Skip to main content

प्रभास खण्ड · अध्याय 83

योगेश्वरीमाहात्म्यवर्णनम्

अध्याय 82अध्याय-सूचीअध्याय 84

श्लोक 1 (skanda.7.83.1)

ईश्वर उवाच। ततो गच्छेन्महादेवि तस्य पूर्वेण संस्थिताम्। योगेश्वरीं महादेवीं योगसिद्धिफलप्रदाम्

īśvara uvāca| tato gacchenmahādevi tasya pūrveṇa saṁsthitām| yogeśvarīṁ mahādevīṁ yogasiddhiphalapradām

ईश्वर ने कहा—हे महादेवी, इसके पश्चात् उसके पूर्व दिशा में स्थित योगेश्वरी महादेवी के पास जाना चाहिए, जो योग-सिद्धि का फल देने वाली हैं।

श्लोक 2 (skanda.7.83.2)

तदुत्पत्तिं प्रवक्ष्यामि शृणु श्रद्धासमन्विता। पुरा दानवशार्दूलो महिषाख्यो महाबलः

tadutpattiṁ pravakṣyāmi śṛṇu śraddhāsamanvitā| purā dānavaśārdūlo mahiṣākhyo mahābalaḥ

अब मैं उसकी उत्पत्ति का वर्णन करता हूँ, श्रद्धापूर्वक सुनो। पूर्वकाल में महिष नामक एक दानवों में श्रेष्ठ, महाबली असुर था।

श्लोक 3 (skanda.7.83.3)

बभूव प्रवरो देवि सर्वदेवभयंकरः। कामरूपी स लोकांस्त्रीन्वशीकृत्वाऽभवत्सुखी

babhūva pravaro devi sarvadevabhayaṁkaraḥ| kāmarūpī sa lokāṁstrīnvaśīkṛtvā'bhavatsukhī

हे देवी, वह श्रेष्ठ तथा समस्त देवताओं के लिए भयंकर था। इच्छानुसार रूप धारण करने वाला वह तीनों लोकों को वश में करके सुखपूर्वक रहने लगा।

श्लोक 4 (skanda.7.83.4)

कस्मिंश्चिदथ काले तु ब्रह्मणा लोककारिणा। सृष्टा मनोहरा कन्या रूपेणाप्रतिमा दिवि

kasmiṁścidatha kāle tu brahmaṇā lokakāriṇā| sṛṣṭā manoharā kanyā rūpeṇāpratimā divi

किसी समय, लोक की रचना करने वाले ब्रह्मा ने स्वर्ग में एक मनोहर, अनुपम रूप वाली कन्या की सृष्टि की।

श्लोक 5 (skanda.7.83.5)

अतपत्सा तपो घोरं कन्या रूपवती सती। नारदेन ततो दृष्टा सा कदाचिद्वरानने

atapatsā tapo ghoraṁ kanyā rūpavatī satī| nāradena tato dṛṣṭā sā kadācidvarānane

वह रूपवती सती कन्या घोर तप करने लगी; हे वरानने, किसी समय नारद ने उसे देख लिया।

श्लोक 6 (skanda.7.83.6)

ततः स सहसा देवि विस्मयं परमं गतः। अहो रूपमहो धैर्यमहो कान्तिरहो वयः

tataḥ sa sahasā devi vismayaṁ paramaṁ gataḥ| aho rūpamaho dhairyamaho kāntiraho vayaḥ

हे देवी, तब वह सहसा परम विस्मय को प्राप्त हुआ—अहो, क्या रूप है! अहो, क्या धैर्य है! अहो, क्या कांति है! अहो, क्या यौवन है!

श्लोक 7 (skanda.7.83.7)

इत्येवं चिन्तयंस्तत्र नारीं वचनमब्रवीत्। कुरुष्वात्मप्रदानं मे न मे दारपरिग्रहः। तवाहं दर्शनाद्देवि कामवाणेन पीडितः

ityevaṁ ciṁtayaṁstatra nārīṁ vacanamabravīt| kuruṣvātmapradānaṁ me na me dāraparigrahaḥ| tavāhaṁ darśanāddevi kāmavāṇena pīḍitaḥ

इस प्रकार सोचते हुए उसने उस स्त्री से कहा—'मुझे अपना समर्पण कर दो; मेरी कोई पत्नी नहीं है। हे देवी, तुम्हारे दर्शन से मैं काम-बाण से पीड़ित हो गया हूँ।'

श्लोक 8 (skanda.7.83.8)

सा ऽब्रवीन्न हि मे कार्यं कामधर्मेण सत्तम। कौमारं व्रतमासाद्य साधयिष्ये यथेप्सितम्

sā'bravīnna hi me kāryaṁ kāmadharmeṇa sattama| kaumāraṁ vratamāsādya sādhayiṣye yathepsitam

