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प्रभास खण्ड · अध्याय 84

आदिनारायणमाहात्म्यवर्णनम्

अध्याय 83अध्याय-सूचीअध्याय 85

श्लोक 1 (skanda.7.84.1)

ईश्वर उवाच। ततो गच्छेन्महादेवि आदिनारायणं हरिम्। तस्याश्च पूर्वदिग्भागे सर्वपातकनाशनम्

īśvara uvāca| tato gacchenmahādevi ādinārāyaṇaṁ harim| tasyāśca pūrvadigbhāge sarvapātakanāśanam

ईश्वर ने कहा—हे महादेवी, इसके पश्चात् आदिनारायण हरि के पास जाना चाहिए, जो उसी (योगेश्वरी) से पूर्व दिशा में स्थित तथा समस्त पापों का नाश करने वाले हैं।

श्लोक 2 (skanda.7.84.2)

पादुकासनसंयुक्तं सर्वदैत्यांतकारिणम्। आदौ कृतयुगे देवि दैत्योऽभून्मेघवाहनः

pādukāsanasaṁyuktaṁ sarvadaityāṁtakāriṇam| ādau kṛtayuge devi daityo'bhūnmeghavāhanaḥ

वे पादुका-आसन से युक्त हैं तथा समस्त दैत्यों का अंत करने वाले हैं। हे देवी, आरंभ में कृतयुग में मेघवाहन नामक एक दैत्य था।

श्लोक 3 (skanda.7.84.3)

महाबलो महाकायो योजनायुतविस्तरः। अजेयः सर्वदेवानां त्रैलोक्यक्षयकारकः। ब्रह्मणा तस्य तुष्टेन वरो दत्तो वरानने

mahābalo mahākāyo yojanāyutavistaraḥ| ajeyaḥ sarvadevānāṁ trailokyakṣayakārakaḥ| brahmaṇā tasya tuṣṭena varo datto varānane

वह महाबली, विशालकाय, दस हजार योजन विस्तार वाला, समस्त देवताओं के लिए अजेय तथा त्रैलोक्य का नाश करने वाला था। हे वरानने, उससे प्रसन्न होकर ब्रह्मा ने उसे वरदान दिया।

श्लोक 4 (skanda.7.84.4)

यदा पादुकया विष्णुस्त्वां हनिष्यति संयुगे। तदैव मृत्युर्भविता नान्यथा मरणं तव

yadā pādukayā viṣṇustvāṁ haniṣyati saṁyuge| tadaiva mṛtyurbhavitā nānyathā maraṇaṁ tava

'जब विष्णु युद्ध में अपनी पादुका से तुम्हारा वध करेंगे, तभी तुम्हारी मृत्यु होगी, अन्यथा तुम्हारा मरण नहीं होगा।'

श्लोक 5 (skanda.7.84.5)

इति लब्धवरो दैत्यः संतापयति भूतलम्। युगानां कोटिमेकां तु सदेवासुरमानुषम्

iti labdhavaro daityaḥ saṁtāpayati bhūtalam| yugānāṁ koṭimekāṁ tu sadevāsuramānuṣam

इस प्रकार वरदान प्राप्त करके वह दैत्य देवों, असुरों और मनुष्यों सहित समस्त भूतल को एक करोड़ युगों तक संतप्त करने लगा।

श्लोक 6 (skanda.7.84.6)

संतप्य बहुधा देवि दक्षिणो दधिमागतः। तत्र विध्वंसयामास ऋषीणामाश्रमाणि वै

saṁtapya bahudhā devi dakṣiṇo dadhimāgataḥ| tatra vidhvaṁsayāmāsa ṛṣīṇāmāśramāṇi vai

हे देवी, अनेक प्रकार से संताप देकर वह दक्षिण दिशा से दधि (सागर) के पास आया; वहाँ उसने ऋषियों के आश्रमों को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया।

श्लोक 7 (skanda.7.84.7)

ततस्त ऋषयः सर्वे विध्वस्ताश्रममण्डलाः। शरणं चैव संप्राप्ता देवदेवं तु केशवम्। अजेयं तं तु संज्ञात्वा तुष्टुवुर्गरुडध्वजम्

tatasta ṛṣayaḥ sarve vidhvastāśramamaṇḍalāḥ| śaraṇaṁ caiva saṁprāptā devadevaṁ tu keśavam| ajeyaṁ taṁ tu saṁjñātvā tuṣṭuvurgaruḍadhvajam

तब वे सभी ऋषि, जिनके आश्रम-मण्डल नष्ट हो चुके थे, देवाधिदेव केशव की शरण में गए; उसे अजेय जानकर उन्होंने गरुड़ध्वज (विष्णु) की स्तुति की।

श्लोक 8 (skanda.7.84.8)

