा, दम और शम भी।

श्लोक 19 (skanda.7.14.19)

एतान्वरान्महादेव त्वदिच्छामि त्रिलोचन

etānvarānmahādeva tvadicchāmi trilocana

हे महादेव! हे त्रिलोचन! ये वरदान मैं आपसे चाहता हूँ।

श्लोक 20 (skanda.7.14.20)

ईश्वर उवाच। अजरश्चामरश्चैव सर्वशोकविवर्जितः। महायोगी महावीर्यो योगैश्वर्यसमन्वितः

īśvara uvāca| ajaraścāmaraścaiva sarvaśokavivarjitaḥ| mahāyogī mahāvīryo yogaiśvaryasamanvitaḥ

ईश्वर ने कहा—अजर, अमर और सब शोक से रहित होओगे। महान योगी, महान वीर्यवान, योग-ऐश्वर्य से युक्त।

श्लोक 21 (skanda.7.14.21)

प्रभावाच्चास्य क्षेत्रस्य गुह्यस्य मम शाश्वतम्। योगाष्टगुणमैश्वर्यं प्राप्स्यसे परमं महत्

prabhāvāccāsya kṣetrasya guhyasya mama śāśvatam| yogāṣṭaguṇamaiśvaryaṁ prāpsyase paramaṁ mahat

इस मेरे शाश्वत गुह्य क्षेत्र के प्रभाव से, तुम योग के आठों गुणों वाले परम महान ऐश्वर्य को प्राप्त करोगे।

श्लोक 22 (skanda.7.14.22)

भविष्यसि मुनिश्रेष्ठ योगाचार्यः सुविश्रुतः

bhaviṣyasi muniśreṣṭha yogācāryaḥ suviśrutaḥ

हे मुनिश्रेष्ठ! तुम विख्यात योगाचार्य बनोगे।

श्लोक 23 (skanda.7.14.23)

यश्चेदं त्वत्कृतं लिगं नियमेनार्चयिष्यति। सर्वपापविनिर्मुक्तो योगं दिव्यमवाप्स्यति

yaścedaṁ tvatkṛtaṁ liṁgaṁ niyamenārcayiṣyati| sarvapāpavinirmukto yogaṁ divyamavāpsyati

जो भी इस तुम्हारे द्वारा प्रतिष्ठापित लिंग की नियमपूर्वक पूजा करेगा, वह सब पापों से मुक्त होकर दिव्य योग को प्राप्त करेगा।

श्लोक 24 (skanda.7.14.24)

जैगीषव्यगुहां चेमां प्राप्य योगं करोति यः। स सप्तरात्राद्युक्तात्मा संसारं संतरिष्यति

jaigīṣavyaguhāṁ cemāṁ prāpya yogaṁ karoti yaḥ| sa saptarātrādyuktātmā saṁsāraṁ saṁtariṣyati

जो भी इस जैगीषव्य-गुफा को प्राप्त कर योग करता है, वह सात रात्रियों में ही युक्तात्मा होकर संसार को पार कर लेगा।

श्लोक 25 (skanda.7.14.25)

मासेन पूर्वजातिं च जन्मातीतं च वेत्स्यति। एकरात्रात्तनुं शुद्धां द्वाभ्यां तारयते पितॄन्। त्रिरात्रेण व्यतीतेन त्वपरान्सप्त तारयेत्

māsena pūrvajātiṁ ca janmātītaṁ ca vetsyati| ekarātrāttanuṁ śuddhāṁ dvābhyāṁ tārayate pitṝn| trirātreṇa vyatītena tvaparānsapta tārayet

एक मास में पूर्वजन्म और बीते हुए जन्म को जान लेगा। एक रात्रि में शुद्ध देह प्राप्त करेगा, दो रात्रियों से पितरों को तार देगा, और तीन रात्रियाँ बीतने पर अन्य सात पीढ़ियों को तार देगा।

श्लोक 26 (skanda.7.14.26)