उसने कहा—'हे सत्तम, मुझे काम-धर्म से कोई प्रयोजन नहीं है। मैं कौमार्य-व्रत का पालन करते हुए अपने अभीष्ट को सिद्ध करूँगी।'

श्लोक 9 (skanda.7.83.9)

न च मन्युस्त्वया कार्यो ह्यस्मिन्नर्थे कथंचन। तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा स मुनिर्नारदः प्रिये

na ca manyustvayā kāryo hyasminnarthe kathaṁcana| tasyāstadvacanaṁ śrutvā sa munirnāradaḥ priye

'और तुम्हें इस विषय में किसी भी प्रकार क्रोध नहीं करना चाहिए।' हे प्रिये, उसका यह वचन सुनकर नारद मुनि—

श्लोक 10 (skanda.7.83.10)

समुद्रान्तेऽगमद्दिव्यां पुरीं महिषपालिताम्। अर्चितो हि मुनिस्तेन महिषेण महात्मना

samudrānte'gamaddivyāṁ purīṁ mahiṣapālitām| arcito hi munistena mahiṣeṇa mahātmanā

समुद्र के तट पर स्थित, महिष द्वारा शासित उस दिव्य नगरी में गए। महात्मा महिष ने उस मुनि का सत्कार किया।

श्लोक 11 (skanda.7.83.11)

पृष्ट्वा ह्यनामयं देवि दत्त्वा चार्घ्यमनुत्तमम्। सोऽब्रवीत्प्राञ्जलिर्भूत्वा किमागमनकारणम्। ब्रूहि यत्ते व्यवसितं सर्वं कर्त्तास्मि नारद

pṛṣṭvā hyanāmayaṁ devi dattvā cārghyamanuttamam| so'bravītprāñjalirbhūtvā kimāgamanakāraṇam| brūhi yatte vyavasitaṁ sarvaṁ karttāsmi nārada

हे देवी, कुशल पूछकर तथा उत्तम अर्घ्य देकर, उसने हाथ जोड़कर कहा—'आपके आगमन का क्या कारण है? हे नारद, जो भी आपका विचार हो, बताइए, मैं सब कुछ पूर्ण करूँगा।'

श्लोक 12 (skanda.7.83.12)

अथोवाच मुनिस्तत्र महिषं दानवेश्वरम्। कन्यारत्नं समुत्पन्नं जंबूद्वीपे महासुर

athovāca munistatra mahiṣaṁ dānaveśvaram| kanyāratnaṁ samutpannaṁ jaṁbūdvīpe mahāsura

तब मुनि ने वहाँ दानवों के स्वामी महिष से कहा—'हे महासुर, जम्बूद्वीप में एक कन्यारत्न उत्पन्न हुई है—'

श्लोक 13 (skanda.7.83.13)

स्वर्गे मर्त्ये च पाताले न दृष्टं न च मे श्रुतम्। तादृग्रूपमहं येन कामबाणवशीकृतः

svarge martye ca pātāle na dṛṣṭaṁ na ca me śrutam| tādṛgrūpamahaṁ yena kāmabāṇavaśīkṛtaḥ

'स्वर्ग, मृत्युलोक अथवा पाताल में मैंने ऐसा रूप न देखा है, न सुना है, जिसके कारण मैं भी काम-बाण से वशीभूत हो गया हूँ।'

श्लोक 14 (skanda.7.83.14)

स श्रुत्वा वचनं तस्य कामस्योत्पादनं परम्। जगाम यत्र सा साध्वी क्षेत्रे प्राभासिके स्थिता

sa śrutvā vacanaṁ tasya kāmasyotpādanaṁ param| jagāma yatra sā sādhvī kṣetre prābhāsike sthitā

उसका यह वचन सुनकर, जो काम को अत्यधिक उत्पन्न करने वाला था, वह वहाँ गया जहाँ वह साध्वी प्राभासिक क्षेत्र में स्थित थी।

श्लोक 15 (skanda.7.83.15)

तामेव प्रार्थयामास बलेन महता वृतः। भार्या भव त्वं मे भीरु भुंक्ष्व भोगान्मनोरमान्। एतत्तपो महाभागे विरुद्धं यौवनस्य ते

tāmeva prārthayāmāsa balena mahatā vṛtaḥ| bhāryā bhava tvaṁ me bhīru bhuṁkṣva bhogānmanoramān| etattapo mahābhāge viruddhaṁ yauvanasya te

अपनी विशाल सेना से घिरा हुआ वह उसी से प्रार्थना करने लगा—'हे भीरु, तुम मेरी पत्नी बनो, मनोहर भोगों का उपभोग करो। हे महाभागे, यह तप तुम्हारे यौवन के विपरीत है।'

श्लोक 16 (skanda.7.83.16)

