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अम्बिका खण्ड · अध्याय 1

प्रयाग में ऋषियों का प्रश्न

अध्याय-सूचीअध्याय 2

श्लोक 1 (skanda.8.1.1)

नमः परमदेवाय त्रैगुण्यविजितात्मने । शाश्वते योगरूपाय संसाराभावहेतवे

namaḥ paramadevāya traiguṇyavijitātmane | śāśvate yogarūpāya saṁsārābhāvahetave

उन परमदेव को नमस्कार है, जो त्रिगुणों से परे अपने स्वरूप में स्थित हैं, जो शाश्वत हैं, योगस्वरूप हैं और संसार के अभाव (अंत) के हेतु हैं।

श्लोक 2 (skanda.8.1.2)

स्थितिसंरोधसर्गाणां हेतवेऽन्तप्रसारिणे । षड्विंशाय प्रधानाय महादेवाय धीमते

sthitisaṁrodhasargāṇāṁ hetave'ntaprasāriṇe | ṣaḍviṁśāya pradhānāya mahādevāya dhīmate

जो सृष्टि, स्थिति और संहार के कारण हैं और भीतर व्याप्त रहते हैं, जो छब्बीसवें तत्त्व हैं, प्रधान हैं, उन बुद्धिमान महादेव को नमस्कार है।

श्लोक 3 (skanda.8.1.3)

प्रजापतेर्महाक्षेत्रे गङ्गाकालिन्दिसङ्गमे । प्रयागे परमे पुण्ये ब्रह्मणो लोकवर्त्मनि

prajāpatermahākṣetre gaṅgākālindisaṅgame | prayāge parame puṇye brahmaṇo lokavartmani

प्रजापति के उस महाक्षेत्र प्रयाग में, जहाँ गंगा और कालिन्दी (यमुना) का संगम है, उस परम पुण्य स्थान में, जो ब्रह्मलोक जाने का मार्ग है।

श्लोक 4 (skanda.8.1.4)

मुनयः शंशितात्मानस्तपसा क्षीणकल्मषाः । तीर्थसंप्लवनार्थाय पौर्णमास्यां कृताह्निकाः

munayaḥ śaṁśitātmānastapasā kṣīṇakalmaṣāḥ | tīrthasaṁplavanārthāya paurṇamāsyāṁ kṛtāhnikāḥ

वहाँ शुद्धचित्त मुनि, जिनके पाप तप से क्षीण हो चुके थे, पूर्णिमा के दिन तीर्थ में स्नान करने के लिए अपने नित्यकर्म कर चुके थे।

श्लोक 5 (skanda.8.1.5)

पौराणिकमपश्यन्त सूतं सत्यपरायणम् । स्नात्वा तस्मिन्महातीर्थे प्रणामार्थमुपागतम्

paurāṇikamapaśyanta sūtaṁ satyaparāyaṇam | snātvā tasminmahātīrthe praṇāmārthamupāgatam

वहाँ स्नान के पश्चात् उन्होंने सत्यनिष्ठ पौराणिक सूत जी को देखा, जो उस महातीर्थ में स्नान करके प्रणाम करने के लिए वहाँ आए थे।

श्लोक 6 (skanda.8.1.6)

दृष्ट्वा ते सूतमायान्तमृषयो हृष्टमानसाः । आशास्यासनसंवेशं तद्योगं समकल्पयन्

dṛṣṭvā te sūtamāyāntamṛṣayo hṛṣṭamānasāḥ | āśāsyāsanasaṁveśaṁ tadyogaṁ samakalpayan

सूत जी को आते देखकर वे ऋषि हर्षित मन से उनका सत्कार चाहते हुए आसन आदि की समुचित व्यवस्था करने लगे।

श्लोक 7 (skanda.8.1.7)

स प्रणम्य ततः सर्वान् सूतस्तान्मुनिपुङ्गवान् । प्रदत्तमासनं भेजे सर्वधर्मसमन्वितः

sa praṇamya tataḥ sarvān sūtastānmunipuṅgavān | pradattamāsanaṁ bheje sarvadharmasamanvitaḥ

तब सर्वधर्मसंपन्न सूत जी उन सभी श्रेष्ठ मुनियों को प्रणाम करके उन्हें दिए गए आसन पर विराजमान हुए।

श्लोक 8 (skanda.8.1.8)

तमासीनमपृच्छन्ते मुनयस्तपसैधिताः । ब्रह्मसत्रे पुरा साधो नैमिशारण्यवासिनाम्

tamāsīnamapṛcchante munayastapasaidhitāḥ | brahmasatre purā sādho naimiśāraṇyavāsinām

जब वे बैठ गए, तब तप से पुष्ट हुए मुनियों ने उनसे पूछा — हे साधो! पूर्वकाल में नैमिषारण्य के निवासियों के ब्रह्मसत्र में...