पुनश्च तव विप्रर्षे अजेयत्वं च योगिभिः। इच्छतो दर्शनं चैव भविष्यति च ते मम

punaśca tava viprarṣe ajeyatvaṁ ca yogibhiḥ| icchato darśanaṁ caiva bhaviṣyati ca te mama

और फिर, हे विप्रर्षे! तुम योगियों द्वारा अजेय होओगे। और जब भी तुम चाहोगे, तुम्हें मेरा दर्शन भी होगा।

श्लोक 27 (skanda.7.14.27)

इति देवो वरान्दत्त्वा तत्रैवांतरधीयत। एतत्कृतयुगे वृत्तं तव देवि प्रभाषितम्

iti devo varāndattvā tatraivāṁtaradhīyata| etatkṛtayuge vṛttaṁ tava devi prabhāṣitam

इस प्रकार देव वरदान देकर वहीं अन्तर्धान हो गये। यह कृतयुग में घटित हुआ, जो मैंने तुम्हें बताया, हे देवी!

श्लोक 28 (skanda.7.14.28)

त्रेतायुगे महादेवि द्वापरेऽपि तथैव च। कलियुगप्रवेशे तु वालखिल्या महर्षयः

tretāyuge mahādevi dvāpare'pi tathaiva ca| kaliyugapraveśe tu vālakhilyā maharṣayaḥ

हे महादेवी! त्रेतायुग में और द्वापर में भी वैसा ही हुआ। कलियुग के प्रवेश में वालखिल्य महर्षि।

श्लोक 29 (skanda.7.14.29)

अस्मिन्प्राभासिके क्षेत्रे सूर्यस्थलसमीपतः। आराधयंतो देवेशं गुहामध्यनिवासिनम्

asminprābhāsike kṣetre sūryasthalasamīpataḥ| ārādhayaṁto deveśaṁ guhāmadhyanivāsinam

इसी प्राभासिक क्षेत्र में, सूर्यस्थल के निकट, गुफा के मध्य में निवास करने वाले देवेश की आराधना करते हुए।

श्लोक 30 (skanda.7.14.30)

अष्टाशीतिसहस्राणि ऋषयश्चोर्द्धरेतसः। वर्षायुतं तपस्तप्त्वा सिद्धिं जग्मुस्तदात्मिकाम्

aṣṭāśītisahasrāṇi ṛṣayaścordddharetasaḥ| varṣāyutaṁ tapastaptvā siddhiṁ jagmustadātmikām

अठासी हज़ार ऊर्ध्वरेता ऋषियों ने दस हज़ार वर्षों तक तप करके उसी स्वरूप की सिद्धि प्राप्त की।

श्लोक 31 (skanda.7.14.31)

ततः सिद्धेश्वरं लिंगं कलौ ख्यातं वरानने। यदा सोमेन संयुक्ता कृष्णा शिवचतुर्दशी। तदैव तस्य देवस्य दर्शनं देवि दुर्ल्लभम्

tataḥ siddheśvaraṁ liṁgaṁ kalau khyātaṁ varānane| yadā somena saṁyuktā kṛṣṇā śivacaturdaśī| tadaiva tasya devasya darśanaṁ devi durllabham

इसी से यह सिद्धेश्वर लिंग कलियुग में विख्यात हुआ, हे वरानने! जब चन्द्रमा से युक्त कृष्ण शिवचतुर्दशी होती है, तभी उस देव का दर्शन, हे देवी! दुर्लभ माना जाता है।

श्लोक 32 (skanda.7.14.32)

ब्रह्मांडं सकलं दत्त्वा यत्पुण्यमुपजायते। तत्पुण्यं लभते देवि सिद्धलिंगस्य पूजनात्

brahmāṁḍaṁ sakalaṁ dattvā yatpuṇyamupajāyate| tatpuṇyaṁ labhate devi siddhaliṁgasya pūjanāt

सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का दान करने से जो पुण्य उत्पन्न होता है, वही पुण्य, हे देवी! सिद्धलिंग की पूजा से प्राप्त होता है।

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