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा जहास वरवर्णिनी। तस्या हसंत्या देवेशि शतशोऽथ सहस्रशः

tasya tadvacanaṁ śrutvā jahāsa varavarṇinī| tasyā hasaṁtyā deveśi śataśo'tha sahasraśaḥ

उसका यह वचन सुनकर उस वरवर्णिनी ने हँसी। हे देवेशी, उसके हँसने से सैकड़ों और हज़ारों—

श्लोक 17 (skanda.7.83.17)

निश्वासात्सहसा नार्यः शस्त्रहस्ता भयानकाः। ताभिर्विध्वंसितं सैन्यं महिषस्य दुरात्मनः

niśvāsātsahasā nāryaḥ śastrahastā bhayānakāḥ| tābhirvidhvaṁsitaṁ sainyaṁ mahiṣasya durātmanaḥ

उसके निःश्वास से सहसा शस्त्रधारिणी भयंकर स्त्रियाँ प्रकट हो गईं; उन्होंने दुरात्मा महिष की समस्त सेना को नष्ट कर दिया।

श्लोक 18 (skanda.7.83.18)

तस्मिन्निपात्यमाने तु सैन्ये दानवसत्तमः। क्रोधं कृत्वा ततः शीघ्रं तामेवाभिमुखो ययौ

tasminnipātyamāne tu sainye dānavasattamaḥ| krodhaṁ kṛtvā tataḥ śīghraṁ tāmevābhimukho yayau

उस सेना के गिरते ही, दानवश्रेष्ठ महिष क्रोधित होकर तुरंत उसी के सम्मुख जा पहुँचा।

श्लोक 19 (skanda.7.83.19)

विधुन्वन्स हि ते तीक्ष्णशृंगेऽभीक्ष्णं भयानके। तया सार्धं च सुमहत्कृत्वा युद्धं महासुरः

vidhunvansa hi te tīkṣṇaśṛṁge'bhīkṣṇaṁ bhayānake| tayā sārdhaṁ ca sumahatkṛtvā yuddhaṁ mahāsuraḥ

वह अपने तीक्ष्ण और भयानक सींगों को बार-बार हिलाते हुए, उस महाद्वीत्य ने देवी के साथ अत्यंत भीषण युद्ध किया।

श्लोक 20 (skanda.7.83.20)

शृंगाभ्यां जगृहे देवीं सा तस्योपरि संस्थिता। पद्भ्यामाक्रम्य शूलेन निहतो दैत्यपुंगवः

śṛṁgābhyāṁ jagṛhe devīṁ sā tasyopari saṁsthitā| padbhyāmākramya śūlena nihato daityapuṁgavaḥ

उसने अपने सींगों से देवी को पकड़ने का प्रयास किया, किंतु वह उसके ऊपर आरूढ़ हो गई; अपने चरणों से उसे दबाकर उसने अपने त्रिशूल से उस श्रेष्ठ दैत्य को मार डाला।

श्लोक 21 (skanda.7.83.21)

छिन्ने शिरसि खङ्गेन तद्रूपो निःसृतः पुमान्। रौद्रोऽपि स गतः स्वर्गं दैत्यो देव्यस्त्रपातितः

chinne śirasi khaṅgena tadrūpo niḥsṛtaḥ pumān| raudro'pi sa gataḥ svargaṁ daityo devyastrapātitaḥ

तलवार से उसका सिर काटे जाने पर उसी रूप में एक पुरुष उसमें से निकला; रौद्र होते हुए भी वह दैत्य, देवी के अस्त्र से गिराया जाकर, स्वर्ग को गया।

श्लोक 22 (skanda.7.83.22)

ततो देवगणाः सर्वे महिषं वीक्ष्य निर्जितम्। महेंद्राद्याः स्तुतिं चक्रुर्देव्यास्तुष्टेन चेतसा

tato devagaṇāḥ sarve mahiṣaṁ vīkṣya nirjitam| maheṁdrādyāḥ stutiṁ cakrurdevyāstuṣṭena cetasā

तब समस्त देवगण, महिष को पराजित हुआ देखकर, महेंद्र आदि ने प्रसन्नचित्त होकर देवी की स्तुति की।

श्लोक 23 (skanda.7.83.23)

देवा ऊचुः। नमो देवि महाभागे गम्भीरे भीमदर्शने। नयस्थिते सुसिद्धांते त्रिनेत्रे विश्वतोमुखि

devā ūcuḥ| namo devi mahābhāge gaṁbhīre bhīmadarśane| nayasthite susiddhāṁte trinetre viśvatomukhi

देवों ने कहा—हे महाभागे देवी, आपको नमस्कार है! हे गंभीरे, हे भीमदर्शने, हे न्यायस्थिते, हे सुसिद्धांते, हे त्रिनेत्रे, हे विश्वतोमुखि!