ऋषय ऊचुः। नमः परमकल्याणकल्याणायात्मयोगिने। जनार्द्दनाय देवाय श्रीधराय च वेधसे

ṛṣaya ūcuḥ| namaḥ paramakalyāṇakalyāṇāyātmayogine| janārddanāya devāya śrīdharāya ca vedhase

ऋषियों ने कहा—परम कल्याण के भी कल्याणकारी, आत्मयोगी, जनार्दन देव, श्रीधर तथा विधाता को नमस्कार है।

श्लोक 9 (skanda.7.84.9)

नमः कमलकिंजल्कसुवर्णमुकुटाय च। केशवायातिसूक्ष्माय बृहन्मूर्ते नमोनमः

namaḥ kamalakiṁjalkasuvarṇamukuṭāya ca| keśavāyātisūkṣmāya bṛhanmūrte namonamaḥ

कमल के पराग के समान स्वर्णिम मुकुट धारण करने वाले को नमस्कार है; केशव को, अत्यंत सूक्ष्म तथा विशाल स्वरूप वाले को, बार-बार नमस्कार है।

श्लोक 10 (skanda.7.84.10)

महात्मने वरेण्याय नमः पंकजनाभये। नमोऽस्तु मायाहरये हरये हरिवेधसे

mahātmane vareṇyāya namaḥ paṁkajanābhaye| namo'stu māyāharaye haraye harivedhase

महात्मा, वरेण्य, पंकजनाभ को नमस्कार है; माया को हरने वाले हरि को, तथा हरि-विधाता को नमस्कार हो।

श्लोक 11 (skanda.7.84.11)

हिरण्यगर्भगर्भाय जगतः कारणात्मने। अच्युताय नमो नित्यमनन्ताय नमोनमः

hiraṇyagarbhagarbhāya jagataḥ kāraṇātmane| acyutāya namo nityamanantāya namonamaḥ

हिरण्यगर्भ के भी गर्भ (उत्पत्तिस्थान) तथा जगत् के कारणस्वरूप को, अच्युत को सदा नमस्कार है, अनंत को बार-बार नमस्कार है।

श्लोक 12 (skanda.7.84.12)

नमो मायापटच्छन्न जगद्धात्रे महात्मने। संसारसागरोत्तार ज्ञानपोतप्रदायिने। अकुंठमतये धात्रे सर्गस्थित्यंतकर्मणे

namo māyāpaṭacchanna jagaddhātre mahātmane| saṁsārasāgarottāra jñānapotapradāyine| akuṁṭhamataye dhātre sargasthityaṁtakarmaṇe

माया के आवरण से ढके हुए, जगत् के धाता, महात्मा को नमस्कार है; संसार-सागर से पार उतारने के लिए ज्ञानरूपी नौका देने वाले, अकुण्ठ बुद्धि वाले, सृष्टि-स्थिति-प्रलय का कर्म करने वाले धाता को नमस्कार है।

श्लोक 13 (skanda.7.84.13)

यथा हि वासुदेवेति प्रोक्ते नश्यति पातकम्। तथा विलयमभ्येतु दैत्योऽयं मेघवाहनः

yathā hi vāsudeveti prokte naśyati pātakam| tathā vilayamabhyetu daityo'yaṁ meghavāhanaḥ

जिस प्रकार 'वासुदेव' नाम के उच्चारण मात्र से पाप नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार यह मेघवाहन नामक दैत्य विलय को प्राप्त हो।

श्लोक 14 (skanda.7.84.14)

यथा विष्णुः स्वभक्तेषु पापमाप्नोति संस्थितम्। तथा विनाशमायातु दैत्योऽयं पापकर्मकृत्

yathā viṣṇuḥ svabhakteṣu pāpamāpnoti saṁsthitam| tathā vināśamāyātu daityo'yaṁ pāpakarmakṛt

जिस प्रकार विष्णु अपने भक्तों में स्थित पाप को ग्रहण कर लेते हैं, उसी प्रकार यह पापकर्म करने वाला दैत्य विनाश को प्राप्त हो।

श्लोक 15 (skanda.7.84.15)

स्मृतमात्रो यथा विष्णुः सर्वं पापं व्यपोहति। तथा प्रणाशमभ्येतु दैत्योऽयं मेघवाहनः

smṛtamātro yathā viṣṇuḥ sarvaṁ pāpaṁ vyapohati| tathā praṇāśamabhyetu daityo'yaṁ meghavāhanaḥ

जिस प्रकार केवल स्मरण मात्र से विष्णु समस्त पाप को दूर कर देते हैं, उसी प्रकार यह मेघवाहन दैत्य नाश को प्राप्त हो।

श्लोक 16 (skanda.7.84.16)

