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प्रभास खण्ड · अध्याय 82

चक्रतीर्थोत्पत्तिवृत्तान्तमाहात्म्यवर्णनम्

अध्याय 81अध्याय-सूचीअध्याय 83

श्लोक 1 (skanda.7.82.1)

देव्युवाच। चक्रतीर्थेति किं नाम त्वया प्रोक्तं वृषध्वज। कुत्र तिष्ठति तत्तीर्थं किं प्रभावं वदस्व मे

devyuvāca| cakratīrtheti kiṁ nāma tvayā proktaṁ vṛṣadhvaja| kutra tiṣṭhati tattīrthaṁ kiṁ prabhāvaṁ vadasva me

देवी ने कहा—हे वृषध्वज, आपने जिस चक्रतीर्थ नाम का उल्लेख किया, वह तीर्थ कहाँ स्थित है, और उसका क्या प्रभाव है, मुझे बताइए।

श्लोक 2 (skanda.7.82.2)

ईश्वर उवाच। पुरा देवासुरे युद्धे हत्वा दैत्याञ्जनार्द्दनः। चक्रं प्रक्षालयामास तत्र वै रक्तरंजितम्

īśvara uvāca| purā devāsure yuddhe hatvā daityāñjanārddanaḥ| cakraṁ prakṣālayāmāsa tatra vai raktaraṁjitam

ईश्वर ने कहा—पूर्वकाल में देवासुर संग्राम में दैत्यों का वध करके, जनार्दन ने अपने रक्त से रंजित हुए चक्र को वहीं प्रक्षालित किया।

श्लोक 3 (skanda.7.82.3)

अष्टकोटिसुतीर्थानि तत्रानीय स्वयं हरिः। तीर्थे प्रकल्पयामास शुद्धिं कृत्वा सुदर्शने। तीर्थस्य चक्रे नामापि चकतीर्थमिति श्रुतम्

aṣṭakoṭisutīrthāni tatrānīya svayaṁ hariḥ| tīrthe prakalpayāmāsa śuddhiṁ kṛtvā sudarśane| tīrthasya cakre nāmāpi cakatīrthamiti śrutam

स्वयं हरि ने वहाँ आठ करोड़ पवित्र तीर्थों को लाकर, सुदर्शन (चक्र) की शुद्धि करके उस तीर्थ की स्थापना की। उस चक्र के नाम पर ही उस तीर्थ का नाम चक्रतीर्थ प्रसिद्ध हुआ, ऐसा सुना जाता है।

श्लोक 4 (skanda.7.82.4)

अष्टायुतानि तीर्थानामष्टौ कोट्यस्तथैव च। तत्र संति महादेवि चक्रतीर्थे न संशयः

aṣṭāyutāni tīrthānāmaṣṭau koṭyastathaiva ca| tatra saṁti mahādevi cakratīrthe na saṁśayaḥ

हे महादेवी, वहाँ अस्सी हजार तथा आठ करोड़ तीर्थ चक्रतीर्थ में विद्यमान हैं, इसमें कोई संशय नहीं है।

श्लोक 5 (skanda.7.82.5)

यस्तत्र कुरुते स्नानमेकचित्तो नरोत्तमः। सर्वतीर्थाभिषेकस्य स प्राप्नोत्यखिलं फलम्

yastatra kurute snānamekacitto narottamaḥ| sarvatīrthābhiṣekasya sa prāpnotyakhilaṁ phalam

जो श्रेष्ठ मनुष्य वहाँ एकाग्रचित्त होकर स्नान करता है, वह सभी तीर्थों में स्नान करने का सम्पूर्ण फल प्राप्त करता है।

श्लोक 6 (skanda.7.82.6)

तीर्थानामष्टकोटिस्तु निवसंति वरानने। एकादश्यां विशेषेण चन्द्रसूर्यग्रहे तथा

tīrthānāmaṣṭakoṭistu nivasaṁti varānane| ekādaśyāṁ viśeṣeṇa candrasūryagrahe tathā

हे वरानने, आठ करोड़ तीर्थ वहाँ सदैव निवास करते हैं, विशेष रूप से एकादशी के दिन तथा चंद्र-सूर्य ग्रहण के समय।

श्लोक 7 (skanda.7.82.7)

तत्र स्नात्वा महादेवि यज्ञकोटिफलं लभेत्। तस्यैव कल्पनामानि शृणु ते कथयाम्यहम्

tatra snātvā mahādevi yajñakoṭiphalaṁ labhet| tasyaiva kalpanāmāni śṛṇu te kathayāmyaham

हे महादेवी, वहाँ स्नान करने से करोड़ों यज्ञों का फल प्राप्त होता है। अब मैं तुम्हें उसी के विभिन्न कल्पों में प्रचलित नाम बताता हूँ, सुनो।

श्लोक 8 (skanda.7.82.8)

कोटितीर्थं पूर्वकल्पे श्रीनिधानं द्वितीयके। तृतीये शतधारं च चक्रतीर्थं चतुर्थके

koṭitīrthaṁ pūrvakalpe śrīnidhānaṁ dvitīyake| tṛtīye śatadhāraṁ ca cakratīrthaṁ caturthake

पूर्वकल्प में यह कोटितीर्थ, दूसरे कल्प में श्रीनिधान, तीसरे में शतधार, तथा चौथे कल्प में चक्रतीर्थ कहलाया।

श्लोक 9 (skanda.7.82.9)