श्लोक 24 (skanda.7.83.24)

विद्याविद्ये जये जाप्ये महिषासुरमर्दिनि। सर्वगे सर्वविद्येशे देवि विश्वस्वरूपिणि

vidyāvidye jaye jāpye mahiṣāsuramardini| sarvage sarvavidyeśe devi viśvasvarūpiṇi

हे विद्या-अविद्यारूपिणी, हे जय-स्वरूपे, हे जाप्ये, हे महिषासुरमर्दिनि, हे सर्वव्यापिनी, हे सभी विद्याओं की स्वामिनी, हे देवी, हे विश्वस्वरूपिणि!

श्लोक 25 (skanda.7.83.25)

वीतशोके ध्रुवे देवि पद्मपत्रायतेक्षणे। शुद्धसत्त्वे व्रतस्थे च चण्डरूपे विभावरि

vītaśoke dhruve devi padmapatrāyatekṣaṇe| śuddhasattve vratasthe ca caṇḍarūpe vibhāvari

हे शोकरहित, हे ध्रुवे, हे देवी, हे कमलदल जैसे विशाल नेत्रों वाली, हे शुद्धसत्त्वे, हे व्रतस्थे, हे चण्डरूपे, हे विभावरि!

श्लोक 26 (skanda.7.83.26)

ऋद्धिसिद्धिप्रदे देवि कालनृत्ये धृतिप्रिये। शांकरि ब्राह्मणि ब्राह्मि सर्वदेवनमस्कृते

ṛddhisiddhipradе devi kālanṛtye dhṛtipriye| śāṁkari brāhmaṇi brāhmi sarvadevanamaskṛte

हे ऋद्धि-सिद्धि प्रदान करने वाली देवी, हे काल-नृत्य करने वाली, हे धृतिप्रिये, हे शांकरि, हे ब्राह्मणि, हे ब्राह्मि, हे सभी देवों द्वारा नमस्कृत!

श्लोक 27 (skanda.7.83.27)

घंटाहस्ते शूल हस्ते महामहिषमर्दिनि। उग्ररूपे विरूपाक्षि महामायेऽमृते शिवे

ghaṁṭāhaste śūla haste mahāmahiṣamardini| ugrarūpe virūpākṣi mahāmāye'mṛte śive

हे घंटाधारिणी, हे त्रिशूलधारिणी, हे महामहिषमर्दिनि, हे उग्ररूपे, हे विरूपाक्षि, हे महामाये, हे अमृते, हे शिवे!

श्लोक 28 (skanda.7.83.28)

सर्वगे सर्वदे देवि सर्वसत्त्वमयोद्भवे। विद्यापुराणशल्यानां जननि भूतधारिणि

sarvage sarvade devi sarvasattvamayodbhave| vidyāpurāṇaśalyānāṁ janani bhūtadhāriṇi

हे सर्वव्यापिनी, हे सर्वदात्री देवी, हे सर्वसत्त्वमयी उद्भवे, हे विद्या, पुराण और शल्यशास्त्र की जननी, हे भूतधारिणि!

श्लोक 29 (skanda.7.83.29)

सर्वदेवरहस्यानां सर्वसत्त्ववतां शुभे। त्वमेव शरणं देवि विद्याऽविद्ये श्रियेऽश्रिये

sarvadevarahasyānāṁ sarvasattvavatāṁ śubhe| tvameva śaraṇaṁ devi vidyā'vidye śriye'śriye

हे समस्त देवताओं के रहस्यों की तथा सभी प्राणियों की शुभे, हे देवी, तुम ही शरण हो—चाहे विद्या हो या अविद्या, श्री हो या अश्री।

श्लोक 30 (skanda.7.83.30)

एवं स्तुता सुरैर्देवि प्रणम्य ऋषिभिस्तथा। उवाच हसती वाक्यं वृणुध्वं वरमुत्तमम्

evaṁ stutā surairdevi praṇamya ṛṣibhistathā| uvāca hasatī vākyaṁ vṛṇudhvaṁ varamuttamam

हे देवी, इस प्रकार देवों तथा ऋषियों द्वारा प्रणाम करते हुए स्तुति की जाने पर, वह हँसते हुए बोली—'श्रेष्ठ वर माँगो।'

श्लोक 31 (skanda.7.83.31)

देवा ऊचुः। स्तवेनानेन ये देवि स्तुवन्त्यत्र नरोत्तमाः। ते संतु कामैः संपूर्णा वरवर्षा निरंतरम्

devā ūcuḥ| stavenānena ye devi stuvantyatra narottamāḥ| te saṁtu kāmaiḥ saṁpūrṇā varavarṣā niraṁtaram

देवों ने कहा—हे देवी, इस स्तोत्र से जो श्रेष्ठ पुरुष यहाँ आपकी स्तुति करेंगे, वे निरंतर वरों की वर्षा से समस्त कामनाओं से परिपूर्ण हों।

श्लोक 32 (skanda.7.83.32)