श्लोक 9 (skanda.8.1.9)

कथितं भारताख्यानं पुराणं च परं त्वया । तेन नः प्रतिभासि त्वं साक्षात्सत्यवतीसुतः

kathitaṁ bhāratākhyānaṁ purāṇaṁ ca paraṁ tvayā | tena naḥ pratibhāsi tvaṁ sākṣātsatyavatīsutaḥ

...आपने महाभारत की कथा और परम पुराण का वर्णन किया था, इसीलिए आप हमें साक्षात् सत्यवती-पुत्र (व्यास) के समान प्रतीत होते हैं।

श्लोक 10 (skanda.8.1.10)

सर्वागमपरार्थज्ञः सत्यधर्मपरायणः । द्विजपूजारतो नित्यं तेन पृच्छां त्वमर्हसि

sarvāgamaparārthajñaḥ satyadharmaparāyaṇaḥ | dvijapūjārato nityaṁ tena pṛcchāṁ tvamarhasi

आप समस्त आगमों के परम अर्थ के ज्ञाता हैं, सत्यधर्म में तत्पर हैं और सदा द्विजों के पूजन में रत रहते हैं, इसलिए आप हमारे प्रश्न के योग्य पात्र हैं।

श्लोक 11 (skanda.8.1.11)

भारताख्यानसदृशं पुराणाद्यद्विशिष्यते । तत्त्वा पृच्छाम वै जन्म कार्त्तिकेयस्य धीमतः

bhāratākhyānasadṛśaṁ purāṇādyadviśiṣyate | tattvā pṛcchāma vai janma kārttikeyasya dhīmataḥ

जो पुराण महाभारत की कथा के समान अथवा उससे भी विशिष्ट है, वही — बुद्धिमान कार्तिकेय का जन्म — हम आपसे पूछना चाहते हैं।

श्लोक 12 (skanda.8.1.12)

इमे हि मुनयः सर्वे त्वदुपास्तिपरायणाः । स्कन्दसंभवशुश्रूषा संजातौत्सुक्यमानसाः

ime hi munayaḥ sarve tvadupāstiparāyaṇāḥ | skandasaṁbhavaśuśrūṣā saṁjātautsukyamānasāḥ

ये सभी मुनि आपकी उपासना में तत्पर हैं और स्कन्द के जन्म को सुनने के लिए इनके मन में उत्सुकता उत्पन्न हो गई है।

श्लोक 13 (skanda.8.1.13)

एवमुक्तस्तदा सूतः संसिद्धैर्मुनिपुंगवैः । प्रोवाचेदं मुनीन्सर्वान्वचो भूतार्थवाचकम्

evamuktastadā sūtaḥ saṁsiddhairmunipuṁgavaiḥ | provācedaṁ munīnsarvānvaco bhūtārthavācakam

इस प्रकार उन सिद्ध श्रेष्ठ मुनियों द्वारा कहे जाने पर सूत जी ने समस्त मुनियों से यह यथार्थ अर्थ बताने वाला वचन कहा।

श्लोक 14 (skanda.8.1.14)

शृणुध्वं मुनयः सर्वे कार्त्तिकेयस्य सम्भवम् । ब्रह्मण्यत्वं समाहात्म्यं वीर्यं च त्रिदशाधिकम्

śṛṇudhvaṁ munayaḥ sarve kārttikeyasya sambhavam | brahmaṇyatvaṁ samāhātmyaṁ vīryaṁ ca tridaśādhikam

हे मुनियो! आप सब कार्तिकेय के जन्म, उनकी ब्राह्मणभक्ति, उनकी महिमा और देवताओं से भी अधिक उनके पराक्रम को सुनिए।

श्लोक 15 (skanda.8.1.15)