भवंतु भद्राणि समस्तदोषाः प्रयांतु नाशं जगतोऽखिलस्य। अभेद्यभक्त्या परमेश्वरेशे स्मृते जगद्धातरि वासुदेवे

bhavaṁtu bhadrāṇi samastadoṣāḥ prayāṁtu nāśaṁ jagato'khilasya| abhedyabhaktyā parameśvareśe smṛte jagaddhātari vāsudeve

जब अभेद्य भक्ति से जगद्धाता, परमेश्वरों के भी ईश्वर वासुदेव का स्मरण किया जाता है, तब समस्त जगत् का कल्याण हो और सभी दोष नष्ट हो जाएँ।

श्लोक 17 (skanda.7.84.17)

ये भूतले ये दिवि येऽन्तरिक्षे रसातले प्राणिगणाश्च केचित्। भवन्तु ते सिद्धियुता नरोत्तमाः स्मृते जगद्धातरि वासुदेवे

ye bhūtale ye divi ye'ntarikṣe rasātale prāṇigaṇāśca kecit| bhavantu te siddhiyutā narottamāḥ smṛte jagaddhātari vāsudeve

पृथ्वी पर, स्वर्ग में, अंतरिक्ष में अथवा पाताल में जो भी प्राणि-समूह हैं, वे सब जगद्धाता वासुदेव का स्मरण करने पर सिद्धियुक्त श्रेष्ठ पुरुष हो जाएँ।

श्लोक 18 (skanda.7.84.18)

ये प्राणिनः कुत्रचिदत्र संति ब्रह्माण्डमध्ये परतश्च केचित्। तेषां तु सिद्धिः परमास्त्वनिंद्या स्तुते जगद्धातरि वासुदेवे

ye prāṇinaḥ kutracidatra saṁti brahmāṇḍamadhye parataśca kecit| teṣāṁ tu siddhiḥ paramāstvaniṁdyā stute jagaddhātari vāsudeve

जो भी प्राणी इस ब्रह्मांड के भीतर कहीं भी हों, अथवा इससे परे भी कोई हों, जगद्धाता वासुदेव की स्तुति करने पर उन सभी को निंदारहित परम सिद्धि प्राप्त हो।

श्लोक 19 (skanda.7.84.19)

ईश्वर उवाच। इति स्तुतस्तदा देवि आदिनारायणो हरिः। ज्ञात्वा स भावि कार्यं तत्समारुह्य च पादुकाम्

īśvara uvāca| iti stutastadā devi ādinārāyaṇo hariḥ| jñātvā sa bhāvi kāryaṁ tatsamāruhya ca pādukām

ईश्वर ने कहा—हे देवी, इस प्रकार स्तुति किए जाने पर, आदिनारायण हरि ने होने वाले कार्य को जानकर अपनी पादुका पर आरूढ़ हो गए।

श्लोक 20 (skanda.7.84.20)

बभूव तेषां प्रत्यक्ष ऋषीणां पापनाशनः। उवाच प्रणतान्सर्वान्किं वा कार्यं हृदि स्थितम्

babhūva teṣāṁ pratyakṣa ṛṣīṇāṁ pāpanāśanaḥ| uvāca praṇatānsarvānkiṁ vā kāryaṁ hṛdi sthitam

वह पापनाशक भगवान् उन ऋषियों के समक्ष प्रत्यक्ष हुए, और नतमस्तक हुए सभी ऋषियों से कहा—'तुम्हारे हृदय में क्या कार्य स्थित है?'

श्लोक 21 (skanda.7.84.21)

कथ्यतां तत्करिष्यामि युष्मत्स्तोत्रेण तर्पितः

kathyatāṁ tatkariṣyāmi yuṣmatstotreṇa tarpitaḥ

'कह दो, मैं वह करूँगा; तुम्हारे स्तोत्र से मैं तृप्त हुआ हूँ।'

श्लोक 22 (skanda.7.84.22)

इत्युक्ता ऋषयः सर्वे कृतांजलिपुटाः स्थिताः। आदिदेवं हरिं प्रोचुः सर्वे नतशिरोधराः

ityuktā ṛṣayaḥ sarve kṛtāṁjalipuṭāḥ sthitāḥ| ādidevaṁ hariṁ procuḥ sarve nataśirodharāḥ

यह सुनकर सभी ऋषि हाथ जोड़कर खड़े हो गए, और सभी नतमस्तक होकर आदिदेव हरि से बोले—

श्लोक 23 (skanda.7.84.23)

ऋषय ऊचुः। जानासि सर्वं त्वं देव न चास्त्यविदितं तव। इमं दैत्यं महादेव संहरस्व महाबलम्। यथेदं सकलं विश्वं निरातंकं भवेत्प्रभो