अस्मिन्क्षेत्रे त्वया वासो नित्यं कार्यः शुचिस्मिते

asminkṣetre tvayā vāso nityaṁ kāryaḥ śucismite

हे शुचिस्मिते, आपका निवास इसी क्षेत्र में सदैव के लिए होना चाहिए।

श्लोक 33 (skanda.7.83.33)

एवमस्त्विति सा देवी देवानुक्त्वा वरानने। विसृज्य ऋषिसंघांश्च तत्रैव निरताऽभवत्

evamastviti sā devī devānuktvā varānane| visṛjya ṛṣisaṁghāṁśca tatraiva nirata'bhavat

हे वरानने, 'ऐसा ही हो' कहकर उस देवी ने देवताओं को विदा किया, तथा ऋषिसंघों को भी विदा कर स्वयं वहीं स्थिर हो गई।

श्लोक 34 (skanda.7.83.34)

आश्वयुक्छुक्लपक्षस्य नवम्यां यो वरानने। उपवासपरो भूत्वा तां प्रपश्यति भक्तितः। तस्य पापं क्षयं याति तमः सूर्योदये यथा

āśvayukchuklapakṣasya navamyāṁ yo varānane| upavāsaparo bhūtvā tāṁ prapaśyati bhaktitaḥ| tasya pāpaṁ kṣayaṁ yāti tamaḥ sūryodaye yathā

हे वरानने, जो कोई आश्विन मास के शुक्लपक्ष की नवमी को उपवासपूर्वक भक्तिभाव से उसका दर्शन करता है, उसका पाप उसी प्रकार नष्ट हो जाता है जैसे सूर्योदय होते ही अंधकार नष्ट हो जाता है।

श्लोक 35 (skanda.7.83.35)

य एतत्पठति स्तोत्रं प्रातरुत्थाय मानवः। न भीः संपद्यते तस्य यावज्जीवं नरस्य वै

ya etatpaṭhati stotraṁ prātarutthāya mānavaḥ| na bhīḥ saṁpadyate tasya yāvajjīvaṁ narasya vai

जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर इस स्तोत्र का पाठ करता है, उस मनुष्य को जीवनभर कोई भय नहीं होता।

श्लोक 36 (skanda.7.83.36)

आश्वयुक्छुक्लपक्षे या अष्टमी मूलसंयुता। सा महानामिका प्राणा येषां तस्यां गताः शुभे

āśvayukchuklapakṣe yā aṣṭamī mūlasaṁyutā| sā mahānāmikā prāṇā yeṣāṁ tasyāṁ gatāḥ śubhe

आश्विन मास के शुक्लपक्ष की जो अष्टमी मूल नक्षत्र से युक्त होती है, वह महानामिका (महाअष्टमी) कहलाती है; हे शुभे, जिनके प्राण उस दिन इस स्थान पर निकलते हैं—

श्लोक 37 (skanda.7.83.37)

तेषां स्वर्गे ध्रुवं वासो वीरास्तेऽप्सरसां प्रियाः

teṣāṁ svarge dhruvaṁ vāso vīrāste'psarasāṁ priyāḥ

उनका निवास निश्चय ही स्वर्ग में होता है; वे वीर अप्सराओं के प्रिय होते हैं।

श्लोक 38 (skanda.7.83.38)

मन्वन्तरेषु सर्वेषु कल्पादिषु सुरेश्वरि। एष एव क्रमः प्रोक्तो विशेषं शृणु सांप्रतम्

manvantareṣu sarveṣu kalpādiṣu sureśvari| eṣa eva kramaḥ prokto viśeṣaṁ śṛṇu sāṁpratam

हे सुरेश्वरि, समस्त मन्वंतरों तथा प्रत्येक कल्प के आरंभ में यही क्रम बताया गया है। अब विशेष विधि सुनो।

श्लोक 39 (skanda.7.83.39)

आश्वयुक्छुक्लपक्षे या पंचमी पापनाशिनी। तस्यां संपूजयेद्रात्रौ खड्गमंत्रैर्विभूषितम्

āśvayukchuklapakṣe yā paṁcamī pāpanāśinī| tasyāṁ saṁpūjayedrātrau khaḍgamaṁtrairvibhūṣitam

आश्विन मास के शुक्लपक्ष की जो पंचमी है, वह पापनाशिनी है; उस रात्रि में मंत्रों से विभूषित खड्ग की पूजा करनी चाहिए।

श्लोक 40 (skanda.7.83.40)

मंडपं कारयेत्तत्र नवसप्तकरं तथा। प्रागुदक्प्रवणे देशे पताकाभिरलंकृतम्। योगेश्वर्याः संनिधाने विधिना कारयेद्द्विजः

maṁḍapaṁ kārayettatra navasaptakaraṁ tathā| prāgudakpravaṇe deśe patākābhiralaṁkṛtam| yogeśvaryāḥ saṁnidhāne vidhinā kārayeddvijaḥ