मुमुक्षया परं स्थानं याते शुकमहात्मनि । सुतशोकाभिसंतप्तो व्यासस्त्र्यम्बकमैक्षत

mumukṣayā paraṁ sthānaṁ yāte śukamahātmani | sutaśokābhisaṁtapto vyāsastryambakamaikṣata

जब मुक्ति की इच्छा से महात्मा शुक परम पद को प्राप्त हो गए, तब पुत्र-शोक से संतप्त व्यास जी ने त्र्यम्बक (शिव) का दर्शन किया।

श्लोक 16 (skanda.8.1.16)

दृष्ट्वैव स महेशानं व्यासोऽभूद्विगतव्यथः । विचरन्स तदा लोकान्मुनिः सत्यवतीसुतः

dṛṣṭvaiva sa maheśānaṁ vyāso'bhūdvigatavyathaḥ | vicaransa tadā lokānmuniḥ satyavatīsutaḥ

महेश्वर का दर्शन करते ही सत्यवती-पुत्र मुनि व्यास की व्यथा दूर हो गई, और वे तब लोकों में विचरण करने लगे।

श्लोक 17 (skanda.8.1.17)

मेरुशृङ्गेऽथ ददृशे ब्रह्मणः सुतमग्रजम् । सनत्कुमारं वरदं योगैश्वर्यसमन्वितम्

meruśṛṅge'tha dadṛśe brahmaṇaḥ sutamagrajam | sanatkumāraṁ varadaṁ yogaiśvaryasamanvitam

तब मेरु के शिखर पर उन्होंने ब्रह्मा के ज्येष्ठ पुत्र, वरदाता, योगैश्वर्य से संपन्न सनत्कुमार को देखा।

श्लोक 18 (skanda.8.1.18)

विमाने रविसंकाशे तिष्ठन्तमनलप्रभम् । मुनिभिर्योगसंसिद्धैस्तपोयुक्तैर्महात्मभिः

vimāne ravisaṁkāśe tiṣṭhantamanalaprabham | munibhiryogasaṁsiddhaistapoyuktairmahātmabhiḥ

वे सूर्य के समान तेजस्वी, अग्नि के समान प्रभावाले विमान में विराजमान थे, तथा योगसिद्ध, तपोयुक्त महात्मा मुनियों से घिरे हुए थे।

श्लोक 19 (skanda.8.1.19)

वेदवेदाङ्गतत्त्वज्ञैः सर्वधर्मागमान्वितैः । सकलावाप्तविद्यैस्तु चतुर्वक्त्रमिवावृतम्

vedavedāṅgatattvajñaiḥ sarvadharmāgamānvitaiḥ | sakalāvāptavidyaistu caturvaktramivāvṛtam

वे मुनि वेद-वेदांगों के तत्त्वज्ञ, समस्त धर्मशास्त्रों से युक्त और सम्पूर्ण विद्याओं को प्राप्त थे, मानो चतुर्मुख ब्रह्मा ही घिरे हुए हों।

श्लोक 20 (skanda.8.1.20)

दृष्ट्वा तं सुमहात्मानं व्यासो मुनिमथास्थितम् । ववन्दे परया भक्त्या साक्षादिव पितामहम्

dṛṣṭvā taṁ sumahātmānaṁ vyāso munimathāsthitam | vavande parayā bhaktyā sākṣādiva pitāmaham

उस महात्मा मुनि को वहाँ विराजमान देखकर व्यास जी ने साक्षात् पितामह के समान परम भक्ति से उन्हें प्रणाम किया।

श्लोक 21 (skanda.8.1.21)

ब्रह्मसूनुरथ व्यासं समायातं महौजसम् । परिष्वज्य परं प्रेम्णा प्रोवाच वचनं शुभम्

brahmasūnuratha vyāsaṁ samāyātaṁ mahaujasam | pariṣvajya paraṁ premṇā provāca vacanaṁ śubham

तब ब्रह्मपुत्र सनत्कुमार ने पधारे हुए महातेजस्वी व्यास जी को परम प्रेम से आलिंगन कर यह शुभ वचन कहा।

श्लोक 22 (skanda.8.1.22)

