प्रभास खण्ड · अध्याय 15
पापनाशनोत्पत्तिवर्णनम्
श्लोक 1 (skanda.7.15.1)
ईश्वर उवाच। तस्याग्नेये तु देवेशि अरुणेन प्रतिष्ठितम्। धनुषां च त्रये तत्र सिद्धलिंगसमीपतः
īśvara uvāca| tasyāgneye tu deveśi aruṇena pratiṣṭhitam| dhanuṣāṁ ca traye tatra siddhaliṁgasamīpataḥ
ईश्वर ने कहा—हे देवेशि! उसके अग्निकोण में अरुण द्वारा प्रतिष्ठित, सिद्धलिंग के समीप, तीन धनुष की दूरी पर।
श्लोक 2 (skanda.7.15.2)
सूर्यसारथिना तत्र लिंगं देविप्रतिष्ठितम्। कलौ पापहरंनाम दर्शनात्पापनाशनम्
sūryasārathinā tatra liṁgaṁ devipratiṣṭhitam| kalau pāpaharaṁnāma darśanātpāpanāśanam
वहाँ सूर्य के सारथी द्वारा प्रतिष्ठित लिंग है, हे देवी! कलियुग में इसका नाम पापहर है, जिसका दर्शन मात्र पाप-नाशक है।
श्लोक 3 (skanda.7.15.3)
चैत्रमास त्रयोदश्यां शुक्लायां वरवर्णिनि। पूजयेद्विधिवद्भक्त्या पौंडरीकफलं लभेत्
caitramāsa trayodaśyāṁ śuklāyāṁ varavarṇini| pūjayedvidhivadbhaktyā pauṁḍarīkaphalaṁ labhet
चैत्र मास की शुक्ल त्रयोदशी को, हे वरवर्णिनि! जो विधिपूर्वक भक्ति से पूजा करता है, वह पौण्डरीक यज्ञ का फल प्राप्त करता है।