वहाँ नौ अथवा सात हाथ का एक मंडप बनवाना चाहिए, जो पूर्वोत्तर ढाल वाले स्थान में पताकाओं से सुसज्जित हो; द्विज को योगेश्वरी के समीप विधिपूर्वक इसे बनवाना चाहिए।

श्लोक 41 (skanda.7.83.41)

आग्नेय्यां कारयेत्कुण्डं हस्तमात्रं सुशोभनम्। मेखलात्रयसंयुक्तं योन्याऽश्वत्थदलाभया

āgneyyāṁ kārayetkuṇḍaṁ hastamātraṁ suśobhanam| mekhalātrayasaṁyuktaṁ yonyā'śvatthadalābhayā

आग्नेय कोण में एक हाथ का सुंदर कुण्ड बनवाना चाहिए, जो तीन मेखलाओं (कगारों) से युक्त हो तथा पीपल के पत्ते के आकार की योनि (कुण्ड-द्वार) से युक्त हो।

श्लोक 42 (skanda.7.83.42)

शास्त्रोक्तं मन्त्रसंयुक्तं होतव्यं पायसं ततः। ततः खड्गं तु संस्नाप्य पंचामृतरसेन वै। पूजयेद्विविधैः पुष्पैर्मंत्रपूर्वं द्विजोत्तमैः

śāstroktaṁ maṁtrasaṁyuktaṁ hotavyaṁ pāyasaṁ tataḥ| tataḥ khaḍgaṁ tu saṁsnāpya paṁcāmṛtarasena vai| pūjayedvividhaiḥ puṣpairmaṁtrapūrvaṁ dvijottamaiḥ

फिर शास्त्रोक्त विधि से मंत्रसहित खीर की आहुति देनी चाहिए। तत्पश्चात् खड्ग को पंचामृत के रस से स्नान कराकर, श्रेष्ठ द्विजों द्वारा मंत्रपूर्वक विविध पुष्पों से उसकी पूजा करनी चाहिए।

श्लोक 43 (skanda.7.83.43)

अभीर्विशसनं खड्गः प्राणिभूतो दुरासदः। अगम्यो विजयश्चैव धर्माधारस्तथैव च। इत्यष्टौ तव नामानि स्वयमुक्तानि वेधसा

abhīrviśasanaṁ khaḍgaḥ prāṇibhūto durāsadaḥ| agamyo vijayaścaiva dharmādhārastathaiva ca| ityaṣṭau tava nāmāni svayamuktāni vedhasā

'अभीः, विशसन, खड्ग, प्राणिभूत, दुरासद, अगम्य, विजय, तथा धर्माधार'—ये आठ तुम्हारे नाम स्वयं ब्रह्मा द्वारा कहे गए हैं।

श्लोक 44 (skanda.7.83.44)

नक्षत्रं कृत्तिका तुभ्यं गुरुर्देवो महेश्वरः। हिरण्यं च शरीरं ते धाता देवो जनार्दनः। पिता पितामहो देव स्वेन पालय सर्वदा

nakṣatraṁ kṛttikā tubhyaṁ gururdevo maheśvaraḥ| hiraṇyaṁ ca śarīraṁ te dhātā devo janārdanaḥ| pitā pitāmaho deva svena pālaya sarvadā

'तुम्हारा नक्षत्र कृत्तिका है, तुम्हारे गुरु देव महेश्वर हैं, तुम्हारा शरीर स्वर्ण है, तुम्हारे विधाता देव जनार्दन हैं। हे देव, तुम्हारे पिता और पितामह भी वे ही हैं; अपने द्वारा सदैव रक्षा करो।'

श्लोक 45 (skanda.7.83.45)

एवं संपूज्य विधिना तं खङ्गं ब्राह्मणोत्तमैः। भ्रामयेन्नगरे रात्रौ नान्दीघोषपुरःसरम्

evaṁ saṁpūjya vidhinā taṁ khaṅgaṁ brāhmaṇottamaiḥ| bhrāmayennagare rātrau nāndīghoṣapuraḥsaram

इस प्रकार श्रेष्ठ ब्राह्मणों द्वारा विधिपूर्वक उस खड्ग की पूजा करके, मंगल-घोष के साथ रात्रि में उसे नगर में घुमाना चाहिए।

श्लोक 46 (skanda.7.83.46)

सर्वसैन्येन संयुक्तस्तत्र ब्राह्मणपुंगवैः। एवं कृत्वा विधानं तु पुनर्योगेश्वरीं नयेत्। उच्चार्य मन्त्रमेवं वै खङ्गं तस्यै समर्पयेत्

sarvasainyena saṁyuktastatra brāhmaṇapuṁgavaiḥ| evaṁ kṛtvā vidhānaṁ tu punaryogeśvarīṁ nayet| uccārya maṁtramevaṁ vai khaṅgaṁ tasyai samarpayet