ṛṣaya ūcuḥ| jānāsi sarvaṁ tvaṁ deva na cāstyaviditaṁ tava| imaṁ daityaṁ mahādeva saṁharasva mahābalam| yathedaṁ sakalaṁ viśvaṁ nirātaṁkaṁ bhavetprabho

ऋषियों ने कहा—हे देव, आप सब कुछ जानते हैं, आपसे कुछ भी अज्ञात नहीं है। हे महादेव, इस महाबली दैत्य का संहार कीजिए, ताकि हे प्रभु, यह सम्पूर्ण विश्व भयरहित हो जाए।

श्लोक 24 (skanda.7.84.24)

इत्युक्तस्तैस्तदा विष्णुर्दैत्यमाहूय संयुगे। ताडयामास तं दैत्यं हृदि पादुकया शुभे

ityuktastaistadā viṣṇurdaityamāhūya saṁyuge| tāḍayāmāsa taṁ daityaṁ hṛdi pādukayā śubhe

उनके ऐसा कहने पर, तब विष्णु ने उस दैत्य को युद्ध में बुलाकर, हे शुभे, अपनी पादुका से उसके हृदय पर प्रहार किया।

श्लोक 25 (skanda.7.84.25)

स हतः पतितो दैत्यो विगतासुर्महोदधौ। हत्वा दैत्यवरं देवस्तत्र स्थाने स्थितोऽभवत्। पादुकासनसंस्थस्तु तत्राद्यापि वरानने

sa hataḥ patito daityo vigatāsurmahodadhau| hatvā daityavaraṁ devastatra sthāne sthito'bhavat| pādukāsanasaṁsthastu tatrādyāpi varānane

वह दैत्य आघात से गिर पड़ा और प्राणहीन होकर महासागर में गिर गया। उस श्रेष्ठ दैत्य का वध करके भगवान् उसी स्थान पर स्थित हो गए, और हे वरानने, वे आज भी वहाँ पादुका-आसन पर विराजमान हैं।

श्लोक 26 (skanda.7.84.26)

यस्तं पूजयते भक्त्या एकादश्यां नरोत्तमः। सोश्ववमेधफलं प्राप्य मोदते दिवि देववत्

yastaṁ pūjayate bhaktyā ekādaśyāṁ narottamaḥ| sośvavamedhaphalaṁ prāpya modate divi devavat

जो श्रेष्ठ पुरुष एकादशी को भक्तिपूर्वक उनकी पूजा करता है, वह अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त करके देवताओं के समान स्वर्ग में आनंदित होता है।

श्लोक 27 (skanda.7.84.27)

गोलक्षं ब्राह्मणे दत्त्वा यत्फलं प्राप्नुयान्नरः। तदादिदेवे गोविन्दे दृष्टे भक्त्या फलं लभेत्

golakṣaṁ brāhmaṇe dattvā yatphalaṁ prāpnuyānnaraḥ| tadādideve govinde dṛṣṭe bhaktyā phalaṁ labhet

एक लाख गौओं का ब्राह्मण को दान देने से मनुष्य जो फल पाता है, वही फल आदिदेव गोविंद के भक्तिपूर्वक दर्शन से प्राप्त हो जाता है।

श्लोक 28 (skanda.7.84.28)

कलौ कृतयुगं तेषां क्लेशस्तेषां सुखाधिकः। आदिनारायणो देवो येषां हृदयसंस्थितः

kalau kṛtayugaṁ teṣāṁ kleśasteṣāṁ sukhādhikaḥ| ādinārāyaṇo devo yeṣāṁ hṛdayasaṁsthitaḥ

जिनके हृदय में आदिनारायण देव विराजमान हैं, उनके लिए कलियुग भी कृतयुग के समान है, और उनका क्लेश भी सुख से बढ़कर है।

श्लोक 29 (skanda.7.84.29)

एकादश्यां रविदिने स्नात्वा संनिहिता जले। आदिनारायणं पूज्य मुच्यते भवबन्धनात्

ekādaśyāṁ ravidine snātvā saṁnihitā jale| ādinārāyaṇaṁ pūjya mucyate bhavabandhanāt

एकादशी के दिन रविवार को समीपवर्ती जल में स्नान करके आदिनारायण की पूजा करने से मनुष्य संसार-बंधन से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 30 (skanda.7.84.30)

इति ते कथितं देवि माहात्म्यं विष्णुदैवतम्। श्रुतं पापहरं नृणां दारिद्यौघविनाशनम्

iti te kathitaṁ devi māhātmyaṁ viṣṇudaivatam| śrutaṁ pāpaharaṁ nṛṇāṁ dāridryaughavināśanam

हे देवी, इस प्रकार मैंने तुम्हें विष्णु-देवता के इस माहात्म्य को बताया है, जिसका श्रवण मनुष्यों के पापों का हरण करने वाला तथा दरिद्रता के समूह का नाश करने वाला है।

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