एवं ते कल्पनामानि ह्यतीतान्यखिलानि वै। कथितान्येवमन्यानि ज्ञेयानि विबुधैः क्रमात्

evaṁ te kalpanāmāni hyatītānyakhilāni vai| kathitānyevamanyāni jñeyāni vibudhaiḥ kramāt

इस प्रकार इसके बीते हुए सभी कल्पों के नाम मैंने बताए; इसी प्रकार अन्य नामों को भी विद्वानों को क्रमशः जान लेना चाहिए।

श्लोक 10 (skanda.7.82.10)

तत्र यद्दीयते दानं तस्य संख्या न विद्यते। अर्द्धक्रोशप्रमाणं हि विष्णुक्षेत्रं प्रकीर्त्तितम्

tatra yaddīyate dānaṁ tasya saṁkhyā na vidyate| arddhakrośapramāṇaṁ hi viṣṇukṣetraṁ prakīrttitam

वहाँ जो दान दिया जाता है, उसकी कोई गिनती नहीं है; यह विष्णु-क्षेत्र आधे कोस की परिधि में स्थित कहा गया है।

श्लोक 11 (skanda.7.82.11)

ब्रह्महत्या नोपसर्पेत्सत्यमेतन्मयोदितम्। मासोपवासी तत्क्षेत्रे अग्निहोत्री यतव्रतः

brahmahatyā nopasarpetsatyametanmayoditam| māsopavāsī tatkṣetre agnihotrī yatavrataḥ

वहाँ ब्रह्महत्या भी पास नहीं आती—यह मैंने सत्य कहा है। जो उस क्षेत्र में मासभर उपवास करने वाला, अग्निहोत्री तथा संयमी व्रतधारी होता है,

श्लोक 12 (skanda.7.82.12)

स्वाध्यायी यज्ञयाजी च तपश्चांद्रायणा दिकम्। तिलोदकं पितॄणां च श्राद्धं च विधिपूर्वकम्

svādhyāyī yajñayājī ca tapaścāṁdrāyaṇā dikam| tilodakaṁ pitṝṇāṁ ca śrāddhaṁ ca vidhipūrvakam

स्वाध्याय करने वाला, यज्ञ करने-कराने वाला, चांद्रायण आदि तप करने वाला, पितरों के लिए तिलोदक तथा विधिपूर्वक श्राद्ध करने वाला—

श्लोक 13 (skanda.7.82.13)

एकरात्रं त्रिरात्रं वा कृच्छ्रं सांतपनं तथा। मासोपवासं तच्चैव अन्यद्वा पुण्यकर्म तत्

ekarātraṁ trirātraṁ vā kṛcchraṁ sāṁtapanaṁ tathā| māsopavāsaṁ tacchaiva anyadvā puṇyakarma tat

एक रात्रि या तीन रात्रि का व्रत, कृच्छ्र और सांतपन प्रायश्चित, मासोपवास, अथवा अन्य कोई भी पुण्यकर्म—

श्लोक 14 (skanda.7.82.14)

दैत्यारिक्षेत्रमासाद्य यत्किंचित्कुरुते नरः। अन्यक्षेत्रात्कोटिगुणं पुण्यं भूयान्न संशयः

daityārikṣetramāsādya yatkiṁcitkurute naraḥ| anyakṣetrātkoṭiguṇaṁ puṇyaṁ bhūyānna saṁśayaḥ

जो भी मनुष्य दैत्यारि (विष्णु) के क्षेत्र में जाकर करता है, वह अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा करोड़ गुना अधिक पुण्यफल देने वाला होता है, इसमें कोई संदेह नहीं।

श्लोक 15 (skanda.7.82.15)

सुदर्शने वरे तीर्थे गोदानं तत्र दापयेत्। सम्यग्यात्राफलप्रेप्सुः सर्वपापविशुद्धये

sudarśane vare tīrthe godānaṁ tatra dāpayet| samyagyātrāphalaprepsuḥ sarvapāpaviśuddhaye

जो पूर्ण यात्रा-फल की कामना करता है, उसे सुदर्शन नामक उत्तम तीर्थ में समस्त पापों की शुद्धि के लिए वहाँ गौ का दान करना चाहिए।

श्लोक 16 (skanda.7.82.16)

चंडालः श्वपचो वाऽपि तिर्यग्योनिगतस्तथा। तस्मिंस्तीर्थे मृतः सम्यगाच्युतं लोकमाप्नुयात्

caṁḍālaḥ śvapaco vā'pi tiryagyonigatastathā| tasmiṁstīrthe mṛtaḥ samyagācyutaṁ lokamāpnuyāt

चाहे वह चांडाल हो, श्वपच हो, अथवा पशु-योनि में जन्मा हो, उस तीर्थ में मरने पर वह निश्चित रूप से अच्युत लोक को प्राप्त करता है।

श्लोक 17 (skanda.7.82.17)

इति संक्षेपतः प्रोक्तं चक्रतीर्थसमुद्भवम्। माहात्म्यं सर्वपापघ्नं सर्वकामफलप्रदम्

iti saṁkṣepataḥ proktaṁ cakratīrthasamudbhavam| māhātmyaṁ sarvapāpaghnaṁ sarvakāmaphalapradam

इस प्रकार संक्षेप में चक्रतीर्थ की उत्पत्ति का यह माहात्म्य कहा गया, जो समस्त पापों का नाश करने वाला तथा सभी कामनाओं का फल देने वाला है।

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