समस्त सेना और श्रेष्ठ ब्राह्मणों के साथ इस विधि को सम्पन्न करके, उसे पुनः योगेश्वरी के पास ले जाना चाहिए, और मंत्रोच्चारण करके उस खड्ग को देवी को अर्पित करना चाहिए।

श्लोक 47 (skanda.7.83.47)

अञ्जनेन समालेख्य चन्दनेन विलेपितम्। बिल्वपत्रकृतां मालां तस्यै देव्यै निवेदयेत्

aṁjanena samālekhya caṁdanena vilepitam| bilvapatrakṛtāṁ mālāṁ tasyai devyai nivedayet

अंजन से अलंकृत तथा चंदन से लेपित बिल्वपत्रों की माला उस देवी को अर्पित करनी चाहिए।

श्लोक 48 (skanda.7.83.48)

दुर्गे दुर्गार्तिहे देवि सर्व दुर्गतिनाशिनि। त्राहि मां सर्वदुर्गेषु दुर्गेऽहं शरणं गतः

durge durgārtihe devi sarva durgatināśini| trāhi māṁ sarvadurgeṣu durge'haṁ śaraṇaṁ gataḥ

'हे दुर्गे, दुर्गति और कष्टों को हरने वाली देवी, हे सर्व दुर्गति का नाश करने वाली, समस्त दुर्गों (संकटों) में मेरी रक्षा करो; हे दुर्गे, मैं तुम्हारी शरण में आया हूँ।'

श्लोक 49 (skanda.7.83.49)

दत्त्वैवमर्घ्यं देवेशि तत्र खङ्गं च जागृयात्। नित्यं संपूज्य विधिना अष्टम्यां यावदेव हि

dattvaivamarghyaṁ deveśi tatra khaṅgaṁ ca jāgṛyāt| nityaṁ saṁpūjya vidhinā aṣṭamyāṁ yāvadeva hi

हे देवेशी, इस प्रकार अर्घ्य देकर वहाँ खड्ग की रक्षा करते हुए जागरण करना चाहिए, और अष्टमी तक प्रतिदिन विधिपूर्वक उसकी पूजा करनी चाहिए।

श्लोक 50 (skanda.7.83.50)

तद्रात्रौ जागरं कृत्वा प्रभाते ह्यरुणोदये। पातयेन्महिषान्मेषानग्रतो गतकंधरान्

tadrātrau jāgaraṁ kṛtvā prabhāte hyaruṇodaye| pātayenmahiṣānmeṣānagrato gatakaṁdharān

उस रात्रि में जागरण करके, प्रातःकाल अरुणोदय होने पर, आगे बढ़कर महिष और मेष (पशुओं) को गर्दन काटकर गिराना चाहिए।

श्लोक 51 (skanda.7.83.51)

शतमर्धशतं वापि तदर्धार्धं यथेच्छया। सुरासवभृतैः कुंभैस्तर्पयेत्परमेश्वरीम्

śatamardhaśataṁ vāpi tadardhārdhaṁ yathecchayā| surāsavabhṛtaiḥ kuṁbhaiḥ tarpayetparameśvarīm

सौ, पचास, या इच्छानुसार उससे भी आधे की संख्या में; तथा सुरा और आसव से भरे घड़ों से परमेश्वरी को तृप्त करना चाहिए।

श्लोक 52 (skanda.7.83.52)

कापालिकेभ्यस्तद्देयं दासीदासजने तथा। ततोऽपराह्नसमये नवम्यां स्यन्दने स्थिताम्

kāpālikebhyastaddeyaṁ dāsīdāsajane tathā| tato'aparāhnasamaye navamyāṁ syandane sthitām

उसे कापालिकों तथा दासी-दासों को भी देना चाहिए। तत्पश्चात् नवमी के अपराह्न काल में, रथ पर स्थापित—

श्लोक 53 (skanda.7.83.53)

योगेशीं भ्रामयेद्राष्ट्रे स्वयं राजा स्वसैन्यवान्। नदद्भिः शंखपटहैः पठद्भिर्बटुचारणैः

yogeśīṁ bhrāmayedrāṣṭre svayaṁ rājā svasainyavān| nadadbhiḥ śaṁkhapaṭahaiḥ paṭhadbhirbaṭucāraṇaiḥ

योगेशी को राजा स्वयं अपनी सेना सहित राज्य में घुमाए, शंख और नगाड़ों की ध्वनि के साथ तथा पाठ करते हुए बटुकों और चारणों के साथ।

श्लोक 54 (skanda.7.83.54)