दिष्ट्या त्वमसि धर्मज्ञ प्रसादात्पारमेश्वरात् । अपेतशोकः सम्प्राप्तः पृच्छस्व प्रवदाम्यहम्

diṣṭyā tvamasi dharmajña prasādātpārameśvarāt | apetaśokaḥ samprāptaḥ pṛcchasva pravadāmyaham

हे धर्मज्ञ! सौभाग्य से परमेश्वर की कृपा से आप शोकरहित होकर यहाँ पधारे हैं। पूछिए, मैं आपको बताता हूँ।

श्लोक 23 (skanda.8.1.23)

श्रुत्वाथ वचनं सूनोर्ब्रह्मणो मुनिपुंगवः । इदमाह वचो विप्राश्चिरं यद्धृदये स्थितम्

śrutvātha vacanaṁ sūnorbrahmaṇo munipuṁgavaḥ | idamāha vaco viprāściraṁ yaddhṛdaye sthitam

तब ब्रह्मपुत्र के इस वचन को सुनकर उस श्रेष्ठ मुनि ने हे विप्रो! वह बात कही, जो चिरकाल से उनके हृदय में स्थित थी।

श्लोक 24 (skanda.8.1.24)

कुमारस्य कथं जन्म कार्त्तिकेयस्य धीमतः । किंनिमित्तं कुतो वास्य इच्छाम्येतद्धि वेदितुम्

kumārasya kathaṁ janma kārttikeyasya dhīmataḥ | kiṁnimittaṁ kuto vāsya icchāmyetaddhi veditum

बुद्धिमान कुमार कार्तिकेय का जन्म कैसे हुआ, किस निमित्त से और किससे हुआ — मैं यही जानना चाहता हूँ।

श्लोक 25 (skanda.8.1.25)

कथं रुद्रसुतश्चासौ वह्निगङ्गासुतः कथम् । उमायास्तनयश्चैव स्वाहायाश्च कथं पुनः । सुपर्ण्याश्चाथ मातॄणां कृत्तिकानां कथं च सः

kathaṁ rudrasutaścāsau vahnigaṅgāsutaḥ katham | umāyāstanayaścaiva svāhāyāśca kathaṁ punaḥ | suparṇyāścātha mātṝṇāṁ kṛttikānāṁ kathaṁ ca saḥ

वे कैसे रुद्र के पुत्र हैं, और कैसे अग्नि तथा गंगा के पुत्र हैं? कैसे उमा के पुत्र हैं और फिर स्वाहा के भी पुत्र कैसे कहलाते हैं? तथा सुपर्णा, मातृगणों और कृत्तिकाओं के पुत्र वे किस प्रकार हैं?

श्लोक 26 (skanda.8.1.26)

कश्चासौ पूर्वमुत्पन्नः किंतपाः कश्च विक्रमः । भूतसंमोहनं ह्येतत्कथयस्व यथातथम्

kaścāsau pūrvamutpannaḥ kiṁtapāḥ kaśca vikramaḥ | bhūtasaṁmohanaṁ hyetatkathayasva yathātatham

वे पहले कौन थे जो उत्पन्न हुए, उनका तप कैसा था और उनका पराक्रम कैसा है? यह बात समस्त प्राणियों को मोहित करने वाली है, इसे यथार्थ रूप में मुझे बताइए।

श्लोक 27 (skanda.8.1.27)

सूत उवाच । एवं स पृष्टस्तेजस्वी ब्रह्मणः पुत्रसत्तमः । उवाच सर्वं सर्वज्ञो व्यासायाक्लिष्टकारिणे । तच्छृणुध्वं यथातत्त्वं कीर्त्यमानं मयानघाः

sūta uvāca | evaṁ sa pṛṣṭastejasvī brahmaṇaḥ putrasattamaḥ | uvāca sarvaṁ sarvajño vyāsāyākliṣṭakāriṇe | tacchṛṇudhvaṁ yathātattvaṁ kīrtyamānaṁ mayānaghāḥ

सूत जी ने कहा — इस प्रकार पूछे जाने पर ब्रह्मा के उस तेजस्वी और श्रेष्ठ पुत्र, सर्वज्ञ सनत्कुमार ने अक्लिष्टकारी व्यास जी को सब कुछ बताया। हे निष्पाप मुनियो! अब मेरे द्वारा कहे जाने वाले उस यथार्थ वृत्तान्त को सुनिए।

अध्याय-सूचीअध्याय 2