भूतेभ्यश्च बलिं दद्यान्मंत्रेणानेन भामिनि। सरक्तं सजलं सान्नं गन्धपुष्पाक्षतैर्युतम्

bhūtebhyaśca baliṁ dadyānmaṁtreṇānena bhāmini| saraktaṁ sajalaṁ sānnaṁ gaṁdhapuṣpākṣatairyutam

हे भामिनी, इस मंत्र के साथ भूतों को बलि देनी चाहिए, जो रक्त, जल, अन्न, गंध, पुष्प तथा अक्षत से युक्त हो।

श्लोक 55 (skanda.7.83.55)

त्रीन्वाराँस्तु त्रिशूलेन दिग्विदिक्षु क्षिपेद्बलिम्। बलिं गृह्णन्त्विमे देवा आदित्या वसवस्तथा

trīnvārāṁstu triśūlena digvidikṣu kṣipedbalim| baliṁ gṛhṇantvime devā ādityā vasavastathā

त्रिशूल से तीन बार दिशाओं और विदिशाओं में बलि फेंकनी चाहिए—'ये आदित्य, वसु आदि देवगण इस बलि को ग्रहण करें।'

श्लोक 56 (skanda.7.83.56)

मरुतोऽथाश्विनौ रुद्राः सुपर्णाः पन्नगा ग्रहाः। सौम्या भवंतु तृप्ताश्च भूताः प्रेताः सुखावहाः

maruto'thāśvinau rudrāḥ suparṇāḥ pannagā grahāḥ| saumyā bhavaṁtu tṛptāśca bhūtāḥ pretāḥ sukhāvahāḥ

'मरुद्गण, अश्विनीकुमार, रुद्र, गरुड़, नाग तथा ग्रह भी सौम्य हों; भूत और प्रेत तृप्त और सुख देने वाले हों।'

श्लोक 57 (skanda.7.83.57)

य एवं कुर्वते यात्रां ब्राह्मणाः क्षेत्रवासिनः। न तेषां शत्रवो नाग्निर्न चौरा न विनायकाः। विघ्नं कुर्वंति देवेशि योगेश्वर्याः प्रसादतः

ya evaṁ kurvate yātrāṁ brāhmaṇāḥ kṣetravāsinaḥ| na teṣāṁ śatravo nāgnirna caurā na vināyakāḥ| vighnaṁ kurvaṁti deveśi yogeśvaryāḥ prasādataḥ

जो ब्राह्मण क्षेत्रवासी होकर इस प्रकार यह यात्रा (उत्सव) सम्पन्न करते हैं, हे देवेशी, योगेश्वरी की कृपा से न शत्रु, न अग्नि, न चोर, और न ही विघ्नकारी गण उनमें कोई विघ्न उत्पन्न करते हैं।

श्लोक 58 (skanda.7.83.58)

सुखिनो भोगभोक्तारः सर्वातंकविवर्जिताः। भवन्ति पुरुषा भक्ता योगेश्वर्या निरंतरम्

sukhino bhogabhoktāraḥ sarvātaṁkavivarjitāḥ| bhavanti puruṣā bhaktā yogeśvaryā niraṁtaram

योगेश्वरी के निरंतर भक्त रहने वाले पुरुष सुखी, भोगों का उपभोग करने वाले तथा समस्त रोगों से रहित हो जाते हैं।

श्लोक 59 (skanda.7.83.59)

इत्येष ते समाख्यातो योगेश्वर्या महोत्सवः। पठतां शृण्वतां चैव सर्वाशुभविनाशनः

ityeṣa te samākhyāto yogeśvaryā mahotsavaḥ| paṭhatāṁ śṛṇvatāṁ caiva sarvāśubhavināśanaḥ

इस प्रकार मैंने तुम्हें योगेश्वरी का यह महोत्सव बताया, जो इसे पढ़ने और सुनने वालों के समस्त अशुभ का नाश करने वाला है।

श्लोक 60 (skanda.7.83.60)

शूलाग्रभिन्नमहिषासुरपृष्ठपीठामुत्खातखड्गरुचिरांगदबाहुदंडाम्। अभ्यर्च्य पंचवदनानुगतं नवम्यां दुर्गां सुदुर्गगहनानि तरंति मर्त्याः

śūlāgrabhinnamahiṣāsurapṛṣṭhapīṭhāmutkhātakhaḍgaruciraṁgadabāhudaṁḍām| abhyarcya paṁcavadanānugataṁ navamyāṁ durgāṁ sudurgagahanāni taraṁti martyāḥ

जिस देवी का आसन त्रिशूल के अग्रभाग से भिन्न किए गए महिषासुर की पीठ है, जिनकी सुंदर भुजदंड उठी हुई तलवार तथा अंगद से सुशोभित हैं, पंचमुख शिव के अनुगमन में रहने वाली उस दुर्गा देवी की नवमी को पूजा करके, मनुष्य दुर्गम और सघन संकटों को पार कर जाते हैं।

अध्याय 82अध्याय-सूचीअध्याय 84